नगालैंड के डिमापूर रेलवे स्टेशन(स्टेशन पर लिखा है. ‘डिमापूर’) के वेटिंग हॉल में डिब्रूगढ़ से नयी दिल्ली जानेवाली राजधानी एक्सप्रेस पकड़ने के लिए बैठा हूं । 11/04 की रात 2 बजे की बात है, जो ट्रेन के डिमापूर पहुंचने का टाईम है । गाड़ी के खुलते ही एनएससीएन(नेशनल शोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड. आइसाक मुइवा) नेताओं से केंद्र सरकार की वार्ता की सूचना मिलती है । 5 महीने के अंतराल के बाद दिमापूर(डिमापुर) में ही आयोजित इस वार्ता के बारे में जानने की उत्सुकता होती है । डिमापुर पुलिस परिसर में 12/04 को आयोजित इस वार्ता में शामिल होने एनएससीएन सुप्रीमो टी. मुइवा अपने गुट के 20 सदस्यों की टीम के साथ पहुंचे । केंद्र की ओर से वार्ताकार पूर्व खुफिया अधिकारी अक्षय कुमार मिश्र ने नगा नेताओं से अंतिम समझौते के प्रारूपों पर विमर्श किया । लेकिन पहले की तरह बेनतीजा वार्ताओं की तरह इस वार्ता का सार भी गतिरोध ही निकला । नगा नेताओं की तरह अक्षय मिश्र भी हर वार्ता के बाद कुछ भी बोलने से परहेज करते हैं और मीडिया से मुखातिब नहीं होते । लेकिन इस बार काफी दिनों बाद एक एनएससीएन नेता रेजिंग तान्खुल ने मुंह खोला. ‘यह सार्थक बैठक हुई, 2 घंटे चली । इस बात पर सहमति बनी कि ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ के आधार पर अंतिम समाधान निकाला जाएं’ । लेकिन बैठक के बाद दोनों पक्ष अपना मुंह भी बंद रखते हैं ।

एनएससीएन(आईएम) प्रतिनिधिमंडल से मिलने के बाद केंद्र के वार्ताकार अक्षय मिश्र ने सात नगा गुटों के संयुक्त मंच एनएनपीजी(नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप) नेताओं से भी डिमापुर में मुलाकात की । इन गुटों से केंद्र का अलग एग्रीमेंट चल रहा है और उन नगा नेताओं से भी अलग शांति वार्ता अक्षय मिश्र चला रहे हैं । ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ 3/08/2015 का है, जो केंद्र सरकार ने दिल्ली में सिर्फ एनएससीएन(मुइवा गुट) के साथ किया हुआ है । उस समय से जारी शांति वार्ता गतिरोध पर अटकी है । नगा नेता वार्ता के बाद चुपचाप निकल जाते हैं । फिर उनका अपने हेडक्वार्टर डिमापुर से बयान आता है, जिसमें नगा गुट अपनी ‘विशिष्ट पहचान और संस्कृति’ की दुहाई देते हुए ‘अलग झंडा और अलग संविधान’ का अड़ियल रवैया छोड़ने को तैयार नहीं हैं ।

07/04/2023 को जब मैं डिमापुर में ही था, उसी समय जानकारी मिली कि केंद्र सरकार के तीन नगा विद्रोही गुटों से संघर्षविराम की अवधि एक साल के लिए फिर से बढ़ायी है । केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से दिल्ली से जारी वक्तव्य के अनुसार ये सारे एनएससीएन से ही निकले गुट हैं, जिनसे अलग.अलग 2021.22 से संघर्षविराम एक.एक साल के लिए चल रहा है, अवधि बढ़ायी जा रही है । इन गुटों से कोई वार्ता की अभी तक रिपोर्ट नहीं है ।

सबसे पुराने और दबंग एनएससीएन(मुइवा गुट) का डिमापूर के हेब्रन में हेडक्वार्टर है और अन्य नगा गुटों के भी अड्डे डिमापूर में ही हैं । अक्षय मिश्र की मुलाकात का भी कोई विवरण नहीं मिल पाया । इसका मतलब गतिरोध बरकरार है ।

डिमापूर में तीन दिन गुजारकर मैं नगालैंड की राजधानी कोहिमा चला गया और वहां भी तीन दिन खोजी अभियान में जुटा रहा । डिब्रूगढ़.नयी दिल्ली राजधानी पकड़ने के लिए फिर वापस 11/04 की रात को डिमापुर लौटाए तब नगा वार्ता की सूचना मिली । डिमापूर में और उसके बाद कोहिमा में भी मुझे बताया जाता है कि जहां जाना हो, जिससे मिलना हो या जो भी काम हो, शाम 6 बजे से पहले कर लें । कारण, 6 बजे के बाद बाजार दुकानें बंद हो जाएंगीए ऑटो.टैक्सी कुछ भी नहीं मिलेगी, सड़कों पर सन्नाटा मिलेगा । नगालैंड से बाहर के लोग(गैर.नागा) बताते हैं कि यह आतंक नगा गुटों का है, जिनकी समानान्तर सरकार की टैक्स वसूली और कानून शाम के बाद लागू हो जाती है । बहरहाल, 09/04 को सुबह मैं कोहिमा शहर से 22 किमी दूर खोनोमा गांव पहुंचा । ग्रीन विलेज के नाम से मशहूर खोनोमा गांव नगा विद्रोह के जन्मदाता के पैतृक गांव के रूप में जाना जाता है । भारती की आजादी से पहले ही 1947 में अंगामी जापु फिजो ने अपने संगठन एनएनसी(नगा नेशनलिस्ट काउंसिल) के बैनर तले ‘स्वतंत्र संप्रभु नगा राष्ट्र’ स्थापना का एलान कर दिया । फिर उसके बाद 1951 में भारत सरकार के खिलाफ नगा विद्रोह की नींव यह दावा करते हुए रखी कि एनएनसी के ‘जनमत संग्रह’ के अनुसार 99:(प्रतिशत) नगा आजादी के समर्थक हैं । उसी आधार पर फिजो के नेतृत्व में इस संगठन से 1952 में पहले आम चुनाव का बायकाट किया । एनएनसी में फूट के बाद 1980 में एनएससीएन(मुइवा गुट. प्ड) और 1988 में दूसरी फूट के बाद एनएससीएन(खपलांग.खोले कोन्यक गुट) अस्तित्व में आया । एक दर्जन नगा उग्रवादी गुटों से पटे नगालैंड को इस अशांति में झोंकनेवाले फिजो के गांव की कहानी अन्य गांवों से अलग है । खोनोमा गांव में शिक्षा विभाग में कार्यरत विजोले बताते हैं कि इस गांव में कोई उग्रवादी गतिविधि नहीं । खोनोमा गांव छात्र संघ का किसी नगा गुट से कोई ताल्लुक नहीं’ जबकि यहीं फिजो पैदा हुए । बकौल बिजोलेए नगा शांति वार्ता में गतिरोध को लेकर असंतोष जरूर है । अंग्रेज शासनकाल में भी नगा किसी के अधीन नहीं रहे, ऐतिहासिक कोहिमा युद्ध नगा अंग्रेज सरकार के बीच का था । बाहर से जो भी नगालैंड आते हैं, नगाओं की भावनाओं को समझते हैं, लेकिन भारत सरकार के कोई अधिकारी भावना की कद्र नहीं करते । नगाओं के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकारे बगैर अंतिम समझौते की उम्मीद नहीं लगती । नगाओं के आपस में गुटबाजी, मगर भारत सरकार से किसी वार्ता की शर्त एक जैसी है । खोनोमा गांव को भारत सरकार ने ग्रीन विलेज के रूप में लिया है । चौराहे पर भारत सरकार के पर्यटन विभाग प्रायोजित 3 करोड़ की 20/10/2005 में रखी गयी आधारशिला खुदी है, जिसका उद्घाटन नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने किया । रियो आज भी मुख्यमंत्री हैं । 09/04 को ही जानकारी मिलती है कि पूर्वी नगा जिलों के जनजातीय संगठनों का प्रतिनिधित्व करनेवाले म्छ्च(इस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन) की 11.सदस्यीय टीम की अलग ‘ंटियर नगालैंड ‘राज्य गठन की मांग के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों से वार्ता तय हुई है । गृह मंत्रालय की 3.सदस्यीय कमिटी का नेतृत्व नगा वार्ताकार अक्षय मिश्र करते हैं और बैठक गुवाहाटी में होती है । लेकिन बातचीत का कोई ब्योरा नहीं मिलता । जब मैं नगालैंड में हूं, उसी समय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी गुवाहाटी और अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में हैं । अरुणाचल प्रदेश में चीन को उन्होंने चेतावनी दी और गुवाहाटी में समूचे उत्तर पूर्व में अमन चैन की बात कही ।

अमित शाह कहते हैं कि जो पूर्वोत्तर कभी कांग्रेस का गढ़ माना जाता था और हिंसाग्रस्त क्षेत्र के रूप में पहचान बनी थी, वहां अब भाजपा के सत्ता में आने के बाद से शांति है । इसे देखते हुए उत्तर पूर्व के अधिकांश इलाकों से आफ़स्पा( ंध्ध. आर्म्स फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट) हटा लिया गया है । नगा उग्रवादी से लेकर पूर्वोत्तर का जन.जीवन आफ़स्पा से प्रभावित है । आफ़स्पा कानून से लैस सेना और अर्द्धसैनिक बलों के बंदूक से गंभीर रूप से घायल नगा लोगों के रिसते जख्मों की ताजा टीस उभरी है । अभी के दर्द का सीधा ताल्लुक पूर्वी नगालैंड के मोन जिले से है, जहां के लोग अलग ॄफ्रंटियर नगालैंड’ राज्य की मांग में शामिल हैं । नगालैंड के डीजीपी रूपिन शर्मा के हवाले से 13 अप्रील को जानकारी मिलती है कि रक्षा मंत्रालय ने सेना के उन 30 जवानों के खिलाफ मुकदमा चलाने से इन्कार कर दिया, जिनकी 04/12/2021 की रात फायरिंग में 6 खान मजदूर मारे गए । केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 06/12/2021 को संसद में इसके खिलाफ हुए भारी हंगामे के बीच बताया कि असम राइफल्स के जवानों ने ‘गलती से नगा उग्रवादी ‘समझकर गोली चला दी, जिसमें 6 लोग मारे गए । राज्य सरकार ने विशेष जांच दल( ष्न) गठित कीए जिसने अपनी तथ्यपरक रिपोर्ट के आधार पर मई, 2022 में एक मेजर रैंक के अधिकारी समेत 30 जवानों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किए और एक साल बाद अभी अप्रैल, 2023 में रक्षा मंत्रालय ने उनकी इस ‘गलती’ के खिलाफ मुकदमा चलाने से इन्कार कर दिया । आफ़स्पाए 1958 के अंतर्गत सेना और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती होती है, जिनके खिलाफ मुकदमा राज्य सरकार या स्थानीय अदालत नहीं चला सकती । दीमापुर के अखबार ॆईस्टर्न मिरर’ के संपादक खिएत्सोनुओ रियो ने अपनी रिपोर्ट में लिखा - ष्ठजब केंद्रीय बलों के बंदूक से हुई कोई भूल भी अपराध की श्रेणी में नहीं आएगी, तो ऐसी भूल दोबारा हो सकती है । नगा लोगों का दर्द समझे बगैर तो कोई गतिरोध खतम नहीं हो सकता ।’ दिसंबर, 2021 की वारदात के तुरंत बाद राज्य मंत्रिमंडल ने आफ़स्पा हटाने की मांग की । संसद में हंगामे के बीच सभी सदस्यों ने दलीय भावना से ऊपर उठ कर नगालैंड से आफ़स्पा हटाने की मांग उठाई । नगालैंड में एक ही गठजोड़ ॆनगा नेशनललिस्ट प्रोग्रेसिव पार्टी ‘है, जो सत्ता में है । विपक्ष है ही नहीं । फरवरी, 2023 के अंत में हुए चुनाव के समय अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर शुरू हुई नगा शांति वार्ता चल रही है, और जल्द समाधान निकल आएगा । 2015 में ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ के समय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दावा किया कि 1997 से बेनतीजा नगा शांति वार्ता का हल निकाल लिया गया । नगालैंड में दूसरी बार ऐसी सरकार बनी, जिसमें भाजपा सत्ता में शामिल है । नगा उग्रवादियों के खिलाफ कोई नहीं बोलता । बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के 30.40 हजार लोग यहां रहकर रोजी कमा रहे हैं । ठेला रेहड़ी पर परांठे बेचनेवाले बिहार के मोतिहारी जिले का पवन शाह और मधेपुरा का टेम्पू चालक महिन्दर डिमापुर स्टेशन के पास सुपर बाजार के सामने खड़े होकर बताता है. ‘00 से 500 रुपये रंगदारी टैक्स नगा वसूलते हैं । सुपर बाजार में अधिकांश दुकानें बिहारियों के हैं, जिन्हें डबल टैक्स देना पड़ता है । पुलिस हमारी नहीं सुनती नगा लोग किसी भी समय पैसा वसूलने पहुंच जाते हैं ।’ 08/04 को दीमापुर में ठेला.रेहड़ी वाला बिहारी बताता है. ष्ठदो दिन पहले ग्रीनबोट कोलनी नं. 3 में लफड़ा हुआ, जहां हम ज्यादा संख्या में रहते हैं । वसूली का विरोध करने पर नगाओं ने कोलनी बंद कर दिया । हमलोग आपस में चंदा करके 80,000 रुपया दिया, तब किसी को बाहर निकलने दिया ।

09/04 को इस्टर संडे के रोज मुख्यमंत्री नेफियू रियो मोन जिले के ओटिंग गांव में थे । उन्होंने ईएनपीओ के ‘फ्रंटियर नगालैंड’ राज्य की मांग का समर्थन किया । क्रिसमस के बधाई संदेश के साथ. साथ मुख्यमंत्री ने स्वीकारा कि नगा शांति वार्ता में गतिरोध का असर विकास कार्यों पर पड़ा है ।

04/12/2021 की असम राइफल्स फायरिंग ओटिंग गांव में ही हुई थी और वहीं से उसी समय अलग ‘फ्रंटियर नगालैंड’ की मांग उठी । 09/04/2023 के सम्मेलन में ओटिंग गांव में मुख्यमंत्री के साथ ईएनपीओ नेतागण मौजूद थे । इन नेताओं ने फरवरी, 2023 में नगालैंड विधान सभा चुनाव का बायकाट करने का फैसला किया था । अमित शाह के आश्वासन पर उनलोगों ने बायकाट वापस लिया । 12/09/2022 को दिल्ली में अमित शाह के साथ नगा उग्रवादियों की बैठक में मुख्यमंत्री नेफियू रियो मौजूद थे । वार्ताकार अक्षय मिश्र भी थे ।

आर. एन. रवि को सितंबर, 2021 में जब नगालैंड से हटाकर तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया, तब उन्होंने नगा वार्ताकार पद से इस्तीफा दे दिया । उसके बाद से वार्ताकार का जिम्मा संभालनेवाले अक्षय मिश्र ने सात नया उग्रवादियों के मंच एनपीजी नेताओं से 15/10/2021 को दिल्ली में पहली मुलाकात की ज्यादातर उग्रवादी पूर्वी नगालैंड से हैं ।

दीमापुर पहुंचने से पहले में 05धअप्रैल को गुवाहाटी में था । गुवाहाटी हाईकोर्ट की 75वीं वर्षगांठ और काजीरंगा नेशनल पार्क के समारोह के सिलसिले में राष्ट्रपति द्रौपदी मूमू आयी थीं । ‘नगालैंड पोस्ट ‘ने कोहिमा से एक खबर छापी जिसमें स्थानीय वकीलों के गुवाहाटी हाईकोर्ट की वर्षगांठ समारोह के बहाने उपजा असंतोष उभरा । नगालैंड बार एसोसियसन के अध्यक्ष अकितो झिमोमी ने कहा - ‘नगालैंड को राज्य का दर्जा मिले 60 वर्ष हो जाने के बावजूद इसका अपना हाईकोर्ट न होना शर्म का विषय है । इस पर गंभीर मंथन की जरूरत है कि 1948 में स्थापित गुवाहाटी हाईकोर्ट के तीन बेंच नगालैंड, मिजोरम और अरूणाचल प्रदेश में अभी तक काम कर रहे हैं । जबकि 2013 में मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय को अपना हाईकोर्ट मिले ।

इस गतिरोध के लिये कौन जिम्मेदार है, यह पाठकों पर छोड़ता हूं । जिन्होंने मेरी अमन प्रकाशन से छपी ताजा किताब ‘भारत की लाइलाज खाजरू नगा संकट’ देखी होगी, उन्हें यह रिपोर्ताज पकड़ने में आसानी होगी ।