जातीय हिंसा, द्वेष और आपसी फूट की आग में जल रहे मणिपुर का सामाजिक जीवन लगातार अस्तव्यस्त चल रहा है । कानून और व्यवस्था ही हिंसा तथा भेदभाव की चपेट में है । इसलिए हालात सामान्य होने के निकट भविष्य में आसार नहीं लग रहे हैं । इसलिए जनजीवन पटरी पर आने में कितना समय लगेगा, कहना मुश्किल है । एक.दूसरे के प्रति अविश्वास और सरकार प्रशासन समेत विभिन्न समुदायों में परस्पर वैमनस्य के शोर.शराबे से खिन्न मणिपुर वासियों की अब एकमात्र चिंता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खामोशी को लेकर है ।
‘सबका साथ सबका विश्वास’ का नारा देकर और ‘मन की बात’ रेडियो प्रसारण में देश की जनता से सीधे रूबरू होकर लोगों का मनोबल बढ़ानेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मणिपुर हिंसा पर चुप्पी सबको खटक रही है । गत हफ्ते ‘मन की बात’ प्रसारण के समय मणिपुर के विभिन्न तबकों के राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधिमंडल के लोग हार.थककर प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली में डेरा डाले हुए थे । लेकिन प्रधानमंत्री न तो किसी से मिले, न ही ‘मन की बात’ कार्यक्रम में मणिपुर का नाम लिया । रविवार, 18 जून को इसके विरोध में मणिपुर वासी भड़क उठे । पश्चिम इंफाल से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार नरेंद्र मोदी के ‘वेमन’ रवैए के विरोध में रेडियो ट्रांजिस्टर सेट लोगों ने ‘मन की बात’ के समय तोड़ दिए ।
लोगों ने चिल्लाकर कहा. ‘मन की बात नहीं, मणिपुर की बात’ । लोगों की चीख.पुकार जायज है । खून.खराबा और तनाव की पीड़ा झेल रही मणिपुर की जनता को सांत्वना या आश्वासन के एक बोल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंह से आज तक नहीं मिले । बेकाबू हिंसा के डेढ़ महीने से ज्यादा हो रहे हैं । इस अप्रत्याशित तनावपूर्ण माहौल की चक्की में एक साथ पुलिस, प्रशासन, जनप्रतिनिधि, सरकार, सिविल सोसायटी संगठन पिस रहे हैं । यहां तक कि मणिपुर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक के लिए किसी नतीजे पर पहुंचना संभव नहीं हो पा रहा है । कानून व व्यवस्था नियंत्रण में न आने और शांति के प्रयास विफल होने की सुविधा पर अटकी है । ये अलग बात है कि इसमें मणिपुर की भाजपा सरकार और नशीली दवाओं की तस्करी में कथित रूप से शामिल माफिया राजनीतिज्ञों की सियासी राजनीति भी शामिल है । लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मणिपुर के लोग उम्मीद लगाए बैठे थे और आज भी उनकी तरफ आशा की नजरों से देख रहे हैं कि वे कुछ बोलें । देश की एकता अखंडता और ‘सारा भारत एक’ की दुहाई हमेशा देनेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मणिपुर मामले में चुप्पी पर चारों तरफ से सवाल उठ रहे हैं । प्रधानमंत्री से मिलने के लिए मणिपुर की 10 विपक्षी पार्टियों का प्रतिनिधिमंडल समय मांगता रहा । नरेंद्र मोदी की अपनी पार्टी के विधायक उनसे मिलने दिल्ली में बैठे रहे ।
इस अब से बिल्कुल बेखबर प्रधानमंत्री अमेरिका जाने की तैयारी में जुटे रहे । नरेंद्र मोदी को अपने ‘प्यारे देशवासियों’ से ज्यादा फिक्र अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन की मेजबानी का पंप एंड शो आनंद लेने की थी । अमेरिकी राष्ट्रपति ने नरेंद्र मोदी को सरकारी भोज से पहले अपने निजी आवास पर पारिवारिक भोज पर आमंत्रित किया था । 21 जून को प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह अमेरिका में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में मन को साधने के लिए योग रके मना रहे थे । अमेरिका रवानगी से पहले ‘चुप्पी साधना’ तोड़कर प्रधानमंत्री मणिपुर के खिन्न प्रतिनिधिमंडलों से जरा मिल लेते तो हिसां से अशांत उनके मन को थोड़ी राहत मिलती । हिंसा में मारे गए और बेघर हुए परिवारों के लोगों का हर दिन मातम दिवस साबित हो रहा है ।
ऐसे में अगर यह सवाल उठा कि कया मणिपुर भारत का हिस्सा है तो यह गलत कैसे है यह प्रश्न मणिपुर की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने ही सिर्फ नहीं उठाया है, जिसके नेतृत्व में 10 पार्टियों का प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांग रहा था । मणिपुर की पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था महिला प्रधान है । कारोबार करके घर.गिरस्ती चलानेवाली मणिपुर ‘इमाओ’(माताओं) का संगठन ‘खवाईटामबंद इमा केइथेल’ सिर्फ प्रधानमंत्री से मिलने 19 जून को दिल्ली पहुंचा । जंतर.मंतर पर धरना प्रदर्शन के दौरान आयोजित संवाददाता सम्मेलन में उसके एक नेता के. धनेशोरी ने कहा. ‘हम भी हिंदू हैं’ हमें भी भारत के नागरिक के रूप में देखा जाना चाहिए । मणिपुर संघर्ष नागरिक और सुरक्षा बलों के बीच टकराव का हो गया है । राज्य पुलिस मेइतई की और असम राइफल्स कूकी.जोमी की तरफदारी कर रही है । प्रधानमंत्री हस्तक्षेप करें । राष्ट्रपति शासन की संभावना पर मणिपुर की कारोबारी माताओं ने कहा. ‘हमारी राज्य सरकार है, हमारे प्रधानमंत्री हैं । पूरा प्रशासन सरुक्षा बलों के हवाले जाना हमें मंजूर नहीं ।’ जंतर.मंतर पर प्रधानमंत्री की चुप्पी दर्शानेवाले पोस्टर लगाए गए थे । इमाओं ने कहा. ‘नरेंद्र मोदी चुनाव के समय या किसी विपदा के समय मणिपुर आते हैं, आश्वासन देते हैं । आज हमसे मिलने का उन्हें समय नहीं है ।’ मणिपुरी माताओं ने पुलिस के हाथों प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गए ज्ञापन में ये सारी बातें कहीं हैं ।
प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली पहुंचनेवाले विधायकों में भाजपा के कुकी.जोमी और मेइतेई आदिवासी समुदाय के भी थे । आखिरकार रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें समय दिया । गृहमंत्री अमित शाह भी नहीं मिले । अमित शाह भी हिंसा के तीन हफ्ता गुजर जाने के बाद बेकाबू होने की नौबत आने के बाद मई के अंत में इंफाल जाने का समय निकाल पाए । 29 मई से 01 जून तक का केंद्रीय गृह मंत्री का अन्य सभी पीड़ित कुकी.जोमी और मेइतेई समुदायों का विश्वास जीतने के प्रयास में गुजरा । राज्य पुलिस बल, असम राइफल्स और केंद्रीय बलों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए अमित शाह ने यूनिफाईड कमांड बनाया । सभी समुदायों में सहयोग और सद्भाव कायम करने के लिए राज्यपाल अनुसुइया उइके की अध्यक्षता में 51.सदस्यीय शांति समिति गठित की गयी । लेकिन मामला पटरी पर आने के बजाए और नीचे ही उतरता गया । पहले तो कुकी समुदाय के लोगों ने मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के शांति समिति में शामिल होने पर आपत्ति की । कुकी के साथ.साथ मेइतेई समुदाय के लोगों ने भी यह कहकर शांति कमिटी के बायकाट का फैसला किया कि मुख्यमंत्री और उनके समर्थकों को इसमें शामिल करने से पहले उनसे विमर्श नहीं किया गया । 10 जून को अमित शाह की यह शांति योजना लेकर असम के भाजपा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा इंफाल पहुंचे, जबकि उनके विषय में पहले से ही चर्चा थी कि एन. बीरेन सिंह की तरह मेइतेई समुदाय का साथ दे रहे हैं । यूनिफाईड कमांड के एक अधिकारी के अनुसार कुकी और मेइतेई मतभेद का असर राज्य पुलिस पर भी पड़ा है । पुलिसकर्मी अपने. अपने समुदाय का पक्ष ले रहे हैं ।
मणिपुर हाईकोर्ट के 27 मार्च के आदेश के अनुपालन के खिलाफ निकले विभिन्न आदिवासी समुदायों के जुलूस के बाद 03 मई से यह हिंसा उफनी है । मणिपुर हाईकोर्ट ने मेइतेई समुदाय को एसटी का दर्जा देने के लिए केंद्र सरकार के पास अनुशंसा चार हफ्ते में भेजने का निर्देश दिया था । मुख्यमंत्री स्वयं मेइतेई समुदाय के हैं । हालात बिगड़ते जाने के बाद अब मुख्यमंत्री हाईकोर्ट से राहत मांग रहे हैं । मणिपुर ट्राइबल फोरम, दिल्ली ने 20 जून को सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर कुकी आदिवासियों को सेना की सुरक्षा के लिए तुरंत सुनवाई की गुहार लगायी । सुप्रीम कोर्ट ने ‘लक्ष्मण रेखा(सीमा) का उल्लंघन’ सरकारी जुमला का ख्याल करके इसे पूरी तरह कानून व व्यवस्था का मामला बताते हुए शांति के लिए प्रशासन पर ही भरोसा जताया और कहा कि कोर्ट के हस्तक्षेप से स्थिति ज्यादा बिगड़ सकती है । अर्जी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की गयी । मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश को ऑल मणिपुर ट्राइबल यूनियन की ओर से चुनौती देनेवाली याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अपनी सफाई में कहा कि वो किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है, और समय चाहिए । ऐसी अराजक और अनिर्णय की स्थिति में राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की अटकलबाजी चल रही है । क्योंकि नेतृत्व परिवर्तन के बाद सरकार बनना संभव नहीं है । भाजपा के ही ज्यादा विधायक मुख्यमंत्री से नाराज हैं । कांग्रेस ने 20 जून को दिल्ली में 10 पार्टियों की मणिपुर बैठक बुलायी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2001 की याद दिलायी, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री को मणिपुर के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री ओकरम इबोबी सिंह और कांग्रेस नेता जयराम रमेश को 18 जून की ‘मन की बात’ को ‘मणिपुर की बात’ से जोड़ा । 10 पार्टियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपे गए ज्ञापन में कहा कि 18 जून, 2001 को ऐसी ही नाकेबंदी की नौबत मणिपुर में आयी थी और प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने अपना उत्तरदायित्व निभाने में देर नहीं की । बाजपेयी सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से मिले । गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी भी मिले । बाजपेयी ने सबसे शांति और सहयोग की अपील की । आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी दिग्भ्रमित करनेवाली है । मणिपुर में हिंसा के बीच इंफाल,दीमापुर हाइवे और मणिपुर से रसद की आवाजाही वाली लाइफलाइन मार्ग पर नाकेबंदी जारी है । लगता है, कांग्रेस की सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल मणिपुर जाने की मांग का असर हुआ । असम के मुख्यमंत्री ने भी दिल्ली आकर अमित शाह को 21 जून को रिपोर्ट किया और गृहमंत्री ने सर्वदलीय बैठक बुलाने का एलान कर दिया । प्रधानमंत्री मणिपुर समाधान की जगह अमेरिका में निवेशकों को तलाशने और मणिपुरवासियों का दर्द साझा करने के बजाए अमेरिका से व्यापारिक साझेदारी में जुटे रहे ।