मणिपुर में राष्ट्रीय खेल(क्रीड़ा) यूनिवर्सिटी स्थापित करने से संबंधित बिल लोकसभा में पारित कराके केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार भले ‘उत्साहित’ हो, मणिपुर के लोगों को इससे कोई दिलचस्पी नहीं है । मणिपुर में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री एन. बोरेन सिंह भी अपने लोगों की भावनाओं के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते । इनका रूख जल्दी ही स्पष्ट हो जाएगा, जब केंद्र सरकार की योजना पर काम शुरू होगा ।

केंद्रीय खेलमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने दो अगस्त को लोकसभा में यह बिल पेश करते हुए कहा कि 524 करोड़ की लागत से मणिपुर में राष्ट्रीय खेल यूनिवर्सिटी स्थापित की जाएगी और कोई खेल से जुड़े व्यक्ति इसके कुलपति बनाए जाएंगे ।

यहां तक तो ठीक है । यह भी बिल्कुल तय है कि बाहर(‘मेनलैंड इंडिया’) से ही कोई व्यक्ति प्रस्तावित यूनिवर्सिटी के कुलपति पद पर बिठाए जाएंगे । सेना और अर्द्धसैनिक बल की कड़ी सुरक्षा में ही कुलपति मणिपुर में रह पाएंगे, यह भी निश्चित है । यूनिवर्सिटी प्रशासन का प्रशिक्षण से लेकर सारा कामकाज बंदूक की बदौलत चलेगा, इसमें भी दो राय नहीं । क्योंकि मणिपुर में 1980 से आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट(आफ्प्सा) की बदौलत सारी व्यवस्था चल रही है । यह कानून ‘उपद्रवग्रस्त क्षेत्र’ घोषित करके लागू किया जाता है और उसके बाद कानून तथा व्यवस्था का जिम्मा सेना के जिम्मे सौंपकर सामान्य नागरिक अधिकार जब्त कर दिए जाते हैं ।

मणिपुर की स्थानीय भावनाओं की अनदेखी वाला प्रयोग जब कामयाब नहीं हुआ तो भी लोगों पर जबरन खेल यूनिवर्सिटी थोपने की प्रक्रिया से मणिपुर की जनता कितनी लाभान्वित होगी और देश के अन्य हिस्सों से आनेवाले प्रशिक्षु तथा प्रशिक्षक तनावपूर्ण वातावरण में कैसे रह पाएंगे, यह वक्त क्या बताएगा । आधा अभी स्पष्ट हो गया ।

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने दो अगस्त को लोकसभा में बहस का उत्तर देते हुए कहा कि राष्ट्रीय खेल यूनिवर्सिटी के कुलपति कोई एथलीट होंगे । यह बिल गत वर्ष अगस्त में ही लोकसभा में पेश किया गया था, लेकिन पारित नहीं हो पाया । उस समय से अब तक केंद्र की भाजपा सरकार मणिपुर की टोह लेने में जुटी रही कि सेना की तैनाती और तनावपूर्ण माहौल में मणिपुर को ‘मेनलैंड इंडिया’ का हिस्सा कैसे बनाया जाए । अभी मणिपुर में राष्ट्रीय खेल यूनिवर्सिटी स्थापित करने वाला बिल लोकसभा से जिस दिन पास हुआ है, उसी दिन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को मणिपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति आद्या प्रसाद पांडे को छुट्टी पर जाने की सलाह देनी पड़ी । आद्या प्रसाद पांडे ‘बाहर’ से लाकर मणिपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति पद पर बिठा दिए गए । उन्हें हटाने के लिए यूनिवर्सिटी के छात्रों और शिक्षकों की राज्यव्यापी हड़ताल के आंदोलन के बिल पारित होने की तारीख तक दो महीने से ज्यादा गुजर चुके थे । आद्या प्रसाद पांडे पर यूनिवर्सिटी फंड में घपला और कथित रूप से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को अलग से फंड देने का आरोप है । केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने न तो खुद, न ही अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री के कहने पर भी जनभावनाओं का ख्याल किया । जांच कमिटी ऐसी बनी, जिसने कुलपति को ‘क्लीन चिट’ दे दी ।

मुख्यमंत्री एन. बोरेन सिंह ने 13 जुलाई को ही केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को लिखा कि कुलपति को छुट्टी पर भेजा जाए और उनके खिलाफ नयी जांच कमिटी बनायी जाए । दो महीने तक मणिपुर यूनिवर्सिटी के छात्र और शिक्षकों की हड़ताल जारी रही । कैंपस को छावनी में तब्दील कर दी गयी । यूनिवर्सिटी शिक्षक संघ के प्रवक्ता और फीजिक्स विभाग के हेड प्रोफेसर एन. एन. सिंह ने हेड पद से इस्तीफा दे दिया । राष्ट्रीय खेल यूनिवर्सिटी बिल लोकसभा में पारित होने और मणिपुर यूनिवर्सिटी के ‘बाहरी’ कुलपति के छुट्टी पर जाने की सूचना दो अगस्त को एक साथ सामने आयी ।

दो अगस्त को ही सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई डायरेक्टर आलोक कुमार वर्मा मणिपुर में सेना और अर्द्धसैनिक बलों की फर्जी मुठभेड़ तथा ‘एक्स्ट्रा जुडिशियल’ हत्याओं पर शीर्ष कोर्ट से मांगी गयी कैफियत का जवाब दे रहे थे । सुप्रीम कोर्ट की फटकार पर सीबीआई डायरेक्टर को शीर्ष कोर्ट में पेश होकर बताना पड़ा कि ऐसी हत्याओं की जांच में क्या प्रगति हुई और कितने दोषियों के खिलाफ सीबीआई ने कार्रवाई की । मणिपुर में सेना और अर्द्धसैनिक बलों के आफ्प्सा लैस हत्याओं के 1,528 मामलों की जांच सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही है । सुप्रीम कोर्ट जज एम. बी. लोकुर और जस्टिस यू. यू. ललित ने गत वर्ष 14 जुलाई को स्पेशल जांच दल(एसआईटी) गठित करके जांच का आदेश दिया । सीबीआई निदेशक को ही एसआईटी प्रभारी बनाया गया । सरकारी तरीके से सरकारी ‘सुविधा-असुविधा’ का ख्याल करके ‘निष्पक्ष’ जांच करनेवाली ‘स्वतंत्र’ एजेंसी सीबीआई ने दो अगस्त को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि असम राइफल्स के मेजर विजय सिंह बलहारा को ‘बुक’ किया गया है । शीर्ष कोर्ट के निर्देश पर मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ और एक्स्ट्रा जुडिशियल हत्याओं की 29 वारदातों की जांच सीबीआई कर रही है, जिसमें एफआईआर दर्ज की गयी है । लेकिन ऐसी पहली घटना है, जिसमें सीबीआई ने 12 साल के एक स्कूल छात्र की हत्या के मामले में अर्द्धसैनिक बल असम राइफल्स के एक मेजर को चालान किया है । मामला ये है कि सातवीं कक्षा के छात्र आजाद खॉ को 2009 में उसके मां-बाप के सामने ही घर से खींचकर बाहर निकाला गया और बेरहमी से पीट-पीटकर फिर गोली मार दी गयी । इस दरिंदगी को अंजाम देने के लिए असम राइफल्स के मेजर विजय सिंह ने 21 जवानों के साथ उस बच्चे को घर से बाहर निकाला । मां-बाप को घर में बंद कर दिया और उनके सामनेवाले मैदान में ले जाकर बेरहमी से पीटा, गोली मारी और एक पिस्तौल बच्चे के शव के पास फेंक दिया । उस बच्चे को उग्रवादी गुट पीपुल्स युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट(पीयूएलएफ) से जुड़ा बता दिया ।

यह जानकारी सीबीआई ने नहीं दी है । सुप्रीम कोर्ट की ओर से शीर्ष कोर्ट के ही रिटायर जज संतोष हेगड़े की अध्यक्षता में गठित जांच आयोग की रिपोर्ट में इसे फर्जी मुठभेड़ का कारनामा बताया गया है । जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मणिपुर सरकार के अनुसार बच्चे को जिस गुट से जुड़ा बताया गया, वो प्रतिबंधित नहीं है ।

असम राइफल्स फर्जी मुठभेड़ दिखाकर बेकसूरों को मारनेवाला मणिपुर का सबसे बदनाम अर्द्धसैनिक बल है और केंद्र सरकार इसकी किसी भी ज्यादती से विचलित नहीं होती । अगर सुप्रीम कोर्ट तक मामला नहीं जाता तो लोग जान भी नहीं पाते । सुप्रीम कोर्ट में भी सरकार आफ्प्सा अनुपालन करनेवाले जवानों की हर ज्यादती का बचाव करती है और इसे ‘जनहित’ में बताती है ।

मणिपुर के छात्र अपना विरोध प्रकट करने 31 जुलाई को दिल्ली पहुंचे । शास्त्री भवन के सामने प्रदर्शन करते मणिपुरी छात्रों को पुलिस ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय तक ज्ञापन देने भी नहीं जाने दिया । वहां मौजूद कांग्लीपैक छात्र संघ के उपाध्यक्ष सुखाम विदयानंद ने सवाल उठाया कि मणिपुर यूनिवर्सिटी में असम राइफल्स के कैंप की क्या जरूरत है ।

वर्ष 2000 के अक्टूबर में असम राइफल्स के ही जवानों ने इंफाल के मालोम बस स्टॉप पर बच्चे बुजुर्ग महिलाएं समेत 10 बेकसूरों को अंधाधुंध फायरिंग करके मार दिया । उसके विरोध में दो नवंबर को इरोम शर्मिला ने भूख हड़ताल शुरू कर दी । उनके अनशन को राज्य के 32 जनसंगठनों के संयुक्त मंच अपुन्बा लुप का समर्थन था । इरोम ने मणिपुर को आप्प्सा से मुक्त करने के लिए अनशन शुरू किया था । 15 साल के शांतिपूर्ण विरोध को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोई तवज्जो नहीं दी और हिंसा की काट में हिंसा बरकरार है ।

वर्ष 2000 में ही तीन किशोरों को सेना के जवानों ने उग्रवादी बताकर मार दिया और लाश जंगल में फेंक दी । एक सैनिक अधिकारी को यह नहीं देखा गया । उसका विरोध करनेवाले लेफ्टिनेंट कर्नल धरमवीर सिंह का मुंह बंद करने के लिए उसकी पत्नी और दो बच्चों के सामने से अधिकारियों ने अगवा करा लिया । मणिपुर हाईकोर्ट में 29 जुलाई को धरमवीर सिंह ने मुंह खोला और कई हिरासत हत्याओं का खुलासा किया । 30 जुलाई को सीबीआई डायरेक्टर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मणिपुर फर्जी मुठभेड़ जांच में एक साल में दो आरोप पत्र दायर हुए हैं ।

ओलिंपिक बॉक्सर मेरी कॉम की परंपरा कायम रखनेवाली कितनी बॉक्सर इस प्रस्तावित यूनिवर्सिटी से निकलेंगी इसके बारे में तो कुछ कहना कठिन है । लेकिन बेहतर होता कि जो मणिपुर कई दशकों से सुरक्षा बलों की ज्यादती से पीड़ितों का पीड़ा स्थल बना हुआ है, उससे राहत देने के लिए पहले मानवीय और लचीला रूख अपनाया जाता ।

मणिपुर में 2004 में मनोरमा देवी के घर में आधी रात को घुसकर सुरक्षा बलों ने खींचकर उन्हें बाहर निकाला, सड़क पर ही बलात्कार किया और गोली मारकर सड़क के किनारे ही लाश छोड़ दी । रिटायर सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस बी. पी. जीवन रेड्डी ने जांच के बाद इसे जघन्य अपराध बताते हुए लिखा - ‘जिस आप्प्सा कानून से जनता त्रस्त है, आतंकित है, जिन सुरक्षा बलों से लोग असुरक्षित हैं, उसकी समीक्षा की जानी चाहिए कि इससे उग्रवादी उपद्रव खतम हुआ है या कानूनी अपद्रव बढ़ा है ।’

इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को किसी के भी घर में घुसकर तलाशी लेने, बिना वारंट के गिरफ्तार करने, बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद रखने और गोली मारकर संदिग्ध उग्रवादी घोषित कर देने की खुली छूट है । सरकार को सिर्फ जवानों की पीड़ा से मतलब है । जब पीड़ित नागरिक परिवारों के न्याय की गुहार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचती है, तब भी सरकार की कैफियत से ऐसा नहीं लगता कि उग्रवाद पर काबू पाने के नाम पर जो कुछ हो रहा है वह गलत है । कम-से-कम एक बार पुनर्विचार तो किया जाता कि आप्प्सा से इतर उपद्रव का विकल्प है या नहीं । समूचे पूर्वोत्तर को आप्प्सा के जरिए कमल छाप बनाने की नीति में ढील तो दी गयी है । अप्रील में मेघालय को पूरी तरह और अरूणाचल को आंशिक रूप से आप्प्सा मुक्त किया गया ।