मणिपुर में भाजपा के पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापसी ने समूचे पूर्वोत्तर में शांति की नयी आशा जगायी है । क्योंकि उत्तर पूर्वी क्षेत्र में सबसे ज्यादा उग्रवादी गुट इसी राज्य में सक्रिय हैं । भाजपा एकमात्र पार्टी है, जिसने चुनाव के दौरान आफ्प्सा आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स, एक्ट हटाने का वायदा नहीं किया । उग्रवादी हिंसा के कारण मणिपुर 1980 से ‘उपद्रवग्रस्त क्षेत्र’ घोषित है और इस पर काबू पाने के लिए आफ्प्सा लागू है ।
पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी आफ्प्सा लागू है, जिसकी अवधि समय.समय पर बढ़ायी जाती रही है । 1959 में नगा विद्रोह को दबाने के लिए आफ्प्सा बना और आबादी वाले इलाके में लागू किया गया । इस कानून के अंतर्गत सेना और अर्द्धसैनिक बलों को ‘उपद्रवग्रस्त क्षेत्र’ में कोई भी कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है ।
नगा उग्रवाद सबसे ज्यादा पेचीदा मसला केंद्र सरकार के लिए 60 वर्षां से बना हुआ है । इसका संचालन केंद्र नगालैंड और मणिपुर है, जहां से सुरक्षा बलों के खिलाफ हमले की योजनाएं बनती है । इन्हीं दोनों राज्यों से काफी समय से आप्प्सा हटाने की मांग उठ रही है । नगालैंड और मणिपुर सिविल सोसायटी संगठन आप्प्सा को अशांति का कारण मानते हैं । प्रायः केंद्रीय बलों पर ज्यादती का आरोप लगाया जाता है, जो कभी-कभी सही भी साबित होता है । 4 दिसंबर, 2021 को नगालैंड के मोन जिले में केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ हुई भिड़न्त में 14 लोग नगा समुदाय के थे और मणिपुर के मूल निवासी थे । संसद में आप्प्सा हटाने की मांग उठी । नगालैंड मंत्रिमंडल ने आप्प्सा वापस लेने की केंद्र से मांग की । नगालैंड में मुख्यमंत्री नेफियू रियो के नेतृत्ववाले गठजोड़ में भाजपा भी शामिल है । शांति के लिए सभी दल एकजुट हैं, विपक्ष है ही नहीं ।
ये घाव भरा नहीं था । उसके बावजूद मणिपुर विधान सभा चुनाव में मतदाताओं ने आफ्प्सा हटाने का वायदा करनेवाली पार्टियों के बजाए भाजपा को पूर्ण बहुमत से जिताया । चुनाव परिणाम बताता है कि हिंसाग्रस्त मणिपुर के लोग शांति चाहते हैं, उन्हें उसके लिए आफ्प्सा लागू रहने या हटाने से कोई लेना.देना नहीं है । 60.सदस्यीय मणिपुर विधान सभा में भाजपा ने पहली बार 32 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया है । 28 फरवरी और 4 मार्च को मतदान हुए । परिणाम 10 मार्च को घोषित हुए । दोबारा मुख्यमंत्री बननेवाले एन. वीरेन सिंह ने चुनावी दौरे के क्रम में कहा कि लोगों को अब आफ्प्सा की परवाह नहीं है । सुरक्षा बलों से जनता के अच्छे संबंध हैं ।
इसका मतलब मणिपुर में या अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में भी उग्रवादी हिंसा पर काबू पाने के लिए लागू आप्प्सा कोई चुनावी मुद्दा नहीं है । मणिपुर और नगालैंड के लोग शांति के लिए मजबूत सरकार चाहते हैं । ‘टाइम्स ऑफ मणिपुर’ के संपादक ए. मुबी के अनुसार मणिपुर हमेशा वैसी पार्टी से गठजोड़ या संपर्क रखना चाहता है, जो केंद्र में सत्ता में हो ताकि टकराव की स्थिति के कारण शांति और विकास कार्य में बाधा न पड़े ।
मणिपुर का चुनाव परिणाम इसका सबूत है कि जिस आफ्प्सा के अंतर्गत सेना की तैनाती को अशांति का कारण कहकर प्रचारित किया जाता है, उसे हटाने के वायदे को मतदाताओं ने तूल नहीं दिया । भाजपा को छोड़ सभी दलों ने आफ्प्सा हटाने का वायदा किया था । भाजपा की सहयोगी क्षेत्रीय पार्टी नगा पीपुल्स फ्रंट इस चुनाव में अकेले मैदान में उतरी और आफ्प्सा हटाने के वायदे पर वोट मांगा । एनपीएफ(नगा पीपुल्स फ्रंट) की सीटें 4 से बढ़कर 7 जरूर हुई, मगर वो निर्णायक भूमिका में नहीं आ पायी ।
मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा की पार्टी एनपीएफ ने मणिपुर में भाजपा को पांच साल सरकार बरकरार रखने में सहयोग किया । मंचालय में भी आफ्प्सा लागू है और वहां भी भाजपा सहयोगी है । इस बार के चुनाव में मणिपुर में एनपीएफ ने आफ्प्सा हटाने के मुद्दे पर मणिपुर ही नहीं, उत्तर पूर्व में भी कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बनने का प्रयास किया । लेकिन उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली ।
मणिपुर चुनाव समूचे पूर्वोत्तर के लिए भी संदेश है कि वहां के आम मतदाताओं को केंद्रीय सुरक्षा बलों से कोई दुश्मनी नहीं है । वो सारा उग्रवादी गुटों द्वारा पैदा की गयी है ।
मणिपुर में 15 साल से चल रही कांग्रेस सरकार को 2017 में भाजपा नेता एन. वीरेन सिंह ने सत्ता में नहीं आने दिया । कांग्रेस को 27 सीटें मिली थी और भाजपा ने मात्र 21 सीटें जीती थी । उसके बावजूद भाजपा ने कांग्रेस विधायकों को फोड़कर सरकार बनायी और पूरे पांच साल यह जोड़.तोड़ चलता रहा । लेकिन इस दौरान मणिपुर में आर्थिक नाकेबंदी, बंद, हड़ताल और आए दिन उग्रवादी हमले जैसी वारदातें देखने को नहीं मिली, जो सिलसिला कांग्रेस शासनकाल में चला । अभी के चुनाव को कांग्रेस ने आफ्प्सा को सबसे ज्यादा चुनावी मुद्दा बनाया था, लेकिन मात्र 5 सीट जीत पायी । पिछले भाजपा शासनकाल में ही कांग्रेस के अपने विधायकों के कारण विधान सभा में कांग्रेस के मात्र 13 सदस्य रह गये थे ।
‘टाइम्स ऑफ मणिपुर’ ने एक उसरूल के एक मतदाता के हवाले से छापा है. ‘चुनाव आता है, आफ्प्सा आता है, चुनाव जाता है, आफ्प्सा चला जाता है ।’ एक मेइती सिविल सोसायटी नेता ने कहा. ‘आफ्प्सा इसलिए चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता क्योंकि यह उम्मीदवार और धन.बल के साथ रिश्ते से तय होती है ।’
2 महीने पहले गठित कूकी पीपुल्स एलायंस ने अपने प्रभाव वाले इलाके में आफ्प्सा हटाने के वायदे पर 2 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और जीत मिली ।
इससे स्पष्ट है कि पूरे मणिपुर के मतदाता के लिए यह मुद्दा नहीं है । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान सभी उग्रवादी गुटों को बातचीत के लिए आगे आने कहा । अभी मणिपुर में सबसे मजबूत और शांति के लिए खतरा कूकी नगाओं का गुट है । इनमें कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन और युनाइटेड पीपुल्स फ्रंट के बैनर तले कई नगा गुटों का अगस्त, 2008 से भारत सरकार तथा मणिपुर सरकार से शांति समझौता चल रहा है । इस बार के चुनाव में उनमें से कई गुटों ने भाजपा के पक्ष में वोट डालने के लिए डिक्टैट जारी किया । जबकि इसके पहले उग्रवादी गुटों का चुनाव बायकाट वाला डिक्टैट जारी करने का इतिहास रहा है ।
मणिपुर में घाटी और पहाड़ी आदिवासी समुदायों को राजनीतिक संस्कृति अलग-अलग है । मुख्यमंत्री एन. वीरेन सिंह ने दोनों ही इलाके को साथ लेकर चलने और जोड़ने का प्रयास किया ।
13 नवंबर, 2021 को मणिपुर की म्यांमार सीमा के पास मेइती समुदाय के उग्रवादी गुटों ने घात लगाकर हमला करके असम राइफल्स के एक कमांडिंग ऑफीसर को पत्नी समेत और चार जवानों को मार दिया । एन. वीरेन सिंह स्वयं मेइती समुदाय के हैं ।
इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आफ्रप्सा कानून की आड़ में केंद्रीय सुरक्षा बलों ने काफी ज्यादतियां की हैं । मणिपुर में वर्ष 2000 में असम राइफल्स के जवानों ने इम्फाल के मालोम बस स्टॉप पर अंधाधुंध फायरिंग करके 10 नागरिकों को मार दिया । 2002 में एक सामाजिक कार्यकर्ता मनोरमा देवी को उग्रवादियों से मिले होने का आरोप लगाकर जवानों ने बलात्कार करके मार दिया । आफ्प्सा हटाने की मांग को लेकर इरोम शर्मिला ने 32 जनसंगठनों के समर्थन से 16 वर्ष तक अनशन किया । ऐतिहासिक कांग्ला किले के बाहर उसके विरोध में महिलाओं ने जवानों के सामने निर्वस्त्र प्रदर्शन किया । उस वक्त कांग्ला किला असम राइफल्स का मुख्यालय था । निष्फल अनशन खतम करके ‘लौह महिला’ के नाम से मशहूर हुई इरोम शर्मिला ने 2017 का विधान सभा चुनाव लड़ा और हार गयी । बड़ी मुश्किल से 100 वोट मिले । उसके बाद इरोम शर्मिला राजनीति से सन्यास लेकर बंगलोर में दो बच्चों के साथ पारिवारिक जीवन जी रही हैं । उनकी पार्टी पीपुल्स रिजर्जेंस और जस्टिस एलायंस आज भी अस्तित्व में है, मगर उसने इस चुनाव में हिस्सा नहीं लिया ।
गौरतलब है कि भाजपा के एन. वीरेन सिंह ने 2002 में अपना पहला चुनाव आफ्प्सा हटाने की लड़ाई लड़नेवाले मुद्दे पर लड़ा । मनोरमा देवी हत्याकांड के बाद सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज वी. पी. जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में गठित जांच कमिटी ने 2005 की रिपोर्ट में आफ्प्सा को दहशत का प्रतीक बातकर उसे हटाने पर विचार करने कहा था ।
नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड(एनएससीएन) ने टी. मुइवा समेत जिते सात अन्य नगा उग्रवादी गुटों से केंद्र सरकार का संघर्षविराम समझौता चल रहा है । उनका झमेला ‘अलग झंडा, संविधान’ पर अटका है । एनएससीएन(मुइवा) की अपने समानान्तर(भूमिगत) सरकार चल रही है, जिसकी अपनी पुलिस/सेना है । उनका मतदाताओं पर प्रभाव भी है । मुइवा के लिए आफ्प्सा कोई मुद्दा नहीं है ।
2021 में असम में भाजपा दोबारा सत्ता में लौटी और आफ्प्सा की चुनाव में कोई चर्चा नहीं थी । मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 01.01.2022 को कहा कि आफ्प्सा हटाने पर विचार किया जा सकता है ।