जम्मू व कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाकर इस राज्य का ‘विशेष दर्जा’ खत्म किए जाने के एक साल पूरे होने के दिन पांच अगस्त को ही जम्मू व कश्मीर के उपराज्यपाल गिरीश चन्द्र मुर्मू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया । जम्मू व कश्मीर पुनगठन बिल, 2019 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मंजूरी मिलते ही पांच अगस्त, 2019 को जम्मू व कश्मीर का ‘विशेष दर्जा’ के साथ-साथ राज्य का भी दर्जा समाप्त हो गया । जम्मू व कश्मीर को दो केंद्र शासित क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया । लद्दाख को जम्मू व कश्मीर से अलग होकर केंद्रशासित क्षेत्र का दर्जा मिला । विधान सभा जम्मू व कश्मीर के पास रह गयी ।
केंद्रशासित प्रदेश बनते ही जम्मू व कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक को हटाकर गोवा भेज दिया गया । पूर्व आईएसएस गिरीश चन्द्र मुर्मू जम्मू व कश्मीर के पहले उपराज्यपाल बने । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और अभी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जब गुजरात में नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में गृहमंत्री थे, उस समय से लेकर अभी तक गिरीश चन्द्र मुर्मू दोनों नेताओं के साथ काम कर चुके हैं । जम्मू व कश्मीर के उपराज्यपाल के तौर पर मुर्मू की नियुक्ति का एक साल पहले यही आधार चर्चा में आया कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के करीबी रहे हैं । लेकिन ठीक एक साल पूरा हाने के दिन ही मुर्मू का उपराज्यपाल पद से इस्तीफा और उन्हें महालेखा परीक्षक व नियंत्रक(सीएजी - कैग) बनाए जाने के बाद से कयास लगाए जा रहे हैं । कश्मीर में तीन साल में तीन नेतृत्व बदल गया । भांति-भांति के कयासों का सीधा ताल्लुक जम्मू व कश्मीर की राजनीतिक, सामाजिक गतिविधियों के अलावे संचार/संपर्क व्यवस्था पर पाबंदियों से है । कानून व व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण और उग्रवादी हमलों पर काबू के सरकारी दावों के विभिन्न पहलू पांच अगस्त के बाद से हर दिन उजागर हो रहे हैं ।
370 हटाए जाने के बाद बताया गया कि अब यह प्रदेश पूरी तरह भारत का अभिन्न अंग बन गया । जम्मू व कश्मीर का अलग संविधान, अलग झंडा वाला प्रावधान समाप्त हो गया । पांच अगस्त, 2019 से भारतीय संविधान के सारे कानून और प्रावधान जम्मू व कश्मीर में लागू हो गए, जो भारतीय संघ के अन्य राज्यों में लागू हैं ।
नया कानून जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 लागू होते ही राज्य के सभी राजनीतिक नेताओं को जेल में डाल दिया गया, जिसे अपने घर में नजरबंदी बतायी गयी । अनुच्छेद 370 के साथ-साथ धारा 35-ए भी समाप्त कर दी गयी, जिससे देश के बाकी हिस्सों के लोगों को अन्य राज्यों की तरह जम्मू व कश्मीर में जमीन, मकान खरीदने और वहां बसने की छूट मिली । अनुच्छेद 370 और 35 ए में ‘विरोध दर्जा’ के अंतर्गत यह प्रावधान नहीं था । अनुच्छेद-370 हटते ही मोबाईल, इंटरनेट, 4जी समेत संपर्क और संचार माध्यमों पर भी राजनीतिक गतिविधियों की रोक लग गयी । अखबार, मीडिया पर भी अघोषित पाबंदियां लगी ।
सेना, सीआरपी पहले से ही तैनात थी । पांच अगस्त, 2019 के बाद चौकसी और कड़ी हो गयी । कोरोना लॉकडाउन के चलते उसमें और इजाफा हो गया था । उस नाकेबंदी में कोई विरोध सड़क पर होना असंभव था । एक साल बीतते-बीतते थोड़ी-थोड़ी ढोल का सिलसिला चला । लेकिन जन खौफ बरकरार रहा । जम्मू व कश्मीर की सबसे मजबूत जनाधार वाली पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस सुप्रीमो लोकसभा सदस्य फारूक अब्दुल्ला जेल से छोड़े गए । दसरी मजबूत पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी(पीडीपी) नेता महबूबा मुफ्ती और कश्मीर में कांग्रेस नेता सैफुददोन सोज एक साल बीतने के बाद भी नजरबंदी से मुक्त हुए हैं या नहीं इसकी पक्की रिपोर्ट नहीं है । कांग्रेस के वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता पी. चिदंबरम ने एक साल बीतने के बाद कहा कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक नेताओं को छोड़ने की गलत जानकारी दी है ।
पांच अगस्त, 2020 को पूरे जम्मू व कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी थी । उपराज्यपाल गिरीशचन्द्र मुर्मू इस्तीफा दे रहे थे और जम्मू व कश्मीर की भाजपा यूनिट विशेष दर्जा खत्म किए जाने की पहली बरसी पर 15 दिनों से चल रहे कार्यक्रम का समापन कर रही थी । भाजपा कार्यकर्ताओं की गतिविधियों पर कोई रोक नहीं थी । उसी दौरान नए उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कार्यभार ग्रहण किया । पांच अगस्त, 2020 को नेशनल कान्फ्रेंस नेता फारूक अब्दुल्ला के गुपकर रोड स्थित आवास पर सभी गैर-भाजपा दलों की बैठक आयोजित थी । अनुच्छेद-370 हटाने जाने की पहली बरसी पर नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी द्वारा आयोजित बैठक तथा विरोध मार्च / रैली विफल करने के लिए पूरे कश्मीर में कड़ाई थी । फारूक अब्दुल्ला ने सभी क्षेत्रीय पार्टियों की अपने आवास पर बैठक बुलायी थी, ताकि ‘आगे की रणनीति’ तैयार की जाए । फारूक अब्दुल्ला के पुत्र और नेशनल कान्फ्रेंस उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला के अनुसार उनके पिता के आवास के चारों ओर घेराबंदी कर दी गयी । उधर से किसी वाहन के गुजरने पर रोक थी । जिन राजनीतिक नेताओं को आना था वे सब अपने घर में नजरबंद थे । फारूक अब्दुल्ला को अपने कैंपस से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी । उमर अब्दुल्ला पांच अगस्त करीब आने से पहले ही एक राष्ट्रीय दैनिक से बात करते हुए अनुच्छेद-370 की वापसी तक चुनाव न लड़ने का एलान कर चुके हैं । फारूक अब्दुल्ला और पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती को 6 फरवरी, 2020 को जन सुरक्षा कानून(पीएसए) के अंतर्गत जेल में बंद किया गया, जिसमें छह महीने तक बिना मुकदमा चलाए जेल में रखने का प्रावधान है । ये दोनों पांच अगस्त, 2019 से नजरबंद थे । 13 मार्च, 2020 को फारूक अब्दुल्ला पर से पीएसए हटा लिया गया । लेकिन वे अपने घर से बाहर निकल सकते हैं या नहीं, यह पांच अगस्त, 2020 को उमर अब्दुल्ला के बयान से पता चला । आठ अगस्त को कश्मीर के चार भाजपा नेताओं ने पार्टी छोड़ दी । उसके पहले लद्दाख यूनिट के दो भाजपा नेताओं ने पार्टी छोड़ी । 2014 लोकसभा चुनाव में लद्दाख सीट से भाजपा टिकट पर जीते जाम्यांग सेरिन भी चुप हैं, जिन्होंने 2019 में 370 हटाने क समर्थन में लोकसभा में जोरदार आवाज उठायी । कश्मीरी भाजपा नेताओं ने सरपंचों की हत्या के विरोध में पार्टी से खुद को अलग कर लिया । चार और पांच अगस्त को भाजपा से जुड़े एक सरपंच तथा एक पंच की हत्या कर दी गयी । पार्टी छोड़नेवाले नेताओं में से अवतार कृष्ण और वली अहमद भट्ट ने कहा कि चार अगस्त को उनलोगों ने उपराज्यपाल मुर्मू से मिलने का समय मांगा था, पर वे अगले दिन हट गए । पंचायती राज संस्थाओं के 12 अगस्त के समारोह में नए उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से सरपंचों ने अपनी सुरक्षा की गुहार लगायी । उपराज्यपाल ने भाजपा कार्यकर्ताओं को सुरक्षा का भरोसा दिलाया । 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने 4जी नेट पाबंदी पर सफाई दी कि पूरी पाबंदी नहीं हटायी जाएगी । इसका कारण अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बढ़ता तनाव बताया गया । सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेसनल्स की ओर से दायर याचिका पर कई महीनों से सुनवाई चल रही है । जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन इलाकों में हालात ज्यादा खराब नहीं हैं, वहां 4जी छूट पर विचार किया जा सकता है । 11 मई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 4जी पाबंदी की केंद्रीय गृह सचिव एस. के. भल्ला की अध्यक्षता वाली कमिटी साप्ताहिक समीक्षा करे और अपने आदेश सार्वजनिक करे । फाउंडेशन ने कोर्ट में अवमानना याचिका लगायी, जिसके जवाब में 10 अगस्त को कमिटी की बैठक हुई । उपराज्यपाल मुर्मू ने इस्तीफा से पहले कह दिया कि 4जी बहाल की जा सकती है । जिससे केंद्र सरकार की किरकिरी हुई । 370 हटाये जाने पर भी शीर्ष कोर्ट में सुनवाई चल रही है । जम्मू व कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट के अध्यक्ष शाह फैसल ने 10 अगस्त को पार्टी से इस्तीफा देकर राजनीति से सन्यास ले लिया । 2010 के आईएएस टॉपर फैसल की पार्टी 2019 में उसी समय अस्तित्व में आयी, जब अनुच्छेद-370 हटाने की तैयारी चल रही थी । शाह फैसल ने कहा - ‘मुझे “राष्ट्र विरोधी” टैग लगने से गहरा धक्का लगा और मेरी राजनीति शुरू होने से पहले समाप्त हो गयी । शाह फैसल को 14 अगस्त, 2019 को श्रीनगर हवाई अड्डे पर पकड़ लिया गया । तीन अगस्त, 2020 को पीसीए वापस लेकर फैसल को रिहा किया गया ।
महबूबा मुफ्ती की हिरासत की अवधि बढ़ा दी गयी । पीडीपी -भाजपा गठजोड़ सरकार में महबूबा मुख्यमंत्री थी । काफी जद्दोजहद के बाद 2014 विधान सभा चुनाव के बाद सरकार का गठन हो पाया । जून, 2018 में गठजोड़ से अलग होकर भाजपा ने सरकार को अल्पमत में ला दिया। छह-छह महीने राज्यपाल शासन की अवधि बढ़ाए जाने के बाद जनवरी, 2019 से राष्ट्रपति शासन लागू है । नवंबर में विधान सभा भंग कर दी गयी ।
उपराज्यपाल शासन की अवधि में ही पंचायत चुनाव कराए गए, जिसका सभी गैर-भाजपा दलों ने बायकाट किया । भाजपा समेत सभी दलों ने सुरक्षा की चिंता से मुख्य चुनाव अधिकारी शैलेन्द्र कुमार को सर्वदलीय बैठक में अवगत कराया था । 12776 सरपंचों और पंचों के पद अभी तक रिक्त हैं । 27281 निर्वाचित पंच और सरपंच होटलों में श्रीनगर में अभी तक पुलिस सुरक्षा में रह रहे हैं । खासकर दक्षिण कश्मीर के इन भयभीत पंचों के इलाके में 18 जुलाई को जिन तीन श्रमिकों को सेना ने आंतकवादी कहकर कथित मुठभेड़ में मार गिराया था, उसकी जांच 11 अगस्त को शुरू किए जाने की रिपोर्ट मिली है । जन आक्रोश भड़का कि वे तीनों रजौरी के तीन परिवारों के गुमशुदा सदस्य थे और उनकी गुमशुदगी का मामला भी दर्ज कराया गया था । शोपियान में काम से रात को घर लौटते समय तीनों को मारकर दफना दिया गया ।
जन सुरक्षा कानून में बंद नेता रिहा होने के बावजूद जनता के बीच नहीं जा पा रहे । जनता सुरक्षाकर्मियों से डरी हुई है । सुप्रीम कोर्ट की भी अपनी सीमाएं हैं। चीन और पाकिस्तान के दुष्प्रचार/दावे की बात अगर छोड़ दें तो देश केअन्य हिस्सों में सिर्फ भाजपा को छोड़ किसी हलकान में लोग समझ नहीं पाए कि अनुच्छेद-370 हटाए जाने की बरसी पर 15 दिन जश्न किसके लिए? अहमदाबा के स्कूलों में तो 17 सितंबर, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर धारा-370 और 35-ए पर भाषण, लेख, वाद-विवाद प्रतियोगिता आयोजित की गयी । बरसी करीब आने के समय एनसीईआरटी की 12वीं कक्षा के राजनीति शास्त्र विषय में 370 का हटना जुड़ गया ।