जम्मू व कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा वाला संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 370 खत्म करके इसे दो संघशासित क्षेत्रों(यूटी) में बांटे जाने की दूसरी वर्षगांठ पर भाजपा को छोड़ अन्य किसी भी दल में कोई हलचल नहीं है । जबकि इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त करीब आने से पहले जम्मू व कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों से दिल्ली में बातचीत की और अगला कदम उठाने से पहले कश्मीरी नेताओं को विश्वास में लेने का प्रयास किया । 05-08-2019 को धारा-370 खत्म किए जाने के बाद से विगत दो साल में पहली बार प्रधानमंत्री ने 14 कश्मीरी नेताओं से 24-06-2021 को वार्ता की । उनमें ज्यादातर वही नेता थे, जिन्होंने 04-08-2019 को ही विशेष दर्जा वापसी के लिए संघर्ष करने का गठजोड़ बना लिया । इस बार धारा-370 वापसी के संघर्ष और केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार की कश्मीर नीतियों में बदलाव देखने को मिल रहे हैं। इस पर चर्चा से पहले 24 जून, 2021 को पीएम बैठक के दौरान और बाद के परिणाम के साथ-साथ धारा-370 वापसी की लड़ाई में फूट पर भी गौर करना जरूरी है । जम्मू व कश्मीर के लिए बैठक के पहले से तय भारत सरकार के एकमात्र एजेंडा ‘पहले सीटों का परिसीमन फिर चुनाव’ पर भी कश्मीरी नेताओं के आपसी मतभेद उभरे । भाजपा गठजोड़ सरकार के लिए 5 अगस्त, 2021 की उपलब्धि यह रही कि धारा-370 वापसी की लड़ाई ठंडे बस्ते में डाले रखकर ‘नया कश्मीर’ बनाने की प्रधानमंत्री की योजना पर कश्मीरी नेताओं ने ही मुहर लगा दी ।
प्रधानमंत्री धारा-370 खत्म किए जाने के बाद ‘नया कश्मीर’ बनाने की बात संसद में बोल चुके हैं । केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी 2019 में ही कहा कि जम्मू व कश्मीर को राज्य का दर्जा ‘उपयुक्त समय’ पर लौटाया जाएगा ।
बैठक में मौजूद अमित शाह ने अपना एजेंडा साफ सुना दिया - ‘पहले परिसीमन फिर चुनाव’ । विशेष दर्जा वापसी की कौन कहे, राज्य का भी दर्जा पर वही गोलमटोल जवाब दिया ।
बिल्कुल सोची-समझी रणनीति के तहत नरेंद्र मोदी ने धारा-370 हटाए जाने की दूसरी वर्षगांठ के समय कश्मीरी नेताओं को अपने एजेंडे पर सहमति लेने के लिए बुलाया था । उसका असर है और आगे भी रहेगा । प्रधानमंत्री के एकसूत्री कार्यक्रम को समर्थन ज्यादा है, विरोध कम और लगभग एकजुटता भी है । कश्मीरी नेताओं के एजेंडे बिखरे हुए हैं, जिसमें समर्थन कम है, विरोध ज्यादा । धारा-370 वापसी के लिए गत वर्ष बने पांच मुख्यधारा वाली कश्मीरी पार्टियों के गुपकार गठजोड़ में और इससे बाहर के दलों में इस मुद्दे पर फूट है । राज्य का दर्जा वापस पाने और चुनाव के लिए भाजपा निर्धारित एजेंडे में साथ दिया जाए अथवा नहीं, इसको लेकर कश्मीरी पार्टियों में दरार पड़ चुकी है । ऐसी नौबत का फीडबैक भाजपा को पहले से मिल रहा था । पीएजीडी (पीपुल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन) के अध्यक्ष कश्मीर की सबसे प्रभावशाली पार्टी सुप्रीमो डा. फारूक अब्दुल्ला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संपर्क में थे और उन्होंने गुपकार गठजोड़ की ओर से बातचीत का स्पष्ट संकेत दिया था ।
‘गुपकार गठजोड़’ के नाम से प्रचलित पीएजीडी के एक प्रमुख घटक पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी नेता महबूबा मुफ्ती 24 जून की बैठक से पहले और उसके बाद भी धारा-370 वापसी की लड़ाई जारी रखने पर अड़ी थी । कांग्रेस धारा-370 वापसी की लड़ाई से पहल ही अलग हो गयी थी । पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला धारा-370 की लड़ाई एकदम से छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं, मगर वे यह नहीं चाहते कि इसके चलते सब कुछ ठप्प रहे । कश्मीरी मतदाताओं के लिए यह बदलाव स्पष्ट संदेश है कि जो नेता उन्हें दो साल से धारा-370 वापसी तक के लिए संघर्ष जारी रखने के भ्रम में डाले हुए हैं, उनके भुलावे में न पड़े । 24 जून की दिल्ली बैठक से लौटकर नेशनल कान्फ्रेंस नेता पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने साथ गठजोड़ घटकों को असलियत बता दिया - ‘हम धारा-370 वापसी के भ्रम में न रहें ।’
संसद का मानसून सत्र पेगासस हंगामे के कारण चल नहीं पाया । अगर चलता तो भी कोई कश्मीरी सदस्य धारा-370 वापसी की बात तो नहीं उठा पाते । ज्यादा-से-ज्यादा पहले जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा लौटाने और फिर चुनाव कराने की मांग रख सकते थे, जो वे कश्मीर में 24 जून के बाद से लगातार कर रहे हैं ।
24 जून की पीएम बैठक एक प्रकार से ‘राह बता तो आगे चल’ वाली कहावत चरितार्थ कर रही है । उस बैठक में फारूक अब्दुल्ला ने महबूबा मुफ्ती का साथ देते हुए धारा-370 वापसी की मांग उठायी, जिसका दो और नेताओं ने समर्थन किया । लेकिन पीपुल्स कान्फ्रेंस नेता मुजफ्फर बेग ने बीच में ही दखल देकर अब्दुल्ला को बोलने नहीं दिया । बेग ने मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होने का हवाला देकर फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती दोनों को चुप करा दिया । पीएम बैठक में आमंत्रित 14 कश्मीरी पार्टियों के नेता सुप्रीम कोर्ट का डर दिखाकर आपस में ही एक-दूसरे को धारा-370 वापसी पर जोर देने से रोक देते हैं । एक साल पहले तक केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को बार-बार कहना पड़ता था कि धारा-370 की वापसी नहीं होगी । अब केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट का भी हवाला नहीं देना पड़ता । नवंबर, 2020 में पीपुल्स कान्फ्रेंस ने ही सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर जम्मू व कश्मीर का विशेष दर्जा हटानेवाले संविधान संशोधन को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर जल्द सुनवाई की अर्जी दी । 2019 से ही सुप्रीम कोर्ट में इन याचिकाओं पर सुनवाई पांच जजों की संविधान पीठ के पास लंबित है ।
धारा-370 खात्मे की इस बरसी पर पांच अगस्त को ही स्वतंत्रता दिवस समारोहों की 75वीं वर्षगांठ का राष्ट्रध्वज तिरंगा श्रीनगर के ऐतिहासिक लाल चौक पर फहराता नजर आया । विशेष दर्जा के समय में इस जगह तिरंगा फहराने पर विवाद हो जाता था । लाल चौक पर कश्मीरी झंडा फहराता था और जम्मू व कश्मीर के अपने संविधान के अंतर्गत पाकिस्तानी झंडा जगह-जगह लहराता दीखता था ।
समूचे जम्मू व कश्मीर में भाजपा ने तिरंगा रैलियां निकाली, जिसे महबूबा मुफ्ती ने शोक दिवस बताया और विरोध मार्च निकाला । महबूबा की पैतृक लोकसभा सीट अनंतनाग में भाजपा ही निगम पार्षद रोमासिया रफीक ने खनाबल डिग्री कॉलेज के पास तिरंगा फहराया ।
जम्मू व कश्मीर प्रशासन ने चार महीना पहले नयी औद्योगिक नीति का एलान किया, जिसमें बाहरी निवेश की इजाजत दी गयी । पांच अगस्त को ही पता चला कि 23,000 करोड़ रूपये की परियोजना को मंजूरी दी गयी ।
केंद्र सरकार ने संसद में कांग्रेस के नेतृत्व में लगातार चल रहे विपक्ष के गतिरोध के बावजूद कश्मीर पर कांग्रेस को विश्वास में लेने की नीति पांच अगस्त को ही अपनायी । विदित रहे कि ‘कांग्रेस ने धारा-370 हटाने के सरकार के तरीके की आलोचना जरूर की, लेकिन इसकी वापसी की मांग कभी नहीं उठायी ।’ कांग्रेस के लोकसभा सदस्य अधीर रंजन चौधरी की अध्यक्षता वाली संसद की लोकलेखा समिति के कश्मीर दौरे की इजाजत 6 अगस्त को क्लियर हुई ।
गत वर्ष अक्टूबर में रक्षा मंत्रालय ने अंदरूनी और बाहरी तनातनी का हवाला देकर इस दौरे का विरोध किया । इस बार यही संसदीय समिति 14 से 17 अगस्त तक लेह में स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ समारोह तिरंगा फहरा कर मनाएगी । संसद में गतिरोध के मुखर वक्ता कांग्रेस के एक और सदस्य शशि थरूर को भी इसी समय कश्मीर जाने की इजाजत दी गयी, जो सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से संबद्ध संसद की स्थायी समिति के अध्यक्ष हैं ।
धारा-370 वापसी के लिए बने गुपकार गठजोड़ प्रवक्ता मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के मुहम्मद युसुफ तारिगामी ने पांच अगस्त को वही बात दुहरायी, जो उन्होंने 24 जून की पीएम बैठक के बाद कश्मीर लौटकर कहा था । पीएजीडी की ओर से जारी बयान में तारिगामी ने कहा कि कश्मीर से ‘दिल्ली की और दिल की दूरी’ तबतक कम नहीं हागी, जब तक धारा-370 खत्म किए जाने के बाद गिरफ्तार किए गए राजनीतिक बंदियों को रिहा न किया जाए । 24 जून की बैठक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘दिल की और दिल्ली की दूरी’ कम करने का प्रयास बताया था । उसमें कश्मीरी नेताओं ने इसके लिए राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग उठायी थी । गुपकार गठजोड़ प्रवक्ता ने धारा-370 वापसी पर जोर नहीं दिया । इस वर्ष चार अगस्त को श्रीनगर से प्राप्त पुलिस आंकड़े के अनुसार जम्मू व कश्मीर प्रशासन ने 2300 लोगों को 1200 से ज्यादा मामलों में यूएपीए(गैर-कानूनी गतिविधियां रोक कानून) के अंतर्गत गिरफ्तार किया है । जम्मू व कश्मीर पुलिस के मुताबिक 956 लोग पीएसए(जन सुरक्षा कानून) के अंतर्गत गिरफ्तार किए गए । यूएपीए के तहत बंद 46 प्रतिशत और पीएसए के अंतर्गत गिरफ्तार 30 प्रतिशत लोग अभी भी जेल में हैं ।
2020 में धारा-370 वापसी लड़ाई का तवा गरम था । क्योंकि अगस्त, 2019 से बंद अब्दुल्ला पिता-पुत्र और महबूबा मुफ्ती को जेल से छोड़ा गया था । प्रधानमंत्री ने पांच अगस्त को ही लोगों का ध्यान हटाने के लिए अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी । इस वर्ष भारतवासियों का ध्यान इस तरफ लाने के लिए प्रधानमंत्री ने पांच अगस्त को लखनऊ में धारा-370 हटाने और राम मंदिर की आधारशिला रखने को प्रमुख उपलब्धियों में गिनाया ।
जम्मू व कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हो रहे हैं । सुरक्षा बलों की गिरफ्त में जनजीवन है और आतंकी हमले पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं । जुलाई के अंत में महबूबा मुफ्ती ने अपनी पार्टी के सम्मेलन में पाक प्रधानमंत्री से मिलती-जुलती भाषा में कहा कि 05-08-2019 को ‘कश्मीर के लोगों का जो कुछ छीना गया’, उसे सूद समेत लौटाना होगा । इसे कश्मीर में किसी ने नोटिस नहीं लिया । उसी समय पाक अधिकृत कश्मीर(पीओके) चुनाव में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी पार्टी के चुनाव प्रचार में खुद को कश्मीरियों का पैरोकार कहते हुए धारा-370 को अपनी लड़ाई बताया । अपनी पार्टी के अब्दुल कयूम नियाजी को पीओक का तथाकथित ‘प्रधानमंत्री’ बनाकर इमरान खान ने जम्मू व कश्मीर मामले का जोर-शोर से प्रचार किया । पीएम बैठक से एक दिन पहले 23 जून को महबूबा मुफ्ती ने कहा - ‘अगर भारत तालीबान से बात कर सकता है, तो पाकिस्तान से क्यों नहीं?’ इसका स्पष्ट जवाब फारूक अब्दुल्ला ने बैठक शुरू होने के कुछ घंटे पहले यों दिया - ‘महबूबा मुफ्ती का अपना एजेंडा है, हमारा अपना एजेंडा है । हम पाकिस्तान के बारे में बात नहीं करना चाहते, अपने प्रधानमंत्री से बात करेंगे’ ।
इधर अफगानिस्तान में तालिबान का फिर से बोल वाला होने से पाक पोषित कश्मीरी उग्रवाद के मनोबल बढ़ने के आसार हैं । आठ अगस्त को एनआईए(राष्ट्रीय जांच एजेंसी) ने पाकिस्तान से प्राप्त पैसे आतंकियों तक पहुंचाने के मामले में जमात-ए-इस्लामी और हिजबुल-मुजाहिदीन के 56 ठिकानों पर रात भर छापेमारी की ।