जम्मू व कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपने मंत्रिमंडल के साथ पुलिस घेराबंदी तोड़कर दीवाल फांदकर उस कब्रगाह तक पहुंचे जहां जाने से रोकने के लिए उनलोगों को अपने,अपने घरों में ‘लॉक’ कर दिया गया था ।

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के आदेश से मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के साथ.साथ कश्मीर के सभी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के नेताओं को एक दिन पहले ही अपने घरों में बंद करके पुलिस ने उनके गेट पर बाहर से ताला लगा दिया था, ताकि वे 13 जुलाई को उस कब्रगाह तक नहीं पहुंच सकें । 13 जुलाई तारीख कश्मीर के लिए ऐतिहासिक दिन है और कश्मीरियत की पहचान तथा कश्मीरियों की सामाजिक भावनाओं से जुड़ी है । शहीदों की मजार पर उस दिन ‘फातिहा’ पढ़ने का रिवाज है ।

वर्ष 1931 में जम्मू व कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के खिलाफ विद्रोह भड़कने के दौरान 13 जुलाई को 22 नागरिक मारे गए थे । श्रीनगर जेल के बाहर उसी जगह उन्हें दफनाया गया, जहां वे शहीद हुए थे । श्रीनगर के ख्वाजा बाजार में स्थित वो नक्सबांद साहिब दरगाह शहादत स्थल के रूप में जाना जाता है, जहां 13 जुलाई को 22 शहीदों को श्रद्धांजलि देने की परंपरा चली आ रही है । 13 जुलाई और सद्रे.रियासत कहलानेवाले नेशनल कान्फ्रेंस संस्थापक शेख मुहम्मद अब्दुल्ला का जन्म दिन 05 दिसंबर सार्वजनिक अवकाश हुआ करता था । धारा.370 खत्म करके जम्मू व कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा के साथ.साथ राज्य का दर्जा हटाकर संघशासित क्षेत्र(यूटी) बनाए जाने के 6 महीने के बाद उपराज्यपाल ने ये दोनों अवकाश भी खत्म कर दिए ।

अक्टूबर, 2024 में 10 साल के अंतराल के बाद हुए जम्मू व कश्मीर विधान सभा चुनाव में सबसे प्रभावशाली पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस पूर्ण बहुमत से सत्ता में आयी । लेकिन पुलिस, कानून व व्यवस्था और यूटी के सारे महत्वपूर्ण विभागों पर पूर्ण नियंत्रण उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का ही रहा । जम्मू व कश्मीर सरकार के पास अभी तक अधिकार के नाम पर कुछ नहीं है । मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला शेख अब्दुल्ला के पोते हैं । नेशनल कान्फ्रेंस के सत्ता में आने के बाद से पहली 13 जुलाई को अपनी परंपरा कायम रखने के लिए उमर अब्दुल्ला, उनके पिता नेशनल कान्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला समेत सभी क्षेत्रीय दलों के विधायकों, नेताओं ने शहीद दरगाह पर जाकर श्रद्धांजलि देने की योजना बनायी । लेकिन उपराज्यपाल ने यह योजना कार्यान्वित न होने देने के लिए कानून व व्यवस्था का मामला बनाकर निर्वाचित सरकार के खिलाफ पुलिस का इस्तेमाल किया । उपराज्यपाल के निर्देश पर अधिकारियों ने मुख्यमंत्री की खुलेआम उपेक्षा कर दी । मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को 10 जुलाई को श्रीनगर जिला प्रशासन को अधिसूचित किया कि वे 13 जुलाई को शहीद दिवस मनाएंगे । उसके पहले से उपराज्यपाल कार्यालय ने इस आयोजन के विफल करने की तैयारी कर रखी थी और सीआरपी समेत अन्य केंद्रीय बलों को आवश्यक निर्देश दिए जा चुके थे । तीर.चार दिन पहले से ही सत्तारूढ़ नेशनल कान्फ्रेंस समेत सभी प्रमुख दलों की बैठकें चल रही थी । उपराज्यपाल की उस पर नजर थी । 10 जुलाई को ही नेशनल कान्फ्रेंस प्रवक्ता इमरान नबी दर ने मीडिया को बताया कि ‘हमने उपराज्यपाल को पत्र लिखकर आग्रह किया कि 13 जुलाई और 05 दिसंबर की तारीखों को सार्वजनिक अवकाश फिर से घोषित कर दें ।’ पार्टी महासचिव अली मुहम्मद सागर ने उपराज्यपाल से शहीद कब्रगाह मजार.ए.शुहादा पर 13 जुलाई को ‘फातिहा’ पढ़ने की इजाजत मांगी । ठीक 12 जुलाई को श्रीनगर प्रशासन ने मुख्यमंत्री और तमाम क्षेत्रीय दलों की अर्जियों को ठुकराकर ख्वाजा बाजार शहीद दरगाह की ओर जाने की इजाजत नहीं दी । मुख्यमंत्री समेत सभी क्षेत्रीय दलों के नेताओं को और आम जनता की उसमें भागीदारी रोकने के विभिन्न हथकंडे अपनाए गए । हुर्रियत कान्फ्रेंस अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक को जेल में डाल दिया गया । नेशनल कान्फ्रेंस सुप्रीमो फारूक अब्दुल्ला, उनके पुत्र मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, पीपुल्स कान्फ्रेंस प्रमुख विधायक सज्जाद लोन, मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार नसीर असलम वानी, सीपीएम नेता विधायक एम.वाई. तारीगामी सब के सब नजरबंद कर दिए गए । उप मुख्यमंत्री और हिन्दू बहुल जम्मू क्षेत्र से जीते एकमात्र नेशनल कान्फ्रेंस विधायक सुरिंदर चौधरी उस समय जम्मू में थे । मगर उनका श्रीनगर आवास लॉक कर दिया गया । जम्मू व कश्मीर सरकार और सभी दलों के नेताओं को शहादत दिवस के साथ.साथ 11 जुलाई को उमर अब्दुल्ला की दादी बेगम अकबर जहां अब्दुल्ला का भी वार्षिक इंतकाल दिवस मनाना था । लेकिन जिला प्रशासन ने कुछ भी नहीं होने दिया । प्रशासन ने निषेधाज्ञा लागू करके आम जनता को ख्वाजा बाजार की तरफ जाने से मना कर दिया और निर्देश दिए कि इन आदेशों का उल्लंघन करनेवालों के खिलाफ वर्तमान कानूनी प्रावधानों के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी । इसका मतलब उपराज्यपाल ‘कश्मीरियत’ और ‘जम्हूरियत’ दोनों को समझना नहीं चाहते । शहीद दरगाह को चारों तरफ से पुलिस ने सील करके कड़ी घेराबंदी कर दी । मुख्यमंत्री और सभी दलों के नेताओं के आवासों को भी निगरानी में ले लिया ।

सारी घेराबंदी को तोड़कर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनके मंत्री, विधायक 13 जुलाई को ख्वाजा बाजार दरगाह पहुंच गए और 1931 में महाराजा हरि सिंह के खिलाफ विद्रोह में मारे गए 22 शहीदों को ‘फातिहा’ पढ़कर श्रद्धांजलि दी ।

ऐतिहासिक परिपाटी को बरकरार रखने के प्रयास में सफल होने के बाद उमर अब्दुल्ला ने कहा कि पुलिस बलों ने उनके साथ धक्कामुक्की की और हाथापाई करके उन्हें शारीरिक रूप से पीछे धकेला । उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी पैदल चलते हुए पुलिस के रोके जाने के बावजूद पहुंचे । मुख्यमंत्री को ऑटो से और उनके मंत्री सकीना मसूद (ईटू) को स्कूटर से पहुंचना पड़ा । बुजुर्ग फारूक अब्दुल्ला और तारिगामी भी पहुंच गए ।

मुख्यमंत्री कानून और संविधान पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘किस कानून के तहत एक निर्वाचित सरकार को कानून व व्यवस्था के तथाकथित रखवालों ने हमें रोका और नजरबंद कर दिया । 2024 के जिस चुनाव में पूर्ण बहुमत से जनादेश प्राप्त जम्मू व कश्मीर की निर्वाचित सरकार को केंद्र द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल प्रशासन की पुलिस ने नजरबंद कर दिया और मतदाताओं की भावनाओं से जुड़ी परंपरा का निर्वाह करने से रोका ।’

उमर अब्दुल्ला ने इस संबंध में दिवंगत भाजपा नेता अरूण जेटली की पंक्ति ‘जम्मू व कश्मीर में लोकतंत्र गैर.निर्वाचित की दमन नीति है ।’ दुहराते हुए कहा कि अभी वही बात ज्यों.की.त्यों लागू हो रही है ।

पूर्व प्रधानमंत्री और सभी दलों के लिए सर्वमान्य नेता अटल बिहारी वाजपेयी के जम्मू व कश्मीर नारे. ‘कश्मीरियत, जम्हूरियत, इन्सानियत की बात नेशनल कान्फ्रेंस नेताओं के मुंह से ही ज्यादा सुनने को मिलती है । केंद्र की वर्तमान भाजपा गठजोड़ सरकार के भाजपा नेता जम्मू व कश्मीर में या उसके बाहर अटल बिहारी वाजपेयी के नाम की माला जरूर जपते हैं, मगर उनका कश्मीरियों को भरोसे में लेने के लिए दिये गए इस नारे का जिक्र नहीं करते । सभी जानते हैं कि नेशनल कान्फ्रेंस नेता फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला दोनों की वाजपेयी मंत्रिमंडल में 1999 से 2004 के बीच मंत्री रह चुके हैं ।

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी नेता महबूबा मुफ्ती ने 13 जुलाई को जम्मू व कश्मीर उपराज्यपाल मनोज सिनहा द्वारा गए दुरूपयोग को ‘कश्मीरियत, जम्हूरियत और इन्सानियत’ के लिए ‘शर्मनाक’ बताया । महबूबा मुफ्ती के पिता मुफ्ती मुहम्मद सईद भी वाजपेयी मंत्रिमंडल में शामिल थे । नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा ने जम्मू व कश्मीर में महबूबा मुफ्ती को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकर कर गठजोड़ सरकार बनायी और थोड़े ही दिनों बाद समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दिया । पहले राज्यपाल शासन और फिर राष्ट्रपति शासन लगाकर विधान सभा भंग की गयी । उसी स्थिति में 2019 में दूसरी बार सत्ता में आने के बाद 05 अगस्त को धारा.370 समाप्त करके जम्मू व कश्मीर राज्य को दो यूटी(संघशासित क्षेत्रों) में विभाजित कर दिया गया ।

जम्मू व कश्मीर से काटकर लद्दाख को यूटी का दर्जा दिया गया और जम्मू व कश्मीर का पूर्ण राज्य दर्जा समाप्त कर दिया गया । आज तक केंद्र सरकार के पास जम्मू व कश्मीर की जनता के सामने यह स्पष्ट करने के लिए कोई सफाई नहीं है कि इसका राज्य दर्जा घटाने के पीछे मंशा क्या थी । धारा.370 हटानेवाले जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और दिसंबर, 2023 में फैसला आने के समय तक केंद्र सरकार के पास इस मुद्दे पर जवाब नहीं था । चीफ जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने यह मानना चाहा कि संविधान की धारा.3 का इस्तेमाल पहली बार सिर्फ जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा घटाकर यूटी बनाने के लिए क्यों दिया गया । सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को ज्यादा नहीं कुरेदा और केंद्र सरकार के इस आश्वासन को मान गयी कि जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा लौटा दिया जाएगा ।

धारा.370 हटाए जाने के केंद्र के निर्णय को सुप्रीम द्वारा सही ठहराने के फैसले को जम्मू व कश्मीर के नेताओं ने कमोवेश मान लिया । सिर्फ राज्य दर्जा लौटाने की राजनीतिक कवायद चलती रही । इसमें सबसे अच्छी भूमिका प्रभावशाली नेता फारूक अब्दुल्ला ने निभायी । उन्होंने केंद्र से टकराव का रास्ता टालने की नीति अपनायी और सुप्रीम कोर्ट में दिए गए आश्वासन के अनुसार चुनाव से पहले राज्य दर्जा लौटाने का अनुरोध करते रहे ।

2024 में मई में लोक सभा चुनाव में भाजपा की उम्मीदों पर पानी फिर गया । केंद्र सरकार कानून व व्यवस्था की दुहाई देकर जम्मू व कश्मीर में विधान सभा चुनाव और राज्य का दर्जा दोनों लौटाने का काम लंबित रखना चाहती थी । सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू व कश्मीर विधान सभा चुनाव 30 सितंबर 2024 तक कराने का निर्देश चुनाव आयोग को दिया, लेकिन राज्य दर्जा लौटाने की कोई समय.सीमा केंद्र के लिए तय नहीं किया ।

विधान सभा चुनाव के दौरान भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत केंद्रीय भाजपा नेताओं ने जम्मू व कश्मीर के मतदाताओं को लुभाने के लिए राज्य दर्जा लौटाने का वायदा किया । लेकिन लोकसभा चुनाव की तरह विधान सभा चुनाव में भी भाजपा की उम्मीदें पूरी नहीं हुई । सिर्फ इतना हुआ कि भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे के तहत हिंदू बहुल आबादी वाला जम्मू और मुस्लिम बहुल मतदाताओं वाला कश्मीर क्षेत्र मजहबी आधार पर दोबारा दो हिस्सों में बंट गया ।

जम्मू व कश्मीर में लोकतांत्रिक तरीके से जनादेश हासिल कर बनी नेशनल कान्फ्रेंस नीत सरकार के राज्य दर्जा लौटाने की गुजारिश पर केंद्र सरकार ने आजतक ध्यान नहीं दिया । 09 महीने से मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला केंद्र से टकराव टालने के लिए केंद्र से सिर्फ अनुरोध कर रहे हैं कि ऐसी कुछ अधिसूचना जारी की जाए ताकि निर्वाचित सरकार मतदाताओं के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन कर सके ।

13 जुलाई वाली घटना सीधे तौर पर क्षेत्रीय दलों को उकसाने के लिए उपराज्यपाल की पहल के रूप में देखा जा रहा है । जैसा कि श्रीनगर के अखबार ‘ग्रेटर कश्मीर’ का कहना है । ऐसे समय में यह कांड हुआ है, जब सभी राजनीतिक दल यह पक्की उम्मीद लगाए बैठे हैं कि 21 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में जम्मू व कश्मीर को राज्य दर्जा लौटानेवाला बिल केंद्र सरकार लाएगी । नेशनल कान्फ्रेंस नेता फारूक अब्दुल्ला ने केंद्र को चेताया भी कि अब अगर और देर की गयी तो वे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे ।

13 जुलाई को उपराज्यपाल ने आतंक प्रभावित बारामुला में नियुक्ति पत्र बांटे । वे शायद 1931 के शहीदों को ‘आतंकी’ दिखाना चाहते थे ।

धारा.370 खत्म किए जाने के 6 महीने बाद 13 जुलाई और 05 दिसंबर का सार्वजनिक अवकाश रद्द करने के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का विस्फोट अभी जम्मू व कश्मीर को यूटी बनाए जाने के 6वे साल में सामने आया है । मनोज सिन्हा महाराजा हरिसिंह के जन्मदिन को सार्वजनिक अवकाश और उनके खिलाफ विद्रोह करनेवालों को ‘उपद्रवी , घोषित कर चुके है ।

उपराज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के पांच वर्ष पूरा होने पर मनोज सिन्हा ने 22 अप्रील को पहलगाम हमले के समय सुरक्षा में चूक की जिम्मेदारी अपने ऊपर अभी ली, जिसमें 26 लोग मारे गए । लेकिन उन्होंने ही निर्वाचित सरकार के खिलाफ पुलिस को भिड़ाकर जन.भावनाओं को ताक पर रख दिया ।

पहलगाम हमले की सारे कश्मीरियों ने निंदा कीए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का समर्थन किया । आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई में जनता सरकार के साथ है । लेकिन 13 जुलाई के उपराज्यपाल के कदम से राज्य दर्जा टालने से ज्यादा जन.असंतोष को बढ़ा दिया । रोके जानेवाले नेताओं में सीपीएम के सबसे पुराने विधायक एम. वाई. तारीगामी भी थे । सारे वामदलों के नेताओं ने शहादत स्थल पर ‘फातिहा’ रोकने की कार्रवाई को कश्मीरियों का ‘अपमान’ बताते हुए उन शहीदों को ‘उपद्रवी’ कहने और महाराजा हरिसिंह का जन्मदिन अवकाश घोषित करने की कड़ी निंदा की ।