प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जितनी बार चुनाव प्रचार में सिलीगुड़ गए, एक बार भी गोरखों के ‘सपने’ का जिक्र नहीं किया । 2014 में दार्जीलिंग लोकसभा सीट जीतने क लिए नरेंद्र मोदी ने दार्जीलिंगवासियों से कहा कि उनका सपना सिर्फ भाजपा पूरा कर सकती है । प्रधानमंत्री ने गोरखालैंड का नाम नहीं लिया, अलग राज्य का दर्जा देने का भी जिक्र नहीं किया, सिर्फ इतना कहा कि दार्जीलिंग के लोगों का सपना पूरा करने का वायदा किया । दार्जीलिंग को अलग गोरखालैंड राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर तीन दशक से दार्जीलिंग में हिंसक आंदोलन चल रहे हैं । 2004 लोकसभा चुनाव तक भाजपा कहीं पिक्चर में नहीं थी । 2009 में भाजपा के जसवंत सिंह ने इस वायदे पर दार्जीलिंग लोकसभा सीट जीती कि वे अलग गोरखालैंड के लिए आवाज उठायेंगे । उन्होंने आवाज उठाया भी । उस वक्त केंद्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी और पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार । 2011 में वाममोर्चा सरकार को हराकर तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी(दीदी) मुख्यमंत्री बनी और उन्होंने गोरखा नेताओं से ‘भाईचारा’ स्थापित करके खूनखराबा के साथ-साथ अलग गोरखालैंड की आवाज बंद करना पहला लक्ष्य बनाया । दीदी को उस दिशा में काफी हद तक सफलता मिली भी । लेकिन अभी 2019 लोकसभा चुनाव में दार्जीलिंग लोकसभा सीट भाजपा के कब्जे से छीनने के लिए दीदी की सारी रणनीति दांव पर लगी है । ममता बनर्जी के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ है ।
दीदी ने सिर्फ भाजपा की कमियों और गोरखालैंड आंदोलनकारियों को छिन्न-भिन्न करने का फायदा उठाना चाहा है । 2014 में भाजपा के एस. एस. अहलूवालिया ‘बाहरी’ होने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वायदा पूरा करने के नाम पर जीते । पांच साल तक अहलूवालिया ने गोरखों की सुधि नहीं ली । गोरखालैंड आंदोलन के दौरान 2017 में हिंसा पर काबू पाने के लिए तृणमूल कांग्रेस सरकार की पुलिस फायरिंग में 11 आंदोलनकारियों की मौत के बावजूद अहलूवालिया सिलीगुड़ी नहीं गए । वो एतिहासिक दार्जीलिंग बंद 104 दिनों का था । अहलूवालिया की जगह भाजपा ने इस बार दूसरे ‘बाहरी’ राजू सिंह बिस्ता को उम्मीदवार बनाया । गोरखालैंड आंदोलन के सबसे तगड़े नेता विमल गुरूंगा की पार्टी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा(जीजेएम) का दीदी तोड़ चुकी हैं । बिमल गुरूंगा के खिलाफ हिंसा के कई मामले दर्ज हैं और वे गिरफ्तारी से बचने के लिए सिलीगुड़ी नहीं आ सकते । बिमल गुरूंगा की बदौलत भाजपा ने दो बार जीत हासिल की है । बिमल गुरूंगा अज्ञातवास से ही गोरखालैंड आंदोलन जीवित रखे हुए हैं और दीदी के विरोध में भाजपा का साथ दे रहे हैं । गोरखालैंड के सिवाए दार्जीलिंग में और कोई चुनावी मुद्दा है ही नहीं । प्रायः ऐसा हुआ कि नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ममता बनर्जी के आगे या पीछे ही गोरखालैंड में चुनावी सभाएं की । अमित शाह ने बार-बार विवादास्पद नेशनल नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) और नागरिकता बिल का जिक्र किया, जो वहां मुद्दा ही नहीं है । दीदी ने दार्जीलिंग विधायक अमर सिंह राय को लोकसभा का अपना उम्मीदवार बनाकर अगले विधान सभा चुनाव में दार्जीलिंग की तीनों सीट छोड़ देने का दांव खेला है ।
दीदी ने जीजेएम को फोड़कर बिमल गुरूंगा के दाहिने हाथ विनय तमांग को गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन(जीटीए) का प्रमुख सितंबर, 2017 में हिंसा पर काबू पाने के बाद बनाया । बिमल गुरूंगा से अमरसिंह राय को भी दीदी ने ही फोड़ा । ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद जुलाई, 2011 में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और जीजेएम के बीच त्रिपक्षीय समझौता बिमल गुरूंगा की अगुवाई में हुआ । 2012 में जीटीए का गठन हुआ और सभी 45 सीटें बिमल गुरूंगा के समर्थकों ने जीती । बिमल गुरूंगा जीटीए प्रमुख बने । उसके बाद से जीटीए का चुनाव नहीं हुआ । दार्जीलिंग में पहली बार ऐसा हुआ है जब गोरखालैंड आंदोलन का कोई ऐसा धांसू नेता नहीं है, जो किसी पार्टी को लोकसभा सीट से जिता दे । लेकिन गोरखालैंड मुद्दा इतना हावी है कि इसे डंप करने की सभी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों की नीति की प्रतिक्रिया में क्षेत्रीय पार्टी का पक्ष मजबूत होने की चर्चा है। उसमें सबसे तगड़ी है, हरका बहादुर छेत्री के नेतृत्ववाली जन आंदोलन पार्टी । ये गोरखालैंड आंदोलन के सबसे सम्मानित और प्रभावशाली नेता माने जाते हैं । 2011 विधान सभा चुनाव में जब दीदी के साथ बिमल गुरूंगा ने तालमेल कर लिया, तो हरका बहादुर छेत्री को अच्छा नहीं लगा । इनके लोकसभा सीट के लिए पर्चा भरने से जीजेएम के विनय तमांग गुट के लिए दीदी का साथ देकर गोरखालैंड मुद्दे के बिना अपने मतदाताओं के बीच खड़े होना कठिन हो गया । गोरखालैंड आंदोलन की ही उपज विनय तमांग का दीदी ने इस सौदेबाजी फांस में डाला है कि दार्जीलिंग सीट ‘छोड़ दो’ तो मैं विधान सभ सीट छोड़ दूंगी । इसकी असलियत तो लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के दिन 19 मई को उजागर हो जाएगी । अमर सिंह राय ने विधान सभा सीट से इस्तीफा देकर लोकसभा के लिए पर्चा भरा । रिक्त दार्जीलिंग विधान सभा सीट के लिए 19 मई को मतदान कराने का चुनाव आयोग ने निर्णय लिया है । उसमें दीदी का रवैया क्या होगा, इस पर आगे का गोरखालैंड आंदोलन निर्भर है । दार्जीलिंग लोकसभा सीट के लिए तो 18 अप्रील को मतदान हो चुका । सिलीगुड़ी से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार गोरखों पर सबसे ज्यादा हरका बहादुर छेत्री के भाषणों का असर पड़ा है । उन्होंने मतदाताओं को समझाया कि दीदी गोरखालैंड राज्य गठन न होने देने पर अड़ी हैं । 10 साल में भाजपा का भी रवैया देख लिया । गोरखालैंड लोगों की भावनाओं से जुड़ा है, इसीलिए जीटीए का गठन दार्जीलिंग की जगह गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन नाम देकर किया गया । बिमल गुरूंगा ने इसे गोरखालैंड गठन की पहली सीढ़ी बताया और इस मुद्दे पर दीदी से कभी समझौता नहीं किया । गोरखालैंड आंदोलन के जन्मदाता सुभाष घीसिंग के ‘एकछत्र राज’ में उनकी कृपा से वाममोर्चा और कांग्रेस उम्मीदवार बारी-बारी से जीते । घीसिंग के संगठन गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट(जीएमएलएफ) से निकलकर बिमल गुरूंगा ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा बनाया और 2008 में घीसिंग के बाद दूसरे दबंग नेता के रूप में उभरे ।
छेत्री ने कमजोर नस उभाड़ने वाला भाषण दिया कि 2017 में 104 दिनों के आंदोलन में 11 गोरखों का बलिदान और उससे भाजपा का अलग रहना मतदाताओं के साथ धोखा है । इस विंदु पर दीदी गुट के विनय तमांग भी अपराध बोध से ग्रसित हैं । कमाल की बात है कि दीदी ने भी ‘सवाल उठाया’ कि उस दौरान भाजपा कहां थी ।
भाजपा को ऐसा ही जवाब नगालैंड में अलग ‘ग्रेटर नगालिम’ और नगा विद्रोहियों से 2015 में हुए शांति समझौते पर मिलने की संभावना है । नगालैंड की एकमात्र लोकसभा सीट पर प्रथम चरण में 11 अप्रैल को ही वोट पड़े । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी नगालैंड गए, शांति समझौते का कभी नाम नहीं लिया । कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एकमात्र नेता थे, जिन्होंने वायदा किया कि अगर वे सत्ता में आए तो नगा शांति समझौता को स्थायी हल में बदलेंगे ।
नगा आंदोलन से जनाधार बनानेवाले मुख्यमंत्री नेफियू रियो के(एनपीएफ) नगा पीपुल्स फ्रंट के साथ तालमेल करके भाजपा वहां सत्तारूढ़ गठजोड़ में शामिल है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 लोकसभा चुनाव में नगा समस्या के हल का वायदा किया । फिर फरवरी, 2018 में विधान सभा चुनाव में भी इसे दुहराया । लेकिन तीन अगस्त, 2015 को नगा विद्रोही नेता नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम(एनएससीएन) के साथ दिल्ली में हुए ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ के विषय में आज तक लोग कुछ नहीं जानते । ‘स्थायी हल’ की खोज में लटका हुआ है । कांग्रेस उम्मीदवार पूर्व मुख्यमंत्री के. एल. यिशी की स्थिति मजबूत बतायी गयी है । ‘दीमापुर पोस्ट’ के अनुसार एनपीएफ से अलग हुए भाजपा विरोधी गुट ने कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन किया । 60 सदस्यों के नगालैंड विधान सभा में कांग्रेस के एक भी विधायक नहीं हैं । भाजपा के 12 और अकेली सबसे बड़ी पार्टी एनपीएफ के 26 विधायकों के लिए भी अपने मतदाताओं को नगा मुद्दे पर आश्वस्त करना कठिन हो रहा था । प्रधानमंत्री समेत भाजपा नेताओं ने यहां नागरिकता बिल की दुहाई दी, जिसके विरोध में नगालैंड विधान सभा से प्रस्ताव पारित हो चुका है ।
नगालैंड की तरह मणिपुर में भी 18 अप्रैल को हुए मतदान में नगा मुद्दा और नागरिकता बिल विरोध हावी रहा । भाजपा शासित मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के लिए भी संकट था । नगा मुद्दे को उछालकर सीपीआई के मोइयांगथेम नारा सिंह सबसे मजबूत उम्मीदवार के रूप में उभरे । पिछले लोकसभा चुनाव में भी वे दूसरे नंबर पर रहे, कांग्रेस, भाजपा दोनों को कड़ी शिकस्त दी ।