नगा विद्रोही संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम(एनएससीएन-आईएम-आइसाक मुइवा गुट) के साथ शांति वार्ता चला रहे केंद्र सरकार के प्रतिनिधि और नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि जब वार्ता को निर्णायक दौर में ला रहे थे, ठीक उसी समय एनएससीएन सुप्रीमो टी. मुइवा ने राज्यपाल को हटाने की मांग कर डाली ।
86-वर्षीय टी. मुइवा दिल्ली में रहते हुए केंद्र सरकार को यह ऐसा संदेश देना चाहते थे, जिससे लगे कि आर. एन. रवि ने केंद्र और एनएससीएन दोनों के साथ धोखा किया है । एनएससीएन(आईएम) ने अगस्त, 2015 में दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में केंद्र के साथ डील किया, जिसे ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ कहा जाता है । इस पर एनएससीएन की ओर से टी. मुइवा और आइसाक चिशी स्वू दोनों ने हस्ताक्षर किए । इसके लिए दोनों को तैयार करने का श्रेय वार्ताकार आर. एन. रवि को जाता है, जो जुलाई, 2019 में नगालैंड के राज्यपाल बनाए गए । एनएससीएन के दूसरे सुप्रीमो आइसाक चिशी की 2016 में दिल्ली में ही मृत्यु हो गयी । 2015 ‘डील’ का मजमून पर दोनों पक्षों ने गोपनीयता बरती । अभी पांचवें साल में टी. मुइवा ने उस समय मुंह खोला है, जब नगालैंड के राज्यपाल सभी नगा गुटों को इस झंझट के अंतिम डील के लिए अमूमन राजी कर चुके हैं । नगालैंड के सबसे पुराने और मजबूत नगा गुट एनएससीएन के संचालक मुइवा ने दावा किया कि 2015 डील में इस बात पर सहमति हुई थी कि एनएससीएन(आईएम) ‘संप्रभुता का साझीदार होगा और दो अलग-अलग हस्तियों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का नया रिश्ता कायम होगा ।’ मुइवा ने गत हफ्ते ‘फ्रेमवर्क डील’ का मजमून दिल्ली में ही जारी किया और कहा कि समझौते में ‘संप्रभुता’ साझा करने की बात थी । बकौल मुइवा-‘हमने अलग संविधान और झंडे की मांग कभी नहीं छोड़ी, हमारी संप्रभुता भारतीय संविधान के दायरे में नहीं आती ।’ मुइवा के अनुसार राज्यपाल ने बड़ी बारीकी से मूल समझौते का मुख्यविन्दु ‘संप्रभुता’ गोल(डिलिट) कर दिया और संशोधित डील अन्य नगा गुटों से साझा करते रहे । 11 अगस्त को मुइवा ने यह कहकर आर. एन. रवि को राज्यपाल पद से हटाने की मांग कर डाली और 13 अगस्त को दिल्ली में आर. एन. रवि के साथ पूर्व निर्धारित वार्ता में शामिल नहीं हुए । अलबत्ता मुइवा दो खुफिया अधिकारियों से मिले । आर. एन. रवि भी खुफिया ब्यूरो(आईबी) के प्रमुख रह चुके हैं । मुइवा के अचानक बदले तेवर पर वार्ताकार आर. एन. रवि और केंद्र सरकार के किसी अधिकारी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने से इन्कार कर दिया । लेकिन इस संकट के शांतिपूर्ण स्थायी समाधान निकलने के राज्यपाल बनने से पहले और बाद के प्रयासों में सहयोग कर रहे नगा समुदायों में मुइवा के रवैये से नाराजगी है । नगालैंड से तो रिपोर्ट है कि नगा जनजातीय संगठन और विभिन्न नगा गुट मुइवा के रूख पर बंट गए हैं । लेकिन सबसे प्रभावशाली नगा जनजातीय मंच ‘हो हो’ समेत ज्यादातर नगा समुदाय एनएससीएन(आईएम) की राज्यपाल को हटाने की मांग से सहमत नहीं हैं ।
माहौल प्रतिकूल और अशांत होने का एक कारण राज्यपाल आर. एन. रवि का हिंसा राज चला रहे नगा गुटों के प्रति कुछ ऐसी कठोर उक्तियों का इस्तेमाल माना जा रहा है, जो उन्हें बड़ी नागवार गुजरी । राज्यपाल ने नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो को पत्र लिखकर कहा कि राज्य में सशस्त्र गिरोहों की समानान्तर सरकारें टैक्स वसूल रही हैं, जिस पर राज्य सरकार का कोई जोर नहीं चल रहा है । आर. एन. रवि ने इसी को आधार बनाकर कानून व व्यवस्था की हालत गंभीर बतायी और मुख्यमंत्री को लिखा कि संविधान की धारा 371ए(1) के अनुसार कानून व व्यवस्था से जुड़े जिला स्तर से ऊपर के ‘अधिकारियों की नियुक्तियां तथा तबादले’ राज्यपाल की मंजूरी से होगी । वार्ताकार-सह-राज्यपाल ने एनएससीएन या किसी नगा गुट का नाम तो नहीं लिया, मगर उनका सीधा तात्पर्य उन्हीं ‘गिरोहों से था । यहां तक कि वे सात नगा गुट भी नाराज हो गए तो नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप (एनएनपीजी) नामक संयुक्त मंच के जरिए अलग वार्ता चला रहे हैं। एनएनपीजी से आर. एन. रवि ने 2017 में संघर्षविराम समझौता किया । यह संयुक्त मंच एनएससीएन के ‘अलग संविधान, झंडे’ के अड़ियल रवैये से सहमत नहीं है और इस रूकावट को परे रखकर पहले एक अनुकूल रास्ता निकालने के पक्ष में है ।
आर. एन. रवि के दबाव में राज्य सरकार ने सात जुलाई को एक और आदेश जारी किया, जिसमें सभी सरकारी कर्मचारियों से कहा गया कि ‘भूमिगत संगठनों’ में शामिल अपने रिश्तेदारों का सूचीबद्ध करें । इससे शांति समझौते के समर्थक सिविल सोसायटी संगठनों के लोगों का भी गुस्सा भड़क उठा । लेकिन फिर भी वे यह नहीं चाहते थे कि वार्ता में इससे कोई गतिरोध पैदा हो ।
लेकिन आर. एन. रवि के पत्र से यह बात उजागर हो गयी कि निर्णायक दौर की वार्ता पर राज्यपाल और मुख्यमंत्री में मतभेद है । नेफियू रियो ने 25 जुलाई को इसे और भी अच्छी तरह स्पष्ट करते हुए साफ कर दिया कि उग्रवादी संगठनों की राजभवन की परिभाषा राज्य सरकार से मेल नहीं खाती । मुख्यमंत्री ने यह भी खुलासा कर दिया कि भूमिगत संगठनों में अपने रिश्तेदारों का नाम सरकारो कर्मचारियों को बताने का आदेश राजभवन का था । मुख्यमंत्री ने जब इस झमेले से पल्ला झाड़नेवाला स्पष्टीकरण दिया, उसके पहले एनएससीएन सुप्रीमो मुइवा दिल्ली में डेरा जमा चुके थे । उसी दौरान आर. एन. रवि ने मुइवा से दिल्ली में मुलाकात की तारीख तय की, जिससे मुइवा मुकर गए और राज्यपाल का हटाने की मांग कर डाली । पूरे वाकए पर केंद्र सरकार की नजर है, इसीलिए दो खुफिया अधिकारियों को मुइवा से संपर्क बनाए रखने का निर्देश दिया गया । मुइवा ने राज्यपाल पर यह कहकर बातचीत में अड़ंगा लगाने का आरोप लगाया कि उन्होंने मूल 2015 समझौते की ‘संप्रभ सत्ता साझेदारी’ वाली सहमति पंक्ति उड़ा दी । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को अंदाजा लगा कि नगा वार्ता में बात जितनी आगे बढ़ी है, कहीं उतना ही पीछे न चला जाए । इसलिए मुइवा के राज्यपाल को हटाने वाली शर्त रखने से पहले अगस्त के शुरू में ही असम सरकार में मंत्री हिमंत बिस्व शर्मा और नगालैंड के मुख्यमंत्री को दिल्ली में मुइवा से मिलने का निर्देश मिला । वैसे दोनों ने ही इस संबंध में कुछ भी बोलने से इन्कार कर दिया ।
1997 में एनएससीएन(आईएम) से केंद्र सरकार का ‘संघर्षविराम समझौता’ हुआ था । 18 साल चली लगभग 70 दौर की ‘शांति वार्ता’ बेनतीजा रही । 2014 में प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी ने इस झमेले का अंतिम नतीजा निकालने की ठानी । 2015 ‘डील’ उस दिशा में पहला कदम था । मई, 2019 में दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने आर. एन. रवि को राज्यपाल बनाकर 31 अक्टूबर तक ‘फाइनल डील’ को डेडलाइन दी । दिल्ली में अक्टूबर, 2019 में कई दौर की मैराथन वार्ताओं के बावजूद मुइवा ने ‘अलग झंडा, संविधान’ की अपनी जिद नहीं छोड़ी । उस समय भी नेफियो रियो ने अपना रवैया स्पष्ट नहीं किया । राज्यपाल ने मुइवा को फाइनल डील अटकाने के लिए जिम्मेदार ठहराया । नगालैंड के सत्तारूढ़ गठजोड़ में भाजपा प्रमुख घटक है । उपमुख्यमंत्री भाजपा के हैं ।
एनएससीएन के प्रस्तावित ‘ग्रेटर नगालिम’ में नगालैंड से सट असम, मणिपुर, अरूणाचल प्रदेश ने नगा बहुल इलाके शामिल है । मुइवा अपनी भूमिगत संघीय नगालिम सरकार के स्वयंभू ‘प्रधानमंत्री’ हैं ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन तीनों राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार कह चुके हैं कि फाइनल डील में किसी राज्य की जमीन से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी । असम, मणिपुर की भाजपा सरकारें और अरूणाचल की भाजपा गठजोड़ सरकार भी केंद्र सरकार को बार-बार चेता चुकी हैं कि वे अपनी एक इंच जमीन नहीं छोड़ेंगे ।
निर्णायक दौर की वार्ता के क्रम में अरूणाचल प्रदेश में कुछ ऐसी हिंसा की वारदातें हुई, जो माहौल बिगाड़ने वाली साबित हुई । जुलाई में जब आर. एन. रवि ने नेफियू रियो का पत्र लिखा, उसी दौरान अरूणाचल प्रदेश में एनएससीएन के छह उग्रवादी असम राइफल्स के साथ मुठभेड़ में मारे गए । अरूणाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक आर. पी. उपाध्याय ने कहा कि ये उग्रवादी लोंगडिंग, चाग्लांग और तिराप जिलों में सक्रिय हैं, जहां संघर्षविराम लागू नहीं होता । मुइवा के गृह राज्य मणिपुर में भी पुलिस ने हथियारों का जखीरा बरामद किया, जो एनएससीएन(आईएम) के पाए गए ।
12 अगस्त को दिल्ली में खुफिया अधिकारी मुइवा को मनाने में जुटे थे और अरूणाचल प्रदेश छात्र संघ ने केंद्र को चेताया कि नगा शांति वार्ता से अरूणाचल को बाहर रखा जाए, क्योंकि यहां कोई जनजाति नगा नहीं है, सब अरूणाचली और भारतीय हैं । छात्र संघ ने याद दिलाया कि 2015 में ‘फ्रेमवर्क डील’ के बाद आर. एन. रवि ने अरूणाचल आकर वायदा किया था कि फाइनल डील में अरूणाचल प्रदेश के हितां के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा ।
( नगा झंझट पर लेखक की किताब छप रही है ।)