नगा डील पर रहस्यमय चुप्पी नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि ने तोड़ी और ‘फाइनल डील’ का डेडलाइन द दिया । उसके साथ ही परस्पर विरोधी विसंगतियां खुलकर सामने आ गयीं, जिन पर सस्पेंस बना हुआ था । ज्यादातर बातें उसी अलगाववादी हिंसा वाले मुद्दे को जिन्दा रखनेवाली हैं, जो शांति मार्ग का ‘डेड एंड’ है ।

नरेंद्र मोदी ने मई, 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल की शुरूआत के कुछ ही दिनों बाद नगा शांति वार्ता के लिए पूर्व खुफिया प्रमुख आर. एन. रवि को केंद्र का वार्ताकार नियुक्त किया । उसके बाद तीन अगस्त, 2015 को प्रधानमंत्री के आवास पर एक ‘डील’ हुआ । उस पर नगा विद्रोहियों की ओर से एनएससीएन(नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम - आईएम) नेता टी. मुइवा और भारत सरकार की ओर से वार्ताकार आर. एन. रवि ने दस्तखत किए । उस अवसर पर तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल भी मौजूद थे । भारत की आजादी के समय से चले आ रहे सबसे जटिल और पेचीदे नगा संकट के समाधान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरी दिलचस्पी दिखायी, इसका पूरे देश में स्वागत हुआ । लेकिन नगालैंड समेत पूर्वोत्तर में इसके विषय में तरह-तरह की आशंकाएं व्यक्त की गयीं । भारत सरकार इस समझौते को ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ बताती है और पूर्वोत्तर के लोग इसे ‘नगा डील’ कहते हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन अगस्त, 2015 को इस डील को ऐतिहासिक कहा और दावा कि 18 वर्षों से बेनतीजा शांति वार्ता को विराम देकर नगा संकट का अंतिम हल निकाल लिया गया । 1997 में एनएससीएन(आईएम) से भारत सरकार का संघर्षविराम हुआ था और समस्या के स्थायी हल के लिए शांतिपूर्ण वार्ता चलती रही ।

अभी 18 वर्षों में चार और जोड़कर आगे की चर्चा करनी पड़ेगी । क्योंकि नरेंद्र मोदी के दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नगा डील पर सस्पेंस बढ़ानेवाले कई डेवलपेंट सामने आ गए । उसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, जम्मू व कश्मीर को विशिष्ट दर्जा देनेवाला अनुच्छेद 370 5 अगस्त को हटाया जाना । जुलाई में जब इसकी तैयारी पूरी हो चुकी थी, उसी समय आर. एन. रवि को नगालैंड का राज्यपाल बनाया गया । जुलाई से अक्टूबर तक वार्ताकार बने रहते हुए राज्यपाल आर. एन. रवि ने सभी नगा पक्षों को एक मंच पर लाकर ‘फाइनल डील’ तक पहुंचने में कितनी सफलता मिली, उसका खुलासा उन्होंने गत हफ्ते अचानक एक धमाके के साथ किया । राज्यपाल आर. एन. रवि के कार्यालय से 18, अक्टूबर को एक वक्तव्य जारी हुआ - ‘सभी मुद्दों पर आपसी सहमति के बाद समझौते का मसौदा फाइनल डील के लिए तैयार है ।’ वक्तव्य के अनुसार जिन नगा गुटों से बातचीत के बाद राज्यपाल नतीजे पर पहुंचे, उसमें सबसे प्रभावशाली और प्रबल दावेदार एनएससीएन(मुइवा) शामिल नहीं है, जिसने 3 अगस्त, 2015 डील पर हस्ताक्षर किए । नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने राज्यपाल के वक्तव्य से असहमति जतायी और अलग ‘नगा राष्ट्रीय झंडा’ तथा अलग ‘नगा संविधान’(येझाबो) के प्रति झुकाव दिखाया । इसी विंदु पर फाइनल डील और समाधान का पेंडुलम डोल रहा है । राज्यपाल आर. एन. रवि ने अपने वक्तव्य में एनएससीएन (मुइवा) का यह दावा खारिज कर दिया कि ‘अलग नगा राष्ट्रध्वज’ और ‘अलग नगा संविधान’ के बिना कोई समझौता नहीं हो सकता । राज्यपाल ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अलग ‘नगा राष्ट्रध्वज’ और नगा येझाबो (संविधान) के मामले में भारत सरकार की स्थिति से नगा नेता भलीभांति परिचित हैं, क्योंकि भारत के संघीय संविधान में ऐसा प्रावधान नहीं है ।

इस पर सबसे पहले तो मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने ही यह टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया कि राज्यपाल क वक्तव्य से सरकार को सहमति है । राज्यपाल आर. एन. रवि ने एनएससीएन(मुइवा) पर अड़ंगे का आरोप लगाते हुए कहा कि 22 वर्षों से हिंसा की आड़ में चल रही अंतहीन वार्ताओं का सिलसिला स्वीकार्य नहीं है ।

उसके जवाब में एनएससीएन(मुइवा गुट) के चेयरमैन खीहेज टुक्कू ने 20 अक्टूबर को इंफाल से अपना बयान जारी करके जवाबी आरोप लगाया कि सरकार भय और आशंका का माहौल बनाकर ‘नगालिम’ में अपना डिक्टैट जबरन थोपना चाहती है । एनएससीएन नेता ने एक प्रकार से चेतावनी के लहजे में कहा कि मौजूदा सरकार क पूर्व सरकारों की तरह सैनिक कार्रवाई के विकल्प का वातावरण पैदा करके वार्ताकारों पर अपनी शर्तें थोपने से समस्या का हल नहीं निकलगा । खीहोज टुक्कू ने कहा कि हजारों की संख्या में सशस्त्र बल तैनात करके सरकार डर जैसी मानसिकता पैदा कर रही है ।

वार्ताकार के रूप में आर. एन. रवि चार साल में कहां तक पहुंचे और तीन अगस्त, 2015 के ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ में किन झंझटिया मुद्दों पर सहमति के बाद हस्ताक्षर हुए, उसका खुलासा अभी हुआ है । एनएससीएन चेयरमैन ने कहा कि वह तो सिर्फ वार्ता के लिए मुलाकातों का एक मंच था । अलग नगा राष्ट्रध्वज और अलग नगा संविधान के बिना तो ‘अंतिम समझौता’ वार्ता हो ही नहीं सकती ।

अगस्त, 2019 में राज्यपाल आर. एन. रवि ने अचानक यह राज खोला कि प्रधानमंत्री ने तीन महीने में इस संकट का अंतिम हल निकालने कहा है । उसी समय नगा संगठनों की आशंका उपजी कि जम्मू व कश्मीर को विशिष्ट दर्जा देनेवाला अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद अब अगला नंबर उनका आ सकता है । नगालैंड को अनुच्छेद 371ए के अंतर्गत ‘विशिष्ट दर्जा’ प्राप्त है, लेकिन उसका ताल्लुकात सिर्फ स्थानीय स्तर पर उनके सामाजिक रीति-रिवाजों से जुड़े कानून से है । उसमें जम्मू व कश्मीर की तरह अलग झंडा और अलग संविधान का कोई जिक्र नहीं है । केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और नगालैंड के राज्यपाल ने गुवाहाटी जाकर स्पष्टीकरण दिया कि नगालैंड समेत पूर्वोत्तर को विशिष्ट दर्जा देनेवाली धारा 371 ए से एफ के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी । गृह मंत्री ने चेता भी दिया कि ‘एक देश, एक संविधान, एक ध्वज’ के साथ कोई समझौता नहीं ।

राज्यपाल ने प्रधानमंत्री के निर्देश के अनुपालन की डेडलाइन 31 अक्टूबर तय की है । उसके पहले 27-29 अक्टूबर को ‘फोरम फॉर नगा रिकन्सिलिएशन’(एफएनआर) की अध्यक्षता में दोनों पक्षों की दीमापुर में बैठक होगी । आर. एन. रवि ने जिस पक्ष एनएनपीजी(नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप) से 18 अक्टूबर को बात करके वक्तव्य दिया, वो ‘अलग झंडा, अलग संविधान’ मुद्दा फिलहाल टालने को तैयार है । आर. एन. रवि ने वैसे नगा गुटों से नवंबर, 2017 में समझौता किया । मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने दोनों पक्षों से बातचीत की है । लेकिन लगता है राज्यपाल का एनएससीएन(मुइवा), एनएफआर समेत मुख्यमंत्री के साथ भी कोई संवाद नहीं चल रहा है । गत वर्ष जुलाई(2018) में मणिपुर के भाजपा मुख्यमंत्री एन. वीरेन सिंह ने अपने सभी 60 विधायकों के साथ दिल्ली में डेरा डाल दिया और केंद्र से कहा कि कोई भी नगा डील उनसे बात किए बगैर न किया जाए । नगालैंड की सत्तारूढ़ नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेस पार्टी भी भाजपा नीत राष्ट्रीय गठजोड़ का हिस्सा है । एनएससीएन के प्रस्तावित ग्रेटर नगालिम में नगालैंड से ज्यादा मणिपुर के नगा बहुल इलाके शामिल है, जो मुइवा का गृह राज्य है ।

सितंबर, 2019 में एनएससीएन नेता टुक्कू और मुइवा ने प्रधानमंत्री को फाइनल डील के लिए पत्र लिखा । उसके बाद दिल्ली में नगा छात्रों ने विभिन्न गुटों के साथ प्रदर्शन किया। हर साल की तरह 14 अगस्त को नगा ध्वज के साथ ‘नगा स्वतंत्रता दिवस’ मनाया जा चुका था ।

महात्मा गांधी की 150वीं जयंती वर्ष में नगालैंड में शांति का माहौल बिगड़ने के लक्षण हैं । एनएससीएन का दावा है कि महात्मा गांधी ‘नगाओं की आजादी’ के समर्थक थे, इसलिए 14 अगस्त, 1947 को ही ‘स्वतंत्र नगालिम’ का ऐलान करके भारत सरकार से आजादी की जंग छेड़ दी। दोनों पक्षों ने हिंसा स थकने के बाद 1997 में शांति वार्ता के लिए संघर्ष विराम किया । अब शांति वार्ता भी थक चुकी है ।