नगालैंड के विधायकों ने विद्रोही नगा गुट नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम(आईएम.आइसाक मुइवा) को आमंत्रित कर विवादास्पद ‘अलग झंडा और संविधान’ जैसे मुद्दे पर बातचीत करने का केंद्र सरकार से आग्रह किया है । नगा राजनीतिक मसले का सर्वसम्मत अंतिम समाधान निकालने के लिए बनी संसदीय समिति ने केंद्र से गुहार लगायी है कि एनएससीएन(आईएम) नगा नेताओं को बुलाकर इनकी अलग झंडा और अलग संविधान जैसी विवादित मांग पर जल्द.से.जल्द वार्ता की जाए, जो हल के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है । नगालैंड के सभी 60 विधायक और दो संसद सदस्य इस संसदीय समिति के सदस्य हैं, जिसकी हालिया बैठक में केंद्र से की गयी इस अपील का प्रस्ताव पारित किया गया ।
विदित हो कि नगालैंड के सभी 60 सदस्य एक ही गठजोड़ के बैनर तले खड़े हैं और यह एकजुटता सिर्फ नगा झमेले का अंतिम हल निकालने के लिए आपस में कायम की गयी है । नगालैंड विधान सभा में विपक्ष है ही नहीं । भाजपा समेत सारे क्षेत्रीय व राष्ट्रीय दलों के विधायकों ने एक ही मंच पर आकर गठजोड़ कायम किया हुआ है, इस एकीकृत सरकार का एकमात्र मकसद आपसी राजनीतिक मतभेद भुलाकर नगा उग्रवादियों और केंद्र के बीच चल रही शांति वार्ता को ठोस नतीजे पर पहुंचाने का प्रयास किया जाए । इसके लिए बनी संसदीय समिति की इसी हफ्ते हुई बैठक इस मायने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि भारत नगा वार्ता सिर्फ ‘अलग झंडा और संविधान’ के अड़ियल रवैये के कारण बेनतीजा चल रही है । इस सिलसिले में अगस्त, 2015 में केंद्र और एनएससीएन(आईएम) नेताओं से दिल्ली में हुई ‘फ्रेमवर्क डील’ का भी जिक्र किया, जिससे दोनों पक्षों के बीच इस समस्या में ‘फाइनल डील’ का रास्ता खुला ।
नगालैंड विधान सभा से नगा संकट का समाधान निकालने के लिए प्रस्ताव तो केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने से पहले और उसके बाद कई बार पारित किया जा चुका है । लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है, जब नगालैंड के ‘लामेकरष्ठ(विधायकए सांसद) ने एक साथ केंद्र सरकार से खास तौर पर उसी मोड़ पर एनएससीएन(आईएम) नेताओं को बातचीत के लिए बुलाने कहा है, जहां समझौता वार्ता की गाड़ी बार.बार जाम में फंस जाती है । यह मोड़धविंदु है, नगा नेताओं की ‘आजाद संप्रभु ग्रेटर नगालिम’ की मांगए जिसके लिए उन्हें अपने काल्पनिक देश का ‘अलग झंडा और संविधान’ चाहिए । केंद्र सरकार के प्रतिनिधि ने विभिन्न नगा गुटों से अलग.अलग और साथ.साथ हालिया वार्ता गत अप्रील में नगालैंड में की है । अन्य गुट भारत की आजादी के समय से चली आ रही इस हिंसा में सनी पेचीदा समस्या का शांतिपूर्ण समाधान निकालने के लिए रूकावट डालने वाले मुद्दे पर लचीला रूख अपनाने के पक्ष में है । अगर सबसे मजबूत और संगठित एनएससीएन(आइसाक.मुइवा) ‘अलग झंडा और संविधान’ की मांग पर अड़ा है ।
आधिकारिक स्तर की वार्ता 31/10/2019 के बाद से पटरी से उतरी हुई है, जो डेडलाइन तारीख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतिम हल के लिए तय किया था ।
नगालैंड विधायकोंसांसदों की संसदीय समिति अब तक के प्रयासों की समीक्षा के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि अगस्त, 2015 की फ्रेमवर्क डील’ के आलोक में एनएससीएन(आईएम) से अंतिम समाधान की वार्ता जल्द की जाए ।
संसदीय समिति की कोहिमा में आयोजित बैठक में नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो मौजूद थे । बैठक के बाद नगालैंड सरकार के प्रवक्ता कैबिनेट मंत्री नीबा क्रोनू ने संवाददाताओं को बताया कि एनएससीएन(आईएम) के ‘अलग झंडा और संविधान’ की शर्त पर अड़े रहने के कारण नगा समस्या का अंतिम हल नहीं निकल पा रहा है। इस संबंध में 03/08/2015 को दिल्ली में एनएससीएन(आईएम) के साथ प्रधानमंत्री की मौजूदगी में हुई फ्रेमवर्क डील’ का भी नगालैंड सरकार के प्रवक्ता ने जिक्र किया । हालिया बैठक में पारित प्रस्ताव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से आग्रह किया गया है कि एनएससीएन(आईएम) को बुलाकर इसी विंदु पर बातचीत की जाए ।
1947 से चली आ रही भारत ही नहीं, दुनिया की सबसे पुरानी और जटिल नगा समस्या का हल निकालने के लिए 80 से ज्यादा दौर की वार्ता के बाद 1997 में संघर्षविराम पर सहमति बनी । उससे सिर्फ इतना हुआ कि हिंसा का दौर रुका और दोनों पक्ष एक.दूसरे पर हमला न करने को राजी हुए । उसे नगा नेताओं ने यह कहकर प्रचार किया कि यह दो देशों. भारत और नगालिम सरकारों की ‘सेना’ के बीच ‘युद्ध’ रोकने के लिए ‘सीजफायर’ है । उसके बाद दूसरा महत्वपूर्ण मोड़ है, अगस्त, 2015 की फ्रेमवर्क डील । इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह दोनों ने ‘ऐतिहासिक’ बताया ।
नरेंद्र मोदी ने 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनते ही नगा संकट के हल को प्राथमिकता के आधार पर लिया और ठोस नतीजे पर लाने के लिए पूर्व खुफिया अधिकारी आर. एन. रवि को वार्ताकार नियुक्त किया । अगस्त, 2015 डील के लिए दिल्ली लाए गए एनएससीएन(आईएम) सुप्रीमो टी. मुइवा ने उस समय भी ‘अलग झंडा और संविधान’ की शर्त छोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया । दूसरी बार सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी ने 31/10/2019 तक हर हाल में ठोस नतीजा का डेडलाइन तय करके आर. एन. रवि को नगालैंड का राज्यपाल बना दिया । लेकिन वार्ता प्रक्रिया में नए गतिरोध आ गए । आर. एन. रवि ने यह बात कह दी कि नगा उग्रवादी सरकार की तरह समानान्तर टैक्स वसूलते हैं और सरकारी अधिकारीधउनके रिश्तेदार की नगा उग्रवादियों से मिलीभगत है ।
उसके बाद आर. एन. रवि को नगालैंड से हटाया गया और दूसरे पूर्व खुफिया अधिकारी अक्षय मिश्र ने वार्ता का मोर्चा संभाला । सितंबर, 2021 में यह दायित्व संभालने के बाद नगा नेताओं के साथ पहली बैठक में ही अक्षय मिश्र का ‘अलग झंडा और संविधान’ रोड़ा से सामना पड़ा । फिर उसके बाद दिसंबर, 2021 में नगालैंड के मोन जिले में विशेष सैनिक दस्ते की 21वीं बटालियन की ओर नगा उग्रवादी होने के संदेह में की गयी फायरिंग में 6 खान मजदूरों की मौत से माहौल तनावपूर्ण हो गया । 04/12/2021 को हुई इस वारदात से खटास आ गयी । संसद में जोरदार हंगामा हुआ । नगालैंड सरकार ने मंत्रिमंडल की बैठक में प्रस्ताव पास करके केंद्र से आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट, 1959 (आफ्प्सा) हटाने की मांग की । संसद में भी दलीय भावना से ऊपर उठकर कई सदस्यों ने आफ्प्सा हटाने और दोषी सैनिकों पर कार्रवाई की मांग उठायी ।
संयोग से अभी ऐसे समय में नगालैंड सरकार ने अपने विधायकोंधसांसदों की राय से केंद्र सरकार को अवगत कराया है, जब मोन जिला फायरिंग के सिलसिले में गत जून में एक मेजर समेत 30 सैनिकों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया है । इन सैनिकों के खिलाफ धारा.302(हत्या)ए 120 बी(आपराधिक साजिश) और धारा 201(सबूत छिपाने) समेत कई धाराओं में मुकदमा किया गया है । इससे नगा नेताओं के जख्मों पर मलहम लग सकता है और माहौल अनुकूल होने की संभावना है ।
अप्रैल, 2022 में वार्ताकार अक्षय मिश्र एक.डेढ़ महीने तक नगालैंड में रहकर नगा नेताओं के अड्डे पर जाकर वार्ता कर खाली हाथ लौटे हैं । ताजा पहल का राजनीतिक पहलू भी है । क्योंकि 2023 के शुरू में ही नगालैंड विधान सभा का चुनाव है ।
नगा नेताओं को भी वो बात नहीं भूलनी चाहिए जो प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने विद्रोह की नींव रखनेवाले फिजो को 1952 में कहा था. ‘आजाद नगालिम मैं तो क्या भारत का कोई प्रधानमंत्री नहीं दे सकता।