असम के चाय बागानों में काम करनेवाले आदिवासी वोटों को लेकर इंडिया गठजोड़ के दो घटकों - कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा(झामुओ) आमने-सामने हैं । झारखंड में झामुमो के नेतृत्ववाली सरकार में कांग्रेस दूसरा बड़ा घटक है और मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन खुद को असम में आदिवासियों का कांग्रेस से बड़ा हितैषी साबित करना चाहते हैं ।
‘टी ट्राइव्स’(Tea Tribes) के नाम से बोलचाल में परिभाषित असम के चाय बागान मजदूर समेत आदिवासियों की कुल आबादी लगभग 70 लाख है और उनमें ज्यादातर झारखंड मूल के हैं । आदिवासी राज्य झारखंड के मुख्यमंत्री होने के नाते हेमंत सोरेन उत्तर पूर्वी भारत में आदिवासी समुदायों के राष्ट्रीय नेता बनने की कोशिश में जुटे हैं ।
हेमंत सोरेन ने असम चुनाव में पहली बार अपनी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा को मैदान में उतारा है । दूसरी ओर कांग्रेस असम में मुख्य विपक्षी पार्टी है और प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर के कांग्रेसी नेता इस बार सत्ता में वापसी का दावा कर रहे हैं ।
हेमंत सोरेन अपनी पत्नी विधायक कल्पना सोरेन समेत पार्टी के स्टार प्रचारकों के साथ असम में कैंप कर रहे हैं । इन नेताओं का उन 35-40 विधान सभा सीटों पर धुआंधार प्रचार अभियान जारी है, जहां आदिवासी और चाय बागान मजदूरों का वोट निर्णायक होता है ।
कांग्रेस को अब भाजपा के साथ-साथ अपने सहयोगी झामुमो से भी सीधा मुकाबला के चलते वोट बंटने से संभावित नुकसान की चिंता है ।
झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस नेताओं की रांची से दिल्ली तक किसी भी बातचीत में सीटों के बंटवारे पर सहमति नहीं बन सकी । झारखंड असम के कांग्रेस नेता झामुमो को 5-7 से ज्यादा सीटें देने को राजी नहीं हुए और झामुमो 21 से कम सीटों पर समझौता करने को तैयार नहीं थी ।
पर्चे दायर करने और वापस लेने की अंतिम तारीख तक झामुमो 21 सीटों पर अड़ी रही । नामांकन पत्रों की जांच के बाद झामुमो के 18 उम्मीदवार मैदान में रह गए । झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम की 14 उन्हीं सीटों को निशाना बनाया है, जो 2021 विधान सभा चुनाव में भाजपा ने जीती थी । झामुमो ने अपने प्रत्याशी भी पहले उन्हीं सीटों के लिए घोषित किए ।
असम में पहली बार किस्मत आजमाने का झामुमो का कारण कांग्रेस से अलग है । 2024 झारखंड विधान सभा चुनाव में भाजपा के स्टार प्रचारक के रूप में पहुंचे असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने झारखंड की सभी 81 सीटों पर जोर-आजमाइश की थी । इसलिए झामुमो ने असम के आदिवासी आबादी वाले इलाके के उन 14 विधान सभा क्षेत्रों पर पूरी ताकत झोंकी है, जो 2021 में भाजपा से जीती और कांग्रेस की परवाह नहीं की ।
हिमंता बिस्वा सरमा दूसरी बार असम के मुख्यमंत्री बनने की तैयारी में जुटे हैं । 2016 में भाजपा को पहली बार कांग्रेस को सत्ता से हटाने में कामयाबी मिली । कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरूण गोगोई का लगातार तीन बार का कार्यकाल समाप्त हुआ और सर्वानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने । 2021 में भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने सोनोवाल को केंद्र में ले लिया और हिमंता बिस्वा सरमा को असम की कमान सौंपी गयी ।
तरूण गोगोई के पुत्र और असम कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई 2014 से लोक सभा सदस्य हैं । असम में सत्ता परिवर्तन की उम्मीद में पहली बार विधान सभा चुनाव लड़ रहे हैं ।
झामुमो ने तरूण गोगोई की पारंपरिक सीट तिताबार से भी अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं, जहां से कांग्रेस के भास्कर ज्योति बरूआ अभी विधायक हैं । इस बार कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया है ।
कांग्रेस को असम की कुल 126 विधान सभा सीटों पर भाजपा को पछाड़ना है, जिनमें से 19 सीटें एसटी(ज. अनुसूचित जनजाति) के लिए रिजर्व है । चुनाव तारीखों के ऐलान के पहले से झामुमो की उस पर नजर है । हेमंत सोरेन ने जनवरी-फरवरी 2026 से ही झारखंड मूल के आदिवासी समाज से मिलना-जुलना शुरू कर दिया था । टी ट्राइव्स क्षेत्रों में एक ही सीट रिजर्व है, इसलिए झामुमो ने बाकी उम्मीदवार सामान्य सीटों पर खड़े किए हैं । सोरेन टी ट्राइव्स को एसटी दर्जा दिलाने का वायदा कर रहे हैं । असम में एक ही चरण में 09 अप्रील को वोट पड़ेंगे, प्रचार का समय कम है । मुकाबले के तीनों दलों ने एड़ी-चोटी लगा रखी है । झामुमो प्रमुख हेमंत सोरेन ने चुनाव में उतरने का लक्ष्य करके अपना असम दौरा 01 फरवरी से शुरू किया । हिमंता बिस्वा सरमा पहले चेते । हेमंत सोरेन के रांची लौटने के एक हफ्ते बाद हिमंता बिस्वा सरमा डिब्रूगढ़ पहुंचे और चाय बागान मजदूरों को भूमि अधिकार देने के लिए आवेदन पत्रों के वितरण की शुरूआत की । मुख्यमंत्री ने कहा कि इस कदम से जनजाति समुदायों(जनगोष्ठी) की सामाजिक स्थिति बदलाव आएगा । झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 01 फरवरी को तिनसुकिया जिले में ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम द्वारा आयोजित जनसभा में कहा कि असम का चाय बागान उद्योग झारखंड के आदिवासी की बदौलत चलता है, लेकिन इनके पास रहने को अपनी जमीन नहीं है । इनके लिए कोई कल्याणकारी योजना नहीं है, न वित्तीय सहायता मिलती, न सामाजिक सुरक्षा है । हेमंत सोरेन ने बड़ी संख्या में जुटे लोगों से कहा कि सभी आदिवासी एकजुट होकर झामुमो के पक्ष में वोट डालें तो असम में राजनीतिक और सामाजिक बदलाव संभव है । उन्होंने झारखंड की तरह असम में भी कल्याणकारी योजनाएं चलाने और जमीन का अधिकार देने का वायदा किया । उसके पहले जनवरी में झारखंड के जनजातीय कल्याण मंत्री चमरा लिंडा के नेतृत्व में झामुमो का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने असम जाकर आदिवासियों की स्थिति का अध्ययन किया था । उनके साथ झारखंड के सांसद विजय हांसदा, विधायक एम टी राजा और भूषण तिर्की ने विभिन्न दलों के आदिवासी नेताओं से विमर्श किया । कांग्रेस देर से चेती, जब मार्च के पहले सप्ताह में हेमंत सोरेन ने असम जाकर प्रत्याशियों का चयन कर लिया । असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई अपने दो पार्टी नेताओं - कांग्रेस राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य जितेन्द्र सिंह और झारखंड प्रभारी के. राजू के साथ 12 मार्च को रांची पहुंचे । मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर बंद कमरे में बातचीत हुई, मगर बात बनी नहीं । दो दिन पहले हेमंत सोरेन असम के बिस्वनाथ जिले में जनसभा को संबोधित करके और रोजा इफ्तार समारोह में शामिल होके लौटे थे । एक और नया दल जय भारत पार्टी से भी झामुमो ने चुनाव गठजोड़ किया है । झामुमो नेता सुप्रियो भट्टाचार्य और विनोद पांडेय ने झारखंड कांग्रेस नेता बंधु तिर्की, केशव महतो द्वारा झामुमो पर गठजोड़ धर्म नहीं निभाने के आरोप के जवाब में कहा कि कांग्रेस के साथ घटक दल समझौता/तालमेल करते हैं, कांग्रेस नहीं करती । झामुमो नेताओं ने कहा कि कांग्रेस के इसी रवैए के कारण इंडिया गठजोड़ में दरार पड़ी है । गत वर्ष बिहार चुनाव में कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल आदिवासी इलाकों में झामुमो को सीटें देने को तैयार नहीं हुए, तो हमने हाथ पीछे कर लिए । तब भी झारखंड में गठजोड़ बरकरार है । अभी असम के साथ ही हो रहे बंगाल चुनाव में भी पूर्वी बंगाल के आदिवासी हलकान में झामुमो भाजपा के खिलाफ वोट बंटने की संभावना का ख्याल करके मैदान में नहीं है । लेकिन कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के वजूद का ख्याल नहीं रखती । ये बयान है झामुमो नेताओं का । झारखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बंधु तिर्की ने चुनाव प्रचार की शुरुआत 27 मार्च को असम के अमचोंग चाय बागान से किया और बागान मजदूरों से हिमांता बिस्वा सरमा तथा हेमंत सोरेन का वायदा दुहराया । झारखंड से गए विधान सभा में विपक्षी नेता(भाजपा) बाबूलाल मरांडी और पूर्व भाजपा मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का भी स्टार प्रचार का फोकस आदिवासी इलाके पर है । भाजपा नेताओं को झामुमो-कांग्रेस गठजोड़ के खिलाफ एक और बड़ा मुद्दा मिल गया है और वो है एस सी उप दी(असामाजिक जाति जनगणना) के धर्म, जनजाति की स्थिति में उप-धर्म के रूप मेंझिमेवाले अभ्यास के लाभ से वंचित होने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश । 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एस सी एस टी समुदाय का यह दर्जा धर्मान्तरण के बाद स्वतः समाप्त हो जाएगा । झारखंड में भाजपा नेता काफी समय से सरना कोड (आदिवासियों का मूल धर्म) की दुहाई दे रहे हैं और झामुमो-कांग्रेस पर धर्मान्तरण का आरोप लगा रहे हैं ।
पश्चिम बंगाल की तरह झारखंड सरकार पर भी भाजपा नेता बांग्लादेशी घुसपैठियों का झारखंड के आदिवासियों से शादी करवाकर उन्हें वोटर बनाने और धर्म बदलने के बावजूद एस टी आरक्षण से लाभान्वित कराने का आरोप लगाते हैं । भाजपा एस टी मोर्चा के कार्यकारी सदस्य रमेश हांसदा ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दावा किया है कि झारखंड में 100 महिला मुखिया हैं, जिन्होंने मुसलमान और ईसाई से शादी की हुई हैं । आदिवासियों से जुड़ा एक और मामला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के 07 मार्च के पश्चिम बंगाल दौरे के क्रम में उठा विवाद है । यह बंगाल के साथ-साथ असम चुनाव में भी आदिवासी वोटों को प्रभावित कर सकता है । राष्ट्रपति अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन का उद्घाटन करने सिलीगुड़ी पहुंची थी । राष्ट्रपति ने संबोधन भाषण में आयोजन स्थल उनके आने से पहले बदले जाने और प्रोटोकॉल के अनुसार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) के उनकी अगवानी नहीं किए जाने पर नाराजगी जतायी । दार्जीलिंग और उसके आसपास डुआर्स, न्यू जलपाईगुड़ी के मैदानी इलाकों में संथाल आदिवासियों की बड़ी आबादी है, जिनका फैलाव झारखंड से असम तक है ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत भाजपा के वरिष्ठ नेता दीदी पर राष्ट्रपति का और आदिवासियों का अपमान करने का आरोप लगाकर इसे चुनावी मुद्दा बना चुके हैं ।
ममता बनर्जी ने 25 मार्च को जलपाईगुड़ी में चुनावी जनसभा की । पूर्वी बंगाल की इन आदिवासी, गोरखा आबादी के बीच 2019 से भाजपा ने अपना मजबूत आधार बनाया है ।
ममता बनर्जी असम के भी आदिवासी समेत बंगला भाषियों का नेता खुद को मानती हैं । असम के आदिवासी और चायबागान श्रमिक असमिया से ज्यादा बंगला बोलते हैं । दीदी वहां चुनावी जोर-आजमाइश कर चुकी हैं ।