केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नए वर्ष की शुरूआत पूर्वोत्तर राजनीतिक दौरे से की । उनके जनवरी से आरम्भ कार्यक्रमों का फोकस 9 राज्यों में होनेवाले विधान सभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव पर है । 16.17 जनवरी को हुई भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अन्य राज्यों के अलावे 3 पूर्वोत्तर राज्यों. त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड पर विशेष चर्चा हुई । भाजपा की नजर अभी इन्हीं तीनों राज्यों पर है, जहां विधान सभा चुनाव फरवरी.मार्च, 2023 में होने हैं । इन तीनों उत्तर पूर्वी राज्यों का राजनीतिक समीकरण और चुनावी मुद्दे अन्य राज्यों से भिन्न हैं । नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भाजपा का पूर्वोत्तर में सत्ता फैलाव और दबाब बढ़ा है ।

2021 में असम में भाजपा दूसरी बार सत्ता में आ चुकी है । मणिपुर में भी भाजपा 2022 में लगातार दूसरीबार सत्ता में आयी । इन दोनों राज्यों में 15 साल से चली रही कांग्रेस सरकार को भाजपा ने अपदस्थ किया ।

भाजपा के लिए असली चुनौती अभी त्रिपुरा है, जहां 20 वर्षों से कायम सीपीएम(मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी) सरकार को हटाने में भाजपा को कामयाबी मिली । अमित शाह 2023 के शुरू में ही 5 जनवरी को सबसे पहले त्रिपुरा गए और राज्यव्यापी चुनावी यात्रा को झंडी दिखाकर रवाना किया । उसके बाद मणिपुर और फिर नगालैंड पहुंचे । त्रिपुरा में भाजपा ने 2018 में कुछ छोटे दलों को मिलाकर सीपीएम और कांग्रेस को पटखनी जरूर दी, मगर भाजपा की सरकार के अंदर उठापटक का सिलसिला पूरे पांच साल तक चलता रहा । त्रिपुरा में सीपीएम नीत वाम गठजोड़ की सरकार चल रही थी और कांग्रेस विपक्ष में होती थी । लेकिन इस चुनाव के करीब आते.आते भाजपा के अंदरूनी मतभेद ने वाम दलों और कांग्रेस को एक मंच पर लाकर मजबूत बना दिया है ।

मणिपुर की तरह त्रिपुरा में भी भाजपा को अपने ‘आया राम गया राम’ एजेंडे से ही सरकार बनाने का अवसर मिला । त्रिपुरा में अबकी भाजपा का साथ ‘राम’ छोड़ रहे हैं । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अगरतला जाने से हफ्ताभर पहले वरिष्ठ भाजपा गठजोड़ विधायक दिबा चन्द्र ह्रांखाल वापस कांग्रेस में जा चुके थे । 2 वर्षों में त्रिपुरा की भाजपा गठजोड़ का साथ छोड़नेवाले वे आठवें विधायक थे । उनमें पांच भाजपा के थे । दिबा चन्द्र ह्रांखाल और पूर्व मंत्री सुदीप रॉय बर्मन 2018 विधान सभा चुनाव के समय कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे, जो दोनों वापस कांग्रेस में चले गए ।

भाजपा ने 36 सीटें जीतकर त्रिपुरा में 2018 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी थी । उस वक्त सत्तारूढ़ सीपीएम को मात्र 16 सीटों पर जीत हासिल हुई थी । कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पायी । सरकार बनाने के कुछ महीने बाद भाजपा को राज्य में नेतृत्व बदलना पड़ा । विप्लव देव को हटाकर मानिक साहा को मुख्यमंत्री बनाया गया । त्रिपुरा में चल रहे चुनावी रथयात्र के समापन के दिन 12 जनवरी को शामिल हुए भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा समझ रहे हैं कि त्रिपुरा में कांग्रेस वाम गठजोड़ पश्चिम बंगाल की तरह निष्प्रभावी नहीं होगा । 2021 में भाजपा को कांग्रेस.वाम के अंदरूनी गठजोड़ मतभेद के कारण 75 सीटें जीतकर बंगाल विधान सभा में पहली बार मजबूत विपक्षी पार्टी बनने का मौका मिला । मेघालय में भाजपा के लिए सत्तारूढ़ नेशनल पीपुल्स पार्टी(एनपीपी) और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) की पार्टी तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) कठिन चुनौती है ।

पूर्वोत्तर समेत जिन नौ राज्यों में 2023 में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं, उनमें सबसे ज्यादा अहम भाजपा के लिए त्रिपुरा है । इस राज्य में एक और कठिन चुनौती भाजपा के लिए अलग तिपरालैंड राज्य की मांग ने खड़ी की हुई है ।

त्रिपुरा के पुराने राजघराने से आनेवाले विक्रम मानिक्य देबबर्मा ऐसी किसी भी पार्टी से चुनाव गठजोड़ करने को तैयार हैं, जो ‘ग्रेटर तिपरालैंड’ राज्य की मांग को समर्थन दे । उनकी पार्टी मतदाताओं के बीच ‘मोठा’ तिपरा(तिपराहा इंडिजेनस प्रोग्रेसिव रिजनल एलायंस) के नाम से जानी जाती है । पिछले चुनाव के समय विक्रम देबबर्मा ने भाजपा का समर्थन किया था । उसके बाद से वे लगातार ‘ग्रेटर तिपरालैंड’ की मांग को लेकर आंदोलन चलाते रहे । ज्ब्न(तिपरा) बड़ा पार्टी प्रमुख विक्रम मानिक्य देबबर्मा ने अपनी मांग पर दबाब बनाने के लिए 7.8 नवंबर, 2022 को दो दिन दिल्ली के जंतर.मंतर पर धरना दिया । केंद्र सरकार ने उन्हें नोटिस नहीं लिया । अभी चुनाव के समय सीपीएम और कांग्रेस दोनों भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए तिपरा मोठा से गठजोड़ करना चाहती है । मगर अलग तिपरालैंड मांग पर गोलमटोल बयान दे रही है । कांग्रेस की त्रिपुरा यूनिट के अध्यक्ष बीराजीत सिन्हा ने स्पष्ट कर दिया कि अलग राज्य के समर्थक नहीं हैं । सीपीएम राज्य सचिव जितोन्द्र चौधुरी ने कहा कि तिपरा बड़ा की मांग संवैधानिक ढांचे के अंदर है । तिपरा बड़ा सुप्रीमो देबबर्मा ने 13 जनवरी को साफ कह दिया कि किसी भी पार्टी से उनके गठजोड़ की पहली शर्त है, तिपरालैंड के समर्थन का लिखित आश्वासन । तिपरा बड़ा प्रस्तावित ग्रेटर तिपरालैंड में त्रिपुरा ट्राइबल एरिया स्वायत्त जिला परिषद के मतदाता शामिल हैं, जिनकी अधिकारों से वंचित विशाल आबादी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती है । सिर्फ त्रिपुरा के लिए दो चरणों में जनविश्वास यात्र रथों से 60 विधान सभा क्षेत्रों की 1000 कि.मी. से ज्यादा की दूरी तय की गयी । भाजपा तिपरा बड़ा वोट को ष्ट’ फैक्टर मान रही है ।

मेघालय में सत्तारूढ़ क्षेत्रीय दल एनपीपी गठजोड़ मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने 2022 के अंत में ही कह दिया कि वे 2023 में विधान सभा चुनाव अकेले लड़ेंगे । उन्होंने कहा कि भाजपा नीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़(एनडीए) को समर्थन जारी रहेगा, मगर विधान सभा चुनाव में भाजपा या किसी अन्य पार्टी से कोई गठजोड़ नहीं होगा । कोनराड संगमा ने 2018 में कुल 60 में से 53 सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ा था । ममता बनर्जी की पार्टी सीपीएम ने मेघालय में अपना पैर फैलाया है । 2021 में कांग्रेस के कुल 17 में से 12 विधायक टीएमसी में शामिल हो गए । तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी(दीदी) मेघालय में एक साथ सत्तारूढ़ एनपीपी, भाजपा और कांग्रेस तीनों को शिकस्त देने की तैयारी में जुटी है । नवंबर, 2022 दलबदल में पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा 12 कांग्रेस विधायकों को लेकर टीएमसी में जाने के बाद से विपक्ष के नेता हैं । 13 जनवरी को दीदी ने मेघालय में कई चुनावी सभाओं को संबोधित किया । दीदी त्रिपुरा में भी अपनी पार्टी का विस्तार चाहती हैं ।

मेघालय में भाजपा को असम.मेघालय सीमा विवाद के नवंबर, 2022 में हिंसक रूप लेने का भी नुकसान उठाना पड़ सकता है । असम की भाजपा सरकार और मेघालय सरकार दोनों ने सीमावर्ती गांव मकरोह में ग्रामीणों के खिलाफ पुलिस फायरिंग का एक.दूसरे पर आरोप लगाया । 6 लोग झड़प में मारे गए । केंद्र सरकार दोनों सरकारों के बीच समझौता नहीं करा पायी । विवाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित है ।

देश भर में चल रहे धर्मान्तरण विवाद के बीच असम में एक नया झमेला उसी समय उभरा, जब मेघालय.असम सीमा पर तनाव चरम पर था । असम में स्पेशल ब्रांच के एसपी ने सभी जिलों के एसपी को 16 दिसंबर को पत्र लिखा, जिसमें एक साल के अंदर स्थापित चर्चों की संख्या और मौजूदा चर्चों के अलावा धर्मान्तरण में शामिल लोगों की जानकारी मांगी गयी थी ।

असम पुलिस का यह पत्र उस समय राजनीतिक रंग ले लिया, जब लीक होने के बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बयान जारी करके उन विवादित पत्र से खुद को अलग कर लिया । रिपोर्ट है कि उस पत्र की प्रति असम के डीजीपी जी. पी. सिंह और गृह विभाग के प्रधान सचिव नीरज वर्मा को भी भेजी गयी थी । इसाई बहुल मतदाता वाले मेघालय में यह विवाद भाजपा के वोट को प्रभावित कर सकता है और नगालैंड में भी ।

चर्च प्रभुत्व वाले नगालैंड का चुनाव मुद्दा मणिपुर और मेघालय से अलग है । नगालैंड में पिछले कई विधान सभा चुनाव एकमात्र नगा झमेले का स्थायी हल एजेंडे को लेकर लड़े गए हैं । इस एक मुद्दे पर नगालैंड के सारे मतदाता और भाजपा समेत सभी पार्टियां एकजुट हैं कि 26 वर्षों से बेनतीजा चल रही ‘भारत.नगा वार्ता’ का निदान निकलना चाहिए । मुख्यमंत्री नेफियू रियो के नेतृत्व में सत्तारूढ़ गठजोड़ है, विपक्ष नहीं है । नगा मतदाता केंद्रीय गृह मंत्री से इस पर ठोस आश्वासन की उम्मीद कर रहे थे । अमित शाह ने मणिपुर की तरह नगालैंड में भी उग्रवाद समाप्त होने और शांतिए प्रगति का पूर्वोत्तर में नया युग शुरू होने की बात जरूर कही, मगर वे नगा मुद्दे पर कुछ नहीं बोले । अमित शाह के दो दिन पहले नगालैंड मंत्रिमंडल ने बैठक करके नगा आदिवासी समुदायों से अलग राज्य की मांग छोड़ने और चुनाव में हिस्सा न लेने की धमकी वापस लेने की अपील की । पूर्वोत्तर में उग्रवादी की नींव रखनेवाले सबसे मजबूत उग्रवादी गुट नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम(एनएससीएन) ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’ की मांग पर अड़ा है । जिसका भारत से अलग ‘झंडा और संविधान’ हो । उनमें सात नया नगा गुटों के मंच नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप(एनएनपीजी) के साथ केंद्र का संघर्षविराम समझौता चल रहा है । 6 जनवरी को जब नगालैंड में अमित शाह 1352 करोड़ रूपये की विकास परियोजनाओं की आधारशिला रख रहे थे, उसी दिन एनएनपीजी ने प्रदेश भाजपा यूनिट अध्यक्ष एलोंग लोंगकुमेर पर नगा शांति प्रक्रिया में अड़ंगा लगाने का आरोप लगाया ।

केंद्रीय गृह मंत्री के पूर्वोत्तर दौरे के पहले से ही सारे नगा जन संगठन चुनाव से पहले नगा झंझट का स्थायी समाधान निकालने की मांग कर रहे हैं । अमित शाह के लौटने के बाद से विरोध, प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है ।

15 जनजातीय समुदायों के संगठनों के 11 जनवरी को एक वक्तव्य जारी करके कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में समाधान के लिए चुनाव का प्रचार अभियान चलाकर नगाओं के साथ विश्वासघात किया । इस बार लोग झांसे में नहीं आएंगे । केंद्र सरकार वही बात फिर दुहराना चाहती है’ ।

इन संगठनों ने मिलकर 13 जनवरी को 6 घंटे का ‘नगालैंड बंद’ का आयोजन किया, जिसमें नगा हल के लिए गठित नगालैंड पीपुल्स एक्शन कमिटी का केंद्र से संघर्षविराम समझौता वाले सातों गुटों ने भी साथ दिया ।

केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार ने पूर्वोत्तर को हिंसा उग्रवाद की जगह शांति और विकास के मानचित्र पर लाया है, इसमें दो राय नहीं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पहला कार्यकाल समाप्त होने से एक साल पहले 2018 में मेघालय, मणिपुर, नगालैंड में चुनाव हुए थे । उसका लाभ इस बार कसौटी पर है । 2023 शुरू होने के पहले से ही केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर के ‘विश्वास और चुनाव विकास’ एजेंडे को ध्यान में रखा है । उग्रवाद पर काबू पाने के लिए लागू सेना को असीमित अधिकार देनेवाला कानून । थ्च। (आर्म्स फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट) कई इलाकों से हटाया गया ।

प्रधानमंत्री के निर्देश पर गठित उत्तर पूर्व काउंसिल(एनईसी) की बैठक 18 दिसंबर को शिलांग में हुई, जिसकी अध्यक्षता उन्होंने ही की । प्रधानमंत्री उसके बाद अगरतल्ला भी गए । उस समय तक त्रिपुरा भाजपा गठजोड़ सरकार से अलग होकर कई विधायक भाजपा का साथ छोड़ चुके थे और मेघालय के मुख्यमंत्री भी विधान सभा चुनाव भाजपा से मिलकर न लड़ने का एलान कर चुके थे ।