जम्मू व कश्मीर के पुंछ जिले में दुर्गम घने जंगलों में छिपे संदिग्ध आतंकवादियों का सफाया करने के लिए सेना का ऑपरेशन जारी है । पहले इसे मुठभेड़ बताया गया । जब से यह जानकारी बाहर आयी कि आतंकी हमले में सेना के जेसीओ(जुनियर कमीशंड ऑफिसर) समेत 9 जवान शहीद हो गए, लेकिन आतंकवादियों के गुप्त ठिकाने तक पहुंचने में और जवाबी कार्रवाई में उम्मीदों के अनुकूल सफलता नहीं मिल पा रही है, तब से इसे धरपकड़/तलाशी अभियान कहा जा रहा है ।
11 से 20 अक्टूबर के बीच की कश्मीर के अन्य इलाकों की आतंकी वारदातों को अगर छोड़ दें तो सिर्फ पुंछ जिले के गेन्धार तहसील में ही दो जेसीओ समेत नौ जवान आतंकी हमले में मारे गए । मन्थार तहसील में भाटा डुरियन इलाके के नार जंगल में आतंकवादियों के गुप्त ठिकाने खत्म करने में सेना की पूरी ताकत लगी हुई है । इसी अभियान में इतने जवानों को जान गंवाने पड़े ।
इतनी जानलेवा मुठभेड़ 18 साल में पहले कभी नहीं देखी गयी । 05/08/2019 को धारा-370 हटाकर जम्मू व कश्मीर का विशेष राज्य दर्जा समाप्त करके इसे दो संघशासित क्षेत्रों में बांटे जाने के बाद से इतनी लंबी मुठभेड़ पहली है ।
19 अक्टूबर को सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे जम्मू पहुंचे और पुंछ के भिम्बर गली का दौरा किया । सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इसी जगह से भागकर आतंकवादी भाटा डुरियन जंगल में छिपे हैं, जहां 14 अक्टूबर को 4 जवान मारे गए ।
फायरिंग दोनों तरफ से हुई, मगर कोई आतंकवादी हताहत हुआ, ऐसी रिपोर्ट नहीं है । सुरक्षा बलों का मानना है कि इस जगह पर तकरीबन दो महीने से सीमापार से घुसपैठ करके आए आतंकवादी छिपे हैं । सेना प्रमुख के दौरे के बाद सेना और अर्द्धसैनिक बलों ने कश्मीर के सीमावर्ती पुंछ जिले के नार जंगल में छिपे आतंकवादी ठिकाने का सफाया करने का अंतिम अभियान चलाया हुआ है । आम नागरिकों के जानमाल का नुकसान न हो, इसलिए जंगल इलाके में और आसपास रहनेवाले लोगों स अपने घरों के अंदर रहने की अपील की गयी है ।
यह ऑपरेशन वैसे समय में चल रहा है, जब जम्मू व कश्मीर का जन-जीवन अस्तव्यस्त है । कश्मीर के गैर-स्थानीय के साथ-साथ स्थानीय लोगों में भी असुरक्षा की स्थिति व्याप्त है । सामाजिक से लेकर कानूनी असुरक्षा के माहौल से लोगों में दहशत है । पहले कश्मीरी पंडितों का मुस्लिम बहुल कश्मीर से हिन्दू आबादी वाले जम्मू की ओर पलायन शुरू हुआ । फिर प्रवासी मजदूर भागने लगे, जब बिहार और यूपी के दो मजदूरों की हत्या हो गयी । मुख्य रूप से अल्पसंख्यकों को आतंकवादी निशाना बना रहे हैं, जिन्हें कश्मीर के मूल वाशिंदे आतंकवादी नहीं मानते । हत्याओं के इस सिलसिले को 1990 जैसा आतंकवाद फिर से पैर फैलाना माना जा रहा है । इसमें हिंदू, सिख, मुसलमान सभी समुदायों को निशाना बनाया जा रहा है । 7 अक्टूबर को श्रीनगर के एक स्कूल में घुसकर प्रिंसिपल सुपिंदर कौर शिक्षक दीपक चंद की आतंकवादियों ने हत्या कर दी ।
श्रीनगर के ईदगाह इलाके में स्थित गवर्नमेंट ब्वायज हायर सेकेंडरी स्कूल की प्रिसिंपल और शिक्षक दीपक चंद को सीधे स्कूल में घुसकर नहीं मारा । उस वक्त सभी टीचर ऑनलाईन क्लास ले रहे थे । आतंकियों ने सबका परिचय पत्र जांचा, दोनों गैर-मुस्लिमों को अलग किया और उसके बाद मार दिया ।
1990 के दशक में कश्मीर में आतंकवाद चुन-चुनकर कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाने से उपजा था । उसके बाद कश्मीर छोड़कर भागे पंडितों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के धारा-370 तथा धारा 35-ए हटाने के बाद सुरक्षा में आश्वासन पर धीरे-धीरे लौटने लगे थे । लेकिन 7 और 8 अक्टूबर, 2021 को कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय टिक्कू ने कहा कि दो दिनों में 70 परिवार कश्मीर छोड़कर जम्मू चले गए । उसके बाद से यह सिलसिला जारी है ।
कश्मीरो सिख और पंडित समुदाय के कई सरकारी कर्मचारी तथा शिक्षक कश्मीर छोड़कर जम्मू भागे । श्रीनगर में शिक्षा विभाग में जुनियर सहायक सिद्धार्थ रैना के शब्दों में - ‘हम कश्मीर से बाइक पर भागे हैं । डर बना रहा कि जो कोई हमारी तरफ देख रहा है, वो हमें गोली मार देगा ।’ सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? कइयों ने तबादला मांगा, काम पर नहीं पहुंचे ।
जवाब में जम्मू व कश्मीर प्रशासन ने कड़ा रूख अपनाया । कश्मीर के डिवीजनल कमिश्नर ने कश्मीर के सभी 10 जिलों के उपायुक्तों को निर्देश दिया कि जो कोई भी अनुपस्थित पाए जाएंगे, उनके खिलाफ सेवा नियमों के अंतर्गत कार्रवाई की जाएगी । हालात काबू से बाहर जाते देख प्रशासन ने भरोसा दिलाया, मगर अल्पसंख्यकों का भय दूर नहीं हुआ । जो सरकारी कर्मचारी मुसलमान हैं, उन पर प्रशासन को संदेह है । या तो वे किसी आतंकवादी गुट से मिले हुए हैं, या उनका वैसे आतंकी परिवार से रिश्ता है । ऐसा सरकार मानती है । वैसे मुसलमान कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त करनेवाली संविधान की धारा 311(2)(सी) के तहत कार्रवाई की जा रही है । इस कानून के अंतर्गत प्रशासन को किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आरोपों की जांच किए बगैर सीधे बर्खास्त करने का अधिकार है, जो अल्पसंख्यक सिख और हिंदू कर्मचारी हैं, उन्हें प्रशासन सुरक्षा नहीं दे पा रहा है । मुसलमान पर सरकार भरोसा नहीं कर रही है और हिंदुओं को सरकार पर भरोसा नहीं है । आतंकवाद नए सिरे से भड़कने में तेजी कश्मीर के सबसे पुराने और लोकप्रिय अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी के इंतजार के बाद आयी । वहां से गैर-स्थानीय कश्मीरियों का पलायन उसके बाद ही शुरू हुआ । पाक पोषित आतंकवाद पर काबू पाने के लिए सरकार बंदूक के जरिए दुहरा आतंक पैदा करके लोगों को विश्वास में लेने की नीति पर अड़ी है । सैय्यद अली शाह गिलानी की 04/09/2021 को मौत के बाद प्रशासन के रवैए से लोग नाराज हुए । गिलानी की लाश ‘पाकिस्तानी झंडे’ में लिपटा होने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने और राष्ट्रविरोधी कथित नारे के खिलाफ जम्मू व कश्मीर पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया । गिलानी का जनाजा नहीं निकलने दिया । पुलिस पर आरोप है कि गिलानी के परिवारजनों से लाश छीपकर 300 मीटर दूर ले जाकर दफना दिया । गिलानी की मौत के बाद लॉकडाउन था । इंटरनेट मोबाईल सेवाएं बंद थी ।
सितंबर के पहले सप्ताह की यह घटना है । एक महीने के बाद 16 अक्टूबर को श्रीनगर से खबर आयी कि गिलानी के पोते अनीस-उल-सलाम को जम्मू व कश्मीर सरकार ने ‘राज्य की सुरक्षा के हित में’ बर्खास्त कर दिया । वो शेरी कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में रिसर्च अधिकारी था । उस तारीख तक 26 सरकारी कर्मचारी भारतीय संविधान की धारा 311(2)(सी) के अंतर्गत नौकरी से बर्खास्त किए जा चुके थे और सब-के-सब मुसलमान थे, उनमें चार जम्मू के थे । जम्मू निवासी फारूक अहमद बट सरकारी मिडिल स्कूल में शिक्षक थे, जिन्हें बर्खास्त किया गया ।
धारा-370 हटाकर कश्मीर को जबरन भारत का हिस्सा बना दिया गया । जम्मू व कश्मीर का अपना संविधान खत्म करके अन्य राज्यों की तरह भारतीय संविधान लागू कर दिया गया । लेकिन कश्मीरी खुद को सिर्फ कश्मीरी मानते हैं । उनसे जबरन भारतीय मनवाने की प्रतिक्रिया यह मानी जा सकती है । जम्मू व कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा सितंबर में जब विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए पोर्टल लांच कर रहे थे ताकि वे अपनी पुश्तैनी जायदाद पर दावा कर सकें, उस समय जो वापस लौटे थे, उनके फिर से भागने की नौबत थी । उसके कुछ दिन बात 55 सरपंचों और पंचों ने इस्तीफा दे दिया, जो भाजपा से जीते थे ।
लद्दाखवासियों के बीच दशहरा मनाने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पहुंचे । 5 से 17 अक्टूबर के बीच हत्याओं का सिलसिला जारी था । राष्ट्रपति जिस दिन लद्दाख से विदा हुए, उसी दिन 17 अक्टूबर को दो बिहारी राजमिस्तिरियों की ईंट मार-मारकर हत्या कर दी गयी । केंद्र सरकार ने कश्मीर से बाहर से लोगों को यहां आने और अन्य राज्यों की तरह बसने का न्योता धारा-370 के साथ ही धारा-35-ए भी खत्म करने के बाद से दे रही है । हाल ये है कि जो उसके पहले से रह रहे हैं, उनकी जान खतरे में है ।
इस आतंकवाद के उभरने का कारण अफगानिस्तान में तालिबान का फिर से बोलबाला माना जा रहा है । गौरतलब है कि 1990 में जब अफगानिस्तान में तालिबान ने कब्जा जमाया और इस्लामी कानून लागू किया, उसी समय कश्मीर में भी आतंकवाद भड़का ।
इस हफ्ते 20/10/2021 को जब केंद्रीय गृह मंत्री कश्मीर के हालात की समीक्षा कर रहे थे, उसी दिन मास्को की मेजबानी में अफगानिस्तान के तालिबान नेता जुटे थे । भारत, चीन, पाकिस्तान समेत 10 देशों के प्रतिनिधि जुटे थे, अमेरिका शामिल नहीं हुआ । उस बैठक के बाद पाक विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी काबुल पहुंचे । विदित हो कि अगस्त में अफगानिस्तान में सत्ता हथियाने के तुरंत बाद तालिबान नेता ने कहा कि उसे कश्मीर समेत दुनिया के मुस्लिमों के पक्ष में बोलने का हक है ।
ताजा आतंकी हमले के आलोक में दो बातें याद करने लायक है । भाजपा ने कश्मीर समस्या के लिए धारा-370 और कांग्रेस की नीतियों को हमेशा जिम्मेदार ठहराया । इतिहास बदलने के बाद का यह नया आतंकवाद चैप्टर है । कश्मीर में पहला फियादीन(आत्मघाती) हमला जनवरी, 2018 में हुआ । जब जैश-ए-मुहम्मद से संबद्ध 16 साल के एक किशोर ने विस्फोट करके पांच सीआरपी जवानों की जान ली । उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी धारा-370 हटाने वाले कानून का मसौदा तैयार कर रहे थे ।
पुंछ में जारी मुठभेड़ ने 2003 की हिलकाका मुठभेड़ की याद दिला दी, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे । अप्रील-मई, 2003 में दो हफ्ते तक चले सेना के सपविनाश ऑपरेशन में 62 आतंकवादी मारे गए । सेना के सिर्फ दो जवान मारे गए। वो उस समय तक का सबसे बड़ा ऑपरेशन था ।
अभी कश्मीर के सिख और पंडित जान बचाने के लिए जम्मू के जिस जगती टाउनशिप में पनाह लेने जा रहे हैं, वो 2011 में कांग्रेस गठजोड़ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शासनकाल का बना हुआ है । 4200 दो रूम वाले इन फ्लैटों में करीब 6500-7000 परिवार रह रहे हैं ।