संघशासित क्षेत्र जम्मू व कश्मीर में विधान सभा और लोकसभा सीटों के परिसीमन के लिए गठित रिटायर सुप्रीम कोर्ट जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट जारी कर दी । लेकिन गठन के समय से ही चला आ रहा विवाद बरकरार है, जो संवैधानिक.सह.राजनीतिक है ।

एक ओर जहां जम्मू व कश्मीर में विधान सभा चुनाव का रास्ता खुलाए वहीं दूसरी ओर परिसीमन आयोग रिपोर्ट के कई विवादों से घिरे होने के कारण आगे की प्रक्रिया उलझी हुई है ।

जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 के तहत जम्मू व कश्मीर राज्य का भारतीय संविधान के अनुच्छेद.370 के अंतर्गत प्राप्त विशेष दर्जा समाप्त हो गया और इस राज्य का विभाजन दो संघशासित क्षेत्रें . जम्मू व कश्मीर और लद्दाख में हो गया । इसके साथ ही जम्मू व कश्मीर के अपने संविधान का अस्तित्व समाप्त हो गया और यह क्षेत्र पूरी तरह अन्य राज्यों की तरह भारतीय संघीय व्यवस्था का हिस्सा बन गया । 05/08/2019 को जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट लागू होने के एक साल पहले से ही जम्मू व कश्मीर विधान सभा भंग थी और वहां पहले राज्यपाल शासन, फिर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था । नियमतः परिसीमन आयोग की रिपोर्ट पहले सम्बन्धित राज्यधसंघशासित क्षेत्र की विधान सभा में पेश होती है ।

जम्मू व कश्मीर में विधान सभा सीटों के परिसीमन के लिए केंद्र सरकार ने मार्च, 2020 में आयोग का गठन किया । पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज रंजना देसाई परिसमीन आयोग की अध्यक्ष बनायी गयीं और मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चन्द्रा तथा जम्मू व कश्मीर के मुख्य चुनाव अधिकारी के. के. शर्मा आयोग के सदस्य नियुक्त हुए । परिसीमन आयोग के सहयोगी सदस्य जम्मू व कश्मीर के पांच सांसद बनाए गए । उनमें सबसे मजबूत जनाधार वाली पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस के तीन और भाजपा के दो संसद सदस्य हैं । नेशनल कांफ्रेंस के तीनों सांसद हैं. पार्टी सुप्रीमो फारूक अब्दुल्ला, हसनैन मसूदी और अकबर लोन । भाजपा के हैं. केंद्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह और सांसद जुगल किशोर शर्मा ।

आयोग के गठन के समय तक जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट के खिलाफ नेशनल कान्फ्रेंस और अन्य दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कर डाली थी, जिसमें अनुच्छेद.370 हटाने के केंद्र के फैसले को चुनौती दी गयी । गठन के एक साल बाद 18/02/2021 को जब परिसीमन आयोग ने पहली बैठक की तो नेशनल कांफ्रेंस के सदस्यों ने उसका बायकाट किया । इस सांसदों ने परिसीमन आयोग के प्रस्तावित मसौदे को ‘पूर्वाग्रह’ से ग्रसित बताते हुए कहा कि पहले तो सीटों का परिसीमन नहीं किया जा सकता, क्योंकि जम्मू व कश्मीर जनप्रतिनिधित्व एक्ट, 1957 के अनुसार 2026 की जनगणना से पहले परिसीमन नहीं हो सकता । जम्मू व कश्मीर जनप्रतिनिधित्व एक्ट, 1957 में संशोधन करके 2002 में विधान सभा से पारित प्रस्ताव में यह प्रावधान किया गया, जिसे 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया । नेशनल कांफ्रेंस सदस्यों का कहना था कि जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 के तहत केंद्र सरकार सीटों का परिसीमन नहीं कर सकती, क्योंकि इस एक्ट की संवैधानिक वैद्यता सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है । परिसीमन आयोग की पहली बैठक में प्रस्तुत ड्राफ्ट मसौदे से लेकर 05/05/2022 को जारी अंतिम रिपोर्ट तक जम्मू व कश्मीर के राजनीतिक दलों ने प्रस्ताव ठुकराने का सिलसिला जारी रखा ।

अंतिम रिपोर्ट परिसीमन आयोग ने ऐसे समय में जारी की है, जब सुप्रीम कोर्ट जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट को चुनौती देनेवाली लंबित याचिकाएं सुनवाई के लिए लिस्टिंग पर विचार करने को तैयार हो गयी । चीफ जस्टिस एन. बी. रमना और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने 25 अप्रील को कहा कि गर्मी के अवकाश के बाद ये याचिकाएं सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की जाएगी । विगत ढाई वर्षों में याचिकर्ताओं की ओर से कई अर्जियां देकर सुप्रीम कोर्ट से धारा.370 समाप्त करने के केंद्र के फैसले के खिलाफ सुनवाई जल्द करने का आग्रह किया गया । 25 अप्रील को पेश सीनियर एडवोकेट शेखर वकाडे ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पीठ के सामने कहा. ‘यह धारा.370 का मामला है, परिसीमन भी जारी है ।’ इस पर चीफ जस्टिस ने कहा. ‘यह पांच जजों की पीठ का मामला है, मैं पीठ का पुनर्गठन करूंगा ।’

संवैधानिक विवाद का सबसे अहम पहलू ये है कि परिसीमन आयोग ने विधान सभा सीटों का जो खाका खींचाए उसमें परिसीमन एक्ट, 2002 का पालन नहीं किया गया, जबकि परिसीमन आयोग का गठन ही उसी कानून के तहत हुआ । जनगणना पर आधारित कुल सीटों की संख्या और उसका वितरण तय करने के लिए परिसीमन एक्ट, की क्लाउज 8(ठ) लागू करने के बजाए जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट की सेक्शन 63 का अनुसरण किया गया ।

जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाला यह पांचवां परिसीमन आयोग है और पहला है, जिसमें चुनाव क्षेत्रों का खाका खींचने में परिसीमन एक्ट, 2002 का पालन नहीं किया गया । परिसीमन आयोग का काम तो पांच उत्तर पूर्वी राज्यों के लिए जनादेश के साथ शुरू हुआ । लेकिन गठन के एक पखवारे बाद 21/03/2020 को पांच पूर्वोत्तर राज्यों को इसके दायरे से बाहर कर दिया गया । यह एकमात्र आयोग है, जिसे सिर्फ जम्मू व कश्मीर के परिसीमन तक सीमित कर दिया गया । भारत के विधायी इतिहास में यह पहला आयोग है, जो उस संघशासित क्षेत्र की विधान सभा में पेश नहीं किया जाएगा, जहां विधान सभा सीटों का परिसीमन नहीं किया गया है । यही सवाल उठाकर जम्मू व कश्मीर में भाजपा को छोड़ सभी दल पहले विधान सभा चुनाव और फिर परिसीमन कराने पर जोर दे रहे थे । सभी गैर.भाजपा ‘राजनीतिक एजेंडे’ के आधार पर तैयार मसौदा करार दिया ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू व कश्मीर की सभी पार्टियों के नेताओं के साथ दिल्ली में 24/06/2021 को बैठक की । धारा.370 समाप्त किए जाने के बाद प्रधानमंत्री की वो पहली बैठक थी । उसमें भी कांग्रेस समेत सभी दलों ने पहले चुनाव, फिर परिसीमन पर बल दिया ।

मार्च, 2021 में परिसीमन आयोग का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ाया गया । 22/02/2022 को कार्यकाल समाप्त होने के दिन 2 महीने की बढ़ोतरी की गयी । कार्यकाल समाप्त होने से एक दिन पहले 05/05/2022 को आयोग ने अंतिम रिपोर्ट जारी कर दी। इस दौरान परिसीमन आयोग ने श्रीनगर में और जम्मू में राजनीतिक दलों के साथ कई बैठकें कीए उनके नेताओं से सुझाव मांगे । उनके सुझावों का सीटों के परिसीमन में कितना ख्याल रखा गया, यह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है । क्योंकि भाजपा को छोड़ सभी दलों ने इसे नामंजूर कर दिया । अंतिम रिपोर्ट के अनुसार विधान सभा सीटें 90 होंगी, जो पहले 83 थीं । जम्मू डिवीजन में 43 और कश्मीर घाटी में 47 होंगी । हिंदू बहुल आबादी वाले जम्मू को 6 और कश्मीर घाटी को 1 अतिरिक्त सीट दी गयी है। रिपोर्ट की दो बातें छलावा मालूम होती हैं । एक है पाक अधिकृत कश्मीर(पीओके) के लिए 24 सीटें और दूसरी है विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए 2 सीटें । पीओके पर भारत का कब्जा तबतक नहीं हो सकता, जबतक भारत युद्ध में पाकिस्तान को हराकर उसे वहां से खदेड़ नहीं देता । इसलिए वहां के लिए भारतीय हिस्से के कश्मीर में विधान सभा सीटों का परिसीमन का अर्थ समझ में नहीं आता । आतंकवाद के चलते कश्मीर से भागे जिन पंडितों के पुनर्वास और घर वापसी का प्रचार किया जा रहा है, उनके लिए आवंटित ‘कम से कम’ 2 सीटों पर उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं मिला है । वे नामजर किए जाएंगे और वो भी सरकार के रहमो.करम पर । यह प्रस्ताव गजट (राजपत्र) अधिसूचना का हिस्सा नहीं है और परिसीमन आयोग के अन्य प्रस्तावों की तरह सरकार उसे मानने को बाध्य नहीं है ।