यह लेख भारत में धर्मान्तरण विरोधी कानूनों और सुप्रीम कोर्ट में उनकी संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्रित है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से पूछा है कि कौन तय करेगा कि धर्मान्तरण धोखाधड़ी या जबरन हुआ है। लेख में विभिन्न राज्यों, विशेषकर भाजपा शासित राज्यों द्वारा बनाए गए कड़े कानूनों, उनके प्रावधानों और इन कानूनों के दुरुपयोग के मामलों पर चर्चा की गई है, साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता पर इसके प्रभावों को भी उजागर किया गया है।
यह लेख कोरोना लॉकडाउन के दौरान भारत में हुई तीव्र राजनीतिक उठापटक और जोड़-तोड़ की राजनीति का विश्लेषण करता है। इसमें मध्य प्रदेश, राजस्थान और मणिपुर में सरकारों को बचाने या गिराने के प्रयासों, विधायकों की खरीद-फरोख्त और अदालती हस्तक्षेपों पर प्रकाश डाला गया है। लेखक स्वास्थ्यकर्मियों की उपेक्षा और कोरोना बचाव प्रयासों की तुलना में राजनीतिक गतिविधियों की अधिक मुस्तैदी पर भी टिप्पणी करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों को तेजी से निपटाने और राज्य सरकारों द्वारा हाईकोर्ट की अनुमति के बिना मुकदमे वापस लेने पर रोक लगाने के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड का खुलासा करने की समय-सीमा भी 48 घंटे कर दी है। यह लेख राजनीति के अपराधीकरण को रोकने में न्यायपालिका के प्रयासों और राजनीतिक दलों व सरकारों की अनिच्छा को उजागर करता है।
यह लेख गुजरात में दो राज्यसभा सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव कराने के चुनाव आयोग के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और 'एक देश एक चुनाव' के प्रधानमंत्री के विचार के बीच के विरोधाभास पर केंद्रित है। लेखक तर्क देता है कि चुनाव आयोग भाजपा की राजनीतिक सुविधा के अनुसार काम कर रहा है, जिससे 'एक देश एक चुनाव' के नारे की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। इसमें संवैधानिक बाधाओं और राजनीतिक दलों की अरुचि का भी उल्लेख है।
चुनाव आयोग लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की जल्दबाजी दिखा रहा है, जबकि केंद्र सरकार इस पर राजनीतिक सहमति चाहती है। यह लेख गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों की तारीखों की घोषणा में आयोग के कथित राजनीतिक दबाव और विरोधाभासी कदमों पर भी सवाल उठाता है। विपक्षी दल आयोग के इरादों पर सवाल उठा रहे हैं, खासकर प्रधानमंत्री के गुजरात दौरों के संदर्भ में।
यह लेख 17वीं लोकसभा चुनाव 2019 के परिणामों का विश्लेषण करता है, जिसमें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की रिकॉर्ड जीत और कई नए राजनीतिक घटनाक्रमों पर प्रकाश डाला गया है। इसमें महिला प्रतिनिधित्व में वृद्धि, विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना, और विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के प्रदर्शन जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की गई है। लेख मोदी लहर को अभूतपूर्व बताता है और इसे नेहरू-गांधी युग के करिश्मे से अलग करता है।
यह लेख आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के चुनाव आयोग के अधिकार की कमी पर केंद्रित है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को दागी नेताओं के मुकदमों को शीघ्र निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने का निर्देश दिया है, क्योंकि राजनीतिक दल ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देने से नहीं हिचकते। लेख में बताया गया है कि सरकार और राजनीतिक दल दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के पक्ष में नहीं हैं, जिससे चुनाव सुधारों में बाधा आ रही है।
जम्मू व कश्मीर में विधानसभा चुनाव लगातार टल रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार सामान्य स्थिति का दावा कर रही है। भाजपा को छोड़कर सभी प्रमुख राजनीतिक दल जल्द चुनाव और राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग कर रहे हैं, जिसके लिए उन्होंने चुनाव आयोग और राष्ट्रीय दलों से मुलाकात की। लद्दाख भी जम्मू व कश्मीर से अलग होकर राज्य का दर्जा चाहता है, जबकि कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा और रोजगार संबंधी चिंताएं भी बनी हुई हैं, जो चुनाव में एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती हैं।
यह लेख जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35-ए को समाप्त करने के केंद्र सरकार के फैसले और इसके 100 दिन पूरे होने की उपलब्धियों पर केंद्रित है। यह 'कश्मीरियत' और 'जम्हूरियत' की अवधारणाओं की पड़ताल करता है, यह तर्क देते हुए कि पारंपरिक 'कश्मीरियत' धर्म-आधारित (इस्लामियत) थी और भेदभावपूर्ण थी। लेख इस संवैधानिक बदलाव के कानूनी और ऐतिहासिक पहलुओं पर भी प्रकाश डालता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाएं और रणवीर दंड संहिता (RPC) के प्रावधानों का उल्लेख है।
यह लेख लद्दाख लोकसभा चुनाव 2024 के परिणामों का विश्लेषण करता है, जहाँ निर्दलीय उम्मीदवार हाजी मुहम्मद हनीफा जान की जीत ने भाजपा की लद्दाख नीति पर पुनर्विचार करने का दबाव बनाया है। यह जीत लद्दाखियों की राज्य के दर्जे और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल होने की पुरानी मांगों को दर्शाती है, जिसे सोनम वांगचुक के नेतृत्व में हुए आंदोलन ने उजागर किया था। लेख जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों पर भी प्रकाश डालता है, जहाँ क्षेत्रीय और सामाजिक मुद्दे हावी रहे, और भाजपा पर जल्द विधानसभा चुनाव कराने का दबाव बढ़ गया है।