यह लेख एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की संभावना पर केंद्रित है, जिसे चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी चुनौती बताया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने स्पष्ट किया है कि संवैधानिक संशोधन और पर्याप्त वीवीपीएटी मशीनों के बिना यह संभव नहीं है। भाजपा सरकार इस पर दबाव बना रही है, जबकि विपक्षी दल इसे असंवैधानिक और अव्यावहारिक मानते हैं, और ईवीएम छेड़छाड़ के मुद्दे पर भी चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
यह लेख चुनाव आयोग की उस लाचारी पर प्रकाश डालता है जिसमें वह दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस संबंध में 'तार्किक आदेश' जारी करने का निर्देश दिया है, जबकि चुनाव आयोग का मानना है कि यह अधिकार उसके पास नहीं है और इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की आवश्यकता है। राजनीतिक दल इस मुद्दे पर कानून बनाने से बचते रहे हैं, जिससे राजनीति का अपराधीकरण जारी है।
यह लेख चुनाव सुधारों पर केंद्रित है, विशेष रूप से दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के मुद्दे पर। यह बताता है कि कैसे चुनाव आयोग के कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव, जैसे दागी उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने का अधिकार, सरकार द्वारा अनदेखा कर दिया गया है, जबकि वोटर आईडी को आधार से जोड़ने जैसे प्रस्तावों को तुरंत मंजूरी मिल गई। लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि राजनीतिक दलों के हित जनहित पर हावी होते हैं, जिससे राजनीति का अपराधीकरण जारी है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने विधानसभा को समय से पहले भंग कर दिया, जिससे चुनाव आयोग एक नई चुनौती में फंस गया। आयोग को अब तेलंगाना विधानसभा चुनाव मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम के साथ कराना होगा, जबकि तेलंगाना विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने में आठ महीने से अधिक का समय बचा था। यह कदम संवैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत चुनाव आयोग के लिए एक जटिल स्थिति पैदा करता है, खासकर एक साथ चुनाव कराने की राष्ट्रीय बहस के बीच।
यह लेख पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली 'एक साथ चुनाव' पर उच्चस्तरीय समिति के गठन और उसके राजनीतिक समर्थन पर केंद्रित है। समिति विवादों में घिरी हुई है, खासकर विपक्षी दलों द्वारा इसे भाजपा का एजेंडा बताए जाने के कारण। लेख चुनाव सुधारों, विशेषकर राजनीति के अपराधीकरण को रोकने में सरकार की अनिच्छा और चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख गुजरात में दो राज्यसभा सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव कराने के चुनाव आयोग के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और 'एक देश एक चुनाव' के प्रधानमंत्री के विचार के बीच के विरोधाभास पर केंद्रित है। लेखक तर्क देता है कि चुनाव आयोग भाजपा की राजनीतिक सुविधा के अनुसार काम कर रहा है, जिससे 'एक देश एक चुनाव' के नारे की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। इसमें संवैधानिक बाधाओं और राजनीतिक दलों की अरुचि का भी उल्लेख है।
यह लेख लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने के प्रस्ताव पर केंद्रित है, जिसे विधि आयोग और चुनाव आयोग ने समर्थन दिया है, लेकिन प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इसमें एक साथ चुनाव कराने में आने वाली राजनीतिक, संवैधानिक और कानूनी चुनौतियों का विस्तार से वर्णन किया गया है, जिसमें संविधान के कई अनुच्छेदों और जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की आवश्यकता शामिल है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम. एन. वेंकटचलैया जैसे विशेषज्ञों ने संघीय सिद्धांतों और स्थानीय मुद्दों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की है।