मानवाधिकार और जन-आंदोलन
इरोम शर्मिला और आमरण अनशन
इरोम शर्मिला चानू का संघर्ष आधुनिक भारत के नागरिक प्रतिरोध की सबसे असाधारण कथाओं में से एक है। मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून — AFSPA — के विरोध में उनका लंबा आमरण अनशन केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध नैतिक साहस की अद्वितीय मिसाल है।
यह पुस्तक इरोम शर्मिला के जीवन, उनकी तपस्वी प्रतिबद्धता, मणिपुर की पीड़ा और मानवाधिकारों की उस बहस को सामने लाती है, जो अक्सर राष्ट्रीय विमर्श के हाशिये पर रह जाती है। इसमें एक ऐसी स्त्री की कथा है, जिसने सत्ता, हिंसा और उपेक्षा के सामने अपने शरीर को ही प्रतिरोध का माध्यम बना दिया।
शशिधर खान ने उत्तर-पूर्व भारत, सामाजिक संघर्षों और राजनीतिक प्रश्नों पर लंबे समय तक गंभीर पत्रकारिता की है। उनके लेखन की विशेषता यह है कि वे घटना को केवल खबर की तरह नहीं, बल्कि समाज, राज्य और मनुष्य के संबंधों के भीतर रखकर देखते हैं।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो इरोम शर्मिला को केवल एक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि साहस, करुणा और लोकतांत्रिक प्रतिरोध की जीवित कथा के रूप में समझना चाहते हैं।