नगाओं की राजनीतिक दशा दिशा तय करनेवाले राज्य के सबसे प्रभावशाली संगठन ‘हो हो’ ने नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि से कहा है कि जबतक नगा शांति प्रक्रिया का अंतिम हल नहीं निकल जाता, राज्य में डिलिमिटेशन(परिसीमन) प्रक्रिया न शुरू की जाए ।
नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने मार्च में विधान सभा में कहा कि परिसीमन प्रक्रिया शीघ्र शुरू की जाएगी । उसी समय से अटकलें लगायी जा रही थो कि नगा शांति वार्ता का अंतिम समाधान कब तक निकलेगा और उसके बगैर परिसीमन प्रक्रिया कहां तक उचित होगी । हो हो ने इसी हफ्ते एक वक्तव्य जारी करके नगालैंड के राज्यपाल से यह आग्रह किया है । पूर्व खुफिया प्रमुख आर. एन. रवि नगा शांति प्रक्रिया में भारत सरकार की ओर से वार्ताकार भी हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मई 2019 में लोकसभा चुनाव संपन्न होने के दो महीने बाद जुलाई में आर. एन. रवि को नगालैंड का राज्यपाल बनाकर ‘नगा फ्रेमवर्क डील’ को ‘फाइनल डील’ में बदलन कहा । प्रधानमंत्री ने इसके लिए 31 अक्टूबर तक का डेडलाइन दिया । ‘फ्रेमवर्क डील’ तीन अगस्त, 2015 को नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम(एनएससीएन) के मुइवा गुट और भारत सरकार के बीच दिल्ली में हुआ ।
मुइवा का इस समझौते के टेबुल तक लानेवाले आर. एन. रवि की विभिन्न नगा गुटों से गुपचुप वार्ता चलती रही । मगर यह जानकारी गोलमटोल रखी गयी कि इस वार्ता से कुछ निकल रहा है या नहीं और बात कहां तक पहुंची है । 2015 के ‘नगा फ्रेमवर्क डील’ के बारे में भी अभी तक कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की गयी है । यहां तक कि नगालैंड और मणिपुर के लोग भी नहीं जानते कि उस डील में आखिर किस सहमति पर ‘भारत नगा’ हस्ताक्षर हुए ।
यही ‘भारत नगा’ शब्द नगा शांति प्रक्रिया के रास्ते की सबसे बड़ी रूकावट है और बिना ‘खेद’ के अब तक इसे चुनावी मुद्दा बनाकर रखा गया है । 1997 में एनएससीएन(मुइवा) के साथ संघर्षविराम सहमति बनी और उस समय से अब तक इस झंझट के समाधान की शांति वार्ताएं कुल मिलाकर वहीं अटकी है, जहां से शुरू हुई थी । मई, 2019 में दुबारा जनादेश हासिल करने के एक साल पूरे होने के उपलक्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा नेताओं ने उपलब्धियों में ‘नगा फ्रेमवर्क डील’ का नाम नहीं लिया । एक साल की उपलब्धियां गिनाने के समय ही नगा हो हो संगठन न राज्यपाल आर. एन. रवि को एनएससीएन समेत विभिन्न नगा गुटों के साथ हुई सहमति को स्थायी हल में बदलने और उसके पहले चुनाव परिसीमन न शुरू करने का आग्रह किया ।
अक्टूबर, 2019 के अंत में राज्यपाल आर. एन. रवि ने विभिन्न नगा गुटों और सिविल सोसायटी संगठनों को ‘फाइनल डील’ तक लाने के लिए मैराथन वार्ताएं चलायीं । दिल्ली में ही लगातार कई बैठकें हुई और 31 अक्टूबर बीत जाने के बावजूद बेनतीजा रही । समाधान नहीं निकला, न ही निकलने के निकट भविष्य में आसार हैं । मगर इसका चुनावी लाभ दोनों लोकसभा चुनावों में और नगालैंड के विधान सभा चुनावों में भाजपा ने उठाया है । नगा शांति वार्ता के चुनावी इस्तेमाल प्रक्रिया में नगालैंड की क्षेत्रीय पार्टियां भी शामिल हैं । उसके सिरमौर नेफियू रियो गठजोड़ मुख्यमंत्री हैं, जिसमें भाजपा शामिल है । भाजपा ने इसे जनवरी, 2017 में मणिपुर विधान सभा चुनाव प्रचार में और 2018 में नगालैंड विधान सभा चुनाव में भुनाया । दोनों चुनावों में नगा शांति प्रक्रिया मुख्य मुद्दा था । हार्डलाइनर एनएससीएन सुप्रीमो मुइवा को दरकिनार करने के लिए वार्ताकार आर. एन. रवि ने 2017 में सात अन्य नगा गुटों के साथ भी संघर्षविराम समझौता किया, जिनका मंच ‘नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप’ के नाम से जाना जाता है ।
अटकी और भटकी नगा शांति वार्ता के आलोक में नगा हो हो ने जिस डिलिमिटेशन प्रक्रिया के संभावित परिणाम क प्रति नगालैंड के राज्यपाल को सचेत किया है, उसके पीछे की कहानी यों है । 2002 में केंद्र सरकार ने परिसीमन प्रक्रिया शुरू करना चाहा तो राज्य सरकार ने इसे ‘दोषपूर्ण और अव्यावहारिक’ कहकर ठुकरा दिया । 2011 जनगणना मं एक दशक में नकारात्मक आबादी वृद्धि को देखते हुए राज्य सरकार ने फिर इन्कार कर दिया । मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने बाद में माना कि डिलिमिटेशन ‘बहुत कठिन प्रक्रिया’ है । 2011 में नगालैंड की 1.79 लाख आबादी 2001 के मुकाबले 11,000 कम थी ।
अभी मार्च में मुख्यमंत्री नेफियू रियो को डिलिमिटेशन आसान लगा तभी तो उन्होंने विधान सभा को बताया कि यह प्रक्रिया शीघ्र शुरू की जाएगी । इस बात पर राज्यपाल और मुख्यमंत्री में सहमति है या नहीं, यह तो तभी पता चलेगा, जब डिलिमिटेशन शुरू होगा । मार्च से तो कोरोना लॉकडाउन चल रहा है । नगा शांति प्रक्रिया पर तो मुख्यमंत्री नेफियू रियो और राज्यपाल में मतभेद है । मुख्यमंत्री एनएससीएन(मुइवा गुट) को दरकिनार करके कोई समझौता के पक्ष में नहीं हैं । एनएससीएन(मुइवा) के ‘अलग झंडे अलग संविधान’ शर्त पर भी मुख्यमंत्री का रवैया ढीला है । 31 अक्टूबर, 2019 डेडलाइन से पहले जब राज्यपाल ने मुइवा को कड़ा संदेश देने के लिए ‘अलग झंडा अलग संविधान’ से इन्कार कर दिया तो मुख्यमंत्री उस पर कोई टिप्पणी करने से बचते रहे । राज्यपाल जब मुइवा से इतर नगा संगठनों से मिल रहे थे, उस समय मुख्यमंत्री एनएससीएन के दीमापुर हेडक्वार्टर में दोनों पक्षों में मध्यस्थता कर रहे थे(27-29 अक्टूबर)।
नेफियू रियो नगा शांति वार्ता को भुनाकर ही पहली बार 2003 में सत्ता में आए । उस समय से अबतक वे चौथी बार मुख्यमंत्री बने । प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नगालैंड जाकर कहा कि नगा संकट के हल के लिए जरूरत पड़ी तो संविधान में संशोधन किया जा सकता है । वैसा संविधान संशोधन तो न हुआ, न होना संभव है, जिसमें भारत के संघीय ढांचे के अंतर्गत अलग संप्रभु संघीय सरकार का संविधान और झंडा हो । लेकिन 2003 विधान सभा चुनाव में पहली बार भाजपा के सात उम्मीदवार जीते । उस समय से लगातार नगा शांति वार्ता को भुनाकर भाजपा नेफियू रियो के नेतृत्ववाले गठजोड़ में शामिल है ।
जनवरी, 2017 में मणिपुर चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सफाई दी कि नगा डील में किसी भी अन्य राज्यों की सीमाओं के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जाएगा । एनएससीएन(मुइवा) के प्रस्तावित ‘ग्रेटर नगालिम’ में नगालैंड और मणिपुर के अलावे असम और अरूणाचल प्रदेश के नगा बहुल इलाके मिलाने की बात प्रचारित की जाती है । यह किसी को नहीं पता कि 2015 ‘फ्रेमवर्क डील’ में इस पर सहमति हुई या नहीं । मणिपुर में भाजपा ने पहली बार सरकार बनाने के लिए जिन कांग्रेस विधायकों को फोड़ा उसमें सात की सदस्यता सुप्रीम कोर्ट के राडार पर होने के बावजूद विधान सभा स्पीकर वाई. खेमचंद ने ‘सुरक्षित’ रखा हुआ है । भाजपा में शामिल होकर मंत्री बने श्यामकुमार सिंह की सदस्यता और मंत्री पद तो 18 मार्च, 2020 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से खतम हो गया । 2018 में नगालैंड विधान सभा चुनाव के बाद मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने अपने सभी विधायकों के साथ दिल्ली में डेरा डाला और कहा कि उनसे बात किए बगैर कोई नगा डील न की जाए । असम के भाजपा मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल नगा डील पर बोलते रहे और असम की हितों की अनदेखी न किये जाने के प्रति चेताते रहे । 31 अक्टूबर के बाद से वो भी चुप हैं ।
अक्टूबर, 2019 में कई नगा संगठनों ने दिल्ली में आयोजित शांति वार्ता बैठक में समझौते के अन्य प्रस्तावों में नगालैंड विधान सभा में सीटों की संख्या 60 से ज्यादा करने की मांग रखी । लोकसभा और राज्य सभा की भी मात्र एक-एक सीटें हैं ।
31 अक्टूबर के बाद शांति वार्ता पर लॉकडाउन लग गया । मार्च के बाद से डिलिमिटेशन पर लॉकडाउन है । लेकिन लोकसभा सभा स्पीकर ओम बिड़ला ने जम्मू व कश्मीर में परिसीमन के लिए कमिटी गठित की है । 2019 में धारा-370 की समाप्ति के बाद से केंद्र प्रशासित प्रदेश जम्मू व कश्मीर विधान सभा और लोकसभा की सीटें बढ़ जाएंगी । अगर नगालैंड में ऐसा हुआ तो नागरिकता संशोधन कानून को लेकर संतुलन बिगड़ सकता है, जिसके खिलाफ नगालैंड विधान सभा प्रस्ताव पारित कर चुकी है । राज्य सभा में नगा पीपुल्स फ्रंट(एनपीएफ) सदस्य के. जी. केन्ये को इसके समर्थन के लिए जनवरी, 2020 में पार्टी ने निलंबित कर दिया । एनपीएफ नगालैंड विधान सभा में विपक्षी दल है ।