असम के तिनसुकिया जिले में पांच बंगालियों की गोली मारकर हत्या किए जाने के पीछे असम पुलिस ने संदिग्ध उल्फा उग्रवादियों का हाथ बताया और उल्फा की ओर से तुरंत इसका खंडन कर दिया गया । उल्फा का मतलब युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम(प-इंडिपेंडेंट), जिसका चीफ कमांडर परेश बरूआ है। यह शांति वार्ता विरोधी है और पुलिस की पकड़ से बाहर है । यही खबर प्रचारित की जाती है । लेकिन इस संबंध में कोई सूचना कहीं से उपलब्ध नहीं हो पाती कि उल्फा के अरविंद राजखोवा नेतृत्ववाले गुट से शांति वार्ता चल रही है या नहीं । अगर चल रही है तो बात कहां अटकी है ।
परेश बरूआ गुट सिर्फ हिंसा की बदौलत ‘स्वाधीन संप्रभु असोम’ कायम करने पर अड़ा है । सुरक्षा बल यह पक्की जानकारी देने की स्थिति में नहीं हैं कि वो बांग्लादेश में है या चीन में । ऐसे समय में पांच बंगालियों की हत्या की रिपोर्ट सामने आयी है, जब असम के मूल नागरिकों की पहचान करके ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (एनआरसी) बनाने को लेकर राज्य के एनआरसी कोऑर्डिनेटर प्रतीक हजेला सुप्रीम कोर्ट को भी आश्वस्त नहीं कर पा रहे हैं । 31 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट को दावे और आपत्तियां पेश करने की तारीख 25 नवंबर से बढ़ाकर 15 दिसंबर करनी पड़ी । विदित हो कि असम से तमाम बाहरियों को निकाल बाहर करके सिर्फ मूल असमिया वाशिंदों का ‘स्वाधीन संप्रभु असोम’ गठित करने के लिए 1979-80 में असम छात्र आंदोलन शुरू हुआ और उसी आंदोलन का हिस्सा है, उल्फा ।
उल्फा शांति वार्ता अंधेरे में है । नागरिकों की पहचान को लेकर भी हिंसा का माहौल है। इससे एक नयी जातीय हिंसा उभरी है, जिसका ज्वलंत प्रमाण पांच बंगालियों की हत्या के बाद देखने को मिला । असम से ज्यादा बंगाल में इस पर हंगामा मचा हुआ है । यह जातीय हिंसा राजनीतिक रंग ले चुकी है । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममताा बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस से लेकर कांग्रेस की पश्चिम बंगाल यूनिट खास तौर से बंगालियों का कथित रूप से निशाना बनाने का आरोप लगाकर इसे राजनीतिक मुद्दा बना चुकी है । मृतकों की पहचान की जा चुकी है । घटनास्थल की सिर्फ इतनी रिपोर्ट स्पष्ट है कि हमलावर दो गुटों में आए और खड़ोनीबाड़ी गांव में घुसकर इन लोगों को घर से बाहर ले जाकर गोली मारी । उसके बाद की सारी रिपोर्ट संदिग्ध और गोलमटोल है । असम के डीजीपी कुलाधर साइकिया और अतिरिक्त डीजीपी मुकेश समेत स्थानीय पुलिस अधिकारी साफ-साफ कुछ बोलने से परहेज कर रहे हैं । दो नवंबर को घटना के दिन हत्या में संदिग्ध उल्फा(आई) का हाथ बताकर पुलिस अधिकारियों ने पल्ला झाड़ना चाहा, जैसा वे प्रायः करते हैं । लेकिन इस हत्याकांड में बात बनी नहीं । बंगाली समुदाय पुलिस की सफाई से आश्वस्त नहीं है । जब उन्हें मीडिया से पता चला कि उल्फा ने इस हत्याकांड में हाथ होने से इन्कार कर दिया, तो उन्होंने सीबीआई जांच की मांग कर डाली । अभी सीबीआई अपना ही अंदरूनी झगड़ा संभालने की स्थिति में नहीं है, जो असम निवासी बंगालियों को पता होगा । मगर ऑल असम बंगाली फेडरेशन की ओर से हत्या के विरोध में आयोजित 12 घंटे के तिनसुकिया बंद के दौरान सुरक्षा की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे फेडरेशन के सचिव विजय चंदा ने कहा - ‘हिंसा की जड़ है बंगालियां के खिलाफ सरकार पोषित नफरत, जो नागरिकता संशोधन बिल और एनआरसी से पैदा हुई है । उसका खामियाजा गरीब बेकसूर को भुगतना पड़ा ।’ 29 जुलाई को जब सुप्रीम कोर्ट की डेडलाईन के अनुसार एनआरसी का अंतिम मसौदा तैयार किया जा रहा था, उस समय गुवाहाटी से 70 किमी दूर स्थित बंगाली मुस्लिम आबादी वाले मोरीगांव में लोग उत्तेजित थे । कई परिवारों के आधे सदस्यों का नाम नागरिक रजिस्टर में शामिल नहीं किया गया। बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने हत्या के विरोध में रैलियां की, असम की भाजपा सरकार पर बरसे । तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ बियां प्रतिनिधिमंडल के साथ चार नवंबर को तिनसुकिया जाकर मृतकों के परिवारजनों से मिले । सांसद ने कहा कि इस हत्या के पीछे किसका हाथ है, यह पता लगाने तक वे चुप नहीं बैठेंगे । दीदी(ममता बनर्जी) ने राष्ट्रीय स्तर पर हिंसा भड़काने की राजनीति बताकर भाजपा शासित गुजरात में बिहारियों पर हुए हमले से जोड़ा । असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों से ज्यादा अब बिहारी और बंगाली उग्रवादियों के निशाने पर हैं । असम सरकार अगर चाहे भी तो स्थिति सामान्य कायम नहीं होने दी जाएगी ।
तीन नवंबर को हत्याकांड के विरोध में असम में आयोजित राज्यव्यापी बंद के दौरान घटना में भी सियासी राजनीति नजर आयी । बंगाली बहुल आबादी वाले बराक और ब्रहमपुत्र घाटी में घटना को कांग्रेस ने समर्थन किया, जिसमें सिर्फ बंगाली संगठनों के लोग थे । भाजपा ने हैलाकांडी में धरने को समर्थन किया । असम आंदोलन से उपजी पार्टी असोम गण परिषद भाजपा गठजोड़ में शामिल होने के बावजूद इससे अलग रही । सारे धरना, प्रदर्शनों का टोन हिंसक था ।
जनजीवन से ज्यादा पुलिस अस्तव्यस्त है । एक आर तो वार्ता विरोधी परेश बरूआ गुट के उल्फा(आई) का हत्याओं में हाथ बता दिया और दूसरी ओर वार्ता समर्थक गुट के दो उल्फा नेताओं को गिरफ्तार कर लिया । फिर उसके अगले दिन एक और को संदिग्ध उल्फा(आई) का नेता बता घटना से ‘लिंक’ जोड़कर गिरफ्तार कर लिया । जांच प्रक्रिया पर कोई पुलिस अधिकारी कुछ नहीं बोलना चाहते । उल्फा(आई) अपनी हर योजना को अंजाम देने के बाद जिम्मेदारी लेता है, क्योंकि उसे अपने समर्थकों के बीच पुलिस से ज्यादा मजबूत दिखाना है । 13 अक्टूबर को गुवाहाटी में विस्फोट की जिम्मेदारी उल्फा(आई) ने ली, जिसमें चार लोग घायल हुए । उल्फा(परेश बरूआ) ने स्थानीय टीवी चैनलों को ई-मेल करके यह भी बताया कि एनआरसी और नागरिकता(संशोधन) बिल के विरोध में विस्फोट किया गया है, जिसके जरिए सरकार गैर-असमियों को बसाना चाहती है ।
उस विस्फोट के दस दिन बाद 23 अक्टूबर को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत के दौरे पर आए चीनी गृह मंत्री झाओ केझी से बातचीत के दौरान उल्फा नेता परेश बरूआ को पकड़ने में मदद मांगी । बातचीत के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल भी मौजूद थे, जिसमें अन्य सुरक्षा मुद्दों के बीच उल्फा(आई) नेता भी आया । अगले दिन चीन ने परेश बरूआ के अपने यहां होने से इंकार कर दिया । परेश बरूआ मामले को कभी बांग्लादेश तो कभी चीन से जुड़ा सरकार बताती है । लेकिन राज्य सरकार और केंद्र सरकार स्वयं अपने राज्य के उस समाज से नहीं जुड़ी है, जिनके बीच उल्फा की पैठ है । पुलिस, सेना और अर्द्धसैनिक बल इस बिंदु पर सवालों के घेरे में है, जिनकी बदौलत असम में शासन चलता है ।
उल्फा शांति वार्ता के मध्यस्थ गुवाहाटी निवासी गणमान्य नागरिक रेवती फूकन 22 अप्रील को अपने घर के पास से रहस्यमय ढंग से लापता हो गए । उल्फा(आई) नेता परेश बरूआ के ग्रामीण सहपाठी रहे फूकन मध्यस्थता के लिए बने पीपुल्स कन्सल्टेटिव ग्रुप के महत्वपूर्ण सदस्य थे । एक महीना तक अता-पता चलने में पुलिस की रूखाई के बाद रेवती फूकन के परिवारजन सीधे सुप्रीम कोर्ट गए । जुलाई में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा, तारीख ली । उसके बाद की कोई जानकारी प्राप्त नहीं है ।
मई, 2015 में केंद्र सरकार के वार्ताकार खुफिया प्रमुख पी. सी. हलदर वार्ता समर्थक उल्फा चेयरमैन अरविंद राजखोवा को लेकर दिल्ली आए । गृह मंत्री समेत मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से उल्फा नेता मिले और कहा कि परेश बरूआ को शामिल किए बगैर वार्ता अधूरी रहेगी । राजखोवा को 2010 में बांग्लादेश से लाया गया था । मई, 2015 की मुलाकात के तीन साल बाद की कहानी सामने है । रेवती फूकन वाली घटना के बाद राजखोवा ने वार्ता से मुकरने की धमकी दी । उल्फा शांति वार्ता के बाद केंद्र सरकार ने इससे भी बड़ा झंझटिया नगा वार्ता को तीन अगस्त, 2015 समझौते के बावजूद गोलमटोल रखा हुआ है ।
इस बीच हिंसा और तनाव फैलानेवाला नागरिकता(संशोधन) बिल, 2016 का मसौदा तैयार हो गया । 23 अक्टूबर को केंद्रीय गृहमंत्री अपने चीनी काउंटरपार्ट से असम के उपद्रवी पर मदद मांग रहे थे और उसीदिन असम में नागरिकता बिल के विरोध में राज्यव्यापी बंद का आयोजन था । इसमें असम गण परिषद समेत 46 संगठन शामिल थे । संयुक्त संसदीय समिति इस विवादास्पद बिल पर विचार कर रही है, जो दिसंबर में संसद शीर्तकालीन सत्र के समय शायद रिपोर्ट दे । हिंसक छात्र आंदोलन की उपज असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल 25 मई, 2016 को पद की शपथ लेने के बाद सबसे पहले एनआरसी कार्यालय गए ।