असम के सबसे मजबूत और खूंखार उग्रवादी गुट उल्फा(युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम) की केंद्र से शांति वार्ता के एक मध्यस्थ रेबती फूकन के अचानक लापता हो जाने के बाद इतना पता चला कि उल्फा शांति वार्ता ‘जारी’ है । लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद केंद्र और राज्य सरकार यह बताने को तैयार नहीं है कि मध्यस्थ रेबती फूकन कैसे लापता हुए तथा वे कहां, किस हालत में हैं ।

इससे राज्य सरकार, केंद्र सरकार और सुरक्षा बल समेत खुफिया एजेंसियों को कोई फर्क नहीं पड़ा है । क्योंकि खुफिया एजेंसियों के जरिए ही केंद्रीय सुरक्षा बल, सेना और अर्द्धसैनिक बलों की देखरेख में नगा की तरह पेचीदी उल्फा शांति वार्ता भी चल रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि नगा शांति वार्ता के विषय में लोग यदा-कदा उड़ती खबर सुन लेते हैं कि ‘अंतिम समझौता’ हो चुका है। उल्फा शांति वार्ता चल भी रही है या नहीं, यह भी पता नहीं चलता । हिंसा और अशांति का माहौल कायम है या नहीं, इन खबरों को भी अब असम में नागरिकों की पहचान को लेकर चल रहे नए झंझटों से उपजे बवाल दबा देते हैं ।

उल्फा शांति वार्ता के एक मध्यस्थ रेबती फूकन के लापता हो जाने से उनके परिवारजन अशांत हैं । सुप्रीम कोर्ट में मामला चले जाने पर भी केंद्र सरकार और असम सरकार असहज नहीं है ।

क्योंकि उसके बावजूद रेबती फूकन का कोई अता-पता नहीं है । सुप्रीम कोर्ट के सामने जुलाई के दूसरे सप्ताह में केंद्र और राज्य सरकार को अपना पक्ष प्रस्तुत करना है । इस बात के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं कि रेबती फूकन उस समय तक मिल जाएंगे । केंद्र सरकार को अगली तारीख भले मिल जाए । सुप्रीम कोर्ट जज यूयू ललित और दीपक गुप्ता की वेकेशन बेंच ने 15 जून का केंद्र सरकार के आग्रह पर दो सप्ताह का समय दिया । जबकि सुप्रीम कोर्ट ने एक जून को ही हेबियाज कोर्पस याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया था ।

रेबती फूकन के पुत्र कौशिक ने 29 मई को सुप्रीम कोर्ट बेंच के सामने हेबियाज कॉर्पस याचिका प्रस्तुत की, जब एक महीने तक उन्हें अपने पिता के बार में पुलिस कोई सूचना देने को तैयार नहीं थी । रेबती फूकन के लापता होने और पुलिस की उपेक्षापूर्ण नीति के खिलाफ उनके पुत्र की ओर से याचिका 29 मई को वकील गीता लूथरा ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की। उस वक्त याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार करनेवाले वेकेशन जज थे - एल. नागेश्वर राव और मोहन एम. शांतानगोदर । अर्जी में सुप्रीम कोर्ट से असम सरकार समेत अधिकारियों को यह निर्देश देने का आग्रह किया गया कि रेबती फूकन को कोर्ट में प्रस्तुत करे ।

रेबती फूकन 22 अप्रील से अपने गुवाहाटी के अंबिकागिरी इलाके में स्थित आवास से लापता हैं । एक महीने तक जब पुलिस रेवती फूकन का कोई सुराग नहीं बता पायी, तब उनके पुत्र कौशिक ने लाचार होकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया । विगत एक महीने में जितनी बातें ऑन रिकार्ड और ऑफ रिकार्ड गुवाहाटी में चर्चा में रही, उससे तो रेबती फूकन का कोई सुराग मिलने की संभावना कम ही लगती है । पहली बात तो ये कि रेबती फूकन उस पीपुल्स कन्सल्टेटिव ग्रुप(पीएसजी) के महत्वपूर्ण सदस्य थे, जो उल्फा द्वारा 2005 में केंद्र सरकार से वार्ता करने के लिए गठित की गयी थी । 2011 में जब केंद्र सरकार ने उल्फा से सीधी वार्ता शुरू की तो पीएसजी भंग कर दी गयी । पीएसजी में और भी गणमान्य नागरिक थे । लेकिन उनमें रेबती फूकन अन्य से ज्यादा ‘महत्वपूर्ण’ इस माएने में थे कि उनकी उल्फा के वार्ता विरोधी स्वयंभू ‘चीफ कमांडर’ परेश बरूआ से नजदीकी दोस्ती थी । उल्फा कमांडर परेश बरूआ पर काबू पाना असम पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के लिए अभी तक संभव नहीं हो पाया है । परेश बरूआ ‘स्वाधीन संप्रभु असोम’ सिर्फ हिंसा की बदौलत हासिल करने पर कायम हैं और इसी शर्त पर वार्ता में शामिल होने को तैयार हैं, जब केंद्र सरकार यह मांग मान ले ।

रेबती फूकन के लापता होने के बाद यह बात सामने आयी कि वे परेश बरूआ के बचपन के दोस्त हैं । दोनों ही डिब्रूगढ़ जिले के एक ही गांव में साथ पले-बढ़े हैं । रेबती फूकन के पुत्र के अनुसार उनके पिता परेश बरूआ को अपने छोटे भाई की तरह मानते थे । यह बात किसी से छिपी नहीं है कि परेश बरूआ की भनक खुफिया एजेंसियों को नहीं मिल पा रही है । परेश बरूआ की स्वयंभू सेना के काडर पुलिस और सुरक्षा बलों को प्रायः कड़ी शिकस्त देते रहते हैं ।

जानकार लोगों का कहना है कि रेबती फूकन उल्फा कमांडर परेश बरूआ की केंद्र से वार्ता कराने के लिए प्रस्ताव को अंतिम रूप देने में जुटे थे । जब यह बात फैली उसी समय रेवती फूकन लापता हो गए । 22 अप्रील को रोजाना की तरह सवेरे वे टहलने निकले, पर वापस नहीं लौटे ।

उनके पुत्र कौशिक ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी अर्जी में बताया है कि ‘रेबती फूकन या तो इंटेलिजेंस ब्यूरो, तॅ(रिसर्च एंड एनेलिसिस विंग) सेना के खुफिया ब्यूरो अथवा छप(राष्ट्रीय जांच ऐजेंसी) की गिरफ्त में हैं, जिनमें आपस में उल्फा ऑपरेशन को लेकर मतभेद हैं ।’ उतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया गया - ‘याचिकाकर्ता के पिता 1991 से प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ केंद्र और उल्फा से वार्ता के क्रम में सीधे तौर पर जुड़े रहे हैं ताकि असम में शांति स्थापित की जा सके । 2016 से रेबती फूकन खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर विभिन्न मिशनों के लिए काम कर रहे हैं ।’

कौशिक ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उन्हें 20 अप्रील को जानकारी मिली कि रेबती फूकन की एक रिटायर ब्यूरोक्रेट और असम के एक वकील के साथ ‘गुप्त बैठक’ हुई । ‘बैठक में परेश बरूआ के साथ वार्ता शुरू करने के नए प्रस्ताव पर विचार हुआ, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सौंपा जाना था । 22 अप्रील की सुबह से रेबती फूकन का कोई अता-पता नहीं है ।’

गुवाहाटी में थाने में रेबती फूकन की गुमशुदगी का मामला दर्ज कराया गया । कौशिक के अनुसार अफसोस इस बात का है कि पुलिस को जांच में कुछ पता नहीं चला है और उनके पास सुप्रीम कोर्ट आने के सिवा, कोई दूसरा चारा नहीं था । कौशिक को एक संदिग्ध जानकारी 4 मई को मिली कि एक सीआरपीएफ डॉक्टर ने किसी पत्रकार को संदेश भेजा कि फूकन का शिलांग सीआरपी कैंप में वे इलाज कर रहे हैं और वे ‘सुरक्षित’ हैं ।

असम सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वे इस मामले में कुछ ‘गोपनीय कागजात’ कोर्ट में पेश करना चाहते हैं । जबकि केंद्र सरकार ने हलफनामा दायर करने के लिए दो हफ्ते का समय मांगा । सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय सरकार को भी नोटिस जारी किया है और उसे भी दो हफ्ते में जवाब देना है ।

विदित हो कि उल्फा वार्ता चलाने के लिए केंद्र की ओर से नियुक्त मध्यस्थ इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख आर. एस. पांडे हैं । अभी रेबती फूकन प्रकरण सामने आने के बाद पता चला कि इस ‘मध्यस्थ’ के सहयोग से उल्फा के परेश बरूआ गुट को बातचीत के टेबुल पर लाने के लिए फूकन ने नए प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया था । इस संबंध में रेबती फूकन ने अपने बचपन के दोस्त बरूआ से बात की थी । याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट पीठ के सामने यह बात रखी है, जिसमें परेश बरूआ के हवाले से छपी खबरों का भी जिक्र किया गया है । इसलिए रेबती फूकन खुफिया एजेंसियों की हिरासत में हो सकते हैं ।

उल्फा वार्ता तो 20 वर्षों से चल रही है और कांग्रेस शासनकाल में कुछ-कुछ पता चल जाता था । 2014 में भाजपा गठजोड़ सरकार बनने के बाद वार्ताकार खुफिया प्रमुख बदल दिए गए । आर. एस. पांडे से पहले पी. सी. हल्दर वार्ता चला रहे थे ।

2009 के दिसंबर में कांग्रेस सरकार ने उल्फा चेयरमैन अरविंद राजखोवा का भारत लाने के लिए बांग्लादेश पर दबाव बनाया । राजखोवा और सह-चेयरमैन अनूप चेतिया को गुवाहाटी लाकर गिरफ्तार करके जमानत पर वार्ता के लिए रिहा किया गया । लेकिन वार्ता 2011 में चुनाव के समय शुरू हुई । परेश बरुआ बांग्लादेश अड्डा से गायब हो गए और दूसरा गुट उल्फा(स्वाधीन) बना लिया । अभी तक अरविंद राजखोवा से वार्ता का भी कोई नतीजा सामने नहीं आया है । उल्फा को खतम करने के सेना के तमाम ‘ऑपरेशन’ के बावजूद उल्फा का अस्तित्व कायम है ।

परेश बरूआ तो सभी बाहरी लोगों को निकाल बाहर करके सिर्फ असमियों के लिए ‘स्वाधीन असोम’ बनाने पर अड़े हैं । भाजपा ने 2016 में सत्ता में आने के बाद जो नागरिकता कानून बनाया, उससे सभी उग्रवादी भड़क उठे हैं । अरविंद राजखोवा ने शांति वार्ता से मुकरने की धमकी दे दी है। उनका परेश बरूआ से मतभेद नहीं है । क्योंकि उल्फा सेना के ‘चीफ कमांडर’ परेश बरूआ ही थे । इसी बीच रेबती फूकन के लापता होने से पुरानी यादें ताजा हो गयी हैं कि केंद्र सरकार वैसा ‘मध्यस्थ’ चाहती है जो उल्फा के बागी नेताओं से नरमी न बरतें । ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात असमिया लेखिका इंदिरा गोस्वामी भी पीपुल्स कन्सल्टेटिव ग्रुप की सदस्य थी । उनके जरिए 2005 में केंद्र सरकार ने वार्ता शुरू तो की । मगर खुफिया रिपोर्ट पर उल्फा से ‘मिलीभगत’ का आरोप लगाकर इंदिरा गोस्वामी की बात को तवज्जो नहीं दी । इंदिरा गोस्वामी की तो दिंसबर, 2011 में स्वाभाविक मौत हुई । मगर रेबती फूकन के विषय में कुछ कहना कठिन है । असम सरकार को जा ‘गोपनीय दस्तावेज’ सुप्रीम कोर्ट में पेश करना है, उसमें रेबती फूकन के परेश बरूआ से अहम खुफिया सूचनाएं साझा करने की बात हो सकती है ।