भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को 'बेहतर' बनाने के सारे दावे खोखले साबित हो रहे हैं, क्योंकि इसकी बुनियाद नकली दवाओं पर टिकी है, जो बाजार में खुलेआम सबसे ज्यादा बिकती हैं। दवा बनाने वाली बड़ी कंपनियों, बड़े डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत के बगैर ऐसा संभव नहीं है। हर साल बजट में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की ओर से इतने रुपये स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए आबंटित करने का प्रचार किया जाता है, जिसमें सबसे ज्यादा देहाती इलाकों में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने तथा जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर बल दिया जाता है। लेकिन इस फंड का उपयोग आम आदमी से ज्यादा विभागीय अधिकारी-कर्मचारी करते हैं। सरकार वैसे माफियाओं पर शिकंजा कसने में कमजोर साबित हो रही है, जो मरीज का इलाज नकली दवाएं खिलाकर करने का इंतजाम लगाते हैं।
सरकार जनता के करों के पैसे से स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने की योजना बनाती है, लेकिन सरकार के पास इस बात का जवाब नहीं है कि जब अस्पताल में एक्सपाइरी डेट वाली नकली दवाएं मिलेंगी, एक ही सिरिंज कई मरीजों के काम आ जाएगी, तो जनता का पैसा आखिर कहां जा रहा है? एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक नकली दवाओं का जाल बाजार में इस तरह बिछा है कि पढ़े-लिखे मरीज भी चक्कर में आ जाते हैं। उनके लिए असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 20 फीसदी से ज्यादा नकली दवाएं ही बिक रही हैं, जिनके सेवन से मरीज की जान बचेगी या जाएगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
इनमें जीवन रक्षक दवाओं की संख्या ज्यादा है, क्योंकि ऐसी दवाएं महंगी हैं, जिससे दवा बनाने वाली कंपनियों को मरीज की जेब से मोटी रकम निकलवाने में आसानी होती है। फिर कंपनियों को भी तो मरीज की जान खतरे में डालने वाली 'जीवन रक्षक' दवाओं से प्राप्त माल उन स्थानों पर पहुंचाना होता है, जहां से स्वास्थ्य सेवा के नाम पर मौत का व्यापार करने की खुली छूट मिली हुई है। भारत में 4,000 करोड़ रुपये का नकली दवाओं का बाजार फल-फूल रहा है। 2005 में यह आंकड़ा 3,000 करोड़ का था। यह इस बात का सबूत है कि यह धंधा कितनी तेजी से मुनाफे की ओर बढ़ रहा है। ऐसी दवाएं सबसे ज्यादा सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को खिलाई जाती हैं और वे भी उन्हें खरीदनी पड़ती हैं। गांवों के अस्पतालों में तो प्रायः मरीजों को डॉक्टरों के दर्शन कम ही होते हैं। सरकारी अस्पताल की शरण में ज्यादातर गरीब मरीज जाते हैं, जिन्हें कौन दवा किस दुकान में मिलेगी, यह अस्पताल के कर्मचारी बताते हैं।
भाजपा गठबंधन सरकार की स्वास्थ्य मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज को मरीजों के लिए दर्द था, इसलिए उन्होंने ऐसे धंधे को रोकने के लिए कड़े कानून बनाने का निर्णय किया। उनके प्रस्तावित विधेयक के मसविदे में नकली दवा बनाने और बेचने वालों के लिए मौत की सजा, और जुर्माने के रूप में 10 लाख या जितने रुपये की नकली दवा बेचने की बात सामने आएगी, उसकी तिगुनी रकम वसूली का प्रावधान था। सुषमा स्वराज के ही शब्दों में, 'यह सामूहिक हत्या है, जो सिर्फ मुनाफा कमाने के लिए की जा रही है, जिसके दोषियों के लिए मौत की सजा ही न्यायोचित है।' उन्होंने भी भगीरथ प्लेस का नाम नहीं लिया, सिर्फ उस ओर इशारा किया। दिल्ली का भगीरथ प्लेस नकली दवाएं बनाने-बेचने वाले देश के गिने-चुने बड़े अड्डों में से एक है।
बहरहाल, सुषमा स्वराज का प्रस्ताव अमल में नहीं आ पाया। क्योंकि 2004 में उन्होंने विधेयक का मसविदा तैयार किया और 2005 में उनकी सरकार चली गई। वर्तमान कांग्रेस गठबंधन सरकार का आलम यह है कि इसके स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने पहले तो संशोधन 'आवश्यक' मानते हुए सारे कड़े दंड प्रावधान हटा दिए और फिर मसविदे को ठंडे बस्ते में डाल दिया। हां, नकली दवाओं के बढ़ते व्यापार से उत्पन्न 'गंभीर' स्थिति पर विचार-विमर्श वे कभी-कभार कर लेते हैं, लेकिन इस व्यापार में शामिल माफियाओं को कानून के दायरे में लाने के लिए विधेयक संसद में लाना जरूरी नहीं समझते। इस संबंध में किसी सवाल का जवाब भी रामदास टाल देते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल के तीन साल पूरा होने पर जिन 'उपलब्धियों' का जिक्र किया, उनमें स्वास्थ्य सेवाएं 'बेहतर' बनाने के उपाय भी शामिल थे।
विश्व बैंक के साथ-साथ भारत सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट में भी कहा गया है कि भारत में इस्तेमाल की जाने वाली 65 प्रतिशत से ज्यादा सुइयां असुरक्षित हैं। इस देश में बच्चों और महिलाओं की मृत्यु दर यों भी कई देशों के मुकाबले ज्यादा है, जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है। उनमें रोंगटे सिहराने वाला तथ्य यह है कि एक करोड़ 30 लाख से अधिक बच्चे हर साल एक ही सुई के दुबारा-तिबारा इस्तेमाल होने से मरते हैं। भारत सरकार के स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक डॉ. आर.के. श्रीवास्तव ने इस बात से इनकार नहीं किया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के महासचिव डॉ. एस.एन. मिश्र का कहना है कि एक सुई का दुबारा इस्तेमाल मरीज की जान के साथ खिलवाड़ है, क्योंकि यह एचआईवी-एड्स समेत कई असाध्य बीमारियों को न्योता देता है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रति वर्ष पांच अरब सुइयां लगाई जाती हैं, जबकि भारत में मात्र डेढ़ अरब सुइयां बनती हैं। इससे अनुमान लग जाता है कि एक सुई का इस्तेमाल कितनी बार, कितने मरीजों के लिए किया जाता होगा। सारे स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि सबसे ज्यादा इन्फेक्शन सुइयों से होता है। तभी तो एक सुई का दुबारा इस्तेमाल होने से इन्फेक्शन का आंकड़ा दो करोड़ को पार कर गया है। भारत में दवा उद्योग का कारोबार 20,000 करोड़ का है और जहरीली नकली दवाएं निर्यात करने के लिए भारत दुनिया भर में बदनाम है, जिससे यह कारोबार तेजी से आगे बढ़ रहा है।