लोकसभा से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र(एनसीटी) दिल्ली सरकार(संशोधन) बिल, 2021 पास हो गया । इससे दिल्ली की निर्वाचित सरकार के अधिकार समाप्त हो गए और दो तिहाई से ज्यादा बहुमत वाले जनादेश से बनी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र(एनसीटी) सरकार की हैसियत ‘प्रशासक’/‘सरकार’ उपराज्यपाल के निर्णयों पर मुहर लगानेवाली हो गयी ।

दिल्ली के आम आदमी पार्टी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल विरोध करते रह गए । लोकसभा में आम आदमी पार्टी समेत समूचे विपक्ष ने विरोध किया । लेकिन उसके बावजूद भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ (एनडीए) सरकार ने यह बिल पास करा लिया । प्रचंड जनादेश से दूसरी बार दिल्ली में सत्ता में आनेवाली आम आदमी पार्टी सरकार की लगातार एनसीटी उपराज्यपाल(‘प्रशासक’) से ठनी रही । ठनने का असली कारण उपराज्यपाल और निर्वाचित सरकार के अधिकारों को लेकर टकराव था । मामला 2018 में सुप्रीम कोर्ट में गया और पांच जजों की संविधान पीठ के फैसले के बावजूद ‘अधिकार’ का पचड़ा सुलझ नहीं पाया ।

दिल्ली विधान सभा के दो चुनावों में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए दो-दो बार भाजपा की करारी हार ने आम आदमी पार्टी के जनादेश को उपराज्यपाल के नियंत्रण में रखने के उपाय लगा दिए । एनसीटी दिल्ली सरकार एक्ट, 1991 में संशोधन करके इस हफ्ते जो बिल लोकसभा से पास कराया गया है, उसके एवज में केंद्र सरकार के तर्क दिग्भ्रमित करनेवाले हैं ।

एनसीटी दिल्ली सरकार(संशोधन) बिल, 2021 पास होने के दिन 22 मार्च को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने अपनी ‘सफाई’ में कहा कि ‘यह टेकनीकल बिल है, राजनीति से प्रेरित बिल नहीं है ।’ इस संशोधन बिल में 1991 के एनसीटी, दिल्ली सरकार एक्ट के चार सेक्शनों को संशोधित करके उसकी नयी परिभाषा ‘सरकार’ शब्द जोड़कर तय कर दी गयी । ‘सरकार’ का तात्पर्य केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के अनुसार रोजमर्रे के दिल्ली के कामकाज से है, जो 1991 के एक्ट में टेकनीकल तौर पर स्पष्ट नहीं था । 23 मार्च को राज्यसभा में रखने के समय भी किशन रेड्डी ने वही बात दोहरायी । अब नयी संशोधित व्यवस्था को लेकर जो दिग्भ्रम की स्थिति ‘सरकार’ शब्द जोड़ने से पैदा हुई है, उसके आगे निर्वाचित सरकार सिर्फ उपराज्यपाल के आदेश के अनुसार चलने को बाध्य होगी । विधान सभा में कोई भी बिल उपराज्यपाल की पूर्वानुमति के बगैर पेश ही नहीं किया जा सकता । अर्थात् दिल्ली विधान सभा जो भी एक्ट बनाएगी, उसका मतलब होगा ‘सरकार’ यानी कि उपराज्यपाल ।

केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार ने उपराज्यपाल पद को पहले ‘प्रशासक’ बताया और फिर दिल्ली के लिए ‘सरकार’ शब्द का इस्तेमाल करके नयी परिभाषा तय कर दी । दिल्ली को राज्य का दर्जा देने की मांग कांग्रेस और भाजपा दोनों ने उठायी थी । दिवंगत कांग्रेस नेता शीला दीक्षित दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री बनी और जब केंद्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी तब भी दिल्ली को राज्य का दर्जा देने की मांग पर अड़ी रही । भाजपा भी इस मुद्दे पर चुनाव जीती है । लेकिन आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को पछाड़ दिया ।

लोकसभा में यह बिल 15 मार्च को पेश किया गया, उस दिन दिल्ली के मुख्यमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल समेत जंतर-मंतर पर धरना दिया । 2019 के अंत में नागरिकता संशोधन बिल के विरोध में दिल्ली के शाहीनबाग में लंबे समय तक चले धरना को असफल करने की भाजपा नेताओं की कोशिश का जवाब फरवरी, 2020 में विधान सभा चुनाव में जनता ने दिया । आम आदमी पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीती और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे ‘स्टार प्रचारक’ के इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के बावजूद भाजपा मात्र 8 सीटें जी पायी । नरेंद्र मोदी ने 2015 की 8 सीटों में इजाफा करके पार्टी को 2020 में 8 तक पहुंचाया ।

इस आलोक में 1991 एक्ट की कथित ‘टेकनीकल द्विविधा’ दूर करने के लिए लाए गए एनसीटी दिल्ली सरकार( संशोधन) बिल पास होने के दिन आम आदमी पार्टी के लोकसभा सदस्य भगवंत मान का विरोध में दिया गया यह बयान समझ में आता है - ‘भाजपा दिल्ली में 22-23 साल से सत्ता से बाहर है । हमने तकरीबन 90 प्रतिशत सीटें जीती है । भाजपा हार स्वीकार नहीं करना चाहती । ‘हाल में दिल्ली नगर निगम चुनाव में भो भाजपा बुरी तरह हारी ।’ कांग्रेस के मनीष तिवारी ने भी संवैधानिक मसला उठाया और धारा 239 ए ए पर फोकस किया, जो एनसीटी से जुड़ा है । मनीष तिवारी ने कहा कि धारा 239 ए ए में संशोधन करके भाजपा सरकार ने एक साथ दिल्ली सरकार को प्राप्त जनादेश और सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फँसले को नकारा । लेकिन भाजपा सदस्य मीनाक्षी लेखी ने जो बात उपराज्यपाल को ‘सुपर पावर’ बनाने के अपनी सरकार के प्रयास के समर्थन में कही वो गृह राज्य मंत्री के ‘सरकार’ और ‘टेकनीकल’ से भी ज्यादा दिग्भ्रम पैदा करनेवाली है । मीनाक्षी लेखी ने कहा - ‘उपराज्यपाल प्रशासक हैं, वो राज्यपाल नहीं हैं । उपराज्यपाल के पास राज्यपाल से ज्यादा पावर है । वे राज्यपालों की तरह मंत्रिमंडल के सलाह और सहयोग से बंधे नहीं हैं । दिल्ली के उपराज्यपाल के पास ऐसी कोई बाध्यता नहीं है ।’ गत फरवरी में भाजपा ने दल-बदल करवाकर पुडुचेरी की कांग्रेस सरकार को अल्मत में ला दिया । सरकार गिराने के आरोपों का ‘जवाब’ देने के लिए पुडुचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी को हटा दिया । पूरे पांच साल तक किरण बेदी और पुडुचेरी के मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी के बीच रोजमरें के कामकाज से लेकर हर बात पर तनातनी चली । फरवरी, 2021 में जब पांच सदस्यों के साथ पुडुचेरी विधान सभा चुनाव का भी नंबर आया, तब किरण बेदी को पहले उपराज्यपाल पद से हटाया गया और फिर वी. नारायणसामी को इस्तीफा देने की नौबत लाकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया । उसके बाद मार्च में एनडीए सरकार के निशाने पर आ गए दिल्ली के मुख्यमंत्री, जिनके धारा 239 ए ए के अंतर्गत संविधान से प्राप्त अधिकार उपराज्यपाल के हाथ में देकर ‘टेकनीकल द्विविधा’ का समापन कर दिया गया । जुलाई, 2018 में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षताा वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच ‘पावर’ की उठापटक मामले में यों फैसला सुनाया - ‘दिल्ली के उपराज्यपाल की हैसियत किसी राज्य के राज्यपाल वाली नहीं है । सिर्फ एक सीमित अर्थों में प्रशासक हैं, जो उपराज्यपाल पदनाम से काम कर रहे हैं । संविधान की धारा 239 ए ए के अनुसार यह स्पष्ट बताया जाता है कि उपराज्यपाल से पूर्वानुमानति लेना निर्वाचित सरकार के जनप्रतिनिधित्व और लोकतंत्र के आदर्शों को नकारना है । दिल्ली सरकार को भी ध्यान में रखना चाहिए कि दिल्ली राज्य नहीं है ।’ इसके बाद अगर भाजपा सदस्य मीनाक्षी लेखी का सदन में दिया गया ‘प्रशासक’ वाले बयान पर गौर किया जाए तो ‘टेकनीकल द्विविधा’ और बढ़ जाती है । 2019 में दिल्ली के कानून सचिव ने एक अंदरूनी मेमो में लिखा कि निर्वाचित सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इस्तेमाल अपने निर्णयों पर उपराज्यपाल को अंधेरे में रखने के लिए नहीं कर सकती । सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि उपराज्यपाल को ‘मैकेनिकल’ तरीके से काम नहीं करना चाहिए कि अपना दिमाग लगाए बिना मंत्रिमंडल के हर फैसले को राष्ट्रपति के पास भेजें । ताजा संशोधन एक्ट, 2021 में ‘टेकनीकल’ और सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ‘मैकेनिकल’ बात है । दोनों ही उपराज्यपाल से जुड़ा है । दिल्ली के अधिकांश मतदाता साक्षर और प्रबद्ध हैं । वे इसका क्या मतलब निकालें । जी. किशन रेड्डी ने बिल पास होने के दिन लोकसभा में कहा - ‘इससे दिल्ली की प्रशासनिक क्षमता बढ़ेगी और विधायिका तथा कार्यपालिका के अच्छे रिश्ते सुनिश्चित होंगे जब कार्यपालिका के पास विधायिका को नियंत्रण में रखने के अधिकार नहीं थे, तब तो संबंध हमेशा बिगड़ा ही रहा । अब उपराज्यपाल को ज्यादा पावर देने के बाद क्या होगा. इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है । इस संशोधन एक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने से अरविंद केजरीवाल कतई नहीं चूकेंगे । वो चुनौती आम आदमी पार्टी की ओर से मानी जाएगी, दिल्ली सरकार की नहीं । क्योंकि ‘सरकार’ का मतलब अब ‘प्रशासक’ उपराज्यपाल हो गया ।

1993 में दिल्ली के भाजपा मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना ने जोरदार आवाज में यह मामला उठाया था कि कितनी कम शक्तियां दिल्ली की निर्वाचित सरकार के पास हैं । पूर्ण राज्य का अधिकार लेने के वायदे पर भाजपा के साहिब सिंह वार्मा भी मुख्यमंत्री बने । सुषमा स्वराज ने दिल्ली की मुख्यमंत्री बनकर चुनाव में दिल्ली के अधिकार का मुद्दा गोल किया और चुनाव हार गयीं ।

वे सभी स्वर्ग सिधार चुके हैं । अरविंद केजरीवाल के हाथों लगातार पराजय झेल रही भाजपा ने अपनी खुंदक दिल्ली की स्वायत्तता खतम करके ही निकाली ।

दिल्ली और पुडुचेरी से जुड़ी भाजपा की कुछ ‘टेकनीकल’ बातें पोलिटिकल भी हैं । पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने 2015 में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ उतारा । किरण बेदी अरविंद केजरीवाल को उनकी सीट से नहीं हरा पायी । उसके सालभर बाद किरण बेदी को पुडुचेरी का उपराज्यपाल बना दिया गया । पुडुचेरी की कांग्रेस सरकार से किरण बेदी की ऐसी ठनी कि फरवरी, 2019 में मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी ने अपने सभी मंत्रियों और विधायकों के साथ उपराज्यपाल आवास के बाहर फुटपाथ पर कई रातें गुजारी । दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया दोनों ही नारायणसामी के समर्थन में पुडुचेरी जाकर उनके साथ धरने पर बैठे । मद्रास हाईकोर्ट ने 30/04/2019 को फैसला दिया कि उपराज्यपाल पुडुचेरी की निर्वाचित सरकार के रोजमर्रे के राज-काज में दखल नहीं दे सकती । राजकाज और निर्वाचित सरकार का भाजपाई अर्थ ‘टेकनीकल’ है ।