प्राय: चुनाव के समय सुर्खियों में आनेवाला 'पेड न्यूज' अभी विधान सभा चुनावों के दौरान फिर काफी चर्चा में रहा । मगर इस बार की चर्चा पहले से अलग और नयी थी ।
हमेशा पेड न्यूज को लेकर बयान मुख्य चुनाव आयुक्त के संवाददाता सम्मेलनों से निकलता है । अपने पूर्ववर्तियों की तरह वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त डा. नसीम जैदी ने मार्च के पहले सप्ताह में पांच विधान सभा चुनावों के मतदान कार्यक्रम की घोषणा के समय और उसके बाद भी पेड न्यूज के खिलाफ नाराजगी जतायी । लेकिन नसीम जैदी मतदान तैयारियों का जायजा लेने और बीच में भी समीक्षा बैठकें करने चुनाव वाले राज्यों में जब भी गए, संवाददाताओं से बातचीत के क्रम में उन्होंने पेड न्यूज का जिक्र हर बैठक में नहीं किया । जबकि उनके पूर्ववर्ती एस. वाई कुरैशी हमेशा करते थे और वी. एस. संपत ने भी वैसा किया ।
अबकी पहली बार नजारा बदला देखने को मिला, जब संसद में 'पेड न्यूज' को लेकर हंगामा हुआ । बजट सत्र के दूसरे चरण की समाप्ति के समय जितने मामले उठे, उनमें एकमात्र पेड न्यूज पर ही अमूमन सभी पार्टियों का एक जैसा सुर था । दलीय राजनीतिक मतभेद से ऊपर उठकर राज्य सभा सदस्यों ने इस मामले पर अपनी चिंता जतायी । इसकी आवाज लोकसभा में नहीं गूंजी और सरकार की ओर से जवाब भी राज्य सभा में सदन के नेता सूचना और प्रसारण मंत्री अरूण जेटली ने दिया ।
चर्चा की शुरूआत दिल्ली निवासी भाजपा सदस्य विजय गोयल की ओर से हुई और कई वरिष्ठ सदस्यों ने साथ दिया । जद (यू) के शरद यादव, सीपीएम के सीताराम येचुरी, कांग्रेस के आनंद शर्मा, तृणमूल कांग्रेस के सुखेंदु शेखर रॉय समेत कई सदस्य पेड न्यूज को मीडिया पर काला धब्बा, पीत पत्रकारिता बताते हुए कई तरह से इसके खिलाफ बयान रिकार्ड कराए ।
नौ मई को राज्य सभा का ज्यादा समय पेड न्यूज में गया । उपसभापति पी. जे. कुरियन ने भी सदस्यों की चिंता पर सहमति जतायी । पूर्वोत्तर के एक भी सांसद ने आवाज नहीं उठायी, जहां से पेड न्यूज की शिकायत चुनाव आयोग को नहीं मिलती ।
पेड न्यूज के आरोप को गलत नहीं कहा जा सकता । कुछ ही लोगों के चलते सही, मीडिया की बदनामी तो हुई है । चुनाव आयोग इसके खिलाफ कार्रवाई का अधिकार सरकार से काफी समय से मांग रहा है । सरकारें पहले भी अपनी लाचारी बता चुकी है । वित्त मंत्री अरूण जेटली ने इसे दुहराया और कहा कि पेड न्यूज पर अंकुश लगाने की कोई कोशिश अभिव्यक्ति की आजादी पर शिकंजे के रूप में देखा जाएगा । उन्होंने भी मीडिया को काफी बुरा-भला कहा ।
जो कुछ भी हुआ, यह सर्वथा निंदनीय है, ऐसा होना नहीं चाहिए और हमें स्वयं ही इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने का उपाय सोचना होगा । चुनाव आयोग के बयानों के बाद दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने संसद में सवाल उठने से एक दिन पहले 8 मई को ही पेड न्यूज पर नजर रखने के लिए एक पैनल बनाया । पांचों राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को प्रेस क्लब की ओर से लिखा गया कि पैनल सदस्यों को मतदान और रिपोर्टिंग वाले स्थानों पर जाने तथा तथ्यों का पता लगाने में सहयोग करें । प्रेस क्लब ने इसके लिए पांच उप-समिति बनायी, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार शामिल किए गए और उन्हें अखबारों में पेड न्यूज की जांच का जिम्मा सौंपा गया ।
चलिए, यह तो हुई पेड न्यूज की शिकायत और उसके निवारण की बात । विधान सभा चुनाव संपन्न हो गया । किसी राज्य से पेड न्यूज की शिकायत मिलने की रिपोर्ट नहीं है । न तो इस पर चुनाव आयोग ने कुछ बोला है, न ही प्रेस क्लब पैनल ।
लेकिन सूचना व प्रसारण मंत्री अरूण जेटली ने मतदान समाप्त होने के बाद भी पेड न्यूज पर गुस्से का इजहार किया । लेकिन उनका गुस्सा दिल्ली और मुख्य रूप से आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर केंद्रित था । अखबारों में पूरे-पूरे पृष्ठ के विज्ञापन देकर अरविंद केजरीवाल के प्रचार-प्रसार अभियान पर अरूण जेटली का बयान टिका था, जो उन्होंने स्पष्ट कहा । जेटली ने इसे विज्ञापन के नाम पर रिश्वतखोरी कहा ।
इसका असली कारण था, दिल्ली नगर निगम का चुनाव । यही असंतोष दिल्ली के भाजपा नेता विजय गोयल ने राज्य सभा में पेड न्यूज के रूप में जाहिर किया । विजय गोयल के निशाने पर वास्तव में आम आदमी पार्टी सरकार थी और उन्होंने अपनी चर्चा की शुरूआत में ही दिल्ली में सम-विषम स्कीम समेत बिजली, पानी आपूर्ति योजना के प्रचार-प्रसार का जिक्र किया । आम आदमी पार्टी सरकार ने अपनी उपलब्धियों का लगातार हर अखबार में पूरे पृष्ठ के विज्ञापन के जरिए नगर निगम चुनाव को ध्यान में रखकर किया । आम आदमी पार्टी ने पहली बार नगर निगम चुनाव में भी भाजपा को चुनौती दी और विज्ञापन का असर दिखा दिया । दस साल से निगम में काबिज भाजपा सिर्फ तीन वार्डों में सिमट गयी । 13 वार्डों के लिए उपचुनाव हुए, जिसमें आम आदमी पार्टी ने सबसे ज्यादा पांच सीटें जीती । कांग्रेस ने भी चार सीटें जीतकर चौंका दिया, जिसे लोकसभा और दिल्ली विधान सभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी ।
17 मई को दिल्ली नगर निगम का चुनाव परिणाम आया, जिस दिन अरूण जेटली ने पेड न्यूज की बात आम आदमी पार्टी के हवाले से की । निशाने पर अखबार नहीं, दिल्ली के मुख्यमंत्री थे ।
संसद सदस्यों ने अखबारों में राजनीतिक विज्ञापन को रिश्वतखोरी बताया, जो हर पार्टी की सरकार केंद्र और राज्यों में करती है । कांग्रेस समेत अन्य सदस्यों ने माना कि 'हम सब इसके भुक्तभोगी हैं ।' लेकिन बड़े कमाल की बात है कि उसी समय चुनाव वाले राज्यों से चुनाव आयोग द्वारा नोटों की गड्डियां बरामद होने की खबरें आ रही थी । वोटर को पैसे देकर वोट खरीदने में तमिलनाडु नंबर वन पर था । सभी पार्टियों के उम्मीदवारों में पेड वोट प्राप्त करने के लिए 'प्री पेड' वोटर बनाने की होड़ मची थी ।
मई के पहले सप्ताह में जब संसद सत्र हंगामेदार चल रहा था, उस समय चुनाव वाले राज्यों से लगभग रोजाना ही पेड वोट के लिए पैसे बरामद हो रहे थे । किसी पार्टी के सदस्य ने इस मामले को संसद में उठाने लायक नहीं समझा । 15 मई को चुनाव आयोग ने बताया कि तमिलनाडु, असम, पश्चिम बंगाल, केरल और पुड्डुचेरी से 178 करोड़ रूपये पकड़े गए जो वोटरों को बांटने के लिए लाए गए थे । तमिलनाडु से ही चुनाव आयोग के उड़न दस्ते ने 112.89 करोड़ रूपये बरामद किए । तमिलनाडु के एक भी सांसद पेड न्यूज पर नहीं बोले ।
2009 लोकसभा चुनाव के समय से पेड न्यूज और वोटरों को पैसे देने की खबर चुनाव आयोग के जरिए अखबारों में आ रही है । उसके बाद से जितने विधान सभा चुनाव हुए, सब में पेड न्यूज उछली । लेकिन 'पेड वोट' की बात सबसे पहले और सबसे ज्यादा तमिलनाडु से आयी । पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालास्वामी ने ही सर्वप्रथम जानकारी दी । अभी भी उन्होंने यह बात दुहराई है कि देश में सबसे ज्यादा भ्रष्ट तमिलनाडु के वोटर हैं और वोटर को रिश्वतखोर बनाने के बढ़ते चलन पर चिंता जतायी ।
यह पहला अवसर है, जब संसद में पेड न्यूज पर सवाल उठा और जवाब में सत्र समाप्ति के बाद अरूण जेटली सेंसरशिप का सुझाव टाल गए । यह बात सही है कि सरकार चाहकर भी पेड न्यूज पर कुछ नहीं कर सकती । वही राजनीतिक पार्टियां नहीं करने देंगी, जिन्होंने अपने मतलब के हिसाब से सवाल उठाया । क्योंकि पहली बात तो ये कि पेड न्यूज का पता लगाना मुश्किल है । कारण ये है कि ऐसी खबरें सीमित संख्या में होती हैं । अगर सारे न्यूज पेड हों तो फिर राजनीतिक दलों की रोजाना ब्रीफिंग में कोई संवाददाता जाएं ही क्यों । ऐसे विज्ञापन भी कम मिलेंगे जो खबर की तरह तैयार किए गए हों । यह काम राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए करवाते हैं ।
चुनाव आयोग की अगर मानें तो इससे वोटरों को प्रभावित किया जाता है, इसलिए चुनाव होने तक ऐसे विज्ञापनों पर रोक लग जाती है । विजय गोयल सदन में जिसे 'एडवर्टोरियल' (उपलब्धियों का बखान करनेवाले एडिटोरियल-संपादकीय) बता रहे थे, उसका और रिपोर्ट का अगर असर होता तो वोटरों को पैसे देने की जरूरत क्यों पड़ती ।
दलों को पता है कि वोटर खबर और विज्ञापन से नहीं पटता । वोटरों को रिश्वतखोर बनानेवाले राजनीतिक दलों को पत्रकारों की रिश्वतखोरी की आवाज संसद में उठाना शोभा नहीं देता । संसद के अंदर ‘वोट फॉर नोट' और पैसे लेकर सवाल पूछने का धंधा हो चुका है । पेड न्यूज पर सेंसर तो संभव है, मगर ‘पेड वोट' का क्या होगा, जिसका असर सीधा होता है ।