प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 'पेड न्यूज' के बारे में कहा कि इस संबंध में मीडिया को स्वयं विचार करना चाहिए और इसे रोकने के उपाय निकालने चाहिए । लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त वी. एस. संपत ने काफी कड़ा रवैया अपनाया है । उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि ऐसे आरोपी मीडियाकर्मी/मीडिया संस्थान के लिए दंड का प्रावधान जरूरी है और इसके लिए 1961 के जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन किया जाए ।

प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू भी 'पेड न्यूज' की लगातार आ रही शिकायतों से परेशान हैं । इसे निबटाना उनके लिए कठिन हो रहा है, चेतावनियां भी असरदार साबित नहीं हो रही हैं ।

कर्नाटक विधान सभा चुनाव का प्रचार अभियान लगातार जोर पकड़ता जा रहा है और उसी हिसाब से 'पेड न्यूज' की शिकायतें भी जोर-शोर से आ रही हैं । प्रधानमंत्री के लिए भले ये चिंता का विषय न हो, लेकिन चुनाव आयोग के लिए तो है । क्योंकि इस संवैधानिक संस्था का काम चुनाव से सम्बन्धित सारे मामलों पर नजर रखना है ।

यह पहला अवसर है, जब चुनाव आयोग ने 'पेड न्यूज' की शिकायतों पर मीडियाकर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और उसके लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की मांग सरकार से की है । क्योंकि यह पहला विधान सभा चुनाव (कर्नाटक) है, जहां से इतने बड़े पैमाने पर पेड न्यूज की शिकायतें आ रही हैं । शिकायत करनेवालों में जागरूक मतदाता, सूचना अधिकार कार्यकर्ता हैं । इसके अलावे राजनीतिज्ञ भी शामिल हैं, जिनकी मर्जी के मुताबिक छपने/प्रसारित होनेवाली खबरों का नाम है - 'पेड न्यूज'

इस हफ्ते जर्मनी की यात्रा से लौटने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चुनाव प्रचार के लिए कर्नाटक दौरे का कार्यक्रम बनाने से पहले ही अपनी लाचारी जाहिर कर दी । उन्होंने एक प्रकार से स्पष्ट कर दिया कि इसमें सरकार कुछ करने की स्थिति में नहीं है । उसके तुरंत बाद मुख्य चुनाव आयुक्त वी. एस. संपत ने पेड न्यूज पर ही दिल्ली में आयोजित एक वर्कशॉप में इतना कड़ा बयान दिया जो मीडियाकर्मियों के गले नहीं उतरा । क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक/प्रिंट मीडिया ने उनके इस वक्तव्य को तवज्जो नहीं दी । मुख्य चुनाव आयुक्त को यह अंदाजा तो रहा ही होगा कि पैसे लेकर समाचार छापनेवाले अखबार/चैनल उनके इस बयान को तरजीह नहीं देंगे । इसमें वो पत्रकार भी शामिल हैं, जो चाहे निजी तौर पर अथवा आपस में मिल-जुलकर यह काम कर रहे हैं ।

चुनाव आयोग ने सरकार से ऐसे तत्वों को दंडित करने का अधिकार मांगा है । जाहिर है कि सिर्फ चेताने और सावधान करने के लिए चुनाव आयोग के प्रमुख ने ऐसा कहा है । वे अच्छी तरह जानते हैं कि यह अधिकार चुनाव आयोग को सरकार नहीं देगी । वी. एस. संपत के बयान से ही बहुत लोगों ने जाना कि यह काम आसान नहीं है और इतना दुरूह है कि 1961 के जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करना पड़ेगा । चूंकि इस कानून के सारे प्रावधान को अमल में लाना संविधान के मुताबिक चुनाव आयोग के जिम्मे है, इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त ही ऐसी मांग कर सकते हैं । पेड न्यूज की शिकायतें चुनाव के समय ही चर्चा में आती हैं, जिसमें चुनाव आयोग के हाथ में ही सब कुछ है । लेकिन इस खास मामले में कुछ करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है, यह जानकारी भी कई राजनीतिज्ञों और आम मतदाताओं के पास नहीं थी ।

ऐसी मांग करना चुनाव आयोग की मजबूरी है । क्योंकि चुनाव तैयारियों का जायजा लेने मुख्य चुनाव आयुक्त अपने दो चुनाव आयुक्तों के साथ तीन बार बेंगलुरू गए और तीनों ही बार उन्हें 'पेड न्यूज' की शिकायतें मिली । दिल्ली में भी मिल रही हैं । चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद से चुनाव आयोग को वोट लुभावन और वोटरों को प्रलोभन देने वाली तमाम गतिविधियों, बयानों, पोस्टरों, विज्ञापनों तथा सरकारी घोषणाओं पर नजर रखनी होती है । पैसे लेकर वोटरों को प्रभावित करनेवाली खबरें प्रसारित/प्रचारित करना भी उसी श्रेणी में आएगा । वोटरों के बीच बांटे जानेवाले नोटों के थैले तो आसानी से जब्त हो जाते हैं । लेकिन नोट लेकर 'न्यूज' बनाने और छापनेवाले बड़ी मुश्किल से पकड़ में आते हैं । चुनाव आयोग की ओर से तैनात अधिकारियों ने अब यह मुश्किल आसान कर लिया है । वर्ना यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं बनता कि प्रधानमंत्री को स्पष्टीकरण देना पड़ गया और चुनाव आयोग ने जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की मांग उठा दी । चुनाव आयोग के 53 वर्ष के इतिहास में पहली बार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त ने मीडिया के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए संविधान संशोधन की मांग उठायी है ।

वोटरों के बीच पैसे बांटने का धंधा 2009 लोक सभा चुनाव में चल निकला और उसी समय से 'पेड न्यूज' की भी शिकायतें आ रही हैं । उसके बाद से जितने विधान सभा चुनाव हुए, सबमें 'वोट के बदले नोट' के साथ-साथ 'खबर के लिये नोट' (पेड न्यूज) के मामले जोर पकड़ते गए हैं । हर साल विभिन्न राज्यों में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं, इस व्यवसाय में इजाफा हो रहा है ।

प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू का कहना है कि 2009-10 के दौरान प्रेस काउंसिल के पास पेड न्यूज की 17 शिकायतें पहुंची । नवंबर, 2010 में बिहार विधान सभा चुनाव में पेड न्यूज उसी तरह चर्चा का विषय रहा, जैसे आज कर्नाटक में है । उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी को बार-बार मीडियाकर्मियों से बातचीत के दौरान कहना पड़ा कि ऐसी शिकायतें चुनाव की निष्पक्षता और मीडिया की विश्वसनीयता दोनों ही के लिए अशोभनीय है । हाल में मार्कण्डेय काटजू ने पटना आकर बिहार के प्रेस के बारे में कुछ कहा, उस पर मीडियाकर्मियों के बजाए राज्य का सत्तारूढ़ गठजोड़ भड़क उठा । मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (जद यू) और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी (भाजपा) दोनों ने ही बौखलाहट भरे बयान दिए । प्रेस काउंसिल को तथ्यों की जांच करने के लिए पत्रकारों की एक टीम भेजनी पड़ी । न तो सारे अखबार बिके हुए हैं, न ही सारे पत्रकार । लेकिन यह आत्ममंथन का विषय तो है ही कि आखिर बिहार के बारे में प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष ने ऐसा बयान क्यों दिया और बाहर लोग क्यों कहते हैं कि बिहार से सिर्फ नीतीश कुमार के 'सुशासन' की खबरें आती हैं । बयान तो सत्ता की तरह ही विपक्ष के भी प्रमुखता से छपते हैं । लेकिन ऐसे आरोप पर विधान सभा और विधान परिषद में हंगामा तो हुआ ।

बहरहाल यह मीडिया के लिये ही बेहद गंभीर और सोचनीय मसला है । आज तक किसी भी पार्टी के नेता ने यह मुद्दा नहीं उठाया, न इस पर कोई बयान दिया । कानूनी अधिकार की बात तो वे कभी कर ही नहीं सकते । प्रधानमंत्री ने जब हथियार डाल दिया तो और किसके वश का है । क्योंकि प्रेस पर अंकुश लगाना लोकतंत्र के चौथे पाये को हिलाना होगा । प्रेस की आजादी छिनने पर राजनीति नहीं चल सकती । पेड न्यूज में शामिल कुछ छुटभैये हैं, जो स्वयं अपने घर के मजबूत पाए को हिलाने पर तुले हैं । इस पर हम सभी मीडियाकर्मियों को खुद विचार करना होगा । सरकार न्यायपालिका पर अंकुश लगाने वाला बिल लाने पर आमादा है । प्रधानमंत्री स्वयं भी ऐसा बयान दे चुके हैं । लेकिन पेड न्यूज पर चुप हैं । धन, बल का इस्तेमाल करके चुनाव लड़ने और जीतनेवाले अपराधियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार चुनाव आयोग 30 वर्षों से मांग रहा है । न मिला, न मिलने की संभावना है । तो फिर पेड न्यूज के अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का अधिकार कहां से मिलेगा । इसमें शामिल लोग पार्टियों और उम्मीदवारों का काम करते हैं । कोई भी पार्टी नहीं चाहेगी, चुनाव आयोग के हायतौबा मचाने से कुछ नहीं होना जाना ।

संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू है, कोई सदस्य यह मामला नहीं उठाएंगे । चुनाव आयोग अगर कुछ करना भी चाहे तो कोर्ट नहीं करने देगी, जो राजनीतिज्ञों के मामले में भी आयोग को झटका देती रहती है । अपराधियों के सांसद/विधायक बनने का मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है । चुनाव आयोग पल्ला झाड़ चुका है, कटघरे में सरकार है । हो सकता है, इस संबंध में भी कोई जनहित याचिका दायर हो जाए, जो सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए स्वीकार कर ले । क्योंकि यह लोकतंत्र का चौथा पाया भरभराने से जुड़ा है ।

क्योंकि सूचना अधिकार कार्यकर्ता सुभाष चन्द्र अग्रवाल द्वारा प्रेस काउंसिल से हासिल की गयी सूचना के मुताबिक 2009 से 2013 तक जितनी 'पेड न्यूज' की शिकायतें आयीं, किसी में भी कोई कार्रवाई नहीं हुई । क्योंकि अधिकांश 'आधारहीन' निकली । इसमें चुनाव के दौरान छपी भ्रामक खबरें, लेख, विज्ञापन शामिल हैं ।

वोटरों की नजर में यह तो ऐसा हुआ कि जज पैसे लेकर फैसला सुनाएं या बलात्कार पीड़ित लड़की जब सुरक्षा मांगने थाना पहुंचे तो थानावाले उसकी कीमत वसूलने लगें । लोकतंत्र के पहरूए से ऐसी उम्मीद नहीं की जाती ।