लिट्टे(LTTE) यानी कि श्रीलंकाई अल्पसंख्यक तमिलों का बेहद खूंखार और मजबूत उग्रवादी गुट लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम, जो अब इतिहास में समा चुका है । भारत-श्रीलंका और तमिलनाडु का केंद्र से रिश्ते को लगभग 30 वर्षों तक प्रभावित करनेवाला लिट्टे का जिन्न अचानक अभी तमिलनाडु की राजनीति में प्रकट हुआ ।

श्रीलंका में तमिलों के संवैधानिक अधिकारों की खूनी लड़ाई के लिए बने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम और वहां के बहुसंख्यक सिंहली वर्चस्व को लेकर पड़ोसी श्रीलंका में गृहयुद्ध जैसे हालात बने रहे । 2009 में इस गुट का पतन हो गया ।

लिट्टे का अस्तित्व अब नाममात्र का बचा है । मगर फिर भी भारत में यह गुट प्रतिबंधित है । तमिलनाडु की सियासी राजनीति में लिट्टे का असर काफी समय तक रहा है । इसका एक कारण है केंद्र में सत्ता संभालनेवाली कांग्रेस और कांग्रेस नीत गठजोड़ सरकारों की ओर से लिट्टे सफाया में श्रीलंका को दी गयी सैनिक तथा हथियार आपूर्ति ।

तमिलनाडु के जन-जन में लिट्टे संस्थापक वी. प्रभाकरन ‘हीरो’ माना जाता है, जिसका इस्तेमाल वहां के सबसे ज्यादा समय तक राज करनेवाली पार्टी द्रमुक समेत अमूमन सभी क्षेत्रीय दल चुनावी राजनीति में करती आ रही है । इसको लेकर हमेशा से विवाद होता रहा है और इस राजनीतिक विवाद के केंद्र में कांग्रेस है ।

इसका प्रमुख कारण है पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 21-05-1991 को श्रीलंका के ही पेरूंबदुर में आत्मघाती विस्फोट में हत्या ।

उस बम विस्फोट की साजिश कथित रूप से लिट्टे सुप्रीमो प्रभाकरन ने रची थी, जिसने दुनिया में पहली बार आत्मघाती विस्फोट दस्ता तैयार किया था । 1991 में राजीव गांधी की हत्या के समय द्रमुक की सरकार तमिलनाडु में थी और मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि मुख्यमंत्री थे, जिनकी भूमिका संदिग्ध पायी गयी थी । राजीव गांधी हत्याकांड की जांच के लिए गठित जस्टिस पी. डी. जैन आयोग ने द्रमुक नेता मुख्यमंत्री करुणानिधि को शक के घेरे में जांच रिपोर्ट में रखा था ।

उसके बावजूद कांग्रेस का तमिलनाडु में और केंद्र में द्रमुक के साथ गठजोड़ चलता रहा ।

2009 में श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के लिट्टे सफाया अभियान में उस समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मददगार रहे । उस अभियान में प्रभाकरन समेत लिट्टे का भी पतन हो गया ।

राजीव गांधी की हत्या को लिट्टे की बदला कार्रवाई मानी गयी । क्योंकि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1987 में श्रीलंका के राष्ट्रपति जुलियस जयवर्द्धन के साथ लिट्टे के खिलाफ भारतीय सैनिकों को भेजने के करार किए थे । उसको लेकर तमिलनाडु के लोगों में भारी रोष था और विवाद हुआ था ।

ये है लिट्टे से जुड़ी तमिलनाडु की पूर्व द्रमुक(द्रविड़ मुनेत्र कझगम) सरकार और केंद्र की कांग्रेस नीत गठजोड़ सरकार की चुनावी ‘अंडरस्टैंडिंग’ का बैग्राउंड । इसको ध्यान में रखकर ही यह आकलन संभव है कि अभी तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद नए गठजोड़ में कांग्रेस के सरकार में शामिल होने के समय लिट्टे क्यों खबरों में आया ।

27 वर्षों के बाद लिट्टे का जिन्न बोतल से उस समय निकला जब तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने अपने गठजोड़ सहयोगी कांग्रेस को मंत्रिमंडल में शामिल किया । अब देखिए कि इसको लेकर विवाद क्यों हुआ । शपथग्रहण के समय ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और लिट्टे सुप्रीमो वेलुपिल्लई(वी.) प्रभाकरन की बरसी पड़ी । 21 मई, 1991 को राजीव गांधी तमिलनाडु में लिट्टे की कथित साजिश के तहत आत्मघाती विस्फोट में शहीद हुए और 2009 में संयोग से 18 मई को ही प्रभाकरन श्रीलंकाई सैनिकों के हाथों मारा गया ।

द्रमुक नेता एम. करुणानिधि की तरह तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री जोसेफ विजय भी श्रीलंकाई तमिलों के लिए अलग इलम राज्य के गठन की लड़ाई लड़नेवाले लिट्टे के समर्थक रहे हैं । करुणानिधि की तरह अभिनेता से राजनेता बने जोसेफ विजय की पहली बार सत्ता में आयी पार्टी टी वी के(TVK - तमिलगा वेत्री कझगम) को भी जनसमर्थन का एक कारण लिट्टे के प्रति सहानुभूति रहा है ।

गत हफ्ते हुआ यों कि 18 मई को मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने लिट्टे सुप्रीमो प्रभाकरन की बरसी पर श्रद्धांजलि की और X(एक्स) पर शोक संदेश पोस्ट किया । मुख्यमंत्री ने पोस्ट में कहा कि श्रीलंका की खूनी जगह मुल्लीवाईक्कल हमेशा तमिलनाडु के लोगों की स्मृतियों में रहेगी, जहां श्रीलंकाई सैनिकों ने तमिल जेहादी प्रभाकरन को मारा ।

21 मई को राजीव गांधी की बरसी के दिन हुए मंत्रिमंडल विस्तार में कांग्रेस कोटे से दो विधायक मंत्री बनाए गए । शपथग्रहण के पहले 18 मई को ही भाजपा ने मुख्यमंत्री के लिट्टे वाले पोस्ट पर विवाद खड़ा किया और कांग्रेस की चुप्पी पर सवाल उठाए ।

तमिलनाडु में भाजपा की उपस्थिति नहीं के बराबर है । इसीलिए लिट्टे से जोड़कर इस सियासी विवाद को दिल्ली से भाजपा नेताओं ने उछाला । पूर्व केंद्रीय मंत्री भाजपा के अनुराग ठाकुर ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के इस विवादित एक्स पोस्ट पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिट्टे और तमिलनाडु में कांग्रेस के तालमेल के पुराने रिकार्ड उजागर कर दिए । भाजपा नेता ने कहा कि मुख्यमंत्री विजय का यह पोस्ट अस्वीकार्य है, क्योंकि लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन सिर्फ हमारे पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के षडयंत्र का मास्टरमाइंड ही नहीं था, भारतीय शांति सेना के तहत श्रीलंका भेजे गए हमारे सैकड़ों जवानों की मौत के लिए भी लिट्टे जिम्मेदार है । अनुराग ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस ने इंद्रकुमार गुजराल के नेतृत्ववाली केंद्र की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से समर्थन वापस लेकर मध्यावधि चुनाव की नौबत ला दी । उस समय कांग्रेस ने यह कहकर सरकार गिराने को उचित ठहराया कि मोर्चा गठजोड़ घटक द्रमुक राजीव गांधी की हत्या साजिश में शामिल था । और फिर उसी द्रमुक के साथ केंद्र में कांग्रेस ने मनमोहन सिंह शासनकाल के समय पूरे एक दशक सत्ता साझेदारी की । तमिलनाडु की जोसेफ विजय नीत टी वी के पार्टी के साथ गठजोड़ के बाद सत्ता में भागीदारी से पहले मुख्यमंत्री द्वारा लिट्टे के प्रति व्यक्त श्रद्धांजलि पोस्ट पर कांग्रेस की खामोशी को सियासी करार दिया ।

पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणामों के साथ 04 मई को तमिलनाडु का जब जनादेश आया तो जोसेफ की टी वी के सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी बनकर उभरी ।

कांग्रेस पहले उसी समय इंडिया गठजोड़ को लेकर विवाद के घेरे में आयी, जब द्रमुक का साथ छोड़कर टी वी के को समर्थन दिया । टी वी के को बहुमत का आंकड़ा कम पड़ रहा था । तमिलनाडु के राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर सरकार बनाने का दावा पेश करने के बाद बहुमत के लिए जरूरी विधायकों का स्पष्ट समर्थन बगैर जोसेफ विजय को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने को तैयार नहीं थे । कांग्रेस ने द्रमुक के साथ गठजोड़ करके चुनाव लड़ा था । द्रमुक नेता मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन खुद भी अपनी सीट नहीं बचा पाए और सरकार में बने रहने लायक सीटें नहीं मिली ।

कांग्रेस ने द्रमुक को हटानेवाली टी वी के को बहुमत जुटाकर अपने लिए सरकार में शामिल होने का मौका निकाला ।

13 मई को विश्वास मत के दौरान द्रमुक के धुर विरोधी जयललिता की पार्टी AIADMK(अखिल भारतीय अन्ना द्रमुक) के कई विधायकों ने अपने वर्तमान नेता पूर्व मुख्यमंत्री पलानीस्वामी का साथ छोड़कर जोसेफ विजय सरकार के पक्ष में मतदान किया । इससे आंकड़ा बहुमत के लिए अपेक्षित समर्थन से आगे निकल गया । लेकिन शपथग्रहण से पहले तक अन्नाद्रमुक ने पर्चा नहीं खोला था ।

ऐसे सियासी खेल के बारे में सिर्फ भाजपा में ही नहीं, इंडिया गठजोड़ के घटकों में भी प्रतिक्रिया हुई । खासकर लिट्टे और 22 साल से द्रमुक के साथ चला आ रहा गठजोड़ तोड़ने का देश भर में अप्रिय संदेश गया । लेकिन कांग्रेस इस बात से खुश है कि तमिलनाडु में 60 वर्षों बाद सत्ता में भागीदारी मिली ।

एम. करुणानिधि के पुत्र एम. के. स्टालिन ने अपने पूरे शासनकाल में लिट्टे हिमायती बिल्ला पिता की तरह खुद पर नहीं लगने दिया । लिट्टे की हवा तमिलनाडु में नहीं चली । द्रमुक से ही निकलकर गठित अन्ना द्रमुक नेता जयललिता करुणानिधि को हटाकर मुख्यमंत्री बनी । फिर उन्हीं की पार्टी के पलानीस्वामी मुख्यमंत्री बने । दोनों ने लिट्टे से दूरी बनाए रखी ।

दोनों की भाजपा से नजदीकी रही । अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली केंद्र की भाजपा गठजोड़ शासनकाल के समय जयललिता मुख्यमंत्री थी । उस समय श्रीलंका की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग वर्ष 2000 में लिट्टे पर काबू पाने के लिए हथियार और सैनिक सहायता मांगने आयी, जिससे प्रधानमंत्री वाजपेयी ने इन्कार कर दिया ।

लिट्टे की आड़ में श्रीलंका की सरकारों ने भारत को ब्लैकमेल करके तमिलनाडु के लोगों में रोष पैदा किया और चीन-पाकिस्तान से भारत की तल्खी का गलत फायदा उठाया । 2009 में श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से यह कहकर लिट्टे सफाया अभियान के लिए हथियार मांग की कि अगर भारत नहीं देता है तो वे चीन-पाकिस्तान से लेने को विवश होंगे । शुक्र है, मनमोहन सिंह राजीव गांधी की तरह सैनिक भेजने को राजी नहीं हुए । श्रीलंका की नजदीकी भारत के बजाए चीन और पाकिस्तान से रही है ।

1980 के दशक में अस्तित्व में आए लिट्टे के हमलों का सामना श्रीलंकाई सेना नहीं कर पाती थी । श्रीलंका का गृहयुद्ध संयुक्त राष्ट्र समेत पूरी दुनिया के लिए चर्चा का विषय रहा । भारतीय मूल के तमिलों को भारत के जरिए ही भड़काने की 1987 में खेली गयी श्रीलंका के राष्ट्रपति जुलियस जयवर्द्धन के कुचक्र में राजीव गांधी फंसे और जयवर्द्धन ने भारत को यह कहकर बदनाम किया कि भारतीय सैनिकों ने लिट्टे के प्रति नरम रवैया अपनाया ।

कांग्रेस नीत केंद्र की गठजोड़ सरकारों में द्रमुक ने हमेशा सत्ता में मनवांछित भागीदारी ली । लेकिन कांग्रेस को तमिलनाडु में बाहर से समर्थन तक ही सीमित रखा ।

60 वर्ष बाद तमिलनाडु में कांग्रेस का सरकार में शामिल होना कैसा रहा, यह तो कांग्रेसी ही ज्यादा समझे होंगे । उसके लिए प्रतिबंधित खूनी लिट्टे समर्थक से कांग्रेस मिल गयी । स्टालिन ने जिस लिट्टे बिल्ला से छुटकारा पाया वो लगाकर जोसेफ विजय ने कांग्रेस को सरकार में शामिल किया और राजीव गांधी के प्रति श्रद्धांजलि का एक शब्द बोले बगैर उनकी बरसी के दिन ही मंत्रिमंडल विस्तार किया । गौरतलब है कि सोनिया गांधी अपने पति की हत्या में शामिल नलिनी को माफी देकर फांसी से बचा चुकी हैं ।