भारत की चीन से लगी सिक्किम की सीमा के रास्ते शुरू हुए नये व्यापारिक सम्पर्क के पीछे चीन का उद्देश्य सिर्फ व्यापारिक सम्बन्ध बढ़ाना नहीं है, क्योंकि चीन को यों भी अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए भारत से नजदीकी बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है। आज चीन दुनिया के आर्थिक क्षितिज को नयी दिशा देने वाली हैसियत में है और यूरोप के सारे समृद्ध देश इसका लोहा मान चुके हैं। चीन ने ऐसे समय में भारत से व्यापारिक सम्बन्ध मजबूत करने की पेशकश की है, जब सीमा विवाद सुलझाने के लिए सारी वार्ताएं विफल साबित हो चुकी हैं और ये ऐसे विवाद हैं जो १९६२ से चले आ रहे हैं, जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को झांसा देकर चीन ने भारत पर हमला किया और भारतीय सैनिकों को खदेड़ते हुए भारत के कई इलाकों पर कब्जा कर लिया। अगर नेहरू ने अमेरिका से मदद न ली होती तो चीन से लगे भारत के तमाम सीमावर्ती इलाकों पर चीन अधिकार कर लेता।

सिक्किम का नाथू ला वही दर्रा है जो १९६२ में बन्द हो गया था। आज ४४ वर्ष बाद इस रास्ते से भारत की सीमाओं में फिर से प्रवेश का आखिर असली मकसद क्या है? इसके साथ-साथ एक और सवाल उठता है कि पर्यटकों के बहाने व्यापार बढ़ाने के लिए चीन ने सिक्किम को ही क्यों चुना, जबकि पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर तक भारत के कई इलाके चीन की सीमा से सटे हैं। कुछ दिन पहले म्यांमार और बांग्लादेश से सड़क और रेल सम्पर्क मार्ग सुदृढ़ करने के लिए चीन ने जो योजना बनायी उसके बारे में भारत से पूछा भी नहीं। वह समझौता बिल्कुल गुप्त रखा गया, जबकि वह सड़क पूर्वोत्तर की सीमा के बिल्कुल करीब से गुजरती है।

नाथू-ला सम्पर्क सूत्र को समझने के लिए सिक्किम के राजनीतिक पहलुओं का विश्लेषण करना होगा जो चीन से जुड़ा है। सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सिक्किम का १९७५ में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा भारत में विलय चीन ने स्वीकार नहीं किया और इस भूटिया रियासत को भारत के राज्य के रूप में मान्यता नहीं दी। १९७५ से लेकर २००६ तक चीन सिक्किम को अपना एक हिस्सा बताता रहा। अभी भी गूगल नेट पर सिक्किम को चीन के प्रान्त के रूप में देखा जा सकता है। वो चीन का आफिसियल नक्शा है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। अभी अचानक सिक्किम को भारतीय प्रान्त मान लेते हैं, हालांकि इस आशय का कोई लिखित समझौता नहीं हुआ है और सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग तथा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य से केन्द्र से अलग हटकर अन्तरंगता बढ़ाने के पीछे अवश्य ही चीन के व्यापार के अलावा भी कुछ इरादे हैं।

सिक्किम की संस्कृति, रहन-सहन, सभ्यता काफी कुछ चीन से मिलती-जुलती है। चोग्याल को चीन अपना भाई मानता था और चाहता था कि वो भारतीय सीमा में एक अलग अस्तित्व बनाए रखकर चीन के साथ रहे। चोग्याल द्वारा चीन की उम्मीदों पर पानी फेर दिए जाने के बावजूद चीन निराश नहीं हुआ और सिक्किम के लगभग सभी मुख्यमंत्रियों (नर बहादुर भंडारी से लेकर चामलिंग तक) ने चीन के प्रति नरम रवैया रखा। नाथू-ला को खोलने के लिए पड़ोसी पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार कई वर्षों से प्रयत्नशील थी और आखिरकार बुद्धदेव भट्टाचार्य ने इस काम में काफी दिलचस्पी ली। इनकी रुचि लेने की वजह तो कम्युनिस्ट सरकार का होना सहज ही समझ में आने वाला है। लेकिन यह मामला सिर्फ सिक्किम और पश्चिम बंगाल के चीन से जुड़ने का नहीं है। वैसे केन्द्र की कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार यदा-कदा चीन को खुश करने के लिए अपने वामपंथी घटक सांसदों को बीजिंग दौरे पर भेजती रहती है। नेपाल में भी माओवादियों की जीत के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी काठमांडू गए। लेकिन चीन से सम्बन्धित मुद्दे का सीधा ताल्लुक भारत की सुरक्षा से है और यह सरोकार ऐसे समय में चालू हुआ है, जब तिब्बत को रेल सम्पर्क से जोड़ने का काम चीन पूरा कर चुका है। आज चीन इस स्थिति में है कि तिब्बत, पूर्वोत्तर और नेपाल समेत किसी भी रास्ते से अपनी सैनिक टुकड़ी मिनटों में सिक्किम में उतार सकता है।

गंगटोक के मुहाने उत्तर पूर्वी राज्यों से मिलते हैं जहां सक्रिय लगभग सारे विद्रोही गुटों का एक पैर म्यांमार और दूसरा पैर बांग्लादेश में है। म्यांमार की सैनिक सरकार मुख्य रूप से चीनी मदद पर टिकी है। चीन ने म्यांमार के साथ इसी बीच हथियारों के बदले इमारती लकड़ी और चावल का समझौता किया है। म्यांमार की भी भारत नीति चीन से मिलती-जुलती है। पिछले वर्ष म्यांमार के सीनियर जनरल थान श्वे ने दिल्ली आकर पूर्वोत्तर के विद्रोहियों को अपनी जमीन से भारत विरोधी गतिविधियां न चलाने का आश्वासन दिया। लेकिन एनएससीएन (नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल आफ नगालैण्ड) के खपलांग गुट का अड्डा आज भी म्यांमार में मौजूद है, जिसके साथ केन्द्र सरकार का युद्धविराम समझौता सात वर्षों से चल रहा है।

अप्रैल, १९६० में चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई सीमा-सम्बन्धी विवाद के बारे में बात करने दिल्ली आए। पंडित नेहरू ने उनसे नेफा की उत्तरी सीमा के रूप में मैकमोहन रेखा को स्वीकारने का आग्रह किया। चाउ ने इस पर तो कोई आपत्ति नहीं की, मगर साथ में अक्साई चीन में चीनी फौज की मौजूदगी चाही। नेहरू को इसमें कोई रुचि नहीं थी। नेहरू ने संसद को बताया कि चीन के साथ सारे मतभेद दूर कर लिए गए हैं। और दो साल बीतते-न-बीतते चीन ने नेफा को भारतीय सैनिकों से मुक्त करा लिया। इस घटना के आगे-पीछे भी जाना आवश्यक है। चाउ-एन-लाई काठमांडू, कराची, काबुल होते हुए दिल्ली आए थे और उनके लौटने के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री टंका प्रसाद आचार्य ने पेकिंग जाकर नेपाल-चीन भाई-भाई का नारा दिया। वे भी पाकिस्तान होते हुए स्वदेश लौटे। भारत की तुलना में चीन की दोगुनी फौज नाथू-ला की भारतीय सीमा की ४५४५ मीटर ऊंची पहाड़ी पर मौजूद होगी।

चीन की कूटनीति का आलम देखिए कि जिस दलाई लामा को उनके तिब्बत समेत तहस-नहस करने में वहां की कम्युनिस्ट तानाशाही ने कोई कसर नहीं छोड़ी है, उनके ७१वें जन्मदिन (६ जुलाई) पर खासतौर से गंगटोक में जश्न के साथ व्यापारिक सम्पर्क खोलने की वार्ता हुई। सिल्क व्यापार का रूट खुल जाने के साथ-साथ चामलिंग इस बात से भी खुश हैं कि नाथू-ला तिब्बत जाने का सबसे आसान और कम समय लगने वाला रास्ता है। उनके मुताबिक नेपाल-कोलकाता के जरिए २००० किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है, जबकि नाथू-ला दर्रे से होकर मात्र १४०० किलोमीटर जाना होता है। बौद्ध प्रदेश सिक्किम के मुख्यमंत्री अपने यहां के पर्यटकों को तिब्बत की छुम्बी घाटी में बेरोकटोक जाने का सपना देख रहे हैं। १६ जुलाई को आयोजित समारोह में चीनी राजदूत सुन यूशी के लौटने के बाद चामलिंग को स्पष्ट करना पड़ा कि सिक्किम की जनता ने स्वेच्छा से भारत में विलय स्वीकार किया था। इसका मतलब है कि सिक्किम को लेकर चीन और भारत के मन में पड़ी गांठ को ढीला करने के प्रयास चल रहे हैं। हिमालय (शिपकिला) और उत्तरांचल (लिपुलेख) वाले रास्ते आंशिक रूप में १९९० के दशक में खुल गए थे। (सप्रेस)