देश में सबसे ज्यादा राजनीतिक सनसनी फैलानेवाले बोफोर्स तोप घोटाला सर्वाधिक चर्चित और विवादित मामला है । राजीव गांधी शासनकाल में स्वीडन की कंपनी से हुए होवित्जर तोप सौदे में दलाली खाने से लेकर उसकी जांच, कोर्ट ट्रायल सब विवाद के घेरे में रहा है । इसी को राजनीतिक तोप बनाकर राजीव गांधी को हरानेवाली किसी भी पार्टी या गठजोड़ सरकार को उस तोप सौदे में शामिल किसी भी अभियुक्त को कटघरे तक लाने में सफलता नहीं मिली । उस मुद्दे का सबसे ज्यादा लाभ उठानेवाली भाजपा के लिए ही बोफोर्स दलाली राजनीतिक तोप साबित हुआ ।
1999 से लेकर 2004 तक के भाजपा गठजोड़ शासनकाल में ही बोफोर्स जांच सबूतों के अभाव में समाप्त करने की नौबत सीबीआई के सामने आ गयी थी । दिल्ली में निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट तक मामला बार-बार गया, मगर बोफोर्स दलाली के कोई आरोपित नहीं धरा पाए । फिर बची-खुची कांग्रेस शासनकाल में खतम हो गयी । मार्च, 2011 में तीस हजारी कोर्ट के चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट विनोद यादव ने आखिरकार इस मुकदमे को क्लोज कर दिया । कोर्ट ने दलाली खानेवाला बिचौलिया इटली के व्यापारी ओट्टावियो क्वात्रोच्चि के खिलाफ चल रहा मुकदमा सीबीआई की अर्जी पर खारिज कर दिया । सीबीआई की यह दलील मजिस्ट्रेट ने मान ली कि क्वात्रोच्चि के खिलाफ सबूत जुटाने के सारे प्रयास विफल होने के कारण ‘जनहित’ में यह मुकदमा क्लोज कर दिया जाए । ओट्टावियो का नाम मशहूर होने का असली कारण यह था कि उसकी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से नजदीकी बतायी गयी और यह भी प्रचारित हुई कि ओट्टावियो का सोनिया गांधी के यहां आना जाना रहा । 23 वर्षों की जांच प्रक्रिया के बाद मुकदमा क्लोज होने के समय तक सारे आरोपित स्वर्ग सिधार चुके थे । एकमात्र जीवित बचे ओट्टावियो क्वात्रोच्चि सबूत के अभाव में बच गए । यह सारा विवरण इतना बहुप्रचारित और बहुचर्चित रहा है कि लोगों की दिलचस्पी समाप्त हो गयी । प्रचार में सबसे ज्यादा भूमिका भाजपा की रही ।
भाजपा ने बोफोर्स जिन्न का चुनावी लाभ उठाने के बावजूद उसे बोतल में ऑक्सीजन पर रखा । अभी चल रहे संसद के मानसून सत्र में भाजपा के दो सदस्यों ने लोकसभा में यही कहकर बोफोर्स मामला उठाया है कि ‘बोफोर्स दलाली का जिन्न बोतल से फिर निकला है, देश जानना चाहता है कि वास्तव में उस तोप सौदे में हुआ क्या था । लोकसभा सदस्य मीनाक्षी लेखी और निशिकांत दूबे ने अपनी सरकार से इस मामले की फिर से जांच कराने की मांग की । दोनों सदस्यों ने शून्यकाल में यह मामला उठाते हुए कहा कि 2005 से इस जांच प्रकरण को खोला जाए और फिर से जांच कराया जाए ताकि यह सुनिश्चित हो कि नाजायज दलाली दो गयी थी या नहीं । गौरतलब है कि 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली भाजपा गठजोड़ सरकार सत्ता से बाहर हो गयी थी, मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में आ गयी थी । 2005 में नए सिरे से जांच की मांग तेज हुई ।
संसद के मौजूदा सत्र में बोफोर्स जिन्न को बोतल से बाहर निकालने के लिए स्वीडन के एक वरिष्ठ अधिकारी स्टेन लिंडस्टॉर्म का हवाला दिया गया है, जिससे संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार ने भी सहमति जतायी । पार्टी सदस्यों द्वारा यह सवाल उठाए जाने के जवाब में मंत्री ने भी विस्तृत जांच की मांग उचित बतायी । संसदीय कार्यमंत्री ने कहा कि बोफोर्स दलाली का मामला फिर से खुल गया है और कांग्रेस को अगर जनता के बीच अपनी छवि सुधारनी है तो नए सिरे से जांच का समर्थन करना चाहिए ।
स्वीडिश अधिकारी के बारे में मंत्री ने बताया कि उसने कथित घोटाले की जांच की, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी शामिल थे और उसने भारत सरकार को ‘भारी मात्रा में सबूत’ दिये थे । लिंडस्टॉर्म ने क्या तो पाया है कि दलाली की रकम जितनी अबतक सोची गयी है और जो सामने आयी है, उससे कई गुनी ज्यादा हो सकती है । यह बात संसद भवन के बाहर संसदीय कार्यमंत्री ने संवाददाताओं को बतायी । लिंडस्टॉर्म ने इस मामले की विस्तृत जांच के लिए बोफोर्स जिन्न को फिर से बोतल से निकालने इसलिए कहा है, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी इसमें शामिल थे और उसकी तफ्तीश अभी तक नहीं हुई है । मंत्री अनंत कुमार और उनकी पार्टी के सांसदों ने जो कुछ संसद में कहा वो स्वीडिश अधिकारी की भाषा है। मंत्री ने भी सांसदों की बात दुहरायी कि देश को पूरी सच्चाई जाननी चाहिए । लेकिन अनंत कुमार ने संवाददाताओं के इस सवाल का जवाब देने से इन्कार कर दिया कि उनकी सरकार जांच का आदेश देगी या नहीं । बोफोर्स घोटाला 1986 का है, जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे । भारत और स्वीडन के बीच होवित्जर तोप सौदा हुआ । बवेला इन आरोपों को लेकर मचा कि स्वीडन सरकार ने भारतीय राजनीतिज्ञों और दलालों को इसके लिए दलाली की भारी रकम दी । आज उसी स्वीडन के अधिकारी ने अपनी जांच रिपोर्ट के आधार पर भारत सरकार से पुनः जांच कराने की मांग उठायी है । कांग्रेस सदस्यों ने जब एतराज किया कि 30 वर्ष पुराने इस मामले को आज क्यों उठाया गया है तो उसके जवाब में भाजपा सदस्य मीनाक्षी लेखी ने पलटवार किया कि ‘लगातार यह बात कही जा रही है, लेकिन मेरा मानना है कि बोफोर्स मामले को उचित तरीके से दफनाया गया है, इसलिए यह जिन्न बार-बार निकलता है ।’ देश जानना चाहता है या नहीं, यह तो बाद की बात है । यहां मुद्दा है कि भाजपा सरकार देश को अपने राजनीतिक मतलब के हिसाब से बोफोर्स जिन्न को निकालती है और फिर वापस बोतल में डाल देती है । बोफोर्स जिन्न का इस्तेमाल नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद स्वीडन से रिश्ता जोड़ने और जितने सौदों के लिए हुआ, उसमें रक्षा सौदा भी शामिल है । होवित्जर कंपनी के साथ-साथ स्वीडन को भी काली सूची में डाल दिया गया था । भारत और स्वीडन के बीच राष्ट्राध्यक्ष के स्तर वाला रिश्ता तोड़ दिया गया था । मई 2015 में भाजपा सरकार ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की स्वीडन यात्रा का कार्यक्रम तैयार किया । एक तो पुराने कांग्रेसी राष्ट्रपति और दूसरा ये कि रवानगी से कुछ दिन पहले प्रणव मुखर्जी ने स्वीडन के अखबार डी एन(डेजीन्स नोहेतेर) के साथ इंटरव्यू में कुछ ऐसी ‘ऑफ दि रिकार्ड’ टिप्पणी की, जिससे भाजपा सरकार की किसी भारतीय राष्ट्रपति की पहली स्वीडन यात्रा योजना का स्वाद बिगड़ गया । बताया जाता है कि प्रणव मुखर्जी ने डी एन अखबार के प्रतिनिधि के एक सवाल के जवाब में बोफोर्स को घोटाला नहीं माना । यह बात उन्होंने ‘ऑफ दि रिकार्ड’ कही, जिसमें गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा इसे मुद्दा बनाने पर कुछ नाराजगी का भी पुट था । डी एन अखबार ने उसे खूब बढ़ा-चढ़ाकर छापा, जो स्वीडन स्थित भारतीय राजदूत बानाश्री बोस हेरोसन को अखरी । उन्होंने अपनी ओर से डी एन के प्रधान संपादक वोलोडास्की को इंटरव्यू संपादित करके ‘ऑफ दि रिकार्ड’ हिस्सा हटाने कहा । भारतीय राजदूत ने अखबार को धमकी भी दे डाली कि अगर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बोफोर्स वाले ‘ऑफ दि रिकार्ड’ टिप्पणी पर फोकस किया गया तो राष्ट्रपति का स्वीडन दौरा रद्द किया जा सकता है । भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने राजदूत के ऐसे कथनों से इन्कार कर दिया और स्वीडन सरकार को नाराज न होने के उपाय किए । प्रवक्ता विकास स्वरूप और विदेश मंत्रालय के सचिव(पश्चिम) नवतेज सरना दोनों ने ही कहा कि ऐसी धमकी राजदूत ने नहीं दी है । राजदूत को झिड़की भी मिली कि भारत सरकार की ओर से राष्ट्रपति दौरे का जायका बिगाड़ने वाली बात न बोलें । किसी भारतीय राष्ट्रपति का ऐसे देश स्वीडन की पहली यात्रा पर जाना ऐतिहासिक तो थी ही । मीनाक्षी लेखी के मुताबिक बोफोर्स जिन्न कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ रहा है । जबकि कांग्रेस का इससे जो बिगड़ना था, बिगड़ चुका । भाजपा का ही यह कई रूपों में पीछा कर रहा है । संसद में मामला उछलने से एक हफ्ता पहले सीबीआई ने दिल्ली स्थित सिद्ध सेल सिंडीकेट कंपनी के नाम एक मामला दर्ज किया है । कम्पनी पर आरोप यह है कि उसने जबलपुर गन्स कैरेज फैक्टरी के लिए चीनी पार्ट पुर्जे बोफोर्स का बिल्ला लगाकर और मेड इन जर्मनी दिखाकर सप्लाई कर दिया । चीन से यों तो तनातनी चल रही है, लेकिन बोफोर्स का असर ऐसा है कि फर्जी चीनी कल-पुर्जे पर भी जर्मन मेड और बोफोर्स बिल्ला वाला माल सप्लाई हो गया ।
बोफोर्स जिन्न का सबसे जबरदस्त करतब है विश्वनाथ प्रताप सिंह का प्रधानमंत्री बनना, जो बोफोर्स सौदे के समय राजीव गांधी मंत्रिमंडल में नम्बर दो थे । देश क्या जानना चाहता है, इसका इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि बोफोर्स घोटाले को भूलकर जनता ने राजीव गांधी को दुबारा स्पष्ट बहुमत से प्रधानमंत्री चुना । क्या जनता यह नहीं जानना चाहेगी कि भाजपा शासनकाल(1999-2004) में सीबीआई को बोफोर्स आरोपितों के खिलाफ सबूत जुटाने में सफलता क्यों नहीं मिली?