बांग्लादेश में पिछले २४ वर्षों से उपेक्षित शरणार्थी की तरह यत्र-तत्र बिखरे करीब तीन लाख बिहारी मुसलमानों की स्वदेश (पाकिस्तान) लौटने की रही-सही आशा भी धूल में मिल गई जब पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने उनके पुनर्वास की व्यवस्था करने से साफ इंकार कर दिया और साफ शब्दों में कह दिया कि अब उन्हें पाकिस्तान में बसाना संभव नहीं है। ‘बिहारी’ कहलाने वाले ये लोग उर्दूभाषी मुसलमान या उनके वंशज हैं जो देश विभाजन के समय बिहार और उत्तर प्रदेश से जाकर पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में बस गए।
मरहूम जनरल जिया उल हक के शासनकाल तक इनके प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया गया, लेकिन नवाज शरीफ ने थोड़ी सी सहानुभूति दिखाई और वापसी की प्रक्रिया अच्छे माहौल में शुरू हुई। उनके शासनकाल में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया इसलामाबाद गईं और उनसे इस समस्या को मानवीय आधार पर लेने का आग्रह किया। नवाज शरीफ ने इस मुद्दे को स्वस्थ रूप में लिया और कुछ बिहारी मुसलमानों को पाकिस्तान लौटने का सुअवसर भी मिला। लेकिन पाकिस्तान के अंदर यह मामला विवादास्पद बन गया और सबसे ज्यादा बेनजीर भुट्टो ने ही बावेला मचाया। सिंध के लोग नहीं चाहते थे कि उनकी जमीन पर बाहर से लोगों को बसाया जाए। बेनजीर का तर्क था कि बसाना ही है तो नवाज शरीफ अपने प्रांत में बसाएं। नवाज शरीफ का उत्साह ठंडा पड़ गया और बिहारी मुसलमानों की वापसी का मामला लटक गया। फिर नवाज शरीफ चुनाव हार गए और बेनजीर भुट्टो दुबारा प्रधानमंत्री बन गईं। बेनजीर के सत्ता में आते ही बिहारी मुसलमानों के शरणार्थी इलाके में उदासी छा गई, क्योंकि नवाज शरीफ के समय पाकिस्तान लौटने वालों के साथ बांग्लादेश से भी खराब सलूक किया गया और कुछ लोगों को मजबूरन वापस बांग्लादेश लौटना पड़ा।
बेगम जिया खालिदा जिया बहुत सारी अंदरूनी बातें नहीं जानती थीं, इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि बेनजीर भुट्टो का रुख अनुकूल रहेगा। लेकिन बेनजीर भुट्टो ने अपनी नीतियों की स्पष्ट जानकारी नहीं होने दी। काफी दिन इंतजार करने के बाद आखिरकार खालिदा जिया खुद इसलामाबाद पहुंच गईं। पिछले महीने की २६ तारीख को पहले इस मुद्दे पर विदेश मंत्रियों के स्तर पर बातचीत हुई, फिर दोनों प्रधानमंत्री मिलीं। बेगम खालिदा जिया दुखी मन से ढाका लौटीं, क्योंकि बेनजीर भुट्टो की ओर से साफ नकार दिए जाने की उम्मीद नहीं थी। बेनजीर भुट्टो ने यह तर्क दिया कि पाकिस्तान में पहले से ही १० करोड़ से भी ज्यादा अवैध आप्रवासी रह रहे हैं जिनके चलते भारी आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बेगम खालिदा जिया की पाकिस्तान में मौजूदगी में हजारों की संख्या में सिंधियों ने यह कहकर वापसी का विरोध किया कि उनके आने से सिंधियों की आबादी कम पड़ जाएगी और नागरिक समस्याएं उठ खड़ी होंगी। वैसे मुहाजिर कौमी आंदोलन के नेता अलताफ हुसैन और जमायत-ए-इसलामी नेताओं ने उनकी वापसी की जोरदार मांग की है। पाकिस्तान की गैर सरकारी संस्था पाकिस्तानी वापसी समिति ने इसके खिलाफ आंदोलन की धमकी दी है। दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात से पहले विदेश मंत्रियों की बातचीत के बारे में पाकिस्तान के विदेश सचिव नजमुद्दीन शेख ने कहा कि दोनों सरकारों ने बिहारी मुसलमानों के मामले को गंभीरता से लिया है और इस पर आगे विस्तार से विचार-विमर्श होना है। इनके कथन की सच्चाई तो बेनजीर भुट्टो के तर्क से ही प्रकट हो जाती है।
ये शरणार्थी मूल रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे जो १९४७ में भारत बंटवारे के समय भागकर पूर्वी पाकिस्तान चले गए थे। वहां के बंगालियों के बीच ये उर्दूभाषी शरणार्थी अपने को कमजोर और अल्पसंख्यक महसूस करने लगे। लेकिन उनकी बोली और संस्कृति पश्चिम पाकिस्तान के लोगों से मिलती-जुलती थी, इसलिए पहले के पाकिस्तानी शासकों ने उनके साथ अच्छा बर्ताव किया। १९७१ में पूर्वी पाकिस्तान में जब मुक्ति संग्राम छिड़ा तो बहुसंख्यक बिहारी मुसलमान पाकिस्तान सरकार के साथ हो गए। उनमें से कुछ ने तो लड़ाकू दस्ते बनाकर बंगालियों के खिलाफ संघर्ष भी किया।
बांग्लादेश बनने के बाद शुरू में तो बिहारियों को काफी यातनाएं दी गईं। बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान ने उनसे साफ-साफ कहा कि “आप लोग या तो बांग्लादेश की नागरिकता ग्रहण करें अथवा पाकिस्तान की राह लें।” प्रस्ताव कोई बुरा नहीं था। लेकिन ये बिहारी भाईलोग जज्बाती मामलों में भी कट्टरपंथी निकले और जिद ठान ली कि “घर पाकिस्तान है, तो यहां क्यों रहें, लेकिन जब तक पाकिस्तान सरकार हमें खुद नहीं बुलाएगी, हम अंतरराष्ट्रीय रेड क्रास की सहायता से जिएंगे, मगर जाएंगे नहीं।” उसी समय से इनकी करुण कहानी शुरू होती है। उन्हें इस तरह बाहर की दुनिया से अलग-थलग कर दिया गया ताकि शरणार्थियों के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं मिल सके। १९७८ में अंतरराष्ट्रीय रेड क्रास की सहायता से बने ६६ शरणार्थी शिविर ही आज भी उनका आश्रय स्थल हैं, जिनमें से कई उजड़ गए हैं और अधिकांश को रेलवे प्लेटफार्मों, बस स्टापों और मैदानों में रात गुजारनी पड़ती है। उनके पास न जमीन है, न मकान, न ही रोजी-रोटी कमाने के सही साधन। आसपास के शहरों में जाकर दिन भर जानवरों की तरह काम करते हैं और पूरी तरह मालिकों की दया पर पेट पालते हैं।
बेगम खालिदा जिया से पहले की सरकार ने भी शरणार्थियों के साथ बदसलूकी की। आसपास के लोगों ने उन्हें भगाने के लिए शिविर उजाड़ दिए, जब भी इलाके में चोरी, पाकेटमारी और उठाईगिरी की कोई घटना हुई, उन्हीं लोगों को फंसाया गया और पुलिस ने पकड़ कर उनकी जमकर पिटाई की। शिविरों के चारों ओर कूड़े-कचरे और मरे मवेशी फेंके जाते थे। भुखमरी और बीमारियों से उनके मरने की सूचनाएं दबा दी जाती थीं। बेहतर जिंदगी के लिए संघर्ष करने वाले कितनों को लापता कर दिया गया। अब ये वापस बिहार भी नहीं आना चाहते।