बांग्लादेश की चर्चित विवादास्पद लेखिका तसलीमा नसरीन भारत में बिन बुलायी मेहमान हैं, इसलिये उनके साथ वही सुलूक हो रहा है जो भारतीय समाज में ऐसे मेहमानों के साथ होता है ।

केन्द्रीय पर्यटन मंत्रालय ने राष्ट्रकुल खेलों के लिये आमंत्रित अतिथियों के स्वागत में तैयार सेलिब्रिटी ‘अतिथि देवो भव’ की भारतीय परंपरा के निर्वाह के लिये खास तौर से बॉलीवुड स्टार आमिर खान को अनुबंधित किया है । इसकी झलक वे अपनी राजनीतिक ड्रामेबाजी वाली बहुचर्चित फिल्म ‘पीपली लाइव’ के प्रदर्शन समारोह में 13 अगस्त को दिखाएंगे, जिसमें ‘अतिथि देवो भव’ को चरितार्थ करनेवाला सीन भी है । और उस दौरान भारत की इस विशिष्ट मगर अनचाही अतिथि तसलीमा नसरीन अपना बोरिया विस्तर समेटने की तैयारी में रहेंगी, क्योंकि 16 अगस्त तक उन्हें हर हाल में भारत छोड़ देना है । तसलीमा प्रकरण के साथ जुड़ी राजनीतिक ड्रामेबाजी ‘पीपली लाइव’ के कथानक से मिलती-जुलती है । विदेश मंत्रालय सीधे तौर पर राजनीतिक कारणों से जुड़े अपने कुछ ‘नियमों’ से बंधा है, जिसके चलते तसलीमा के मामले में इस भारतीय परंपरा का निर्वाह संभव नहीं हो पा रहा है और इसलिये उनकी वीजा की अवधि 16 अगस्त के आगे बढ़ाया जाना संभव नहीं है ।

बांग्लादेश से निष्कासित होने के बाद 2005 में भारतीय वीजा पर तसलीमा जब पहली बार ‘मेहमान’ बनकर कोलकाता आयीं तब केन्द्र की कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार से ज्यादा पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने नाक-भौं सिकोड़ी । क्योंकि उन्होंने भारत में(कोलकाता) स्थायी रूप से रहने का आवेदन वीजा की अर्जी के साथ ही भेजी थी । स्थायी निवास के तसलीमा के आवेदन पर विचार करने की कौन कहे, वो मंत्रालय की फाइल में पड़ी भी है या नहीं, यह भी कोई स्पष्ट बताने को तैयार नहीं है । अभी जो तसलीमा को फाइनल अल्टीमेटम मिला है, उसका कारण यह बताया गया है कि उन्हें ‘विविध श्रेणी’ के अन्तर्गत वीजा दिया गया था, जिसमें वीजा की अवधि अब और आगे नहीं बढ़ायी जा सकती । इस विविध श्रेणी के बारे में विस्तार से बताने को कोई अधिकारी तैयार नहीं है । पांच वर्षों में कई-कई बार कभी छह महीने कभी साल भर के लिये तसलीमा की वीजा की अवधि बढ़ायी जाती रही है । बार-बार उन्हें भारत छोड़ने को मजबूर किया गया । इसमें कोलकाता से भगाया जाना और हर बार विदेश से दिल्ली लौटने पर ‘सुरक्षा कारणों’ से हवाई अड्डे से धकियाकर अज्ञातवास में ले जाया जाना भी शामिल है ताकि किसी को पता न चले । अभी 22 जुलाई को सुबह लंदन से दिल्ली पहुंचने पर भी वही रवैया अपनाया गया । लेकिन इस ‘विविध श्रेणी’ की कई बातें गोलमटोल है । सूत्रों को यह तो नहीं मालूम कि तसलीमा के आवेदन पर आगे फिर विचार किया जाएगा या नहीं, लेकिन इतना पता है कि वीजा की अवधि 16 अगस्त से आगे बढ़ाने के लिए उस समय तक भारत में रहते हुए आवेदन नहीं कर सकती । और भारत छोड़ने के तुरंत बाद भी नहीं कर सकती । सूत्रों के मुताबिक तसलीमा से नया वीजा जमा करने के लिये कहा गया है, लेकिन यह नसीहत भी दी गयी है कि कुछ दिन विदेश में रहने के बाद ही भारत आने का आवेदन दें । कोई अधिकारी यह स्पष्ट बताने को तैयार नहीं है कि इस ‘विविध श्रेणी’ का वो ‘विशेष’ प्रावधान किस श्रेणी के अतिथि पर लागू होता है, जिसके तहत पांच साल के बाद वीजा को विस्तार भारत में रहते हुए नहीं दिया जा सकता । इसी के तहत तसलीमा को 16 अगस्त तक भारत छोड़ देना है, जिस दिन उनके वीजा के पांच साल पूरे हो रहे हैं । यह भी अस्पष्ट है कि तसलीमा उस श्रेणी में किस आधार पर शामिल की गयी । लेकिन इतना साफ पता चल रहा है कि अगर वाकई तसलीमा को भारत से जाना पड़ गया(जो अमूमन निश्चित है), तो उनके फिर वापस लौटने का समय करीब आने में ‘कुछ दिन’ नहीं, कुछ वर्ष या ज्यादा भी लग सकते हैं ।

नवम्बर 2007 में पश्चिम बंगाल सरकार ने तसलीमा को कोलकाता छोड़ने को मजबूर किया, क्योंकि उसी समय से पंचायत चुनाव की तैयारी शुरू हो गयी थी । और मुस्लिम कट्टरपंथियों को दबाव था कि तसलीमा को निकाल बाहर करो । मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ लिखने और सरेआम बोलने वाली तसलीमा को बांग्लादेश के उलेमाओं के फतवे पर तत्कालीन बेगम खालिदा जिया सरकार ने देश निकाला दे दिया । पश्चिम बंगाल में ज्यादातर मुस्लिम मतदाता बांग्लादेश से आकर बसे हैं और ‘प्रगतिशील’ सोच वाली वाम मोर्चा सरकार की प्रगतिशीलता अल्पसंख्यक वोट को प्रभावित करनेवाले लेखन को बर्दाश्त नहीं करती । पंचायत चुनाव में वाम मोर्चा और कांग्रेस दोनों को हाल में शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा । अब अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव की तैयारी है । इसलिये इस बार दिल्ली से विदेश रवानगी के पूर्व एक बार कोलकाता जाने की तसलीमा की इच्छा केन्द्र की कांग्रेस गठजोड़ सरकार ने उनके ‘सुरक्षा’ के मद्देनजर पूरी नहीं की । अब विधान सभा चुनाव से पहले कोलकाता तो क्या, दिल्ली आने की भी उनकी ख्वाहिश शायद ही पूरी हो पाये । भारत में सरकारी हलकों की नजर में तसलीमा ‘अतिथि दानवो भव’ को फलितार्थ करने वाली साबित हो रही हैं, इसलिये किसी भी सरकारी बुलेटिनों में तसलीमा का नाम तक नहीं लिया जाता । रेडियो, दूरदर्शन, प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो(पीआईबी) कोई भी तसलीमा को खबर के लायक नहीं मानती । जबकि 1994 में अपनी पहली किताब ‘लज्जा’ से सुर्खियों में आयी तसलीमा देश-विदेश की अखबारों के लिये हमेशा सुर्ख़ी रही हैं । उनके आत्मकथात्मक उपन्यास ‘द्विखण्डितो’ के तीनों संस्करण झकझोरने वाले हैं, क्योंकि उन्होंने अपने ही मुस्लिम समाज के वैसे छिद्रों को उजागर करना अपने लेखन का विषय बनाया जो भारत की ‘सेक्यूलर’ पार्टियों(चाहे सत्तापक्ष हो या विपक्ष) के लिये वोट बैंक है । इसलिये उनकी टिप्पणियों को अनर्गल और अल्पसंख्यक समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला माना गया । ऐसी पार्टियों की दृष्टि में ‘साम्प्रदायिक’ भाजपा ने भी तसलीमा के जरिये अपना मतलब साधने की कोशिश की । दरअसल देखा जाय तो भारत के राजनीतिक दलों ने ही तसलीमा को हथकंडा बनाकर उनके साथ दानव जैसा सुलूक किया है। मार्च, 2008 में जब उन्हें दिल्ली छोड़ने को मजबूर किया गया तो लंदन हवाई अड्डे पर उतरते ही तसलीमा ने बेहद दुखी होकर विस्फोट किया । पेशे से सफल चिकित्सक रह चुकी स्वभाव और जीवनशैली से बिंदास तसलीमा नसरीन ने भारत की बीमार मानसिकता की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट सामने ला दी है । इसमें बांग्लादेश से ज्यादा भारत के तथाकथित सामाजिक उसूलों के ठेकेदारों का दोहरा चरित्र सामने आया है । क्योंकि बांग्लादेश में तो कट्टरपंथी उलेमा ही वास्तव में सरकार चलाते हैं, लेकिन भारत में अल्पसंख्यक वोट की राजनीति का तकाजा है कि उलेमाओं को नाराज नहीं किया जाय । कमाल तो यह है कि ज्यादातर उलेमाओं ने तसलीमा की एक भी किताब पूरी पढ़ी नहीं है । गैर सरकारी मीडिया से मिली जानकारी के आधार पर ही उन्होंने कोलकाता से दिल्ली और हाल में कर्नाटक तक बवाल मचाया और मीडिया को ही तसलीमा की खबर प्रचारित करने के लिये कोसा भी । एक अलमस्त शायर की यह पंक्ति तसलीमा पर बिल्कुल फिट बैठती है - ‘चुप रहो तो मलाल, बोलो तो बवाल, कुछ है जरूर इस बेबाक हस्ती में’ । तसलीमा के अन्दर बैठी संवेदनशील लेखिका उन्हें चुप नहीं रहने देती, क्योंकि मीडिया को मलाल रहता है । पर भारत में दो-चार महीने के लिये भी अतिथि बनने की शर्त है कि भारत सरकार की ओर से मुहैया ‘घर’ में बन्द रहें और मुंह भी बन्द रखें । क्योंकि उनके कुछ बोलने/लिखने पर बवाल हो जाता है । ताजा बवाल इसी वर्ष होली के समय का है । 17 फरवरी को वीजा की अवधि एक साल के लिये बढ़ने के बाद तसलीमा ने बुरका पर एक लेख लिखा, जिसके भाजपा शासित कर्नाटक के कन्नड़ तथा उर्दू अखबार में छपने पर होली के समय दंगा भड़क उठा । दंगाइयों पर काबू पाने के लिये पुलिस ने गोली चलायी । दो व्यक्तियों के मारे जाने और दर्जनों के घायल होने की रिपोर्ट मिली । लूट-पाट, आगजनी, पत्थरबाजी के चलते कई इलाकों में कर्फ्यू लगाने की नौबत आ गयी । आज इस बात का जवाब भी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के पास नहीं है कि तसलीमा की वीजा की अवधि समाप्त होने में छह महीना शेष होने के बावजूद उन्हें भगाया क्यों जा रहा है । अधिकांश बवाल मचानेवालों को यह भी पता नहीं है कि तसलीमा के 30 के करीब उपन्यास, कहानी, कविता संकलन हैं । इन किताबों का दुनिया की 20 से ज्यादा भाषाओं में बंगला से अनुवाद हो चुका है । सर्वाधिक एडवांस पश्चिम यूरोप के जिस किसी भी देश में वो रहती हैं, वहां अपने विशिष्ट मेहमान को भगाने की उतावली नहीं होती । ऐसा सिर्फ भारत में होता है, जहां वे रहना चाहती हैं । विदेश तो उन्हें भारत से खदेड़े जाने पर भागना पड़ता है । मुख्यरूप से पर्दा(बुरका) के अन्दर रखकर महिलाओं को सिर्फ हरम की चीज मानने वाले अपने ही समाज के खिलाफ हल्लाबोल उगलने वाली तसलीमा भारत में लगभग सभी दलों को बेपर्द कर चुकी हैं । इसलिये आज किसी के मुंह से इनके बारे में एक लफ्ज नहीं निकल रहा है । संघ परिवार के ‘हिन्दुत्व’ की तरह वामपंथ संचालित ‘प्रगतिशीलता’ के स्वयंभू ठेकेदार प्रगतिशील लेखक संघ को तो मानो पता ही नहीं है कि तसलीमा के साथ 2007 में कोलकाता में क्या हुआ और उस समय से अभी तक क्या गुजर रही है । अपने पुश्तैनी घर ढाका से निष्कासित होने के बाद कोलकाता को दूसरा घर मानकर वे 2005 में रहने आयी । राजनीतिक ड्रामेबाजी वाली मेहमाननवाजी की कोलकाता से शुरू यह ट्रेलर फिर से देखते हैं, जहां दो साल रहने के बाद तसलीमा को निकाल बाहर किया गया ।

नवम्बर, 2007 में जब तसलीमा के सामने कोलकाता छोड़ने की नौबत आयी तो उन्होंने भाजपा शासित राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से पनाह मांगी । कोलकाता से विदा होने से पहले तसलीमा ने कहा कि भारत के किसी भी राज्य में भाजपा की सरकार सिर्फ हिन्दू वोट से नहीं बनी है । उसी के अनुरूप वसुंधरा के मतदाताओं की भावनाओं का ख्याल करके तसलीमा ने जयपुर में बुरका पहनकर प्रवेश किया । जबकि कोलकाता में दो साल में वह कभी बुरका पहनकर शहर में नहीं निकली । लेकिन वसुंधरा ने तसलीमा को अपने यहां एक रात भी गुजारने नहीं दिया और पश्चिम बंगाल सरकार पर यह आरोप मढ़कर उन्हें केन्द्र सरकार के हवाले कर दिया कि पश्चिम बंगाल पुलिस ने उन्हें तसलीमा के आने की सूचना नहीं दी, इसलिये उनकी सुरक्षा मुश्किल है । पश्चिम बंगाल विधान सभा में नवम्बर में जब तसलीमा को लेकर हंगामा हुआ तो विधान सभा अध्यक्ष एच-ए. हालीम ने तसलीमा की किताबों को ‘पोर्नोग्राफी’ का दस्तावेज करार दिया । 2008 के फरवरी और सितम्बर में तसलीमा नसरीन को तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अज्ञात ‘सुरक्षित’ आश्रय स्थल(दिल्ली के बाहरी इलाके में) में रखने के बाद निर्देश दिया कि तसलीमा ‘परंपरागत अतिथि सत्कार’ का ‘आनन्द’ उठा रही हैं । लेकिन उनसे उम्मीद की जाती है कि मुंह सिलकर रखें और ऐसी बातें न बोले जिससे भारत में लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचे । तसलीमा का कहना है कि कोलकाता में उनका दिल बसता है और दिल्ली में शरीर । कोलकाता में उनके प्रवेश पर पाबंदी है और दिल्ली में उनके मुंह पर । नवम्बर, 2007 से वे इसी स्थिति में रह रही हैं । 2008 में दो बार दिल्ली से भगाये जाने के बाद तसलीमा ने लंदन और स्वीडन पहुंचकर आखिरकार कह ही डाला कि ‘दिल्ली का सुरक्षित स्थान उनके लिये कैदखाने जैसा था, तथा वे मौत के चैम्बर से निकली हैं’ । भाजपा और संघ परिवार ने उनके लिये 2008 में केन्द्र से स्थायी शरणार्थी का दर्जा देने की मांग की । उसके पहले 2007 के अंत में राजस्थान से निकाल बाहर किये जाने के बाद तसलीमा को अपने यहां ‘शरण’ देनेवालों में सबसे पहले थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रमुख के-एस-सुदर्शन । और उसके बाद बारी-बारी से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने यहां रहने को आमंत्रित किया । एक तो मुस्लिम और उसमें भी अपने ही मजहब, कुरआन शरीफ की कुरीतियों को उजागर करने वाली, ऐसी महिला को अपने घर बुलाने में भाजपा का आगे आने का कारण आसानी से समझ में आता है । जबकि उस समय कोई भी ‘सेक्यूलर’ सरकार तसलीमा को अपने घर में क्या, देश में भी रहने देने को तैयार नहीं थी ।