नगालैंड के 6 पूर्वी जिलों को मिलाकर अलग आदिवासी राज्य की मांग पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि चुनाव के बाद उनकी मांगें पूरी की जाएंगी । 27 फरवरी को होनेवाले मतदान के लिए प्रचार के दौरान राज्य के मोन जिले में उन्होंने 20 फरवरी को एक चुनावी सभा में यह वायदा किया । केंद्रीय गृह मंत्री के साथ मंच पर पूर्वी नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन(म्छच्) के अध्यक्ष सापिकू सेंगटमए कोन्यक आदिवासी यूनियन के प्रमुख टिंगथोक कोन्यक और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो भी मौजूद थे ।

केंद्रीय गृह मंत्री ने नगा शांति प्रक्रिया और सबसे पुराने अलगाववादी झमेले के हल का कोई जिक्र नहीं किया । मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने रैली को संबोधित करते हुए सिर्फ इतना कहा कि भाजपा नीत केंद्र नगा राजनीतिक समस्या का समाधान निकालने के लिए काम कर रहा है ।

‘अलग संविधान और अलग झंडा’ के बिना कोई समझौता न करने पर अड़े नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम(एनएससीएन.प्ड.आइसाक मुइवा) समेत विभिन्न नगा गुटों से वार्ता लगभग ठप्प है । संघर्षविराम सहमति और 2015 में हुई समाधान की ‘फ्रेमवर्क डील’ के आगे कुछ ठोस सामने नहीं आया है । अलग ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’(राष्ट्र) ऐसी मांग है, जो भारत के संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत पूरी नहीं की जा सकती । लेकिन 2003 के बाद से नगालैंड का यह पहला विधान सभा चुनाव है, जिसमें भाजपा के किसी वरि’ नेता ने पार्टी के पक्ष में प्रचार के दौरान इस नगा राजनीतिक समस्या के हल का जिक्र नहीं किया । 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कदम आगे बढ़कर कोहिमा में चुनावी रैली में कहा कि नगा झमेले का हल निकालने के लिए अगर जरूरत पड़ी तो वे संविधान में संशोधन को तैयार हैं ।

उसका अच्छा संदेश मतदाताओं के बीच गया और भाजपा का खाता खुला । पहली बार भाजपा ने विधान सभा की 7 सीटें जीती । अभी नेफियू रियो के नेतृत्ववाले नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (छक्च) गठजोड़ में भाजपा शामिल है । भाजपा के वाई पेट्टन(ल् च्ज्जजंद) उप मुख्यमंत्री हैं ।

आजादी के समय से चला आ रहा नगा उग्रवादी वास्तव में अलगाववाद है । नगा उग्रवादियों को भारत के संघीय व्यवस्था के दायरे से बाहर स्वतंत्र अस्तित्व चाहिए । केंद्र सरकार पर दबाव बनने के लिए इस मांग के समर्थन में हिंसा और भारतीय संविधान सम्मत लोकतांत्रिक प्रक्रिया चुनाव बायकाट के लिए मतदाताओं को उकसाने का प्रयास किया गया था ।

बायकाट का नया तेवर लेकर इस चुनाव में एक संगठन म्छच्(इस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन) सुर्खियों में आया ।

हिंसा, बायकाट और बेनतीजा शांति वार्ताओं से थके मतदाताओं और जन प्रतिनिधियों ने इसे स्वीकार नहीं किया । केंद्र सरकार ने भी चुनाव समर्थक जन भावनाओं और अलग राज्य फ्रंटियर नगालैंड ( थ्त्वदजपमत छंहंसंदक) के पीछे असंतोष को गंभीरता से लिया ।

भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा त्रिपुरा विधान सभा चुनाव प्रचार की अवधि समाप्त होते ही नगालैंड विधान सभा चुनाव के लिए पार्टी का घोषणापत्र जारी करने 14 फरवरी को वहां पहुंच गए । कोहिमा में अपनी पार्टी और गठजोड़ घटक छक्छ की संयुक्त रैली में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने 14 फरवरी को अपनी पार्टी का घोषणा पत्र जारी करते हुए नगालैंड के 6 पूर्वी जिलों के लिए अलग विकास बोर्ड तथा विशेष पैकेज का वायदा किया । नड्डा ने हर महीने मुफ्त चावलए गेहूं के अलावे रियायती दाम पर हरएक परिवार को एक लीटर त्रैमासिक सरसों तेल मुहैया कराने का भी वायदा किया । उन्होंने भी नगा शांति प्रक्रिया और इस समस्या के हल की प्रतिबद्धता नहीं दुहरायी । उसके एक हफ्ते बाद 20 फरवरी को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नगालैंड पहुंचे । उनकी चुनाव रैली में ‘फ्रंटियर नगालैंड’ राज्य की मांग करनेवाले पूर्वी नगालैंड के दोनों नेता मौजूद थे । केंद्रीय गृह मंत्रालय के आश्वासन पर ही इएनपीओ नेताओं ने चुनाव बायकाट वापस ले लिया । नगालैंड की 60 विधान सभा सीटों में से 20 पूर्वी आदिवासी जिलों में पड़ती है । राज्य की 30 प्रतिशत आबादी इन्हीं छह पूर्वी जिलों में रहती है । ये जिले हैं. मोनए तुएन्सांगए फीकाइरए लोंगलेंगए नोकलाक और शामाटोर । अलग राज्य की मांग उठाने के पीछे इन जिलों के लोगों का कहना है कि आज तक किसी सरकार ने उनके इलाकों के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया । अन्य जिलों की तुलना में ये छह जिले हर क्षेत्र में पिछड़े हैं, जबकि यहां के मतदाताओं ने हमेशा मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया । 18 जनवरी को चुनाव आयोग ने त्रिपुरा के साथ नगालैंड और मेघालय के लिए चुनाव कार्यक्रम की अधिसूचना जारी की । उसी के बाद इएनपीओ से सबद्ध पूर्वी नगा आदिवासी समुदायों ने चुनाव बायकाट का एलान कर दिया । इएनपीओ ने कहा कि जबतक उनकी अलग राज्य की मांग पूरी नहीं होती वे चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगेए किसी को पर्चे दायर नहीं करने देंगे और न ही कोई चुनाव रैली होने देंगे । इन छह जिलों के 20 विधायकों ने बायकाट आह्वान ठुकरा दिया, जिनमें भाजपा के भी हैं । लेकिन बात बनी नहीं । उसके बाद राज्य के भाजपा नेताओं के आग्रह पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पूर्वी जिले के नेताओं से कई दौर की वार्ता चलायी । आखिरकार चुनाव बाद समस्या का हल निकालने के आश्वासन पर 04 फरवरी को इएनपीओ ने बायकाट वापस ले लिया । पूर्वी नगालैंड को अलग ष्ठफ्रंटियर नगालैंड’ राज्य का दर्जा विशेष प्रावधानों के साथ देने की मांग तो एक दशक पुरानी है । सिर्फ उसका तेवर और कलेवर नया है । भाजपा नेताओं ने अपने चुनावी वायदे में विकास पर जोर दिया, मगर अलग राज्य की मांग पर कोई वायदा नहीं किया । इएनपीओ ने इस क्षेत्र में ‘विकास घाटा’ के मुद्दे पर अलग राज्य की मांग से सम्बधित ज्ञापन प्रधानमंत्री कार्यालय को 2010 में सौंपा था । नगा शांति प्रक्रिया के ठंडे बस्ते में जाने की हालत में ष्ठफ्रंटियर नगालैंड’ राज्य की मांग में गर्मी अगस्त, 2022 में आयी । नगालैंड राज्य के सभी विधायकों ने जुलाई, 2022 में दलगत भावना को परे रखकर केंद्र से आग्रह किया कि एनएनसीएन(आईएम) से ष्ठअलग झंडा और संविधान’ जैसे मुद्दे पर बातचीत की जाए, जो अंतिम समझौते के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है । सारे विधायकों ने इस मामले में एकजुटता दिखाते हुए संसदीय समिति बनायी, जिसमें राज्य के दो संसद सदस्य भी शामिल हुए । विधान सभा में विपक्ष की कुर्सी खाली हो गयी । हताशा की इसी स्थिति में पूर्वी नगालैंड का यह संगठन इएनपीओ जगा और एक प्रस्ताव पारित करके अगस्त, 2022 में ही एलान कर दिया कि अगर ष्ठफ्रंटियर नगालैंड’ राज्य की मांग पूरी नहीं हुई तो पूर्वी नगालैंड के 6 जिले फरवरी, 2023 विधान सभा चुनाव से अलग रहेंगे । जब जनवरी, 2023 में चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम की अधिसूचना जारी की तो, तो इएनपीओ ने अपने बायकाट आह्वान को तेज कर दिया । नगालैंड के विधायकगण भी चुनाव से पहले नगा समस्या का अंतिम हल निकालने के पक्ष में थे ।

अमित शाह और जे. पी. नड्डा जैसे हाई प्रोफाईल नेताओं के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे 21 फरवरी को नगालैंड पहुंचे । यूयूकेडीमा में चुनाव रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने भी नगा शांति प्रक्रिया या अलगाववाद से जूझते राज्य की किसी समस्या का जिक्र नहीं किया । कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने 2024 लोकसभा चुनाव पर फोकस किया और कहा कि गैर.भाजपा गठजोड़ केंद्र में सत्ता में आएगी जिसका नेतृत्व कांग्रेस करेगी ।

नगालैंड के अखबार ‘दीमापुर पोस्ट’ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार नगा शांति प्रक्रिया के डंप होने के पीछे नगा नेताओं का असंतोष इस बात को लेकर है कि वे पुलिस अधिकारियों के बजाए राजनीतिज्ञों से वार्ता के पक्ष में हैं । पूर्व खुफिया प्रमुख आर. एन. रवि ने नगा नेताओं को बातचीत के टेबुल तक लाने में 2018 विधान सभा चुनाव से पहले कुछ हद तक सफलता हासिल की । चुनाव में भाजपा को इसका फायदा भी मिला । लेकिन नगालैंड के राज्यपाल बनाए जाने के बाद आर. एन. रवि नगा नेताओं का विश्वास कायम नहीं रख पाए और उन्हें वहां से हटाकर तमिलनाडु भेज दिया गया । भाजपा नेता जगदीश मुखी का नगालैंड के राज्यपाल के रूप में कार्यकाल संतोषजनक नहीं समझा गया । इसलिए मतदान के 15 दिन पहले मणिपुर से ला गणेसन को लाकर नगालैंड का राज्यपाल बनाया गया, जो तमिलनाडु में भाजपा के नेता रहे हैं ।

एक रिपोर्ट है कि नगालैंड सरकार इस बार अपने चहेते डीजीपी के जरिए चुनाव के दौरान कानून व व्यवस्था बनाए रखने की हिमायती थी । टी. जॉन लोंगकुमेर का अगस्त, 2022 में जब रिटायरमेंट करीब आया तो केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन्हें 6 महीने का विस्तार दिया । राज्य सरकार ने यूपीएससी द्वारा 1992 बैच आईपीएस अधिकारी रूपिन शर्मा को डीजीपी बनाने की सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । सुप्रीम कोर्ट ने यूपीएससी सिफारिश को सही ठहराया और नगालैंड सरकार को रूपिन शर्मा को डीजीपी नियुक्त करना पड़ा ।

इसाई मिशनरी प्रभुत्व वाले नगालैंड में जनजातीय संगठन किसी भी अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा सक्रिय हैं । उन्हें अपनी रीति-रिवाजए रस्मए ‘विशिष्ट संस्कृति’ पर बहुत नाज है, जो अलगाववादी राजनीति पर भी हावी है । उनके रस्मी कानून संविधान के कानूनों से भी ‘ऊपर’ है । लेकिन सब पर हावी है, महिलाओं के प्रति इस आदिवासी बहुल नगालैंड के लोगों का संकीर्ण और समय से काफी पीछे चलनेवाला दकियासूनी नजरिया । घर से बाहर तक महिलाएं प्रमुख भूमिका निभाती हैं । लेकिन कोई भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय पार्टी महिलाओं को जनप्रतिनिधि के रूप में नहीं देखना चाहती ।

60 सीटों के लिए 184 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें महिला उम्मीदवार सिर्फ 4 हैं । महिला संगठनों द्वारा आवाज उठाने के बाद चार दलों ने एक.एक महिला को टिकट दिया है । इस बार चर्चा है कि कम.से.कम एक उम्मीदवार को जीतना चाहिए । अगर ऐसा हुआ तो 14वीं विधान सभा के साथ नगालैंड का नया इतिहास शुरू होगा । पहली बार कोई महिला विधायक बनेंगी । महिलाओं ने ही शराब और पैसे के प्रलोभन पर वोट डालने के खिलाफ अभियान चला रखा है ।

नगालैंड, मणिपुर समेत अमूमन सभी पूर्वोत्तर राज्यों में ।थ्च।(अफ्स्पा). आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट) को लेकर भारी रोष है, जिसके तहत सेना और अर्द्धसैनिक बलों को केंद्र तैनाती करता है ।

इस बार नगालैंड से पहले त्रिपुरा विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बार-बार कहा कि पूर्वोत्तर के अधिकांश इलाकों से थ्थ्च हटा लिया गया है । पूर्वी नगालैंड के मोन जिले में चुनाव रैली अमित शाह ने कुछ खास कारण से आयोजित किया था । मोन जिले में 04.12.2021 को सेना की फायरिंग में 6 लोग मारे गए । उसको लेकर संसद से लेकर नगालैंड विधान सभा तक में हंगामा मचा । रिपोर्ट है कि सेना ने ‘गलती’ से उन्हें उग्रवादी समझकर गोली चला दी । 07.12.2021 को नगालैंड मंत्रिमंडल की आपात् बैठक में केंद्र से थ्थ्च हटाने की मांग की गयी । डीजीपी टी. जॉन लोंगकुमेर और आयुक्त टोविलातुओ मोर ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा कि सेना ने फायरिंग से पहले लोगों की पहचान करने की कोशिश नहीं की और घात लगाकर हमला किया । शवों को तिरपाल में लिपटा देखने के बाद भड़के ग्रामीणों का जख्म भरा नहीं है । अमित शाह के मोन जाकर रैली करने से टीस शायद कम हो ।

अपनी दूसरी रैली भी अमित शाह ने पूर्वी नगालैंड के ही तुऐनसांग में 21 फरवरी को की जिसमें नगा शांति प्रक्रिया का अंतिम हल निकालने का कोई ठोस वायदा नहीं किया, लेकिन वहाँ भी इस बात को दुहराया की नगालैंड के बड़े हिस्से से थ्थ्च हटा लिया गया है ।