तेलंगाना राज्य गठन बिल लाने की मांग को लेकर कांग्रेस समेत तेलंगाना राष्ट्रत्र समिति द्धटी0आर0एस0ऋ सदस्यों ने लगातार चौथे दिन लोकसभा की कार्यवाही नहीं चलने दी। आंध्र प्रदेश विधानसभा का भी चारों दिन यही हाल रहा। कांग्रेस आलाकमान के आंध्र प्रदेश मामलों के प्रभारी केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद की पार्टी सांसदों के साथ मान-मनौव्वल की सारी वार्ताएं किल रही है। तेलंगाना के करीमनगर क्षेत्र से जीते कांग्रेस सदस्य पोन्नम प्रभाकर ने चन्द्रज्ञेखर राव की तरह स कह दिया कि अब सि बातचीत से बात बनने वाली नहीं, तेलंगाना बिल संसद में पेज़ किये जाने तक हंगामा जारी रहेगा।
राज्य सभा में भी अन्य मुद्दों पर तेलंगाना हावी रहा। तेलंगाना राष्ट्रत्र समिति नेता के0 चन्द्रज़ेखर राव के साथ मिलकर लोक सभा में कांग्रेस सदस्यों ने प्रभाकर के नेतृत्व में पहले स्पीकर मीरा कुमार को दो बार और रि डिप्टी स्पीकर करिया मुण्डा को दिनभर के लिए कार्यवाही स्थगित करने को मजबूर कर दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गत् बुधावार को हंगामें के दौरान मौजूद थे। विपक्षी नेता सुषमा स्वराज ने आर्मी ची जनरल वी0के0 सिंह वाले मामलें में ब्रेक देकर सरकार से जाना चाहा कि न तो तेलंगाना राज्य गठन बिल लाया जा रहा है, न ही आन्दोलनकारियों से वार्ता हो रही है, आखिर माजरा क्या है। पहले की तरह इस समें भी जारू होने के दिन से तेलंगाना पर हंगामा चल रहा है। उधार आन्ध्र प्रदेश विधानसभा स्पीकर नदेंडिया मनोहर ने सारे विपक्षी सदस्यों की ओर से पेज़ कार्यस्थगन प्रस्ताव तो नामंजूर कर दिया, लेकिन वे संदन में कोई कामकाज नहीं चला पाये। हैदराबाद से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार अबकी नये सिरे से शुरू होए तेलंगाना आन्दोलन के दौरान दो दिनों में दो छात्रें द्वारा आत्महत्या किये जाने को ह्असंवैधानिकह्र तरीका बताते हुये स्पीकर जब प्रभावित परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त कर रहे थे, उस समय सदन में तेलंगाना से जीते अधिकांज़ कांग्रेसी भी विपक्षी सदस्यों के साथ संदन से बाहर थे।
कांग्रेस सांसदोंं ने दिल्ली से और हैदराबाद से एक साथ बयान जारी करके आलाकमान को चेता दिया है कि तेलंगाना मसले का हल दिल्ली में बैठकर बातचीत से नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि राज्य का दर्जा देने के वायदे पर जीते प्रतिनिधि उसके बाद अपने मतदाताओं के बीच जाने की स्थिति में नहीं होते और अपनी पहचान कायम रखने पर संकट है। पोन्नम प्रभाकर ने केन्द्रीय गृह मंत्री पी0 चिदंबरम का यह बयान खारिज कर दिया कि तेलंगाना पर बिल तब तक नही लाया जा सकता, जबतक राज्य की अन्य प्रमुख पार्टियां अपना रवैया स्पष्टट न करें।
इसी महीने हुये उपचुनाव में आन्ध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र की सात विधान सभा सीटों पर कांग्रेस का स्फाया हो गया। इन सीटों से टी0आर0एस0 और इसके समर्थक उम्मीदवार जीते, जिन्होने तेलंगाना राज्य गठन पर दबाव बनाने के लिए दुबारा सदस्यता से इस्तीफा दिया था। प्रदेश से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस नेतृत्व को इससे बड़े सम्भावित सदमे का सामना करने का उपाय नहीं सूझ रहा है। क्योंकि अभी रि 17 विधान सभा सीटो के लिए उपचुनाव होने हैं। चुनौती देने वाले कांग्रेस से ही निकले विधायक है, जिन्होने विक्षुब्धा गुट के नेता जगनमोहन रड्डी के प्रति कादारी निभाई और सत्तारूढ़ दल में रहते हुये पार्टी ह्विप का उल्लंघन करके सरकार के खिलाफ अविज़्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाला। संविधान की 10 वीं अनुसूची के तहत इन 17 सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी गई। अपने पिता के नाम पर चल रही जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाई0एस0 राजज़ेखर रेड्डी द्धवाई0एस0आर0 कांग्रेसऋ के भी एक उम्मीदवार तेलंगाना की कोवूर सीट से टी0आर0एस0 के समर्थन से जीते है। कांग्रेस के लिए इन सात सीटों पर उम्मीदवारों का चयन करना कठिन हो रहा था। क्योंकि पिछले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने तेलंगाना में सबसे ज्यादा सीटे राज्य गठन की हप्रतिबद्धाताह्र वायदे पर जीती। अबकी वे तेलंगाना मतदाताओं को हआज़्वस्तह्न नही कर पाये। पार्टी के प्रदेश युनिट से लेकर मंत्रिंडल में गामिल तेलंगाना के मंत्रियों का भी मुख्यमंत्री किरन कुमार रेड्डी से यह मतभेद दूर नहीं हो पाया कि तेलंगाना में उम्मीदवार खड़े किये जायें या नही
उधार तेलंगाना राष्ट्रट्र समिति का उत्साहित होना स्वाभाविक है। इस पार्टी के सदस्यों की संख्या विधान सभा में बढकर 16 हो गई। महबूब नगर सीट पर भाजपा उम्मीदवार को भी हराने की कांग्रेस की जी तोड़ कोज़िज़ बेकार गई। प्रमुख विपक्षी दल तेलुगू देसम पार्टी प्रमुख चन्द्रबाबू नायडू को भी तेलंगाना के मतदाताओं ने सबक सिखाया, जो अपने राजनीतिक मतलब के हिसाब से तेलंगाना पर रवैया बदलते हैं। उनकी पार्टी से अलग हुये विधायक टी0आर0एस0 समर्थन से जीते, बाकी सब हार गये।
तेलुगू देज़म पार्टी की ओर से 2011 गीतकालीन सत्र में पेज़ अविज़्वास प्रस्ताव में तेलंगाना मुख्य मुद्दा था। अभी सारे गैर कांग्रेसी दलों ने एकजुट होकर इस मुद्दे पर सरकार की घेराबन्दी कर रखी है और सत्तापक्ष के सदस्यों को दुविधाा में डाला हुआ है। उधार संसद से लेकर विधान सभा और सड़क तक एक साथ आन्दोलन चल रहा है। एक बार फिर 2010 वाली स्थिति का दौर शुरू हो गया है, जब श्रीकृष्ण आयोग की गोलमटोल रिपोर्ट आने के बाद इस्तीफा और आम हड़ताल से महीनों तक जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा। 2011 में भी वो सिलसिला चला। उस समय तेलंगाना समर्थक छात्रें का आत्मदाह आन्दोलन के बीच में शुरू हुआ। इस बार शुरूआत ही आत्महत्या से हुई है। कांग्रेस को पार्टी के अस्तित्व के साथ-साथ दो साल बाद होने वाले विधान सभा और लोकसभा चुनाव की भी चिन्ता है। अगले उपचुनाव में ही बचीखुची कसर पूरी हो जायेगी और कांग्रेस के लिए भविष्ठय का आकलन करना आसान हो जायेगा। प्रदेश में कोई नेता 17 सीटें जगनमोहन खेमे से छीनने का दावा करने की स्थिति में नहीं हैं। जबकि वाई0एस0आर0 कांग्रेस ने कांग्रेसियों को खुली चुनौती दे रखी है। पिछले चुनाव में तेलंगाना की कुल 119 विधान सभा सीटों में 56 और कुल 17 लोकसभा सीटों में से 12 पर जीत हासिल करने वाले कांग्रेस सदस्यों को आलाकमान के प्रति कादारी निभाने के चक्कर में मतदाताओं के प्रति कादारी हाथ से निकल जाने का डर सता रहा है। लम्बे समय तक आज्वासन देकर तेलंगाना आन्दोलन दबाने और कमजोर करने की कोज़िज़ बार-बार नाकामयाब होने के बावजूद टालमटोल रवैया का कारण वे अपने मतदाताओं को कैसे समझायें। वे अगले चुनाव के संकट से भी आलाकमान को आगाह कर चुके हैं।
जुटाने भर के लिए तो कांग्रेस के पास इतनी गिनती है कि 17 और सीटें गंवाने बावजूद सरकार फिलहाल तो अल्पमत में नहीं आयेगी, लेकिन तलवार की धार पर बहुमत बनाये रखने वाली गाड़ी कभी-भी पटरी से उतर सकती है।
पिछले वर्षा 1 दिसम्बर से विधानसभा कागीतकालीन सत्रगुरू होने से मात्र दो दिन पहले स्पीकर ने उन 24 कांग्रेसी विधायको के इस्तीफे पर निर्णय लिया, जो चार महीने से हविचाराधीनह्र था। उनके इस्तीफे नामंजूर कर दिये गयें। इस सत्र में अविज़्वास प्रस्ताव पर 16 घंटे बहस के अलावे और कोई कामकाज नही हुआ। प्रस्ताव जरूर गिर गया, लेकिन र्फि कहने के लिए सरकार बची। समर्थन में 160 और विरोधा में 122 वोट पड़े। यानी कि बहुत मामूली अन्तर से सरकार बची कांग्रेस आलाकमान को पहले से इसकी भनक थी, इसलिए नवम्बर में ही प्रजा राज्यम पार्टी का कांग्रेस में विलय करा लिया गया तो भी उसके एक विधायक ने अविज़्वास प्रस्ताव कें समर्थन में वोट डाला।
लोक सभा स्पीकर मीरा कुमार ने भी 2011 में संसद के जीतकालीन सञ्चारू होने से दो दिन पहले तेलंगाना समर्थक 12 सदस्यों द्धजिनमें आठ कांग्रेसीऋ का इस्तीफा नामंजूर कर दिया। इस पर वे चार महीने से ‘विचार’ कर रही थी। लोकसभा सचिवालय सूत्रें के मुताबिक इनके इस्तीफे नियम-240 के अनुकूल नहीं पाए गए, जिसके अन्तर्गत किसी सदस्य को इस्तीफे का कारण नहीं बताना है। लेकिन उसके बाद से हर दिन तेलंगाना राज्य गठन की मांग वाली तख्तियां व बैनर लिए कांग्रेसी सदस्य गतिरोधा से पहले और उसके बाद भी सदन के अंदर व बाहर नारेबाजी करते नजर आए। तेलंगाना समर्थन 97 वर्षीय स्वतंत्रता संनानी आचार्य कोंडा लक्ष्मण बापूजी की जंतरमंतर पर धारना जारी रहा।