नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि ने मुख्यमंत्री नेफियू रियो को कड़ा पत्र लिखकर राज्य में कानून व व्यवस्था की हालत ‘गंभीर’ बतायी है और कहा है कि सशस्त्र गिरोहों की तथाकथित समानान्तर सरकारें टैक्स वसूल रही है, जिस पर राज्य सरकार का कोई जोर नहीं चल रहा है ।

राज्यपाल ने अपने पत्र में किसी नगा गुट का नाम नहीं लिया, मगर उनके कहने का तात्पर्य वही था । इन नगा गुटों के सिरमौर अथवा राज्यपाल के शब्दों में यों कहें कि ‘सशस्त्र गिरोहों’ के सरगना नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम(एनएससीएन-आइसाक मुइवा) ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम सरकार’ का दावा करता है । सबसे पुराने और संगठित इस गुट की भारत सरकार से 23 वर्षों से बेनतीजा वार्ता चल रही है । 1997 में सिर्फ संघर्षविराम सहमति बनी और सिर्फ इतना समझौता हुआ कि हिंसा रोकने के लिए दोनों पक्ष एक-दूसरे पर हमले नहीं करेंगे । उस समय से शांति वार्ता जारी है । एनएससीएन(आईएम) की अपनी समानान्तर पुलिस और अर्द्धसैनिक बल है ।

नगा वार्ताकार और राज्यपाल ने नयी बात क्या कह दी, जिस लेकर राज्य सरकार पसोपेस में हैं । नेफियू रियो के नेतृत्ववाली नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी(एनडीपीपी) गठजोड़ सरकार में भाजपा मुख्य घटक है । भाजपा कोटे से वाई. पेट्टन उपमुख्यमंत्री हैं और गृह मंत्रालय भी उन्हीं के जिम्मे है । ऐसी स्थिति में राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में लिखा कि कानून व व्यवस्था की हालत खस्ता हो चुकी है और देश की संप्रभुता तथा अखंडता पर सवाल उठानेवाले सशस्त्र गिरोहों ने सरकारी व्यवस्था को चुनौती दे रखी है । अपने चार पृष्ठों के पत्र में आर. एन. रवि ने लिखा कि विकास फंड का पैसा इन गिरोहों की वसूली में जा रहा है । राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को लिखा कि कानून व व्यवस्था से जुड़े जिला स्तर से ऊपर के ‘अधिकारियों का तबादला और नियुक्ति’ राज्यपाल की मंजूरी से होगी, जैसा कि संविधान की धारा 371ए(1)(बी) में प्रस्तावित है । राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को चेताया कि ऐसो हालत में वे अपने संवैधानिक दायित्व निभाने से मुकर नहीं सकते ।

राज्यपाल के पत्र का जवाब 10 दिन बाद एनएससीएन(आईएम) ने दिया और अपनी ‘संप्रभु सरकार’ की टैक्स वसूली को उचित ठहराया । एनएससीएन(आईएम) ने राज्यपाल के ‘गिरोह’ और ‘वसूली’ शब्द पर एतराज करते हुए अपने जवाब में कहा कि टैक्स लेना किसी भी राष्ट्र तथा संप्रभु लोगों का अधिकार है । एनएससीएन (आईएम) ने वार्ताकार आर. एन. रवि के पत्र की प्रतिक्रिया में कहा कि अपने अधिकारों के लिए अभी तक चले नगा राजनीतिक आंदोलन के अस्तित्व में होने का आधार टैक्स लेवी है और पहले के वार्ताकारों ने इसे जायज तौर पर स्वीकारा ।

आर. एन. रवि के प्रयासों से एनएससीएन(आईएम) को समझौते के टेबूल पर लाया जा सका और तीन अगस्त, 2015 को एक डील हुआ जिसे ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ कहा जाता है । दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी में इस डील पर हस्ताक्षर हुए । वहां आर. एन. रवि मौजूद थे । नरेंद्र मोदी जब पहली बार 2014 में प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने जिस पुरानी जटिल समस्याओं को गंभीरता से लिया, उनमें से एक है, नगा झंझट । उसके लिए आर. एन. रवि को वार्ताकार नियुक्त किया गया ।

2019 में दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने आर. एन. रवि को नगालैंड का राज्यपाल बनाकर बेनतीजा शांति वार्ता का अंत और स्थायी समाधान करने कहा । उसके लिए प्रधानमंत्री ने 31 अक्टूबर, 2019 तक की डेडलाइन दी । वार्ताओं के दौरान आर. एन. रवि राज्य सरकार की स्थिति तथा नगा गुटों की दबंग हैसियत से अच्छी तरह वाकिफ हो चुके हैं । एनएससीएन(आईएम) ने वही कहा, जिसके चलते अंतिम समझौता नहीं हो पाया । एनएससीएन(आईएम) इस बात पर अड़ा रह गया कि ‘अलग झंडा और अलग येझाबो’ (संविधान) से कोई समझौता नहीं किया जाएगा ।

अक्टूबर में ही जब राज्यपाल ने ‘अलग झंडा और संविधान’ की शर्त को खारिज कर दिया, तो मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने उस पर कोई टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया । मुख्यमंत्री यह बोलने को तैयार नहीं हुए कि राज्यपाल ने जो कुछ कहा, वो राज्य सरकार की राय है । राज्यपाल ने एनएससीएन(आईएम) पर स्थायी समाधान को लटकाए रखने का आरोप लगाया और कहा कि बंदूक की नोक पर वार्ताएं स्वीकार्य नहीं हैं ।

ऐसा पहली बार हुआ है, जब नगालैंड के राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को कानून व व्यवस्था के लिये पत्र लिखा और उसका जवाब पहले नगा गुट ने दिया । 23 वर्षों में आर. एन. रवि पहले नगा वार्ताकार हैं, जो राज्यपाल बनाए गए हैं । मुख्यमंत्री ने दो दिन बाद 30 जून को राज्यपाल के पत्र का जवाब देते हुए कहा कि संघर्षविराम के पहले की अपेक्षा कानून व व्यवस्था की स्थिति आज बेहतर है । मुख्यमंत्री ने राज्यपाल के पत्र का जवाब कोहिमा में संवाददाता सम्मेलन में दिया, जिसमें उन्होंने 19 जून को राजभवन में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक का जिक्र किया । मुख्यमंत्री के अनुसार बैठक में राज्यपाल ने वो पत्र पढ़ा, जो उन्होंने भेजा था । मुख्यमंत्री के अनुसार उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री वाई पेट्टन ने राज्यपाल को कानून व व्यवस्था की स्थिति से अवगत करा दिया था ।

मुख्यमंत्री ने कहा कि 1990 और 1960 के दशक की संघर्षविराम वषां के मुकाबले कानून व व्यवस्था के हालात बेहतर हैं । मुख्यमंत्री ने राज्यपाल के अन्य किसी भी मजमून का जवाब नहीं दिया, न ही एनएससीएन (आईएम) का नाम लिया । नगा नेशनल पोलिटिकल गुट के बैनर तले जिन सात नगा गुटों के साथ संघर्षविराम समझौते में नवंबर, 2017 में आर. एन. रवि को सफलता मिली, उसने भी वसूली में शामिल होने से इन्कार किया । मुख्यमंत्री ने एक प्रकार से एनएससीएन(आईएम) की ‘समानान्तर सरकार’ की सफाई से सहमति जतायी कि वो ‘वसूली’ नहीं जायज टैक्स लेते हैं ।

राज्यपाल ने जो कुछ मुख्यमंत्री को लिखा वो कई गंभीर सवाल पैदा करनेवाले हैं । राज्यपाल के अनुसार राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक जैसे शीर्ष अधिकारी भी सशस्त्र गिरोहों का कुछ बिगाड़ नहीं पाते । वन विभाग के अधिकारियों के आवासों में घुसकर ये गुट उन्हें अगवा कर लेते हैं और फिरौती वसूलते हैं । आर. एन. रवि के शब्दों में ‘कानून अनुपालन’ अधिकारियों के कमजोर पड़ने का कारण जब मैं पूछता हूं, तो वे चुप लगा जाते हैं और फुसफुसाते हैं - ‘ऊपर से आदेश है ।’ बाहर से आनेवाले सामान लदे ट्रकों की शिकायत है कि सशस्त्र गिरोहों को टैक्स देना पड़ता है, इन गिरोहों ने नमक से लेकर निर्माण सामग्रियों तक के अपने डीलर रखे हैं, यह बात राज्यपाल ने कही है । नगा गुटों की स्वयंभू ‘समानान्तर सरकारों’ की कानून व व्यवस्था पर भारत सरकार का भी जोर नहीं चल पाता । ऐसा होता तो हिंसा रोकने के लिए भारतीय संविधान को नकारने वाले संघर्ष विराम तक हो शांति वार्ता नहीं अटकी रहती । राज्य सरकार की कानून व व्यवस्था ‘ठीक’ करने के लिए अगर संवैधानिक दायित्व राज्यपाल ने निभाया तो राज भवन दूसरा संविधान सम्मत सत्ता केंद्र बन सकता है ।

राज्यपाल का कड़ा पत्र असहज सच है । एनएससीएन(आईएम) ने उसकी प्रतिक्रिया में खुद को अन्य नगा गुटों से अलग बताते हुए कहा कि यह टैक्स लोग नगालिम पीपुल्स रिपब्लिक सरकार को देते हैं । सभी नगा गुट इसे ‘स्वयंभू सरकारों’ को दिया जानेवाला टैक्स बताते हैं । कई सरकारों के कानून से त्रस्त लोग भांति भांति के टैक्स चुकाने को मजबूर हैं ।

एनएससीएन(आईएम) सभी सरकारी और निजी वेतनभोगी कर्मचारियों से एक महीने की आय का 25% वसूलता है जो साल में एक बार देना होता है । अभी इस संगठन ने टैक्स दर 5% से घटाकर 3% कर दिया और इसका कारण कोरोना लॉकडाउन के कारण आर्थिक संकट बताया । मगर जानकार लोग इसे राज्यपाल के पत्र का असर मानते हैं ।

इस अराजक स्थिति के खिलाफ 2017 में बने हल्ला बोल संगठन ‘भ्रष्टाचार और बेतहासा टैक्स विरोध’ ने सभी उग्रवादी गुटों को एक मंच पर आने कहा ताकि लोगों को राहत मिले और ‘एक टैक्स एक सरकार’ को चुकाएं ।