मणिपुर केंद्रीय यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. आद्या प्रसाद पांडेय(निलंबित) केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की नाराजगी के बावजूद कुर्सी से चिपके रहने पर अड़े हैं । पूरे यूनिवर्सिटी कैंपस में अराजकता की स्थिति है । पढ़ाई-लिखाई से लेकर तमाम शैक्षणिक गतिविधियां ठप्प है । केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एचआरडी) के आदेशों की खुली अवहेलना करके उदंडता और उच्छंखलता पर अमादा कुलपति ने मंत्रालय को ही चुनौती दे डाली है । कुलपति के भारी वित्तीय हेराफेरी करने और यूनिवर्सिटी कैंपस में जबरन हिन्दुत्व अजेंडा थोपने के विरोध में तकरीबन चार महीने से छात्र-शिक्षक समेत सभी कर्मचारी यूनियन हड़ताल पर हैं ।

मई से शुरू हड़ताल के पहले तीन महीने तक तो केंद्र सरकार ने आखें बंद रखी । यहां तक कि मणिपुर के भाजपा मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के मौखिक रूप से केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर को कहने और फिर पत्र लिखने के बावजूद कुलपति के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई ।

जब एचआरडी मंत्रालय के लिए पल्ला झाड़ना कठिन हो गया, तब जाकर 23 अगस्त को छात्र-शिक्षक यूनियनों और केंद्रीय एचआरडी के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हुए । इस आश्वासन पर आंदोलनकारी छात्र हड़ताल वापस लेने को तैयार हुए कि कुलपति के खिलाफ कार्रवाई की जाए । सहमति इस वायदे पर बनी कि कुलपति आद्या प्रसाद पांडे के खिलाफ लगे वित्तीय गोलमाल और अन्य भ्रष्टाचार आरोपों की जांच कमिटी बनायी जाएगी । कुलपति पर यूनिवर्सिटी के विकास मद का पैसा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के खाते में भिजवाने का भी आरोप है । समझौते से पहले 2 अगस्त को ही मंत्रालय ने कुलपति को छुट्टी पर जाने को कह दिया गया और उनके खिलाफ आरोपों की जांच के लिए एक तथ्य खोजी टीम इंफाल भेजने की घोषणा भी कर दी गयी ।

तीन महीने से मणिपुर यूनिवर्सिटी के बिगड़े हालातों की लगातार आ रही रिपोर्टों के मद्देनजर एचआरडी मंत्रालय को ऐसा करना पड़ा । 23 अगस्त को समझौता होने के समय तक यूनिवर्सिटी के छात्र-शिक्षक और मणिपुर के लोग नहीं जानते थे कि कुलपति को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के किसी निर्देश की परवाह नहीं है । यह तब पता चला जब दो सितंबर को आद्या प्रसाद पांडे अचानक छुट्टी से वापस आकर कुलपति की कुर्सी पर बैठ गए और तुरंत कार्यवाहक वी सी(कुलपति) तथा रजिस्ट्रार को निलंबित कर दिया । कुलपति ने कर्मचारी और शिक्षक यूनियन पर प्रतिबंध लगाकर उनकी गतिविधियों पर भी पाबंदी लगा दी । कुलपति ने मणिपुर यूनिवर्सिटी एक्ट, 2005 का हवाला देते हुए कहा कि छात्र और कर्मचारी यूनियन के अस्तित्व का यूनिवर्सिटी एक्ट में प्रावधान नहीं है । कुलपति ने छात्रों और शिक्षकों को वैसे तोड़फोड़ और उपद्रवी गतिविधियों में शामिल होने का दोषी करार दिया जो मणिपुर में उग्रवादियों पर लगाये जाते हैं । उन्हीं पर काबू के लिए मणिपुर में कई दशकों से आफ्प्सा (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट) लागू है, जिसके अंतर्गत मणिपुर का सामान्य कानून व व्यवस्था प्रशासन भी सेना और अर्द्धसैनिक बलों की बदौलत चलता है । ‘वाई’(ल) श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त कुलपति ने यूनिवर्सिटी कैंपस को अर्द्धसैनिक बलों से पाट दिया और बड़ी संख्या में होस्टलों से छात्रों और शिक्षकों को खींचकर हवालात में डलवा दिए । शांत हुए छात्र फिर आगबबूला हो गए और कुलपति के निकाले जाने तक हड़ताल जारी रखने पर अड़ गए ।

एचआरडी मंत्रालय को कुलपति आद्या प्रसाद पांडे को निलंबित करने का आदेश जारी करना पड़ा । मणिपुर केंद्रीय यूनिवर्सिटी के विजिटर और चांसलर(कुलाधिपति) दोनों ही राष्ट्रपति हैं । मणिपुर की राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला यूनिवर्सिटी की रेक्टर हैं । कुलपति ने सिर के ऊपर से पानी गुजार दिया, तब उनके खिलाफ कार्रवाई की गयी । लेकिन उस समय तक लोग नहीं जानते थे कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय पर कुलपति भारी पड़ेंगे और मंत्रालय की अनुशासनात्मक कार्रवाई की धज्जियां उड़ जाएंगी । कुलपति ने एचआरडी मंत्रालय के जांच कमिटी गठित करने के अधिकार पर सवाल उठा दिया और इसे मणिपुर हाईकोर्ट में चुनौती भी दे डाली ।

छात्रों का उच्छंखल या उदंड होना कोई असामान्य बात नहीं है । वो उमर का तकाजा है । उसके लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई में दंड का भी प्रावधान नहीं है, ताकि छात्रों को बिगड़ने से रोका जाए । मगर जब एक केंद्रीय यूनिवर्सिटी का कुलपति ही बिगड़ जाए और सुधारने वाली व्यवस्था पर भारी पड़े तब क्या हो सकता है, उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है मणिपुर यूनिवर्सिटी । कुलपति की खुली उच्छखलता के पीछे असली कारण क्या है, वो बात अब उनकी मानमानी और एक शैक्षणिक संस्था को दूषित करने के अड़ियल रवैए से ज्यादा चर्चा में है । आद्या प्रसाद पांडे का नाम मणिपुर और उसके बाहर भी ‘बनारसी बाबू’ के रूप में मशहूर है । वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावक्षेत्र वाराणसी के रहनेवाले हैं और 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान पांडेजी ने नरेंद्र मोदी का चुनाव प्रचार प्रबंधन संभाल रखा था । अक्टूबर 2016 में जब केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार द्वारा आद्या प्रसाद पांडे मणिपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति बनाए गए, उसके कुछ महीने बाद ही लोगों को पता चल गया कि कुलपति महोदय की पत्नी विमला का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘राखी भैया’ का रिश्ता है । कुलपति की प्रधानमंत्री से करीबी होने का एक कारण यह भी है कि पांडेजी की पत्नी भाजपा महिला मोर्चा की उपाध्यक्ष हैं और उनका पार्टी नेतृत्व पर दबदबा है । पत्नी की अगुवाई में ही कुलपति ने मणिपुर यूनिवर्सिटी में केसरिया अभियान चलाया । विरोध, हड़ताल, बंद और शैक्षणिक कार्य ठप्प होने के बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय के आगे उसके अधीनस्थ एचआरडी मंत्रालय का जोर चले तो कैसे? इससे भलीभांति अवगत एचआरडी मंत्रालय की परवाह कुलपति क्यों करने लगे और अपने एजेंडों पर कायम पांडेजी के कुलपति रहते मणिपुर यूनिवर्सिटी में हालात सामान्य हो तो कैसे? यूनिवर्सिटी के छह छात्र संगठनों के संयुक्त फोरम की ओर से हालिया राज्यव्यापी दो दिनों का मणिपुर बंद 27-28 सितंबर को आयोजित था । उस दौरान पुलिस ने दो छात्रों को इसलिए गिरफ्तार किया, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह, कुलपति पांडे(निलंबित) और प्रो वोसी प्रो. जोगिन्द्रो की तस्वीरों पर सड़े अंडे फेंके । कुलपति को हटाने के लिए चल रहे आंदोलन का 28 सितंबर को 100वां दिन था । 20 सितंबर को आधी रात के समय कुलपति ने यूनिवर्सिटी कैंपस में अर्द्धसैनिक बलों का बुलाकर छह शिक्षकों और लगभग 100 छात्रों को लाठी से पिटवाते हुए आंसू गैस के गोलों के बीच लेजाकर जेल में डाल दिया । उसी के विरोध में 48 घंटे के बंद का आयोजन किया गया था । सड़े अंडे फेंकनेवाले छात्रों को आईपीसी की किस धारा के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया, उस पर सवाल उठा । यह अस्वाभाविक नहीं है । क्योंकि कुलपति ने ही राज्य से लेकर केंद्र तक के सारे नियम कानून अपने हाथ में ले रखे हैं । मुख्यमंत्री, राज्यपाल की कौन कहे, एचआरडी मंत्री ऐसे ‘पावरफुल’ कुलपति के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं । एचआरडी मंत्रालय सूत्रों को बवाली कुलपति के बारे में कहना पड़ा कि ए. पी. पांडे को तबतक के लिए छुट्टी पर भेजा गया था, जबतक उनके खिलाफ जांच पूरी नहीं हो जाती । जांच कमिटी द्वारा रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद एचआरडी मंत्रालय को कुलपति के भाग्य का फैसला करना था । लेकिन उसके पहले ही ए. पी. पांडे ने अपना ‘पावर’ दिखाते हुए कहा कि वे मात्र एक महीने के लिए छुट्टी पर गए थे । पांडे ने दो सितंबर को वापस आते ही कार्यवाहक कुलपति को निलंबित करने के फैसले में नियम का हवाला दिया ।

पांच सितंबर को निर्गत अपने आदेश में ए. पी. पांडे ने कहा कि मणिपुर यूनिवर्सिटी एक्ट, 2005 की ‘स्टेच्यूट 27’ और केंद्रीय लोकसेवा कानून, 1985 के नियम 10 के तहत कार्यवाहक कुलपति प्रो. विश्वनाथ, रजिस्ट्रार प्रो. दोरेन्द्रजीत को निलंबित किया गया । उसके हफ्ते भर बाद कुलपति पांडेय ने अपने खिलाफ एचआरडी मंत्रालय द्वारा गठित जांच कमिटी को मणिपुर हाईकोर्ट में चुनौती देकर सवाल उठा दिया कि किस नियम और अधिकार के तहत मंत्रालय ने उनके खिलाफ लगे अरोपों की जांच के लिए कमिटी गठित की गयी ।

मणिपुर यूनिवर्सिटी को 2005 में केंद्रीय यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया, जब केंद्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे । कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह दोनों ने ही इंफाल जाकर कहा कि इस यूनिवर्सिटी का सारा बोझ केंद्र वहन करेगा । सब ठीक चल रहा था । 2016 में कांग्रेस को हराकर 15 साल बाद भाजपा ने मणिपुर में सरकार बनायी । यूनिवर्सिटी में भगवाकरण अभियान के बाद पैदा हुए झंझट का हल केंद्र सरकार के पास नहीं ह ।

पूर्वोत्तर और खासकर मणिपुर में अलगाववादियों के दबाव में वैसे भी लोग खुद को ‘मेनलैंड इंडिया’ का हिस्सा नहीं मानते, क्योंकि यहां सेना की बदौलत कानून और व्यवस्था कायम की जाती है । इसका असर पड़ोस में हुआ । भाजपा शासित त्रिपुरा में 27 सितंबर की घटना से लोग भौंचक रह गए, जब अगरतल्ला स्थित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान यूनिवर्सिटी में ओडिशा के छात्रों के साथ स्थानीय लोगों ने मारपीट की । मणिपुर यूनिवर्सिटी के कथित दागी कुलपति का संदेश भाजपा शासित छत्तीसगढ़ तक पहुंचा । रायपुर स्थित हिदायतुल्ला राष्ट्रीय कानून यूनिवर्सिटी के कुलपति सुखपाल सिंह के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के खिलाफ छात्र आंदोलन पर हैं । उन्हें हटाने की मांग कर रहे हैं ।

गांधी जयंती के दिन जब प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान चला रहे थे, उस समय सभी विपक्षी पार्टियां महात्मा गांधी केंद्रीय यूनिवर्सिटी को ‘स्वच्छ’ करने की मांग कर रही थी । कुलपति अरविंद अग्रवाल के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप हैं और शिक्षक छात्र सभी अगस्त से ही उन्हें हटाने की मांग कर रहे हैं । अरविंद अग्रवाल की वीसी के रूप में नियुक्ति पर ही उंगली उठायी गयी है ।