केन्द्र शासित क्षेत्र(यूटी) लद्दाख को राज्य का और संविधान की 6ठी अनुसूची के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्र का दर्जा देने की मांग पर आंदोलनकारी लद्दाखियों नेताओं की केंद्र सरकार के साथ हुई हालिया बातचीत पहले की वार्ताओं की तरह बेनतीजा रही ।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय(एमएचए) के अधिकारियों से दिल्ली में इस हफ्ते की बैठक पहले की तुलना में अमूमन तनावपूर्ण माहौल में हुई । इसमें शामिल होने के लिए लद्दाख से जनसंगठनों के प्रतिनिधियों को वास्तव में उनके नेता सोनम वांगचुक की रिहाई का बेसब्री से इंतजार है ।

पर्यावरण ध जलवायु विशेषज्ञ मैगसेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक ने वार्ता में देरी(टालमटोल) के केंद्र के रवैए के खिलाफ 09 सितंबर को 35 दिनों का अनशन लेह में शुरू कर दिया । लद्दाखियों की मांगों को लेकर वांगचुक के नेतृत्व में आंदोलन करनेवाले लेह अपेक्स बॉडी(एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस(केडीए) के कार्यकर्ता लोग भी वांगचुक के साथ जत्थेवार अनशन पर बैठ गए । जब सोनम वांगचुक की हालत बिगड़ने लगीए तब गृह मंत्रालय ने 06 अक्टूबर को वार्ता की तारीख का एलान किया । लद्दाख नेता इतने आगे की बैठक के लिए तैयार नहीं थे । क्योंकि वांगचुक के लोगों के इसी असंतोष के लिए अनशन ठानी कि केंद्र पांच महीने से वार्ता टाल रहा है । लद्दाखवासियों का धैर्य जवाब दे गया और वे जल्द बैठक बुलाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन पर आमादा हो गए । पुलिस के साथ टकराव की नौबत आ गयी, फायरिंग में 4 की मौत हो गयी और 90 अन्य घायल हो गए । सोनम वांगचुक ने अनशन तोड़ दिया और एंबुलेंस से अपने गाँव आ गए । पुलिस ने उन्हें उनके गाँव से गिरफ्तार कर लिया और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून(एनएसए. छै।) की विभिन्न धाराए धाराएँ लगाकर वांगचुक को कड़ी सुरक्षा वाले जोधपुर केंद्रीय जेल भेज दिया । लेह में अनशन स्थल के आसपास पुलिस फायरिंग और सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी 24 सितंबर को हुई । उसी समय से लद्दाख में स्थिति तनावपूर्ण है । लद्दाख प्रशासन ने पहले कर्फ्यू लगाया । फिर 06 अक्टूबर के बाद से धीरे-धीरे ढील दी गयी, जब एलएबी और केडीए प्रतिनिधियों ने वार्ता के लिए दिल्ली जाने से इन्कार कर दिया । आंदोलनकारी जनसंगठन प्रतिनिधियों की ओर से लद्दाख बौद्ध संघ(एलबीए.स्ट।) के अध्यक्ष और लेह अपेक्स बॉडी के सह.अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लाकरूक ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास शर्ते रख दी । पहली शर्त थी. सोनम वांगचुक की तुरंत रिहाई और दूसरी थी 24.09 की पुलिस फायरिंग की न्यायिक जाँच । लद्दाख नेताओं का आरोप है कि उनका विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और सोनम वांगचुक भी अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने की अपील कर रहे थे । उनके बावजूद पुलिस ने फायरिंग की, जिसमें चार वेकसूर स्थानीय लोग मारे गए तथा 90 अन्य घायल हो गए । लद्दाख नेताओं का यह भी आरोप है कि सोनम वांगचुक को एनएसए के अंतर्गत गिरफ्तार किया जाना और जोधपुर केंद्रीय जेल में बंद रखना अन्यायपूर्ण है । उस जेल में आतंकवादियों और तस्करों को रखा जाता है । सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि एंग्मो ने भी अपने पति की एनएसए के तहत गिरफ्तारी को सुप्रीम कोर्ट में इसी आधार पर चुनौती दी है ।

हालात के मद्देनजर एमएचए(गृह मंत्रालय) ने 12 अक्टूबर को लद्दाखियों नेताओं को वार्ता का बुलावा भेजाए जिसमें सभी तबके प्रतिनिधियों को 22 अक्टूबर को दिल्ली आकर बातचीत करने कहा । उसके पहले 17 अक्टूबर को एमएचए ने रिटायर सुप्रीम कोर्ट जज बी. एस. चौहान की अध्यक्षता में 24 सितंबर को पुलिस फायरिंग की न्यायिक जांच का आदेश दिया । गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार उन हालातों की ‘निष्पक्ष’ न्यायिक जांच का आदेश दिया गया है, जिसकी वजह से ‘कानून व व्यवस्था की गंभीर स्थिति’ पैदा हुई । लद्दाख के दोनों प्रभावशाली जनसंगठनों(एलबीए और केडीए) की ओर से 18 अक्टूबर को आयोजित मौन प्रदर्शन(साइलेंट मार्च) से एक दिन पहले गृह मंत्रालय ने न्यायिक जांच का आदेश दिया। 17 अक्टूबर को ही लेह अपेक्स बॉडी ने 24.09 पुलिस फायरिंग की न्यायिक जांच के आदेश का स्वागत किया और 22 अक्टूबर को केंद्र के साथ वार्ता के लिए सहमति जतायी । दोरजे लाकरूक ने लचीला रूख अपनाते हुए कहा कि सोनम वांगचुक की रिहाई की मांग बरकरार है, लेकिन इसके लिए वार्ता में रुकावट नहीं आने दी जाएगी । पुलिस फायरिंग के खिलाफ 18.10 का विरोध मौन प्रदर्शन के दौरान पूरे लद्दाख में प्रशासन की निषेधाज्ञा समेत विभिन्न पाबंदियों के बावजूद लगभग पूरी तरह ब्लैकआउट रहा । ऐसी असामान्य परिस्थितियों में लद्दाख नेतागण एमएचए अधिकारियों से मिले और कोई ठोस आश्वासन के बगैर लौटे । 22 अक्टूबर की वार्ता में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने शिरकत नहीं की । इसके पहले की वार्ताओं में राय खुद शामिल हुए और उन्हीं की अगुवाई में लद्दाख की मांगों पर विचार करने के लिए उच्चस्तरीय कमिटी बनी । इस उच्चस्तरीय स्थायी कमिटी में लेह अपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस संगठनों में से दोनों के तीन,तीन प्रतिनिधियों के अलावे लद्दाख के एमपी मोहम्मद हनीफा जान शामिल हैं । लद्दाख के बरष्ठितम बौद्ध नेता पूर्व एमपी थुप्स्तान छेवांग के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए दिल्ली पहुंचा था । एमएचए सूत्रों के अनुसार लद्दाख प्रतिनिधियों से कहा गया है कि अपनी मांगों का एक मसौदा तैयार करके देंए जिसमें उस संवैधानिक ढांचे के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत खाका होए जो वे लद्दाख में लागू करना चाहते हैं । उसमें पंचायतों और लद्दाख स्वायत पहाड़ी विकास परिषद पर भी विचार किया जाए । राज्य का और 6ठी अनुसूची वाला दर्जा दोनों एक साथ कैसे दिया जा सकता है, यह भी देखना होगा । वर्तमान में 6ठी अनुसूची के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्र का दर्जा कुछ पूर्वोत्तर राज्यों को मिला हुआ है । जहां तक धारा.371 के अंतर्गत अपनी जमीनए भाषाए संस्कृति की संवैधानिक संरक्षा की लद्दाख की मांग है, उसके लिए भी खास,खास विंदुओं को स्पष्ट करके । इन सब बातों के समावेश का फ्रेमवर्क तैयार करके आएं । कब तक ऐसा ड्राफ्ट बना के दें और अगली बैठक कब हो सकती है, इसकी कोई समय.सीमा तय नहीं हुई । घटनाक्रम के तथ्य बताते हैं कि लेह में 24.09 हिंसा के दिन एमएचए के अधिकारी वार्ता के मजमून पर मशविरा के लिए लेह में ही थे । अब अगली बातचीत जबतक न्यायिक जांच की रिपोर्ट आने और सोनम वांगचुक की रिहाई तक शायद न हो पाए । लद्दाखियों की मांगों में लेह और कारगिल के लिए दो अलग-अलग लोकसभा सीटें भी शामिल हैं । लेकिन एमएचए ने कभी भी इन मांगों को अलग-अलग करके इन पर विचार करने की बात नहीं की । गृह राज्य मंत्री ने हमेशा गोलमटोल जवाब दिया कि केंद्र लद्दाखियों की आकांक्षा पूरी करने को प्रतिबद्ध हैं । अगस्त, 2019 में जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा धारा.370 के साथ ही केंद्र सरकार ने हटा दिया और विभाजन के बाद दो केंद्र शासित क्षेत्र(यूटी) अस्तित्व में आए । जम्मू व कश्मीर से अलग करके लद्दाख को भी यूटी बना दिया गया । उसके पहले से ही लद्दाख में राज्य दर्जा आंदोलन चल रहा था । उसी आश्वासन पर 2019 आम चुनाव में लद्दाख लोकसभा सीट पर भाजपा के जाम्याग त्सेरिन नामग्याल जीते । नामग्याल अपने मतदाताओं का विश्वास कायम नहीं रख पाए । इसलिए 2024 में लद्दाखों ने निर्दलीय उम्मीदवार मोहम्मद हनीफा जान को लोकसभा में अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजा । चुनाव से पहले भी वांगचुक ने भूख हड़ताल शुरू की और केंद्र सरकार से लद्दाख को राज्य और 6ठी अनुसारी दर्जा देने के एलान का अल्टीमेटम दिया था । मतदान का समय करीब आने के समय वांगचुक ने अनशन तोड़ा । लेह से दिल्ली स्थित लद्दाख भवन तक मार्च के अलावे कई बार आंदोलन चला और सरकार के हस्तक्षेप से रुक गया । लेह से दिल्ली मार्च में और लद्दाख भवन के सामने भूख हड़ताल में वांगचुक के समर्थकों के साथ लद्दाख के सांसद मोहम्मद हनीफा जान भी शामिल हुए । अभी संयोग से ऐसे समय में लद्दाख राज्य आंदोलन ने जोर पकड़ी है, जब जम्मू व कश्मीर को राज्य दर्जा लौटाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है । सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि एंग्मो की अपने पति की रिहाई और जोधपुर जेल में मिलने की अर्जी पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की है । जम्मू व कश्मीर को विशेष राज्य का संवैधानिक दर्जा देनेवाली धारा.370 को खत्म करने के फैसले को कश्मीर के राजनीतिज्ञों और प्रबुद्ध नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । चार साल के बाद 2024 लोकसभा चुनाव से चार महीना पहले दिसंबर, 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में धारा.370 हटाने के केंद्र के फैसले को तो सही ठहराया, मगर उसके साथ-साथ राज्य दर्जा घटाकर यूटी बनाने पर केंद्र को लताड़ा । जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा लौटाने के

केंद्र के आश्वासन पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के विवेक पर छोड़ दिया । सुप्रीम कोर्ट में और कश्मीर में केंद्र ने बार, बार कहा कि विधान सभा चुनाव के बाद राज्य का दर्जा लौटा दिया जाएगा । 2018 से जम्मू व कश्मीर में विधान सभा चुनाव नहीं कराए जाने की याचिकाकर्ताओं की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने सीधे चुनाव आयोग को विधान सभा चुनाव कराने का आदेश दिया और इसकी समय,सीमा सितंबर, 2024 तय कर दी । अभी 18.07.2025 को जम्मू व कश्मीर में सरकार गठन के एक साल पूरे होने पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार पर सीधा आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने झूठा दावा किया है कि राज्य दर्जा लौटाने के संबंध में जम्मू व कश्मीर सरकार बातचीत चल रही है । 10 अक्टूबर को केंद्र की ओर से सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में यह सफाई दी । चीफ जस्टिस बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ सुनवाई कर रही है । याचिकाकर्ताओं ने केंद्र को एक निश्चित समय,सीमा के अंदर जम्मू व कश्मीर को राज्य दर्जा लौटाने का निर्देश देने की मांग की है । उनमें कश्मीर के निवर्तमान विधायक इरफान हफीज लोन, लोक्धर जहूर अहमद भट के अलावे प्रेमशंकर झा और राधा कुमार भी हैं । केंद्र को अगले महीने जवाब देना है कि अभी तक इस संबंध में क्या बात हुई है और कब तक जम्मू व कश्मीर को राज्य दर्जा वापस मिलेगा । 1070772025 को सुप्रीम कोर्ट में इस पर सुनवाई हुई और उसके पहले 06.10 को शीर्ष कोर्ट ने गीतांजलि एंग्मो की अर्जी पर उनकी दलील सुनी । जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने केंद्र से कहा कि सोनम वांगचुक को एनएसए के तहत जेल में रखने के आधार पर उनकी पत्नी गीतांजलि एंग्मो का पक्ष सुने । केंद्र ने दलील दी कि उनकी हेबियाज कॉर्पस अर्जी सिर्फ ‘भावनात्मक माहौल’ बनाने वाली है । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने 06 अक्टूबर को केंद्र और लद्दाख प्रशासन को नोटिस देकर इस पर भी विचार करने कहा कि सोनम वांगचुक की एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के तहत गिरफ्तारी का आधार उनकी पत्नी को बताया जा सकता है या नहीं । पीठ ने इस बाबत एनएसए के सेक्शन 8 का जिक्फ़ किया, जिसमें गिरफ्तारी का आधार सिर्फ बंदी को ही बताने का नियम है । गीतांजलि ने अपनी अर्जी में 06.10 को कहा कि गिरफ़्तारी के 10 दिन गुजर जाने के बावजूद सोनम को कोर्ट में भी पेश नहीं किया गया है । केंद्र चाहे कितना भी सफाई दे ले, सोनम वांगचुक की एनएसए, 1980 के तहत जेल में रखने के मामले ने लद्दाख राज्य आंदोलन में राजनीतिक से ज्यादा भावनात्मक मोड़ दे दिया है । 22.10 को एमएचए अधिकारियों के साथ दिल्ली में वार्ता के दौरान 10..सदस्यीय उच्चस्तरीय कमिटी लद्दाख प्रतिनिधिमंडल ने साफ कह दिया कि वे राज्य दर्जा की मांग नहीं छोड़ेंगे और धारा.371 के तहत विशेष प्रावधान ऑफर को कोई तबज्जो नहीं दी । दोरजे लाकरूक के अनुसार कमिटी ने सोनम बांगचुक की रिहाई पर जोर दिया । एक दिन पहले 21.10 को गीतांजलि ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे के साथ शिकायत दर्ज करायी कि किस प्रकार 07 अक्टूबर को अपने पति से जोधपुर जेल में मुलाकात के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो(प्. आईबी) के अधिकारी उनकी निगरानी कर रहे थे और सोनम से बातचीत के समय भी वहाँ मौजूद थे । गीतांजलि एंग्मो ने विस्तृत ज्ञापन एक साथ लद्दाख प्रशासनन, एनएसए सलाहकार वोर्ड और केन्द्रीय गृह मंत्रालय को 21 अक्टूबर को ही सौंपा, जिसमें सोनम के खिलाफ लगाए गए आरोपों को ‘आधारहीन’ और ‘बेतुका’ बताया । 18 अक्टूबर को जम्मू व कश्मीर सरकार की पहली बरसी पर सत्तारूढ़ नेशनल कान्फ्रेंस. कांग्रेस गठजोड़ के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला समेत सभी नेताओं ने कहा कि राज्य दर्जा लौटाने का वायदा टालने का असली कारण ये है कि जम्मू व कश्मीर में भाजपा की सरकार नहीं बनी । इसलिए केन्द्र संसद में सुप्रीम कोर्ट में झूठे वायदे दुहरा रहा है । उसी समय अर्थात् 17.18 अक्टूबर को ही गोरखालैंड राज्य आंदोलन वार्ता भी सुर्खियों में आयी । पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव अगले वर्ष अप्रील,मई में होना है । उसके मद्ददेनजर केंद्र सरकार ने गोरखा नेताओं से बातचीत के लिए रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल विजय मदान को वार्ताकार नियुक्त किया । दार्जीलिंग और उसके आसपास गोरखा तथा जनजातीय पहाड़ी जिलों को मिलाकर अलग गोरखालैंड राज्य आंदोलन 1980 के दशक से चल रहा है । गोरखों को भी संविधान की 6ठी अनुसूची के साथ राज्य का दर्जा चाहिए । लेकिन गोरखा आंदोलन लद्दाख से बिल्कुल अलग सिर्फ हिंसा पर टिका है । 2011 से लगातार तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में सत्ता में है और दीदी(ममता बनर्जी) मुख्यमंत्री हैं । दीदी राज्य के विभाजन के मुख्य खिलाड़ी हैं और गोयथा आंदोलन को उन्होंने बैकटफ पर ला दिया है । पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार विजय मदान को नया वार्ताकार नियुक्त करने के केन्द्रीय गृह मंत्रालय के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए दीदी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर ‘एकतरफा’ फैसला वापस लेने का अनुरोध किया ।

भाजपा दार्जिलिंग पहाड़ी में लोकसभा और विधान सभा चुनाव गोरखालैंड वायदे पर 2 दशक से जीत रही है । गत 03 अप्रील को तीन साल के अंतराल के बाद केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय गोरखा नेताओं से दार्जीलिंग के भाजपा एमपी राजू विस्टा के साथ मिले । लेकिन आश्वासन सिर्फ गोरखा मांगों पर विचार करने तक सीमित है, गोरखालैंड राज्य पर नहीं । 1980 के दशक में भगोड़े सैनिक सुभाष घीसिंग ने हिंसा के बदौलत गोरखालैंड आंदोलन की नींव रखी । वामदल और कांग्रेस उनके समर्थन से दार्जीलिंग में चुनाव जीतते रहे, सुभाष घीसिंग को दार्जीलिंग का बेताज बादशाह मानते रहे ।