लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और संविधान की 6ठी अनुसूची में शामिल करने की मांग पर दबाव बनाने के लिए वहां के सिविल सोसायटी संगठनों ने आंदोलन तेज कर दिया है । लद्दाख में लोकसभा वोटिंग की तारीख जैसे-जैसे करीब आती जा रही है, इस पहाड़ी क्षेत्र में राजनीतिक उमस बढ़ती जा रही है । लेह, कारगिल के सिविल सोसायटी संगठनों के लोकप्रिय नेता जलवायु एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने 21 दिन लंबी भूख हड़ताल समाप्त करते ही कहा कि ‘यह आमरण अनशन का पहला चरण है, मगर आंदोलन खतम नहीं हुआ है ।’ अनशन के दौरान ही सोनम वांगचुक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील किया कि लद्दाखवासियों से किए गए वायदे पूरे करें ।

जलवायु एक्टिविस्ट से राजनीतिक एक्टिविस्ट बने सोनम वांगचुक ने 26 मार्च को भूख हड़ताल समाप्त किया और अगले ही दिन आंदोलन तेज करने का ऐलान कर दिया । सिविल सोसायटी संगठनों के अपने सहयोगियों के साथ वांगचुक ने कहा कि लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग पर जोर डालने के लिए जन आंदोलन तेज किया जाएगा और 07 अप्रील को ‘बोर्डर मार्च’ की तैयारी हो गयी है ।

सोनम वांगचुक के अनुसार ‘बोर्डर मार्च’ चीन की सीमा से लगे पूर्वी लद्दाख इलाकों से निकाला जाएगा जिसमें चीन द्वारा कथित अतिक्रमण भी शामिल है ।

21 दिनों तक चले आमरण अनशन में सारे लद्दाखवासी सोनम वांगचुक और सिविल सोसायटी संगठनों के साथ थे ।

केंद्र शासित क्षेत्र(यूटी) को राज्य का दर्जा देने और इसे संविधान की 6ठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर आंदोलन कई महीनों से चल रहा है । जनवरी-फरवरी 2024 में आंदोलन में तेजी आ गयी, जब लोकसभा चुनाव ऐलान कभी भी होने के कयास लगाए जा रहे थे । उसी क्रम में 03 फरवरी को लद्दाख बंद की जोरदार तैयारी की गयी । हजारों की संख्या में जुटकर लोगों ने स्थानीय वाशिंदों के लिए नौकरियों में आरक्षण और लेह तथा कारगिल के लिए एक.एक लोकसभा सीट की मांग के लिए संपूर्ण लद्दाख बंद को सफल बनाने की योजना बनायी । अभी लद्दाख में एक ही लोकसभा सीट है, जहां से भाजपा के टिकट पर जाम्यांग नामग्याल जीते हुए हैं । लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की 6ठी अनुसूची में शामिल करने के अलावे उपरोक्त दोनों मांगें भी आंदोलन का हिस्सा है ।

चीन से सटी पूर्वी लद्दाख सीमा पर हमेशा तनाव की स्थिति बने रहने के कारण यह क्षेत्र काफी संवेदनशील है । जून, 2020 में एलएसी पर दोनों देशों की सेना में टकराव भी हुआ । 24.03.2024 को होली के दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लेह जाकर सैनिकों का हौसला बढ़ाया और लद्दाख को भारत की हिम्मत और दिलेरी की राजधानी बताया । लद्दाख को विश्वास में रखना केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में है, जो सीमा सुरक्षा के लिए भी जरूरी है । इसके मद्देनजर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लद्दाख बंद से एक दिन पहले 02 फरवरी को न्योता भेजा कि सिविल सोसायटी संगठन नेता वार्ता के लिए 19 फरवरी को दिल्ली आएं । आंदोलनकारियों को लगा कि यह न्योता लद्दाख बंद टालकर आंदोलन को कमजोर करनेवाला है और यह वार्ता भी पहले की बेनतीजा मुलाकातों जैसी होगी । इसलिए बातचीत का न्योता केंद्रीय गृह मंत्रालय(एमएचए) से मिलने के बाद सोनम वांगचुक और युप्स्तान छेवांग ने 20 फरवरी से बेमियादी भूख हड़ताल की धमकी दे दी । युप्स्तान छेवांग लद्दाख के सबसे ज्यादा प्रभावशाली राजनेता हैं और भाजपा के ही टिकट पर लद्दाख लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं । दिल्ली बुलाहट की पक्की खबर मिलने के बाद वांगचुक और छेवांग ने अनशन का कार्यक्रम स्थगित कर दिया । दिसंबर, 2023 में संसद के शीतकालीन सत्र के समय दिल्ली में हुई बेनतीजा वार्ता के बाद से ही लद्दाखी नेता इस पक्ष में थे कि केंद्र सरकार पर आम चुनाव से पहले मांगों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने का दबाव बनाया जाए । इस हिसाब से आंदोलन चलता रहा । लद्दाख से लोकसभा सदस्य जाम्यांग नामग्याल के इससे अपने को अलग रखने के बावजूद मतदाताओं को कोई फर्क नहीं पड़ा । सिविल सोसायटी संगठनों ने आंदोलन का संयुक्त मंच बना रखा है, जिसमें भाजपा की स्थानीय यूनिट समेत सभी राजनीतिक दलों से संबद्ध गुट जुड़े हैं ।

19 फरवरी को दिल्ली में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लद्दाख से आए प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की । लद्दाखनी नेतागण यह ठानकर आए कि एक निश्चित समय-सीमा के अंदर मांगें पूरी करने का ठोस आश्वासन केंद्र सरकार से मिलने के बाद ही आंदोलन वापस लिया जाएगा ।

केंद्र से लद्दाख सिविल सोसायटी संगठनों की 2 वर्षों से बातचीत चल रही है । 19 फरवरी, 2024 दिल्ली बैठक वार्ता का तीसरा दौर था, जो बेनतीजा ही साबित हुआ । 19 फरवरी की बैठक के बाद लद्दाख नेताओं ने कहा कि केंद्र सरकार लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग पर विचार करने को तैयार हो गयी है । केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के साथ बैठक के बाद 24 फरवरी को लद्दाख प्रतिनिधिमंडल केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला से भी मिला । 19 फरवरी को नित्यानंद राय के साथ बैठक में भी गृह सचिव अजय भल्ला ने ही सिविल सोसायटी संगठनों से बातचीत की । तय हुआ कि मांगों पर आगे चर्चा के लिए एक संयुक्त उप.समिति गठित की जाए । उप.समिति गठित हो गयी, जिसमें सिविल सोसायटी संगठनों के दोनों प्रमुख मंचों से तीन.तीन सदस्य लिए गए । ये दोनों एकीकृत संगठन हैं. कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस(केडीए) और लेह अपेक्स बॉडी(एलएबी) । केडीए मुस्लिम बहुल आबादी वाले कारगिल का प्रतिनिधित्व करता है और सठ(एलएबी) लेह अपेक्स बॉडी में बौद्ध समुदाय के प्रतिनिधि हैं ।

6 सदस्यों की इस उप.समिति की पहली बैठक 24 फरवरी को गृह मंत्रालय के नॉर्थ ब्लॉक कार्यालय में हुई केंद्र की ओर से गृह सचिव और लद्दाख प्रशासन की ओर से पवन कोटवाल बैठक में शामिल हुए । पवन कोटवाल लद्दाख के उप राज्यपाल ब्रिगेडियर(रिटायर) बी. डी. मिश्रा के सलाहकार हैं । इस संयुक्त उप.समिति में एलएबी की ओर से युप्स्तान छेवांग, चेरिंग दोर्जय लाकरूक और नवांग रिग्जिन जोरा हैं । केडीए का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. कमर अली अखून असगर, अली कर्बलाई और सज्जाद कारगिली । उप.समिति के अध्यक्ष नित्यानंद राय हैं ।

24 फरवरी की बैठक में औपचारिक मुलाकात से ज्यादा कुछ नहीं हुआ । बस इतनी सी खबर निकली कि सरकार कानूनी विशेषज्ञों से राय ले रही है। पूरा मार्च बीत गया, बीच में लोकसभा चुनाव तारीखों का ऐलान हो गया । लद्दाखियों की मांगों पर न कोई विचार हुआ, न उन्हें ठोस की जगह पहले की तरह तरल भी आश्वासन मिला ।

उसके बाद जलवायु विशेषज्ञ सोनम वांगचुक ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल योजना को अमल में लाने को कमर कस ली । फरवरी बातचीत के बाद कुछ समय के लिए भूख हड़ताल स्थगित की गयी थी, ताकि सरकार के रूख का इंतजार किया जाए ।

लद्दाख के इस आंदोलन में नए सिरे से सोनम वांगचुक ने ही जान फूंकी है और समूचे लद्दाख की जनता इसमें सक्रिय है । सोनम वांगचुक को सबसे ज्यादा इस पहाड़ी क्षेत्र की प्राकृतिक और सामाजिक विशिष्टता की चिंता है, इसलिए वे यहां विकास के नाम पर पहाड़, नदी के साथ छेड़छाड़ के खिलाफ हैं ।

लद्दाख के लोग उत्तर पूर्वी राज्यों जैसी संवैधानिक व्यवस्था चाहते हैं, जिसका प्रावधान 6ठी अनुसूची में है । अपनी विशिष्ट संस्कृति, सामाजिक इतिहास, पर्यावरण की संवैधानिक सुरक्षा के लिए लद्दाख के लोग 6ठी अनुसूची के तहत जनजातीय दर्जा की मांग कर रहे हैं । लेह में प्रस्तावित मेगा एयरपोर्ट और चांगयांग में 20,000 हेक्टेयर में सोलार पार्क का भी लोग विरोध कर रहे हैं ।

2019 में धारा.370 समाप्त करके जम्मू व कश्मीर को दो हिस्सों में बांटकर लद्दाख को यूटी का दर्जा देना लद्दाखियों को अच्छा नहीं लगा । लद्दाख के लोग ऐसा यूटी की मांग कर रहे थे, जिसकी अपनी अलग विधान सभा हो । वे एक ही साथ दिल्ली और श्रीनगर के सीधे नियंत्रण से मुक्ति चाहते हैं ।

2019 से ही आंदोलन जारी है । लद्दाखियों को धारा.370 से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा । इसका सबूत अक्टूबर, 2023 में एलएएचडीसी(लद्दाख स्वायत्त परिषद. कारगिल) के चुनाव में मतदाताओं ने भाजपा उम्मीदवारों को हराकर दिया । जिन मांगों पर चुनाव लड़े गए, उसी पर विचार करने के लिए 04.01.2023 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लेह और कारगिल के स्थानीय नेताओं को दिल्ली बुलाया । उस बैठक में और उसके पहले भी कमिटी गठन को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद हो गया ।

कई दशक पहले कुशोक बाकुला और अकबर लद्दाख ने लद्दाख के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए आंदोलन शुरू किया । कुशोक बाकुला लद्दाख बौद्ध एसोसिएसन(स्ठ।) और अकबर लद्दाख मुस्लिम ऐसासिएसन(स्ड।) के संस्थापक थे । उन दोनों ने जो एकजुटता कायम की, उसी पर आज तक लद्दाख आंदोलन टिका है । इसे भाजपा केंद्रीय नेतृत्व को समझना होगा ।