लोकसभा चुनाव करीब आने के पहले से राजनीतिक सुर्खियों में चर्चित लद्दाख सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार हाजी मुहम्मद हनीफा जान की जीत और भाजपा उम्मीदवार ताशी ग्यालसन की हार इस पहाड़ी क्षेत्र का लगभग सर्वसम्मत जनादेश है । 10 वर्षों से लद्दाख लोकसभा सीट पर भाजपा का कब्जा था और भाजपा लद्दाखियों की मांगे पूरी करने के आश्वासन से जीत रही थी । पहली बार लद्दाख सीट के चुनाव परिणाम से दो संदेश सामने आए हैं, जिसके कारण केंद्र में तीसरी बार सत्ता में आनेवाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़(एनडीए) को अपनी लद्दाख नीति बदलनी पड़ सकती है । सर्वप्रथम तो ये कि पहलीबार ऐसा हुआ, जब मुस्लिम बहुल जिला कारगिल और बौद्ध आबादी वाला जिला लेह से उम्मीदवार खड़े करने को लेकर गैर.भाजपा दलों में मतभेद उभरा । उसके बावजूद चुनाव मैदान में उतरे प्रमुख दल नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस को अपनी.अपनी स्थानीय यूनिटों के दबाव में हाजी हनीफा जान को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में समर्थन देना पड़ा । लद्दाख पहाड़ी क्षेत्र में लेह और कारगिल को मिलाकर एक ही लोकसभा सीट है, जहां इस बार समुदाय प्रतिनिधित्व मतभेद का कारण बना ।

शिया मुसलमान बहुल आबादी वाले कारगिल के मतदाता चाहते थे कि इस बार लोकसभा में लद्दाख का प्रतिनिधित्व करनेवाला कारगिल निवासी हो और मुस्लिम हो । इंडिया गठजोड़ के दो घटक ने नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस ने पहले की तरह लेह से ही बौद्ध उम्मीदवार का नाम तय कर दिया । नेशनल कान्फ्रेंस की कारगिल यूनिट के सभी नेता इस पर बिफर उठे और अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया । इन नेताओं ने नेशनल कान्फ्रेंस के ही कारगिल जिला यूनिट हाजी हनीफा जान को लद्दाख से लोकसभा उम्मीदवार घोषित कर दिया । कांग्रेस की कारगिल यूनिट ने इसे सर्वसम्मत उम्मीदवार बताया । हाजी हनीफा जाने के समर्थन में कारगिल के प्रभावशाली राजनीतिक नेता सज्जाद कारगिली ने वोटिंग से पहले अपना पर्चा वापस ले लिया ।

दूसरा ये कि भाजपा को वोटिंग से कुछ ही दिन पहले अपने लद्दाख एमपी जाम्यांग त्सेरिंग नामग्याल का टिकट काटना पड़ा । नामग्याल के बागी तेवर अपनाने के बाद कांग्रेस ने उन्हीं को अपना उम्मीदवार बना दिया । मतभेद का मुख्य कारण यही थी । क्योंकि जाम्यांग नामग्याल के प्रति लेह और कारगिल दोनों ही जगह असंतोष था । नामग्याल ने पूरे पांच साल में लोकसभा में या लद्दाख में अपने मतदाताओं की मांग जोरदार तरीके से नहीं उठायी । अबकी पहली बार लद्दाखियों ने किसी पार्टी या उम्मीदवार के वायदे पर नहीं अपने द्वारा तय किए गए एजेंडे को लोकसभा में रखने के लिए प्रतिनिधि चुना है । लद्दाख के लोगों की पुरानी मांग है, इस जनजातीय क्षेत्र को राज्य का दर्जा देना और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना । लेह और लद्दाख के लिए अलग-अलग लोकसभा सीट की मांग भी उसमें शामिल है । इसके लिए भी असंतोष काफी समय से चला आ रहा था, जो इस बार खुलकर सामने आ गया । जबकि लेह और कारगिल दोनों ही जिलों के सामाजिक संगठन अपनी मांगों पर बिल्कुल एकजुट होकर आंदोलन कर रहे हैं ।

आम चुनाव कार्यक्रम के एलान से कुछ ही दिन पहले लंबित मांगों को लेकर जन आंदोलन शुरू हो गया । इस आंदोलन की शुरूआत जलवायु/पर्यावरण एक्टिविस्ट मैगसेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से हुई । 06.03.2024 को 21 दिनों की भूख हड़ताल का एलान सोनम वांगचुक ने लेह में आयोजित जिस जनसभा में किया, उसमें 30,000 से ज्यादा लोग मौजूद थे । सोनम वांगचुक लद्दाख का पर्यावरण और यहां की अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए यहां निर्माण कार्य तथा बाहरी लोगों की आवाजाही पर रोक लगाने का आंदोलन चलाते रहे हैं । लेकिन मार्च में शुरू हुई उनकी भूख हड़ताल मुख्य रूप से लद्दाखियों की राजनीतिक मांगों पर केंद्रित थी । सिविल सोसायटी संगठनों के समर्थन से चले इस आंदोलन के जरिए केंद्र सरकार पर दबाव डाला गया कि चुनाव से पहले लद्दाखियों की मांगें पूरी करने का ठोस समझौता करे । 20 मई को लद्दाख में वोटिंग तय थी । उसके हफ्ता भर पहले तक क्रमिक रूप से अनशन जारी रहा । आंदोलनकारियों ने लद्दाख को राज्य का दर्जा और दो लोकसभा सीटों की मांग पर मुख्य रूप से जोर दिया । चाहे भाजपा नेतृत्व के दबाव में या इस झमेले में न पड़कर सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के चक्कर में त्सेरिंग नामग्याल ने आंदोलनकारियों का साथ नहीं दिया । चर्चा तेज हो गयी कि इस बार त्सेरिंग नामग्याल को प्रतिनिधि नहीं बनने दिया जाए । भाजपा नेतृत्व ने नामग्याल पर ठीकरा मढ़ने के प्रयास में उनका टिकट काटकर ताशी ग्यालसन को उम्मीदवार बना दिया । ग्यालसन लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद लेह(सभ्कस्) के कार्यकारी पार्षद हैं । उस समय तक यह आवाज उठने लगी कि 2024 लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार कारगिल से होए लेह से नहीं । कांग्रेस और नेशनल कान्फ्रेंस में हुए तालमेल के अंतर्गत लद्दाख सीट कांग्रेस के हिस्से में आयी । कांग्रेस ने ज्योंही त्सेरिंग नामग्याल को उम्मीदवार घोषित किया कि दोनों दलों की स्थानीय यूनिटों के कार्यकर्ता बगावत पर उतर आए । नामग्याल के रवैए पर लेह में बौद्ध मतदाताओं को भी नाराजगी थी । सोनम वांगचुक के नेतृत्व में हुए आंदोलन में सक्रिय प्रभावशाली सिविल सोसायटी संगठन स(लेह अपेक्स बॉडी) नामग्याल के खिलाफ थी । नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस की स्थानीय यूनिटों में नामग्याल की उम्मीदवारी को लेकर फूट पड़ गयी । लेह और कारगिल के क्षेत्रीय और सामाजिक रिश्ते में भी खटास आ गयी । लेकिन दोनों ही जिलों के मतदाताओं ने मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया । केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने 13 मई को लद्दाख जाकर मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया और ताशी ग्यालसन को जिताने कहा । मगर तबतक हवा बदल चुकी थी । सबसे ज्यादा वोटों से कारगिल के अमूमन सर्वसम्मत निर्दलीय उम्मीदवार हाजी हनीफा जान जीते । उन्हें सामाजिक संगठन ज़क्(कारगिल डेमोक्फ़ेटिक एलायंस) के अलावे कांग्रेस और नेशनल कान्फ्रेंस के बड़े तबके का भी समर्थन था । कहने के लिए इंडिया ब्लॉक उम्मीदवार नामग्याल दूसरे और भाजपा के ताशी ग्यालसन तीसरे नंबर पर रहे । केंद्र सरकार की ओर से गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय 2021 से ही लद्दाख में आंदोलन के मद्देनजर वार्ता चला रहे हैं । इसमें लेह अपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस दोनों ही संगठनों से जुड़े बौद्ध तथा मुस्लिम प्रतिनिधि शामिल हैं । दोनों ही समुदायों के प्रतिनिधियों ने मांगों पर विचार करने के लिए बनी कमिटी में अपने एमपी त्सेरिंग नामग्याल को शामिल करने से इन्कार कर दिया । 2024 लोकसभा चुनाव परिणाम से स्पष्ट है कि भाजपा उम्मीदवार ताशी ग्यालसन और बागी नामग्याल को लेह से बौद्धों के वोट मिले । इसमें दलीय नहीं, क्षेत्रीय और सामाजिक मुद्दे हावी रहे । यह संकेत लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा सीट की मांग पर जोर डालनेवाला है ।

2019 लोकसभा चुनाव के बार केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार ने जम्मू व कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित क्षेत्रों में विभाजित कर लद्दाख को भी यूटी का दर्जा दे दिया । लेकिन लद्दाखियों को बिना विधान सभा का यूटी मंजूर नहीं था और आंदोलन राज्य का दर्जा के लिए शुरू हुआ । दूसरी तरफ कश्मीर के लोग धारा.370 हटाए जाने के ही खिलाफ थे । कांग्रेस ने धारा.370 हटाए जाने पर तो खुलकर प्रतिक्रिया नहीं दी । लेकिन जम्मू व कश्मीर का राज्य का दर्जा लौटाने और जल्द विधान सभा चुनाव कराने पर कांग्रेस हमेशा जोर देती रही । जबकि जम्मू व कश्मीर के क्षेत्रीय दल धारा.370 हटाकर विशेष राज्य दर्जा वापसी के लिए आंदोलन चलते रहे । बाद में नेशनल कान्फ्रेंस नेता फारूक अब्दुल्ला ने थोड़ा नरम रवैया अपनाकर विधान सभा चुनाव कराने की मांग पर आंदोलन केंद्रित रखा । लद्दाख की तरह जम्मू व कश्मीर यूटी से मिले लोकसभा चुनाव परिणाम भी सभी दलों की आंखें खोलनेवाले हैं । पहले तो यह बात दें कि 1999 में कारगिल से नेशनल कान्फ्रेंस के बागी उम्मीदवार हसन खान ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लद्दाख लोकसभा सीट जीती थी । इसी आलोक में जम्मू व कश्मीर का चुनाव परिणाम देखा जाए । हिंदू बहुल आबादी वाले जम्मू क्षेत्र की दोनों लोकसभा सीटें भाजपा ने जीती । यहां के लोगों को धारा.370 और कश्मीर का राज्य दर्जा हटने से कोई सरोकार नहीं है । जम्मू के लोगों को अपना अलग राज्य चाहिए । ऊधमपुर सीट पर भाजपा के जितेन्द्र सिंह से हारनेवाले चौधरी लाल सिंह अलग जम्मू राज्य आंदोलन से जुड़े रहे हैं । जम्मू सीट पर भाजपा के जुगल किशोर शर्मा ने कांग्रेस के रमन भल्ला को हराया । यह भाजपा का हिन्दुत्व एजेंडे वाला क्षेत्र है, जहां से जीत की उम्मीद भी थी । मुस्लिम बहुल आबादी और हमेशा नेतृत्वकर्ता रहे कश्मीर क्षेत्र का चुनाव परिणाम ज्यादा चौंकानेवाला है । भाजपा ने कश्मीर से उम्मीदवार खड़े नहीं किए । जे एंड के अपनी पार्टी और जे एंड के पीपुल्स कान्फ्रेंस जैसी स्थानीय पार्टियों के जिन उम्मीदवारों का भाजपा ने समर्थन किया, सब हार गए । सबसे कमाल है पूर्व मुख्यमंत्री नेशनल कान्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला का एक लो प्रोफाईल पार्टी के जेल में बंद इंजीनियर अब्दुल रशीद शेख के हाथों बारामुला सीट से हारना । कश्मीर क्षेत्र की दूसरी सीट अनंतनाग से पूर्व मुख्यमंत्री पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की महबूबा मुफ्ती को नेशनल कान्फ्रेंस के मियां अल्ताफ अहमद ने हराया । दोनों ही पार्टियां धारा.370 वापसी की लड़ाई के लिए बने मंच गुपकार गठजोड़ और इंडिया ब्लॉक का भी हिस्सा हैं । दोनों में मतभेद हमेशा रहा । भाजपा को साथ लेकर महबूबा मुफ्ती के नेतृत्ववाली जम्मू व कश्मीर सरकार को भाजपा ने 2018 में गिराया था । उसके बाद विधान सभा भंग कर दी गयी । अब भाजपा पर जम्मू व कश्मीर विधान सभा चुनाव जल्द कराने का दबाव बढ़ेगा और राज्य का दर्जा वापसी का काश्मिरियों को दिए गए आश्वासन पूरा करने की प्रक्रिया के साथ,साथ लद्दाख की भी इसी मांग पर विचार करना होगा । मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने दोनों जगह मतदाताओं का उत्साह देखते हुए जल्द विधान सभा चुनाव कराने की बात कही है । जब भी चुनाव होंगेए स्थानीय दलों की राजनीतिक के अलावे सामाजिक वैमनस्य और उसका क्षेत्रीय के साथ,साथ मजहबी पहलू का भी असर होगा । इसमें भाजपा और कांग्रेस को कितना लाभ मिलेगाए यह तो वक्त बताएगा । इंडिया ब्लॉक से अन्य राज्यों में मिले झटके के बाद भाजपा को अपना चुनावी एजेंडा बदलना होगा । लद्दाख और कश्मीर दोनों जगह हवा भाजपा के अनुकूल नहीं है तथा गैर. भाजपा दलों में दरार है ।

कोथवा रोडए पटना. 801503ए