यह लेख राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट के प्रयासों पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे राजनीतिक दल दागियों को टिकट देने से नहीं रुकते, जबकि आयोग और कोर्ट बार-बार इस पर रोक लगाने की गुहार लगाते हैं। लेखक प्रधानमंत्री मोदी की 'मन की बात' पर भी सवाल उठाता है कि उसमें इस महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे को क्यों नहीं उठाया गया।
यह लेख बिहार विधानसभा चुनाव के संदर्भ में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों द्वारा अपने दागी रिकॉर्ड का प्रचार न करने पर चुनाव आयोग की कार्रवाई पर केंद्रित है। यह बताता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद, राजनीतिक दल और उम्मीदवार इन आदेशों की अनदेखी कर रहे हैं, और चुनाव आयोग के पास ऐसे उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने का अधिकार नहीं है। लेख इस बात पर जोर देता है कि कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की है, लेकिन सरकार और पार्टियां दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए कानून बनाने से कतरा रही हैं।
यह लेख 17वीं लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े विवादों का विश्लेषण करता है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह को क्लीन चिट दिए जाने, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के नाथूराम गोडसे संबंधी बयान, और 'भारतीय जिन्ना पार्टी' जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है। लेख चुनाव आयोग की सीमित शक्तियों और उसकी निष्पक्षता पर उठे सवालों पर भी चर्चा करता है।
यह लेख गुजरात राज्यसभा चुनाव में 'नोटा' (नन ऑफ द अबव) विकल्प के राजनीतिक इस्तेमाल पर हुए विवाद का विश्लेषण करता है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की कोशिश की, लेकिन आयोग ने नोटा अधिसूचना रद्द करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी नोटा पर रोक लगाने से मना कर दिया, हालांकि इसकी संवैधानिक वैधता पर विचार करने को तैयार है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। लेख सरकार द्वारा इन नियुक्तियों में राजनीतिक प्रभाव और कोलेजियम प्रणाली की अनुपस्थिति पर प्रकाश डालता है। यह 2017 और 2022 में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, अरुण गोयल की नियुक्ति में जल्दबाजी और पूर्व सीईसी के राजनीतिक संबंधों जैसे उदाहरणों का हवाला देता है, जिसमें चुनाव आयोग को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
यह लेख आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के चुनाव आयोग के अधिकार की कमी पर केंद्रित है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को दागी नेताओं के मुकदमों को शीघ्र निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने का निर्देश दिया है, क्योंकि राजनीतिक दल ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देने से नहीं हिचकते। लेख में बताया गया है कि सरकार और राजनीतिक दल दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के पक्ष में नहीं हैं, जिससे चुनाव सुधारों में बाधा आ रही है।