“मोतियाबिंद के इलाज के लिए बिहार सरकार और भारत सरकार ने जब चश्मा न दिया तो जमीन भारी सूद पर गिरवी रखकर दिल्ली जाने का इंतजाम कर पाई।” यह दुखड़ा है पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित जितवारपुर गाँव की 74 वर्षीय श्रीमती सीता देवी का, जो अपनी बेमिसाल और लाजवाब चित्रकारी की बदौलत दुनिया भर में नाम व शोहरत हासिल कर चुकी हैं।

बिहार के मधुबनी जिले के एक छोटे से उजाड़ सरीखे गाँव में जितवारपुर का नाम ‘मधुबनी पेंटिंग’ के नाम से देश-विदेश में जाना जाता है। सीता देवी से पहले इसी गाँव की रहने वाली गंगा देवी और जगदंबा देवी पद्मश्री पुरस्कार लेकर अपनी कला से जिले तथा पूरे देश का नाम रोशन कर चुकी हैं।

मिथिला लोक चित्रकला की हजारों वर्षों की परंपरा को आज जीवंत बनाए रखने वाली सीता देवी अपनी चित्रकारी को उजागर करने कई बार यूरोप की यात्रा कर चुकी हैं और अपने देश में दर्जनों राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों में इनकी कलाकारी को ‘प्रथम श्रेणी’ का दर्जा मिल चुका है। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि ‘मधुबनी पेंटिंग’ का पर्याय मानी जाने वाली सीता देवी लगभग रुआँसे स्वर में कहती हैं कि इस बुढ़ौती में भी अगर हाथ-पैर न हिलाऊँ तो शायद घर का खाना खर्चा न चले। टूटे-फटे खपड़ैल वाली फूस की छत के मकान में रह रही सीता देवी स्वयं को और अपनी पेंटिंग को बरसात-अंधड़, तूफान से बचा नहीं पातीं। बरसात में जगह-जगह छत टपकती है और बारिश के साथ तेज हवा हो तब उन्हें अपने घर में बचाव की जगह नहीं मिल पाती। इस कलाकार की पेंटिंग को आँधी-बरसात से बचाने की जगह नहीं।

सीता देवी अपनी आँखों की रोशनी चले जाने के कारण काफी दुखी हैं, क्योंकि इससे उनकी कार्यक्षमता शून्य रह गई है। लेकिन इनकी कूची के अंदाज के क्या कहने कि बिना देखे बनाए गए चित्रों की गुणवत्ता उस समय के चित्रों से किसी मायने में कम नहीं है जब उनकी आँखें दुरुस्त थीं। इनका पूरा परिवार कलाकारों का है। बेटी, भांजी, नतनी, पोती—सब की सब इस कला में निष्णात हैं। ऐसे चित्रकार को बिहार सरकार से एक पैसा नहीं मिलता। जीविका का एकमात्र स्थायी स्रोत 500 रुपए है, जो उन्हें पद्मश्री पुरस्कार के बतौर हर महीने भारत सरकार से मिलता है। इस संबंध में बिहार सरकार के किसी अधिकारी से स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती। काफी छानबीन के बाद कला और संस्कृति के एक अधिकारी ने बताया कि सरकार कलाकारों की मदद की एक योजना पर विचार कर रही है।

पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सीता देवी की पहचान 1972 में बनी, जब लोक चित्रकला प्रदर्शनी में उनकी चित्रकारी की धूम मची और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें बुलाकर एक चित्र बनाने का आग्रह किया। सीता देवी बताती हैं कि वे तो प्रदर्शनी के सिलसिले में दिल्ली ले जाई गई थीं, इसलिए उनके पास चित्रकारी का कोई सामान नहीं था। लेकिन आग्रह से सीता देवी भाव-विह्वल हो उठीं और श्रीमती गांधी को अपने सामने बैठाकर पाँच घंटे के अंदर उन्होंने सिर्फ माचिस की तीली से दुर्गा देवी का चित्र बना दिया। चित्र के अंतिम चरण में श्रीमती गांधी को एक आवश्यक काम से बाहर जाना पड़ा। लौटकर जब श्रीमती गांधी को पता चला कि सीता देवी जा चुकी हैं तो उन्होंने उस चित्र के साथ अपनी हस्ताक्षरयुक्त तस्वीर और एक शाल भेजा, जिसे सीता देवी ने परंपरा के रूप में संभालकर रखा है।

1973 में सीता देवी ने एक अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी के दौरान पूर्व जर्मनी के तत्कालीन चांसलर एरिक होनेकर को काफी प्रभावित किया। बर्लिन में चित्र बनाते समय सीता देवी की तन्मयता से अभिभूत एरिक होनेकर ने अपने देश का सबसे खूबसूरत गुलदस्ता उन्हें भेंट किया। बिल्कुल निरक्षर सीता देवी के मस्तिष्क की तेजी का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि उन्हें मालूम है कि जब बर्लिन गई थीं उस समय जर्मनी दो था, लेकिन आज एक हो चुका है। धूल-धक्कड़ में मैले उस गुलदस्ते को दिखाते हुए सीता देवी के चेहरे पर आह्लाद के भाव उमड़ आते हैं। इनसे बात करने के लिए बड़े कलाप्रेमियों ने मैथिली सीखी या दुभाषिए की मदद ली। लेकिन सीता देवी हिंदी नहीं बोल पातीं, समझ जरूर लेती हैं और उन्हें इस बात का जरा भी मलाल नहीं है। वे हर सवाल का जवाब मैथिली में देती हैं।

एक टूटी चौकी, बिना बाँह की एक कुर्सी और एक हिलते पाए वाला टेबुल सीता देवी की पूँजी है, जो मिथिलांचल के परंपरागत सहज आतिथ्य से संसार की कितनी महान विभूतियों को कृतार्थ करती रही हैं। पुपुल जयकर महीनों इनके घर रहकर गई हैं, जिस घर का हर सदस्य हमेशा चित्रकारी में तल्लीन रहता है। फूलों से बने रंगों से रामायण की कथा को चित्रों में उकेरना मधुबनी पेंटिंग की खासियत है। इन चित्रों में मुख्य रूप से राम जन्म, राम विवाह, राम का वन गमन और भरत मिलाप प्रसंगों के अतिरिक्त मिथिला की प्रसिद्ध लोककथाएँ अंकित होती हैं।

छह महीने तक जापान में रहकर लौटी 64 वर्षीय महासुंदरी देवी को अपने गाँव राँटी में रहने लायक मकान तब हो सका जब इन्होंने अपने घर से सबको मधुबनी चित्रकारी की कला में निष्णात कर दिया। अब ये जीवनयापन के लिए किसी सरकारी या गैर-सरकारी अनुदान और प्रदर्शनियों में शामिल किए जाने पर मिलने वाली नाममात्र की सहायता राशि पर निर्भर नहीं हैं। राँटी और जितवारपुर गाँव आसपास हैं, जिनकी हर दीवार रंग-बिरंगे तैलीय चित्रों से सज्जित प्राचीन लोक कला की सहज जीवंतता का परिचय देती है। महासुंदरी देवी भी श्रीमती गांधी से मिल चुकी हैं। जापान सरकार के प्रति महासुंदरी देवी काफी कृतज्ञ हैं, जिसने उन्हें हर प्रकार की सुविधाएँ दीं और अपने यहीं की नागरिकता ग्रहण करने का आग्रह किया, पर मातृभूमि का मोह उन्हें वापस अपने गाँव ले आया। 11 वर्ष की उम्र में इनकी नातिन जापान हो आई और इनकी रिश्तेदार बौआ देवी भी जापान में रह आई हैं। 1991 में दो बार महासुंदरी देवी जापान गईं। इनके घर में साड़ी पर और बधाई कार्ड पर चित्रकारी का भी काम होता है।

इसी गाँव की शांति देवी और शिवन पासवान का कहना है कि श्रीमती सोनिया गांधी से उन्हें यदा-कदा मदद मिलती है। यह दंपति मधुबनी लोककला के प्रचार-प्रसार के लिए अपनी तरफ से यथासंभव प्रयत्न कर रहा है। ये दोनों जापानी कला-प्रेमी हसीगावा को अपनी शोहरत का श्रेय देते हैं। कई-कई बार फ्रांस, इटली, जर्मनी, डेनमार्क और जापान हो आए इस हरिजन दंपति को हिंदी बोलने में भी कठिनाई होती है, लेकिन उन्हें इस बात से संतोष है कि बड़े-बड़े लोग उनकी कला की इज्जत करते हैं। शांति देवी इसे अपने राज्य बिहार का दुर्भाग्य मानती हैं, जहाँ कि किसी सरकार ने न केवल उसकी, बल्कि मधुबनी कला की थाती जितवारपुर गाँव की सुधि नहीं ली और इस कला का मर्म समझने वाले ज्यादातर लोग विदेशी हैं। इन गाँवों की लगभग हर कलाकार श्रीमती इंदिरा गांधी और जापानी कला-प्रेमी हसीगावा का नाम लेती है।

1983 में शिवन पासवान और शांति देवी दोनों की श्रीमती इंदिरा गांधी से भेंट हुई, जिनके रुचि लेने से आज गाँव में शांति देवी का एक पक्का मकान है, जिसमें वे ग्रामीण लड़कियों को उस तरह की चित्रकारी का प्रशिक्षण देती हैं जैसे चित्रों की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में माँग होती है। 1983 में ही इस दंपति की श्रीमती सोनिया गांधी से भी एक प्रदर्शनी के दौरान मुलाकात हुई, जिन्होंने 25,000 रुपए नकद देकर शांति देवी का उत्साह बढ़ाया। सोनिया गांधी ने यह भी आश्वासन दिया कि शांति देवी को जब भी जितने पैसे की जरूरत हो, उनसे निःसंकोच माँग लिया करें। शांति देवी ने आज तक सोनिया गांधी से कुछ माँगा नहीं, लेकिन बिना माँगे यदा-कदा कुछ-कुछ पैसे आते रहते हैं। भारत सरकार से श्री शिवन पासवान को 1,500 रुपए और श्रीमती शांति देवी को 750 रुपए प्रति माह प्रशिक्षण केंद्र चलाने के मिलते हैं।

जिस गाँव की 18 महिलाएँ राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी हैं उसकी कच्ची सड़कें रिक्शा और ताँगा जाने लायक भी नहीं हैं। जिन महिलाओं से मिलने देश-विदेश से सैकड़ों कला-प्रेमी आ चुके हैं, उनकी उपेक्षापूर्ण जिंदगी का वर्णन नहीं किया जा सकता। महासुंदरी देवी के पास एक विजिटर्स बुक है, जिस पर करीब 100 विदेशियों के हस्ताक्षर हैं। अभी तक इन कलाकारों का शोषण ही हो रहा है। जिला या प्रदेश स्तर पर इनकी पेंटिंग का एक भी बिक्री केंद्र नहीं है, जो कलाकारों की स्थायी आय का स्रोत बन सकता था। इस ओर कभी किसी का ध्यान नहीं गया।

हसीगावा कच्चा कागज लेते हैं और गोबर तथा प्राकृतिक रंगों से मिट्टी की भीत पर बने ये चित्र मनपसंद पेपर पर अंकित कराकर खरीद लेते हैं। विदेशी कला-प्रेमियों के एजेंट अभावग्रस्त इन कलाकारों की आर्थिक किल्लत का नाजायज फायदा उठाकर कम से कम कीमत पर पेंटिंग खरीदते हैं और बाहर ले जाकर ऊँची कीमत पर बेचते हैं। जितवारपुर गाँव की ही एक संस्था है सेवा मिथिला, जिसकी संचालिका गौरी मिश्र मधुबनी पेंटिंग के नाम पर अमेरिकी संस्था ऑक्सफैम और फोर्ड फाउंडेशन से लाखों डॉलर उठाती है, लेकिन उसका लाभ कलाकारों तक नहीं पहुँच पाता। कलाकारों की खोज-खबर सिर्फ लोककला प्रदर्शनियों के समय ली जाती है।

दिल्ली और अन्य महानगरों में तथा प्रसिद्ध सूरजकुंड मेले में भी मधुबनी लोककला के नमूने दिखाई दे जाते हैं, मगर उसे बेचने वाले कलाकारों की हालत देखते ही बनती है। सबसे ज्यादा तकलीफ प्रकृति से तारतम्य स्थापित करने वाले कलाकारों को उस समय होती है जब प्रदर्शनियों में और मेलों में शोभा बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर लिये जाने के बाद कोई सरकारी अथवा गैर-सरकारी संस्था इनकी खोज-खबर लेने नहीं आती। जिनकी रोजी का एकमात्र माध्यम पेंटिंग से आने वाली आय है, भला उन्हें विदेश घुमाने और उपाधियों से विभूषित करने से क्या मिलने वाला है। जिन कलाकारों ने अपनी परंपरा से जुड़ी प्रतिभा से प्रदेश का और देश का नाम रोशन किया, आज उन्हें अपनी गुजर-बसर के लिए सोचना पड़ रहा है। सीता देवी का शरीर साथ नहीं दे रहा है, मगर इच्छाशक्ति की कमी नहीं है और आज भी राम विवाह के सपने देखती हैं जो उनकी कला में रचा-बसा है। क्यों न हो, सीता की जन्मस्थली तो यही है, जहाँ राजा जनक के हल की नोक से सीता देवी पैदा हुईं और इसीलिए उनका नाम सीता पड़ा। संस्कृत में ‘सीत’ शब्द का अर्थ हल की नोक होता है।