पटना, 16 नवम्बर (भाषा)। हिंदी के जाने-माने साहित्यकार बाबा नागार्जुन इस बात से दुखी हैं कि भारत में उन जैसे कलमजीवियों को अपने भरण पोषण के लिए प्रकाशकों की दया पर आज भी निर्भर रहना पड़ता है।
इस वर्ष साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता पाने वाले बाबा यहां राजेन्द्र शिखर सम्मान पाने के बाद ‘भाषा’ से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने बताया कि 84 साल की उम्र में भी उदरपूर्ति के लिए कलम चलाना पड़ रहा है फिर भी उन्हें डर है कि कहीं सांस टूटने से पहले कलम रुक न जाये।
जे.पी. आंदोलन के दौरान नुक्कड़ों पर अपने काव्यपाठ से जनमानस को झकझोरने वाले बाबा को यह बात साल रही है कि जे.पी. आंदोलन के लक्ष्यों और उपलब्धियों को कूड़ेदान में फेंक दिया गया।
वे कहते हैं कि कोई भी अच्छा राजनीतिज्ञ किसी भी आंदोलन की उपलब्धियों की बंदरबांट में शामिल नहीं होता, यही कारण है कि आजादी के समय के माहौल से दुखी होकर महात्मा गांधी दिल्ली छोड़कर नोआखली चले गये थे।
लोगों के बीच बाबा के नाम से मशहूर नागार्जुन की राय में केन्द्र में स्थिरता कायम रह पायेगी क्योंकि प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव जोड़तोड़ की कला में पारंगत हैं। वामपंथियों को उन्होंने खिचड़ी और दिशाहीन राजनीति करने वालों की संज्ञा दी और भाजपा पर नयी पीढ़ी को सही रास्ते से विमुख करने का आरोप लगाया।
आज के साहित्य लेखन पर टिप्पणी करते हुए बाबा ने कहा कि आज के लेखकों को छपाए की बीमारी है किंतु स्तरीय लेखन गहरे अध्ययन और मनन की मांग करता है।
पर्यटन विकास निगम के कमरा नं. 102 में बाबा अपने चिरपरिचित बाल सुलभ सरलता से एक टोस्ट पर मक्खन की तरह च्यवनप्राश लगाते हैं और खाते हुए कहते हैं कि बड़ा मजेदार लग रहा है। ये च्यवनप्राश एक लाख इक्कावन हजार के राजेन्द्र शिखर पुरस्कार के साथ व्यवहार के लिए मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भेंट किया है।
बाबा कहते हैं, च्यवनप्राश तो मैंने पहले भी खाया है, लेकिन इसका स्वाद तो गजब का है, सरकारी है न। बाबा बताते हैं कि मुख्यमंत्री ने उनसे कहा कि रउआ के जियावे के बा (आपको जिंदा रखना है) मगर अब क्या अब तो उनके जर्जर शरीर में सिर्फ चमड़ी ही बची है।
लालू प्रसाद के बारे में बाबा कहते हैं कि लोगों को मोहने की कला में वो माहिर हैं, देखना यह कला उसे दोबारा मुख्यमंत्री बना देगी।
इस उम्र में भीड़ में दूसरे दर्जे की रेल यात्रा से होने वाले कष्ट से भी बाबा दुखी हैं। वे कहते हैं कि रेलमंत्री अगर उन्हें दो आदमी का वीआईपी पास उपलब्ध करा दे तो बड़ी राहत मिलेगी। यायावरी प्रवृत्ति के बाबा वर्षों से भयंकर दमे से पीड़ित हैं जिसके चलते ठीक से बोल नहीं पाते और अब कान भी जवाब दे रहा है।
मैथिली भाषा में ‘यात्री’ के नाम से मशहूर बाबा अपने खास बेबाक अंदाज में स्पष्ट करते हैं कि उन्हें फर्जी स्वतंत्रता सेनानी या सर्वोदयी पास नहीं चाहिए लेकिन ऐसे लेखक के रूप में चाहिए जिसकी पुस्तकें देश के 18 विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं।
खांसी के वेग को रोकते हुए फंसी आवाज में वे आखिरकार कह देते हैं, ‘हमारे जैसे साहित्यकार वीआईपी का दर्जा नहीं पा सकते।’