असम के पुराने झंझटिया उग्रवादी समस्याओं में से एक बोडो हिंसा को विराम लगना सही मायने में ऐतिहासिक है । इसका दूसरा प्रशंसनीय पहलू ऐसे समय में विभिन्न बोडो गुटों से एक ही दिन एक ही मंच पर समझौता होना है, जब असम के लगभग सभी असमिया भाषी लोगों का नागरिकता कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन लगातार जारी है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा गठजोड़ और कांग्रेस गठजोड़ दोनों ही सरकारों द्वारा पहले किए गए आधे-अधूरे काम को एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचाया । नागरिकता संशोधन एक्ट को लेकर विरोध सबसे पहले असम से शुरू हुआ । असम में ही सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है, जहां भाजपा की सरकार है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह दोनों ही विरोध का जवाब बोल-बोलकर दे रहे हैं । लेकिन चुपचाप पूर्वोत्तर की परिभाषा बदलने के प्रयास में जुटे हैं, जिसकी पहचान भारत के इतिहास में हिंसा और उपद्रवग्रस्त क्षेत्र के रूप में दर्ज है ।

केंद्र सरकार, असम सरकार और विभिन्न बोडो उग्रवादी गुटों के बीच दिल्ली में 27 जनवरी को हुए हस्ताक्षर कई बिंदुओं से महत्वपूर्ण है । उनमें सबसे ज्यादा मार्के की बात है सिर्फ हिंसा पर भरोसा करनेवाले विभिन्न बोडो गुटों से शांति व अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के शहादत दिवस से पहले समझौता । 30 जनवरी को बापू के शहादत दिवस के दिन बोडो गुटों ने आत्मसमर्पण किया । असम एवं पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के अलावे देशभर के लोगों ने अखबार, टीवी चैनलों के जरिए बोडो उग्रवादियों को हथियार सौंपते देखा । महात्मा गांधी की यह 72वीं पुण्यतिथि थी और बोडो अलगावादी हिंसा 1966-67 में भड़की । इस समझौते से असम में अलग राज्य के लिए हिंसक छापामार आंदोलन चलानेवालों में से एक तबके को मुख्यधारा में लाने का रास्ता खुला है ।

असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने 30 जनवरी को गुवाहाटी में बोडो उग्रवादियों के आत्मसमर्पण के बाद उल्फा(युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम, ‘आई’) उग्रवादियों को इससे प्रेरणा लेने और अंतहीन हिंसा का रास्ता छोड़कर वार्ता के लिए आगे आने कहा । मंत्रिमंडल में नंबर दो मंत्री हिमांता बिस्व शर्मा ने भी उल्फा(आई इंडिपेंडेंट स्वतंत्र) समेत असम और मणिपुर के भी सभी विद्रोही गुटों को शांति प्रक्रिया को अपनाकर अपने समाज के लिए एक उदाहरण पेश करने कहा । सोनोवाल और हिमांता बिस्व शर्मा दोनों ने ही इस बात पर बल दिया कि असम की क्षेत्रीय अखंडता सरकार के साथ बिल्कुल एक रहेगी । समझौता एक साथ दिल्ली और डिसपुर दोनों जगह हुआ, मगर हस्ताक्षर दिल्ली में हुआ । हस्ताक्षर के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और असम के मुख्यमंत्री दोनों ने कहा कि इस समझौते से बोडो अलग राज्य आंदोलन समाप्त हो गया और बोडोलैंड आंदोलन के इतिहास में शांतिपूर्ण जन-जीवन का एक नया अध्याय जुड़ गया । उस अवसर पर अलग राज्य आंदोलन का प्रतिबंधित संगठन एनडीएफबी(नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड) के विभिन्न गुटों के नेताओं के अलावे बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद(बोटीसी) प्रमुख हागामा मोहिलारी भी मौजूद थे । हागामा मोहिलारी 1980 के दशक में अलग बोडोलैंड राज्य की मांग को लेकर हिंसक आंदोलन करनेवाले प्रमुख नेताओं में से रहे हैं। उन्होंने हिंसा को छोड़ मुख्यधारा की जिंदगी का रास्ता अपनाया । अभी वे बोटीसी के मुख्य कार्यकारी परिषद सदस्य हैं और मोहिलारी का एनडीएफबी से अलग होकर बने राजनीतिक मंच बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट(बीपीएफ) असम में भाजपा गठजोड़ सरकार का एक घटक है ।

गुवाहाटी में 28 जनवरी को ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन(एबीएसयू) अध्यक्ष प्रमोद बोडो ने समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह इस अर्थो में काफी महत्व रखता है, क्योंकि इससे सशस्त्र आंदोलन का खात्मा हो गया है । सशस्त्र गुटों के सभी तबके समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए एक साथ एक ही जगह इकट्ठे हुए यह बहुत बड़ी बात है । लेकिन असम के मंत्री हिमांता बिस्व शर्मा ने जब कहा कि इस समझौते से बोडोलैंड राज्य आंदोलन समाप्त हो गया है, तो प्रमोद बोडो समेत एबीएसयू नेताओं ने इतने स्वागतयोग्य माहौल का जायका बिगाड़ने वाला तेवर का परिचय दिया । अलग राज्य की मांग के संबंध में पूछे जाने पर प्रमोद बोडो यह कहकर सरक लिये कि यह अगले विशेष सम्मेलन में तय होगा । उनके सहयोगी एसीबसयू नेता ने कह दिया - ‘समझौते में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि एबीएसयू अलग बोडो राज्य छोड़ देगा । जबकि समझौता कहता है - बोडो संगठनों की मांगों का अंतिम हल निकालने और व्यापक विकास के लिए बातचीत हुई है, आगे भी होगी और राज्य की क्षेत्रीय अखंडता को अटूट रखा जाएगा ।’ इस अप्रिय बिंदु को अगर तूल दिया जाए तो सवालिया निशान लगता है, बिल्कुल गौर न किया जाए तो जवाब मिलता है ।

ऐसे ही समझौते के बाद असम के मुख्यमंत्री ने उल्फा(आई) सुप्रीमो परेश बरूआ गुट को वार्ता के लिए सामने आने कहा । बोडो उग्रवादियों के आत्मसमर्पण से चार दिन पहले 23 जनवरी को उल्फा(आई) समेत आदिवासी ड्रैगन फाइटर, कामतापुर लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन, रावा नेशनल लिबरेशन फ्रंट और अन्य गुटों के भी लगभग 600 विद्रोहियों ने हिंसा छोड़ने के इरादे से आत्मसमर्पण किए । जिन अलगाववादी सशस्त्र गुटों ने सरकार के आगे आत्मसमर्पण किया है और जिन्हें सरकार ने आमंत्रित किया है उनमें सबसे चुनौतीपूर्ण हैसियत वाला उल्फा (आई) है । उल्फा ऐसा गुट है, जो भारत की संघीय व्यवस्था को ही स्वीकार करने को राजी नहीं है । उल्फा को ‘स्वाधीन संप्रभु असोम’ चाहिए, जिसका प्रावधान भारत के संघीय ढांचे में नहीं है । गुवाहाटी के अखबार ‘असम ट्रिब्यून’ की रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री के आमंत्रण के जवाब में उल्फा(भाई) के चीफ सैनिक कमांडर परेश बरूआ ने कथित रूप से संकेत दिया कि वे इसी शर्त पर शांति प्रक्रिया में शामिल होने को तैयार हैं, कि असम की संप्रभुता पर वार्ता होनी चाहिए । भारत के संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत अलग राज्य की मांग करनेवाले उग्रवादी गुटों के आत्मसमर्पण के बाद असम सरकार ने समझौते के माध्यम से क्या संदेश दिया, यह तो उल्फा सुप्रीमो परेश बरूआ ने देखा ही होगा । उसके बाद उन्होंने शांति वार्ता की यह शर्त रखी ।

पूर्वोत्तर में अलगाववादी हिंसा का इतिहास असम से नगा विद्रोह से शुरू होता है । उसके बाद दूसरा वैसा ही अलगाववाद उल्फा के रूप में उपजा । नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम(एनएससीएन) और उल्फा यही दोनों संगठन है, जिसने भारत के संघीय ढांचे के अंतर्गत ‘स्वाधीन संप्रभु अलग राष्ट्र’ के लिए आंदोलन छेड़ा । बाकी सारे अलग राज्य आंदोलन उसी से उपजे हैं ।

बोडो समझौता दिल्ली से लेकर असम तक प्रतिकूल और तनावपूर्ण माहौल में हुआ । जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र - एक्टिविस्ट शरजील इमाम ने ठीक समझौते के समय नागरिकता संशोधन बिल विरोध की हवा में जहर घोलने की कोशिश की - ‘असम, पूर्वोत्तर को भारत से अलग करो ।’ सोशल मीडिया पर किए गए इस बहुप्रचारित विस्फोट का कोई असर नहीं हुआ ।

प्रधानमंत्री ने समझौते के लिए बोडो उग्रवादियों को म्यांमार से लाने का काम चुपके-चुपके करवाया । 27 जनवरी को बोडो उग्रवादियों के साथ समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पता चला कि 11 जनवरी को ही उनमें से कइयों को म्यांमार से ले आया गया था । उल्फा(आई) का सबसे बड़ा और संगठित अड्डा म्यांमार में है । उसके बहुत साथियों ने अन्य उग्रवादी गुटों के साथ आत्मसमर्पण किया । ऐसी तरकीब उल्फा(आई) काडरों के साथ भी अपनायी जा सकती है । क्योंकि उल्फा(आई) के कई छापामारों के बारे में खुफिया रिपोर्ट है कि वे बीहड़ों की घुटती जिंदगी से छुटकारा चाहते हैं । उल्फा नेताओं को 2011 में केंद्र की कांग्रेस गठजोड़ सरकार द्वारा बांग्लादेश से लाया गया था । उल्फा चेयरमैन अरविंद राजखोवा समेत कई नेता गिरफ्तार हुए, जमानत पर छूटे । लेकिन उनके साथ शांति वार्ता बेनतीजा रही । वार्ता विरोधी परेश बरूआ छुट्टा घूमता रहा । इसे भी सही मुकाम पर पहुंचाने का वक्त आ गया है । क्योंकि कोई समझौता इतने वर्षों में हुआ ही नहीं । बोडोलैंड पर यह तीसरा समझौता है ।

1993 में ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन के साथ समझौता हुआ और बोडोलैंड स्वायत्त परिषद बना । 2003 में भाजपा गठजोड़ सरकार में उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की पहल पर बोडोलैंड लिबरेशन टाइगर्स से समझौता हुआ । उसके बाद बोडो आदिवासी बहुल आबादी वाले चार जिलों - कोक्राझार, चिरांग, बस्का और उदालगिरी को मिलाकर बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद बना । पश्चिम असम में बोडोलैंड क्षेत्र में 1966-67 में भड़की अलगाववादी हिंसा में दो बार 1986 और 1987 में उफान आया । बोडो छात्र संगठनों के नेतृत्व ने बाद में एक संयुक्त मंच एनडीएफबी बनाया । हिंसा के कारण ये विभिन्न गुटों में बंटे, जिन्हें शांति पथ पर एक साथ लाने में सफलता मिली है ।

अलगाववाद से पटा पूर्वोत्तर में सेना की बदौलत कानून और व्यवस्था चल रही है, जिसमें फर्जी मुठभेड़ दिखाकर बेकसूरों को या आत्मसमर्पण किए हुए उग्रवादियों को मार देने के लिए सैनिक बदनाम हैं । बड़ी अच्छी बात है कि बोडोलैंड समझौते के बाद सेना प्रमुख जनरल मनोहर मिलिंद नरवणे ने कहा कि अगले 18-24 महीनों में आंतरिक सुरक्षा ड्यूटी से सैनिकों को हटाने की योजना पर काम चल रहा है ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोडोलैंड समझौते का ऐतिहासिक समारोह मनाने सात फरवरी को कोक्राझार पहुंच रहे हैं । प्रधानमंत्री के गुवाहाटी के बजाए कोक्राझार जाने का कार्यक्रम बनाने के पीछे ठोस कारण है । 2014 में कोक्राझार और बक्सा जिले में भड़की जातीय हिंसा काबू से बाहर हो गयी थी । बोडो उग्रवादियों ने 40 बंगाली मुसलमानों की हत्या कर दी थी । एमओएस(समझौता ज्ञापन) में कहा गया है कि बोडो उग्रवादियों के खिलाफ एनआईए(राष्ट्रीय जांच एजेंसी) कोर्ट में सामूहिक हत्याओं के मुकदमों की समीक्षा की जाएगी । अभी समझौते के समय नागरिकता संशोधन बिल को लेकर जातीय और धार्मिक उन्माद उफान पर है । प्रधानमंत्री ने नगा गुटों के साथ अंतिम समझौता के लिए 31 अक्टूबर तक का डेडलाइन तय किया था । उसके लटकने का कारण है हार्डलाइनर एनएससीएन प्रमुख टी. मुइवा, जो समानान्तर सरकार का दावा करता है । यहां सरकार का पक्ष कहीं-न-कहीं कमजोर पड़ता है । नगा विद्रोही नेता दावा करते रहे हैं कि महात्मा गांधी ने 1948 में उनकी अलग नगालिम मांग का कथित रूप से समर्थन किया था । उसी वर्ष राष्ट्रपिता की हत्या हो गयी । बापू की 150वीं जयंती वर्ष में नगा समेत कई पूर्वोत्तर गुटों को हिंसा छोड़ने को राजी करने में सफलता मिली है । एकमात्र एनएससीएन है, जो 22 वर्षों से संघर्षविराम सहमति पर अटकी है । इसे समझौते तक पहुंचाने के लिए बोडो जैसी पहल हो ।