सिमी(प्ड) अर्थात् इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया फिर से चर्चा में है । क्योंकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकारों को इस प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन की गतिविधियों की जानकारी देने कहा है। देश भर में कई सीरियल बम विस्फोटों और उपद्रवी गतिविधियों में हाथ होने के कारण इस इस्लामी आतंकी गुट पर पांच साल से प्रतिबंध है । इसकी अवधि 31 जनवरी, 2019 को समाप्त होनेवाली है ।

इस सात महीने के अंदर केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित कर लेना है कि 31 जनवरी के आगे सिमी पर प्रतिबंध जारी रखना जरूरी है या नहीं । इसलिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकारों को पत्र लिखकर पूछा है कि सिमी अभी तक ऐसी गतिविधियों में शामिल है या नहीं, जिससे देश की आंतरिक सुरक्षा और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के लिए खतरा पैदा हो सकता है । राज्य सरकारों से मिले फीडबैक के आधार पर केंद्रीय गृह मंत्रालय फैसला करेगा कि 31 जनवरी, 2019 से आगे सिमी पर प्रतिबंध बढ़ाया जाय या नहीं ।

गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव एस सी एल दास की ओर से राज्य सरकारों को लिखे गए हालिया पत्र में सिमी के खिलाफ दर्ज मुकदमों और आरोपपत्रों की विस्तृत जानकारी साक्ष्यों के साथ मांगी गयी है । इसमें एक फरवरी, 2014 से पहले या उसके बाद के दर्ज मुकदमे, एफआईआर के अलावे ऐसे मामलों का भी ब्योरा प्रस्तुत करने कहा गया है, जो अदालतों में लंबित हैं ।

सिमी की तकदीर के विषय में केंद्र सरकार के किसी नतीजे पर पहुंचे में तो अभी समय है । लेकिन उसके पहले राज्य सरकारों से क्या फीडबैक भेजा गया है, यह काफी माएने रखता है । क्योंकि जनवरी, 2019 से पहले कुछ राज्यों में विधान सभा चुनाव है और मई, 2019 में लोकसभा चुनाव के समय भी कुछ राज्यों का नंबर आ जाएगा ।

सिमी पर प्रतिबंध का मामला राजनीतिक है । इसलिए इस संबंध में किसी भी फैसले का राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास हो सकता है । ज्यादातर राज्यों के भाजपा शासित होने के कारण अल्पसंख्यक वोट राजनीति करनेवाले कांग्रेस समेत तमाम गैर-भाजपाई दलों के प्रस्तावित विपक्षी महाजोत के लिए सिमी मुद्दा बनेगा ।

पहली बात तो यह कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ऐसे समय में अगले प्रतिबंध पर विमर्श शुरू किया है, जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी(एएमयू) कैंपस जिन्ना को लेकर विवाद के घेरे में है । एएमयू की तरह ही दूसरे केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिलिया का अल्पसंख्यक टैग हटाने की तैयारी की जा चुकी है ।

सिमी की स्थापना 25 अप्रैल, 1977 को एएमयू कैंपस में हुई थी ।

2005 में जब केंद्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी, उस समय जामिया मिलिया कैंपस में सिमी छात्रों ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद ढहाने की बरसी मातम दिवस के रूप में मनायी ।

यह अपने आप में रोचक और अटपटा लगता है कि सिमी की स्थापना 1977 में उस समय हुई, जब केंद्र में तमाम कांग्रेस विरोधी पार्टियों की एकजुटता जनता पार्टी सरकार बनी । जनसंघ का उसमें विलय हुआ और वही जनसंघ भारतीय जनता पार्टी के नाम से फिर वर्षों बाद सत्ता में आया । 2002 में जब सिमी पर पहली बार केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगाया, उसी समय से इसको लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद शुरू हो गया । क्योंकि उस वक्त केंद्र में भाजपा गठजोड़ सत्ता में थी ।

2004 में कांग्रेस के नेतृत्ववाली संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़(यूपीए) ने अपनी ‘प्रगतिशीलता’ का परिचय देते हुए सत्ता में आते ही सिमी पर से प्रतिबंध हटाया । उसी कांग्रेस सरकार को 2004 में फिर प्रतिबंध लगाना पड़ा । सिमी पर से प्रतिबंध हटाने और फिर इस इस्लामी आतंकी गुट को प्रतिबंधित करने का सिलसिला यूपीए के 2009 में दुबारा वापस लौटने तक चला । मौजूदा प्रतिबंध एक फरवरी, 2014 का चल रहा है, जो कांग्रेस सरकार का लगाया हुआ है । पांच साल के लिए लगे इस प्रतिबंध की अवधि 31 जनवरी, 2019 को समाप्त हो रही है । एक फरवरी, 2014 के प्रतिबंध के बाद कांग्रेस मई में आम चुनाव हार गयी । अब 31 जनवरी, 2019 के बाद भाजपा को अपना भाग्य आजमाना है । वर्तमान राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़ सरकार के लिए राहत देनेवाली बात ये है कि सिमी संस्थापक सफदर हुसैन नागोरो समेत इस संगठन के 18 सदस्यों को विभिन्न कोर्टों से अलग-अलग मामलों में कैद की सजा हो चुकी है ।

गत 15 मई को कोच्चि की विशेष एनआईए कोर्ट ने इन सबों को उपद्रव, दंगा भड़काने, तोड़फोड़, हथियार रखने और हथियार चलाने की गुप्त ट्रेनिंग कैंप लगानेवाली गैरकानूनी गतिविधियों में दोषी पाया । राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) स्पेशल कोर्ट जज काउजर एडप्पगथ ने अभियुक्तों को गैरकानूनी गतिविधियां रोक कानून और विस्फोटक पदार्थ एक्ट की आईपीसी धारा-120बी(आपराधिक षडयंत्र) समेत कई धाराओं के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की सजा सुनायी । उन अभियुक्तों को अपराध की गंभीरता के मद्देनजर कैद की अवधि भी अलग-अलग कोर्ट ने तय की । केरल में 2007 से सिमी पर प्रतिबंध है, जब वहां भी कांग्रेस नेतृत्ववाली युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट सत्ता में थी । केरल में ही एक बस को बम से उड़ा देने और ट्रेनों में विस्फोट के कारण केंद्र सरकार को इस पर प्रतिबंध हटाकर फिर लगाना पड़ा ।

2006 तक सिमी इतना बेखौफ हो चुका था कि केंद्र सरकार को फिर से प्रतिबंध हटाकर लगाना पड़ा । फिर जस्टिस बी. एन. चतुर्वेदी की अध्यक्षता वाली ट्रिब्यूनल ने इस प्रतिबंध अधिसूचना की पुष्टि कर दी तो सरकार की अधिसूचना और ट्रिब्यूनल की पुष्टि दोनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी । सुप्रीम कोर्ट जज एस. बी. सिन्हा और मार्कण्डेय काटजू की पीठ ने 15 फरवरी, 2007 के अपने फैसले में सिमी को उपद्रवी तथा अलगाववादी गुट बताकर इसे गैरकानूनी संगठन घोषित कर दिया । जजों ने प्रतिबंध को उचित ठहराया । उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव थे । उन्होंने यह कहकर सिमी पर प्रतिबंध जरूरी नहीं समझा कि यूपी में सिमी के किसी विस्फोट में शामिल होने के ‘पक्के’ सबूत नहीं हैं । 2007 में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ए एम यू का अल्पसंख्यक टैग बरकरार रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगा रहे थे । आज यूपी में भी स्थिति बदली हुई है । अभी भी सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दीपक मिश्र, जस्टिस ए. एम. खानविलकर की पीठ सिमी पर प्रतिबंध के खिलाफ कई याचिकाओं पर नवंबर, 2017 से सुनवाई कर रही है ।

इन याचिकाओं का जो हो और केंद्रीय गृह मंत्रालय को राज्य सरकारों से जो भी फीडबैक मिले । लेकिन सिमी को लेकर सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार फंसी है । और अब दोबारा सिमी के चर्चा में आ जाने से विधान सभा चुनाव में यह मुद्दा बन सकता है । जनवरी, 2019 से पहले मध्यप्रदेश में चुनाव होने हैं । कथित मुठभेड़ दिखाकर सिमी को उछालने के बाद मध्यप्रदेश की सरकार इस तरह फंसी कि जनता के कटघरे में दी गयी हर सफाई एक नया संदेह साबित हुई । संयोग कुछ ऐसा है कि 2017 में भोपाल और इंदौर की कोर्ट ने भी सिमी सरगना सफदर हुसैन नागोरो समेत उसके संगठन के 10 सदस्यों को उम्रकैद की सजा सुनायी ।

पहले देखिए कि 2016 में दीपावली की रात को मध्यप्रदेश पुलिस ने क्या किया । सरकार ने भोपाल सेंट्रल जेल में कथित मुठभेड़ में आठ सिमी आतंकियों के मारे जाने की बात कही । लेकिन उसके बाद से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर उनके गृहमंत्री पुलिस और आतंक निरोधक दस्ता(एटीएस) के बयान परस्पर विरोधी तथा भ्रम पैदा करनेवाले थे । सरकार साबित नहीं कर पायी कि भोपाल सेंट्रल जेल से भागनेवाले सिमी आतंकी थे, जिन्हें पुलिस ने कथित मुठभेड़ में मार दिया । एटीएस प्रमुख ने कहा कि उनके पास हथियार नहीं थे । जो मुठभेड़ मध्यप्रदेश सरकार ने दिखाया वैसा तो कश्मीर, पूर्वोत्तर और नक्सल प्रभावित राज्यों में नहीं देखने को मिलता । विवाद जब बहुत बढ़ गया तो मध्य प्रदेश सरकार ने रिटायर हाईकोर्ट जज एस. के. पांडे की अध्यक्षता में जांच कमिटी बनायी और मुठभेड़ में शामिल ‘बहादुर’ पुलिसकर्मियों के लिए घोषित इनाम वापस ले लिया ।

29 अगस्त, 2017 को भोपाल की स्पेशल कोर्ट ने सिमी अभियुक्तों को भाजपा युवा मोर्चा कार्यकर्ता पर कातिलाना हमला के जुर्म में उम्र कैद की सजा सुनायी । उस हमले के सात अभियुक्तों में से चार के बारे में बताया गया कि भोपाल सेंट्रल जेल से भागने के दौरान कथित मुठभेड़ में 30 अक्टूबर, 2016 को मारे गए । सजायाफ्ता अबू फैजल उर्फ डाक्टर ने स्पेशल कोर्ट में साफ कहा - ‘मेरा भरोसा शरियत में है, संविधान में नहीं ।’

उसके पूर्व 27 फरवरी, 2017 को इंदौर के स्पेशल सेसन जज बी. के. पलोडा ने सिमी संस्थापक सफदर हुसैन नागोरो समेत 10 अभियुक्तों को 2008 में अहमदाबाद विस्फोट सिलसिले में राजद्रोह के जुर्म में उम्र कैद की सजा सुनायी ।

सिमी ऐसा तगड़ा आतंकी संगठन है, जिसने 1990 के दशक तक बंगाल और बिहार के बाद एक-एक वर्ष के अंतराल पर पूरे देश में 10 वर्षों तक सीरियल विस्फोट का जाल बिछा लिया था । नवंबर, 2015 में बिहार विधान सभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पटना गांधी मैदान में जनसभा से पहले सीरियल विस्फोट किया । उसके पूर्व बोधगया मंदिर परिसर में धमाका किया, जिसके अभियुक्तों को इसी महीने सजा हुई है ।