बिहार में तेजी से बढ़ता उग्रवाद अभी तक राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल नहीं हुआ है न ही केन्द्र सरकार का ध्यान इस ओर गया है, पर अब तो समय आ गया है जब बिहार के मामले को गम्भीरता से लिया जाय। अगर यह मानकर चला जाय कि सिर्फ उसी उग्रवादी हिंसा को जनजीवन की शान्ति के लिए खतरे के रूप में लें जिसमें विदेशों का हाथ हो और जिससे अलगाववाद को बढ़ावा मिले तब तो और बात है। लेकिन जब खून-खराबा इस हद तक पहुंच जाय कि लोग गांव-इलाका छोड़-छोड़कर भागने लगें, कोई रातभर सो न सके, दोपहर को घर से बाहर निकले तो स्वाभाविक यह अन्देशा होने लगे कि अब उसकी कहीं लाश नजर आयेगी तो उसे हल्के ढंग से नहीं लिया जा सकता। चिंता की बात यही है कि स्थिति काबू से बाहर होने के बावजूद बिहार सरकार इसे हल्के ढंग से ले रही है। आम जनता में त्राहि-त्राहि मची है।

उत्तर-पूर्वी राज्यों में आज से नहीं-आजादी के समय से ही विद्रोही गुट सक्रिय हैं, लेकिन वहां की सरकारों ने या उन राज्यों की ओर से केन्द्र सरकार ने कभी अपनी कमजोरी जाहिर नहीं होने दी। यहां तक कि कश्मीर और पंजाब की सरकारों ने हमेशा सुरक्षा बलों के हौसले बुलन्द किये। जबकि केन्द्र सरकार को भी इन दोनों राज्यों की समस्याओं से जूझना काफी महंगा पड़ रहा है और उन उपद्रवग्रस्त राज्यों में कानून और व्यवस्था को चुनौती देने वालों को इतनी हिम्मत कभी नहीं हुई कि गांव-गांव में उनकी अपनी अदालत हो और उनका फैसला सबको मजबूरन मानना पड़े।

बिहार के उग्रवादी वास्तव में जातिवादी हैं। इसे उग्रवादी हिंसा कहकर कितना भी महिमामण्डित क्यों न किया जाय, इसकी जड़ में जातिगत संघर्ष है और एक जातिवाले दूसरी जाति के खिलाफ वर्चस्व की खुंदक निकालने के लिए भारी-भारी हथियारों का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं जिसके आगे पुलिस बिल्कुल कमजोर साबित हो रही है। इस अराजकता से भयाक्रान्त हर नौजवान अपनी और अपने परिवार के लोगों की सुरक्षा के लिए भूमिगत उग्रवादी होना पसन्द करता है ताकि समाज में दादागिरी कायम रहे, साथ-साथ पुलिस भी उससे टकराव मोल लेने की जुर्रत न करे। गांव का युवक अपनी-अपनी जाति का दबदबा बनाने के लिए कालेज जाने के बजाय हथियार चलाने और थाना लूटने की ट्रेनिंग लेता है। इस ट्रेनिंग सेंटर से डिप्लोमा प्राप्त नौजवानों के हाथ में सब कुछ होता है। वो जिस किसी भी जमींदार को कहता है कि इतनी रकम अमुक स्थान पर अमुक समय तक पहुंचा दें वरना अंजाम बुरा होगा तो उस डिप्लोमाधारी का आदेश मानना जमींदार की मजबूरी है क्योंकि अगर उसने कहीं अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस की मदद लेने की कोशिश की तो फिर कोई ताकत उस जमींदार की जान नहीं बचा सकती। इन्हें नक्सली भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि नक्सल सिद्धान्त में जाति के आधार पर खूनी क्रान्ति करने का प्रावधान नहीं है।

उग्रवाद का रूप ले चुका यह संघर्ष मूल रूप में जमींदारों और उन भूमिहीनों के बीच है जो २१वीं सदी में भी समाज में उपेक्षा और प्रताड़ना की जिंदगी से ऊबकर आज हथियार हाथों में ले बैठे हैं। इसमें किसी जाति विशेष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आज से दस साल पहले बड़े भूस्वामी मुख्य रूप से ऊंची जाति के लोग (विशेषकर भूमिहार और राजपूत) थे, जिनका पिछड़ी जातियों और हरिजनों के प्रति काफी घटिया नजरिया था। लेकिन इधर पांच-दस वर्षों से सम्पन्नता के साथ जातीय समीकरण बदल गया है। अब पिछड़ी जातियों के पास इतना पैसा हो गया है कि वे ऊंची जातिवालों को उनकी स्टाइल से आंख दिखा सकें और यही है संघर्ष की जड़। इस मामले में मध्य बिहार का माहौल अन्य जिलों के मुकाबले जरा ज्यादा खूनी हो गया क्योंकि यहां ऊंची जाति और पिछड़ी जातियों की हैसियत बराबर हो गयी है। मुख्यमंत्री लालू प्रसादजी के जातीय भावनाओं को भड़काने वाले भाषणों ने और भी उत्तेजना फैला दी। इस जातीय संघर्ष का सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है हरिजनों को। उनके लिए समस्या हो गयी है कि वे किसका साथ दें, किसका विरोध करें कि बिल्कुल तटस्थ रहें। हरिजनों की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ है जिसके चलते विभिन्न उग्रवादी संघटनों के बीच चल रही वर्चस्व की लड़ाई में ये निर्दोष लोग मारे जाते हैं।

प्रतिशोध की आग ने उग्रवादियों को अत्यन्त क्रूर और अमानवीय बना दिया है। पहले तो ये रात के सोते में झोपड़ियों में आग लगा देते हैं और उसके बाद घर से बाहर भागने वालों को या तो गोलियों से भून देते हैं अथवा उठा-उठाकर आग में ही फेंक देते हैं। एम सी सी हमले का जवाब देने के लिए जनता दल और सी पी आई (एम एल) वाले उसी अंदाज में एम सी सी समर्थक हरिजन इलाके में कहर मचाते हैं।

किसी भी सरकार ने भूमिविवाद को गम्भीरता से नहीं लिया जो हिंसा की जड़ है। एम सी सी अभी मध्य बिहार के गया, चतरा, औरंगाबाद और भोजपुर जिलों में सबसे सशक्त उग्रवादी गुट के रूप में उभरा है। अपने प्रभाव वाले तमाम इलाकों में एम सी सी की समानान्तर सरकार चलती है, इसकी अपनी अदालत है और उस अदालत का फैसला अन्तिम होता है। पुलिस और प्रशासन उस फैसले का कार्यान्वयन नहीं रोक सकते। सरकार सब कुछ जानते हुए भी लाचार है। एम सी सी उग्रवादी आम तौर पर उन लोगों को सजा देते हैं जो उनके बारे में पुलिस को अथवा उनके प्रतिद्वन्द्वी संघटन को गुप्त सूचना देते हैं। ऐसे लोगों को एम सी सी का कोपभाजन बनने से न तो पुलिस बचा पाती है न ही एम सी सी के अन्य विरोधी संघटन।

उग्रवादी सबसे ज्यादा उजाड़ और अत्यन्त पिछड़े इलाकों में सक्रिय हैं जहां उन्हें पहाड़ों और जंगलों में सुरक्षित छिपे रहने में आसानी होती है। पुलिसकर्मियों के पास न तो वाहन है, न टेलीफोन न वायरलेस। उग्रवादी खूब मजे में थाना फूंककर चल देते हैं, बड़े अधिकारियों के चरण तभी पड़ते हैं जब कोई बड़ा हत्याकाण्ड हो जाय। ऐसे मौके पर मुख्यमंत्री बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर डालते हैं जिनमें बिहार सशस्त्र पुलिस की चार नयी बटालियनें बनाने से लेकर उग्रवादियों से निबटने के लिए विशेष प्रशिक्षण अभियान चलाना भी शामिल है। विगत दिनों मुख्यमंत्री ने मुख्य रूप से बढ़ते अपराधों की समीक्षा के लिए राज्य के तमाम वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक बुलायी और उसमें भी इस बात पर जोर दिया गया कि सभी थानों को वायरलेस और गाड़ी दी जायगी। जो पुलिसकर्मी हिम्मत करके मुठभेड़ में अपनी जान गंवा बैठते हैं उनके परिवार को भी मुआवजे की रकम के लिए सरकारी कार्यालयों का चक्कर लगाते-लगाते अपनी आधी जिंदगी कुर्बान कर देनी होती है।

हाल में खून की राजनीति में विश्वास करने वाले दो संघटन अन्य सबको पीछे छोड़ने की कोशिश में जुटे हैं और वो हैं एम के एस एस-पार्टी यूनिटी और लालखण्डी। लालखण्डियों ने अपना कार्य क्षेत्र दक्षिण बिहार के पलामू, डाल्टनगंज और हजारीबाग में सीमित कर रखा है। एम के एस एस (मजदूर किसान संग्राम समिति) और एम सी सी एक साथ सक्रिय हैं। ऊंची जातिवालों की शिकायत है कि उन्हें प्रशासन से कोई मदद नहीं मिलती और उन लोगों के मारे जाने पर सरकार की ओर से कोई झांकने भी नहीं आता जबकि पिछड़ी जातियों और हरिजनों के मारे जाने पर मुख्यमंत्री स्वयं पहुंच जाते हैं और प्रशासन तुरन्त सक्रिय हो जाता है। ऊंची जातिवालों ने भी सवर्ण लिबरेशन फ्रन्ट, सनलाइट सेना, रणवीर सेना टाइप से अपने लठैतों के संघटन बना रखे हैं जिनकी बदौलत हमला और जवाबी हमला चलता रहता है। एम सी सी पहली बार प्रकाश में आया १९८९ में जब उसने एक ही दिन औरंगाबाद जिले के दलेलचक बघौरा में एक जाति विशेष के ५३ लोगों की हत्या कर दी और राज्य सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

१९७० दशक में इंडियन पीपुल्स फ्रन्ट और सी पी आई (एम एल) का उदय होता है। सी पी आई (एम एल) के वर्तमान महासचिव विनोद मिश्र काफी समय तक असम में भूमिगत रहने के बाद बिहार आये और बिहार में अपना जनाधार तैयार करके उन्होंने राजनीतिक जीवन अपना लिया। आई पी एफ तो पहले ही खून की राजनीति छोड़कर चुनावी राजनीति अपना चुका था। आई पी एफ को पिछले विधानसभा चुनाव में भी अच्छा स्थान मिला था और इस बार सी पी आई (एम एल) के साथ मिलकर छः सीटें हासिल की हैं। अब फ्रन्ट के संस्थापक नागभूषण पटनायक लगभग पीछे पड़ चुके हैं, विनोद मिश्र ही हावी हैं जो स्वयं खून की राजनीति में विश्वास करते थे। इसकी वजह यह है कि इन दोनों संघटनों की पैदाइश ही भू-सामन्तों द्वारा भूमिहीन खेतिहर मजदूरों के शोषण से हुई है। इन दोनों ने तो अपनी लड़ाई लड़ने के लिए संसदीय प्रणाली अपना ली, लेकिन एम सी सी इस प्रणाली को अपनाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है।

यूं तो बिहार में ऊंची जातियों के जमींदारों द्वारा अति पिछड़ी जातियों के खेतिहर मजदूरों का शोषण कोई नयी बात नहीं है। बिहारी मजदूरों का बड़ी संख्या में हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और अन्य राज्यों की ओर पलायन की वजह जमींदारों का अपमानजनक व्यवहार ही है लेकिन जनता दल की सरकार ने बिहार में एक नयी प्रवृत्ति की शुरुआत की जिसने बढ़ते-बढ़ते खूनी रूप लिया और पूरा बिहार जातीय विद्वेष की आग में जल रहा है।

पिछले पांच वर्षों में जनता दल सरकार ने सबसे ज्यादा समझदारी से जो काम किया वो है समाज में जातीय उन्माद भड़काना। इसलिए इस अवधि में सबसे ज्यादा जातीय हिंसा भड़की भी जिसे ‘उग्रवाद’ की संज्ञा दी जा रही है। इस दौरान हुए सभी छोटे-बड़े हत्याकाण्डों का विवरण बताता है कि हत्यारों ने एक-एक आदमी को घर से बाहर निकालकर उनकी जाति पूछी और तब थोड़ी दूर बाहर ले जाकर उनकी हत्या की। अपने को वामपंथी दिखाते हुए जनता दल सरकार पर जातिवादी होने का आरोप लगाने वाले ये तथाकथित उग्रवादी मूलतः जातिवादी हैं और पता नहीं इन नेताओं को किस मार्क्स और लेनिन ने प्रभावित किया है जो जातिवाद के आधार पर खूनी क्रान्ति करना चाहते हैं। भागलपुर और आसपास के जिलों में एक अन्य उग्रवादी संघटन शांतिपाल मजुमदार के नेतृत्व में आतंक मचा रखा है। पुलिस स्वीकार करती है कि गत तीन वर्षों में इस संघटन ने दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतारा है और पुलिस को उसका सुराग नहीं मिल पाया है।