संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद((यूएनएससी) के तीन स्थायी सदस्यों ने भारत के इस दावे का जोरदार समर्थन किया है । अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 79वें सत्र के दौरान सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट हासिल करने के भारतीय प्रयास तथा दावे का समर्थन करते हुए कहा कि बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के मद्देनजर यूएनएससी में सुधार की बहुत जरूरत है । इन तीनों आर्थिक और सैनिक महाशक्तियों ने वैसे जापान, जर्मनी तथा ब्राजील को भी स्थायी सदस्य बनाने की वकालत की, मगर भारतीय दावे को ज्यादा मजबूती से अपने संबोधन भाषण में रक्षा । भारत की ही अगुवाई में जापान, जर्मनी और ब्राजील का सिर्फ यूएनएससी में स्थायी सीट हासिल करने के लिए इन चारों देशों का एक ग्रुप बना हुआ है, जो ग्रुप.4 कहलाता है ।
संयुक्त राष्ट्र महासभा के हाल में हुए वार्षिक सत्र की ग्रुप.4 देशों के पक्ष में सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इन चारों स्थायी सीट दावेदारों ने एकजुट होकर इसके लिए प्रयास किया और उसका असर देखने को मिला । शायद यह पहला अवसर है, जब एक साथ पी.5(पांच स्थायी सदस्य) गुट के तीन प्रमुख देशों ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत के दावे को समर्थन देते हुए उचित ठहराया ।
भारत के पक्ष में संयुक्त राष्ट्र मं ऐसी लहर ग्रुप.4 के प्रयासों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लागातार 10वें वर्ष में प्रवेश करने के 100 दिन पूरे होने की भी उपलब्धि मानी जा सकती है । नरेंद्र मोदी के अबतक के कार्यकाल में इसके पहले ग्रुप.4 की इस दिशा में कोई उल्लेखनीय गतिविधि नहीं रही ।
ग्रुप.4 का गठन मनमोहन सिंह ने 2004 में प्रधानमंत्री बनते ही किया और पूरे 10 वर्ष तक स्थायी सीट का दावा जीवंत रखा ।
2015 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र में भारत का पक्ष मजबूती से रखा । अभी 2024 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ठीक उसी तरह से स्थायी सीट का दावा पेश किया और ग्रुप.4 देशों के साथ मिलकर ऐसी लाबीइंग की, ताकि पी.5 के देश भारत के प्रयासों को हल्के ढंग से न लें ।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य पी.5 के नाम से जाने जाते हैं । उनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस के बाद रूस और चीन का नंबर है । 1945 में दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र गठन के समय ये पांचों विजेता देश थे । इन देशों ने इस विश्व मंच(यू एन) का गठन इस तरह से किया, ताकि बाकी सदस्यों की हैसियत उनके समान न हो पाए ।
अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन न केवल यूएनएससी के स्थायी सदस्य बने, बल्कि उसमें दबंगई का यह पहलू भी जोड़ दिया कि सिर्फ इन्हीं पांचों महाशक्तियों को वीटो पावर होगा । संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों की आम सहमति से भी पास कोई प्रस्ताव पी.5 के इतने वर्ष गुजर जाने के बावजूद असमानता बरकरार है और पी. 5 के कोई देश किसी अन्य देश को अपनी बाजूवाली स्थायी सीट पर बैठने देने को तैयार नहीं हैं ।
संयुक्त राष्ट्र में सुधार की बात बहुत दिनों से की जा रही है । यह झंडा सबसे पहले भारत ने ही उठाया और अन्य देशों को इसके लिए एकजुट किया । इस बार हवा का बदला रूख भारत के अनुकूल लग रहा है । मगर स्थायी सदस्य बनने के भारतीय प्रयास के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है, चीन । चीन हमेशा से भारत के इस दावे का विरोधी रहा है । संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस सत्र में रूस ने भी भारत समेत ग्रुप.4 के दावे का समर्थन नहीं किया । रूस और चीन में कम्युनिस्ट शासन होने के बावजूद दोनों देशों में अच्छे सम्बंध नहीं रहे हैं । लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस और चीन के बीच नजदीकी बड़ी है । ग्रुप.4 के देशों से भी रूस और चीन के सामरिक हित टकराते हैं । लेकिन उसके बावजूद अमेरिका, फ्रांस और इंगलैंड के समर्थन से भारत समेत ग्रुप.4 का हौसला बढ़ा है । सबसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान समर्थन किया । उसके बाद फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मेक्रोन ने कहा कि भारत और उसके साथ.साथ जापान, जर्मनी, ब्राजील को यूएनएससी की स्थायी सीट मिलनी चाहिए । उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि संयुक्त राष्ट्र जैसे विश्व प्लेटफार्म पर सभी सदस्यों को किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर समान रूप से अपनी बात कहने का अधिकार नहीं है । संयुक्त राष्ट्र महासभा के 79वें सत्र में फ्रांस के राष्ट्रपति का इशारा वीटो पावर की ओर था । फिर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने भी कहा कि हम सुरक्षा परिषद में भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील को स्थायी सदस्य के रूप में देखना चाहते हैं । लेकिन भारत का खास तौर से जिक्र करते हुए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत को स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करने से यूएनएससी की वैधता और प्रभावशीलता बढ़ेगी ।
विदेशमंत्री जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस और महासभा के नए अध्यक्ष फिलेमोन योंग से अलग.अलग मुलाकात की । दोनों नेताओं ने चर्चा के क्रम में पश्चिम एशिया और युक्रेन संघर्ष के अलावे भारतीय दावे का समर्थन किया । जयशंकर ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया कि 15-सदस्यीय सुरक्षा परिषद में सुधार करने पर सहमति बनी है ।
संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के दौरान भारत के साथ.साथ ब्राजील ने भी एक हफ्ते काफी मेहनत की । ग्रुप.4 के देश अफ्रीकी देशों को भी उचित प्रतिनिधित्व के पक्ष में है । दक्षिण अफ्रीका स्थायी सीट का कई वर्षों से प्रबल दोवदार है और भारत के साथ मिलकर आवाज उठाता आ रहा है । फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मेक्रोन ने कहा कि अफ्रीकी देशों से भी दक्षिण अफ्रीका के अलावे एक और प्रतिनिधि को स्थायी सीट मिलनी चाहिए, ताकि विश्व के किसी भी हिस्से को असंतोष न रहे । ग्रुप.4 देशों के विदेशमंत्रियों ने ग्रुप.20 देशों के मंच का भी इस्तेमाल ग्लोबल गवर्नेंस रिफॉर्म’ की दिशा में ठोस कदम के लिए किया । अभी ग्रुप.20 का अध्यक्ष ब्राजील है । आनेवाले महीनों में ऐसी बैठकें होनेवाली हैं, जिसमें रूस और चीन दोनों को शामिल होना है । नरेंद्र मोदी और चीन के प्रधानमंत्री शी जिनपिंग आमने.सामने होंगे । वीटो पावरयुक्त दो देश. चीन और रूस ने ग्रुप.4 के दावे तथा संयुक्त राष्ट्र सुधारों पर चुप्पी साध रखी है ।
22 से 24 अक्टूबर तक रूस के कजान में ब्रिक्स की बैठक तय है । इसमें भारत और चीन के बीच लद्दाख पर चल रहा तनाव कम करने की कूटनीतिक कवायद तेज हो गयी है । ब्रिक्स(ठत्खै) ग्रुप के संस्थापक सदस्यों में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं । तुर्की, भी इस ग्रुप में शामिल होने के दौर में है ।
तुर्की, के राष्ट्रपति रीसेप तय्यिप एर्डोगन ने अपने संयुक्त राष्ट्र संबोधन में कश्मीर का धारा.370 हटाने समेत कोई जिक्र नहीं किया । माना जा रहा है कि ब्रिक्स का सदस्य बनने में भारत की समर्थन पाने के लिए तुर्की, ने ऐसा किया । 2019 से तुर्की, अपने हर यूएन संबोधन में कश्मीर का जिक्र करता आ रहा है ।
अभी 22.24 अक्टूबर को रूस में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में दो यूएनएससी स्थायी सदस्य और तीन दावेदार आमने.सामने होंगे । दावे और सुधारों की चर्चा नहीं होगी, ऐसा कैसे कहा जा सकता है । मिस्र, इथियोपिया, इरान और संयुक्त अरब अमीरात के भी ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने की संभावना है । ये देश 01 जनवरीए 2024 से ब्रिक्स के सदस्य हो गए ।
ब्राजील के रियो डि जनेरियो में 18.19 नवंबर को जी.20 शिखर बैठक आयोजित है । इसमें भी भारत, चीन, ब्राजील साथ बैठेंगे । संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री एलान कर चुके हैं कि जी.20 की अगली शिखर बैठक की मेजवानी भारत करेगा ।
इन दोनों सम्मेलनों से पहले इस्लामाबाद में एससीओ(शंघाई सहयोग संगठन.ब्) शासनाध्यक्षों की बैठक 15.16 अक्टूबर को होने जा रही है । विदेशमंत्री एस. जयशंकर के एससीओ बैठक में शामिल होने की संभावना है । इसके दो कारण बताए जा रहे हैं। पहला तो ये कि जयशंकर और चीनी विदेशमंत्री तय करेंगे कि ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी.जिनपिंग मुलाकात की क्या रूपरेखा होगी । दूसरा ये कि गत वर्ष एससीओ की गोवा बैठक में भाग लेने पाक विदेशमंत्री बिलावल मुट्टो आए थे । भारत को डिप्लोमेटिक जवाब देना है, साथ.साथ एससीओ में अपनी मौजूदगी और आवाज कमजोर नहीं पड़ने देना है ।
रूस की ब्रिक्स औ एससीओ बैठक में ज्यादा दिलचस्पी है । रूसी राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन भारत, ब्राजील और चीन को यूक्रेन शांति फार्मूला तैयार करने में महती भूमिका निभाने की पेशकश कर चुके हैं । इन तमाम संगठनों की थोड़े.थोड़े अंतराल पर लगभग पूरे साल चलनेवाली बैठकों में किसी.न.किसी रूप में यूएनएससी स्थायी सीट का मुद्दा जरूर उठेगा । क्योंकि एक जर्मनी को छोड़कर ग्रुप.4 के तीनों देश इन तीनों संगठनों का हिस्सा हैं । ग्रुप.4 से बाहर का दक्षिण अफ्रिका मुख्य भागीदार है । जयशंकर अगर पाकिस्तान जाते हैं तो यह 9 साल बाद किसी विदेशमंत्री की पहली यात्र होगी । 2015 में विदेशमंत्री सुषमा स्वराज इस्लामाबाद गयी थी ।
पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में आदतन कश्मीर राग अलापाए जिसका करारा जवाब जयशंकर ने दिया । फिर संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव, भाविका मंगलानंदन दोनों ने पाकिस्तान को लताड़ने के साथ.साथ 28 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र सुधार पर भी बल दिया । पड़ोसी देशों में एकमात्र भुटान है, जिसके प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे ने भारत को स्थायी सीट का हकदार बताया । संयुक्त राष्ट्र सुधार की चर्चा अब सुनने में गोलमटोल लगती है । भारत समेत किसी भी देश संयुक्त राष्ट्र में या उसके बाहर यह बात खुलकर बोलने में परहेज करते हैं कि समानता के रास्ते में मुख्य बाधा है, वीटो । जबतक यह विशेषाधिकार खत्म नहीं होता, पी.5 से पी.6 भी होगा असंभव है ।
पी.5 के सभी देशों ने साम्राज्यवादी स्वार्थ के लिए वीटो अपने पास रखा है और इसका इस्तेमाल करते रहते हैं । लेकिन इनमें से कोई भी देश ऐसा सुधार नहीं होने देना चाहते कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में अगर सर्वसम्मति से वीटो प्रावधान खत्म करने का प्रस्ताव पेश हो तो उसे कोई वीटो न करे । मुश्किल ये है कि पूरा विश्व अपने.अपने स्वार्थ से गुटों में बंटकर पी.5 के देशों से सटा है । इसलिए वीटो खत्म करके सभी सदस्य देशों के लिए समान दर्जा का प्रस्ताव एजेंडा ही नहीं बनता ।