श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षा की 17 अगस्त को हो रहे संसदीय चुनाव में जीत सुनिश्चित मानी जा रही है। उसके बाद उनका प्रधानमंत्री बनना तय है। भारत की इस पर सरसरी नजर है, राजपक्षा के लौटने से भारत-श्रीलंका रिश्ता प्रभावित हो सकता है।
क्योंकि इसी वर्ष 8 जनवरी को हुये राष्ट्रपति चुनाव में महिंदा राजपक्षा अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार मैत्रीपाला सिरिसेना के हाथों पराजित हो चुके हैं। सिरिसेना ने दो-तिहाई बहुमत से राजपक्षा को हरा कर राष्ट्रपति पद पर कब्जा जमाया । राजपक्षा का यह मिथक तोड़ दिया कि श्रीलंका में उनका विकल्प नहीं है।
महिंदा राजपक्षा ने अपना कार्यकाल पूरा होने से दो साल पहले ही चुनाव कराया,ताकि सात वर्ष तक राष्ट्रपति जनता को यह स्वीकार्य नहीं था।
पर उन्होंने अपनी हार नहीं मानी इसके लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा दिया । राजपक्षा ने खुलेआम आरोप लगाया कि भारत के खुफिया ब्यूरो ‘रा’ ( आर.ए.डब्लू-रिसर्च एंड एनेलिसिस विंग) ने ‘पश्चिमी एजेंसियों’ के साथ मिलकर एक साजिश के तहत उन्हें अपदस्थ किया इस आरोप में कितना दम है, यह तो राजपक्षा को ही पता होगा। लेकिन इतना सही है कि लिट्टे(लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम) सफाए की आड़ में उतरी श्रीलंका में रह रहे भारतीय मूल के तमिल अल्पसंख्यकों के बीच बाजाप्ता युद्ध की तरह नरसंहार अभियान राजपक्षा ने चलाया। उसकी दुनिया भर में निंदा हुई। 2009 के ‘इलम युद्ध’ के खिलाफ अभी तक संयुक्त राष्ट्र में युद्ध के मानदंडों का उल्लंघन करके अमानवीय अत्याचार का मामला चल रहा है। इससे भारत क्या दुनिया भर में राजपक्षा के प्रति नफरत है।
राजपक्षा ने चीन और पाकिस्तान से नजदीकी स्थापित की । खासकर चीन से ऐसा व्यापारिक और सैनिक संबंध बढ़ाया, ताकि भारत के लिए चुनौती हो। राजपक्षा की हार बड पैमाने पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के कारण हुई। कोलंबो के अखबार ‘संडे लीडर’ के अनुसार श्रीलंका के कुल राष्ट्रीय वजट 1.7 खरब में से 1.2 खरब रूपये की तिजोरी महिंदा राजपक्षा परिवार के हाथ में थी।
राष्ट्रपति बनने के बाद चुनावी वायदे के मुताबिक मैत्रीपाला सिरिसेना ने राजपक्षा परिवार द्वारा जमा की गयी अकूत 18 अरब संपति की जांच के आदेश दिये। मगर जांच प्रक्रिया बीच में ही रोक देनी पड़ी, क्योंकि उस पैसे से चल रही कई प्रोजेक्टों में चीन ने निवेश किया हुआ है। उन्हीं में से एक है बहुचर्चित 1.4 अरब डॉलर का राजधानी कोलंबो के पॉश वी आई पी एरिया से सटा पोर्ट सिटी मेगा प्रोजेक्ट, जो भारतीय समुद्री मुहाने के करीब है । राष्ट्रपति सिरसेना ने पहले तो चीनी परियोजनाओं का काम रोका, लेकिन उसके बाद से अपनी पार्टी गठजोड़ के अंदरूनी कलह में फंसे हैं ।
सतारूढ़ श्रीलंका फ्रीडम पार्टी(एसएलएफपी) के जिन लोगों ने राजपक्षा का साथ छोड़कर सिरिसेना को जिताने में मदद पहुंचायी, वही अब राजपक्षा के प्रति पुरानी वफादारी निभा रहे हैं। राजपक्षा ने अपने चुनाव प्रचार में इस बात को अहमियत दी है कि अगर वे जीते तो सबसे पहले सिरिसेना जो चीनी परियोजनाएं रद्द की हैं, उन्हें तत्काल चालू करवाएंगे। दक्षिण श्रीलंका में चीन एक बंदरगाह (पोर्ट) और हवाई अड्डा बना चुका है।
प्रधानमंत्री के रूप में महिंदा राजपक्षा के पास ज्यादा अधिकार होंगे, जो उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के समय और उसके पहले भी किसी प्रधानमंत्री के पास नहीं थे। राजपक्षा ने चुनाव लड़ने का फैसला तब किया, जब 20 अप्रैल को संसद से प्रधानमंत्री का अधिकार बढ़ाने वाला 19वां संशोधन बिल परित करा लिया। राजपक्षा समर्थका के दबाव में ही उसके बाद जून में राष्ट्रपति को संसद भंग करके चुनाव की घोषणा करनी पड़ी।
2014 के नबंवर में जब महिंदा राजपक्षा ने राष्ट्रपति चुनाव कराने का ऐलान किया, उस समय मंत्रिमंडल में मैत्रीपाला सिरिसेना नंबर दो की हैसियत रखते थे। पार्टी और देश के अंदर राजपक्षा के खिलाफ व्यापक जन असंतोष से तो वे अवगत थे ही। बस राजपक्षा का साथ छोड़ा और विपक्ष के साझा उम्मीदवार बन गये। मुख्य विपक्षी पार्टी युनाइटेड नेशनल पार्टी(यूएनपी)और सलारूढ़ पार्टी के भी राजपक्षा से नाराज नेताओं ने सिरिसेना को समर्थन दिया। इसके अंतर्गत श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के नेतृत्व में युनाइटेड पीपुल्स फ्रीडम एलायंस(यू पी एफ ए) गठित हुआ। इसमें शामिल होकर यूएनपी के रानिल विक्रमसिंघे विपक्षी नेता से प्रधानमंत्री बन गए। तमिल नेशनल एलायंस(टी एन ए) नेता भी सिरिसेना के साथ हो गये। नये राष्ट्रपति ने तमिलों को नागरिक अधिकार देने और राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने वाला 13वां संविधान संशोधन लागू करने का भी वायदा किया । इसमें सत्ता में भागीदारी टाईप अधिकार देने का प्रावधान है, जो श्रीलंका की बहुसंख्यक सिंहली पार्टी नहीं चाहती।
राष्ट्रपति सिरिसेना अपनी पार्टी और गठजोड़ दोनों के ही प्रमुख बन गये। राजपक्षा को एस एल एफ पी अध्यक्ष पद से हटा दिया। लेकिन पार्टी पर अंदर-अंदर राजपक्षा समर्थकों की पकड़ मजबूत बनी रही । पूर्व राष्ट्रपति चनद्रिका कुमारतुंग ने राजपक्षा गुट के कुछ संदिग्ध नेताओं नेताओं को हटाने का सुझाव दिया। राष्ट्रीय मेलजोल के हिमायती सिरिसेना ने उसे तबज्जो नही दी । 2005 में कुमारतुंग को अपदस्थ करके राजपक्षा राष्ट्रपति बने और उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से भी हटाया। तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का रिकार्ड कायम करने का राजपक्षा का प्रयास नाकामयाब करने में चनद्रिका कुमारतुंग ने सिरिसेना का साथ दिया।
लेकिन छह महीने में ही राजपक्षा समर्थको साबित कर दिया कि भारत से नजदीकी और तमिलों को सिंहलियों के समान अधिकार देना उन्हें मंजूर नहीं है। गठजोड़ में शामिल अन्य प्रमुख पार्टिया भी इससे सहमत हैं।
तमिल नेशनल एलायंस(टी एन ए) नेता सी.वी. विग्नेश्वरन ने पार्टी घोषणापत्र जारी करते हुए जब संघीय व्यवस्था कायम करने की मांग की तो तीखी प्रतिक्रिया हुई। एस एल एफ पी महासचिव अनुरा प्रियदर्शन यापा ने साफ कहा कि संघवाद की बात करना अलगाववाद का मुद्दा उठाना है। विग्नेश्वरन समेत तमिल नेता आर. संपर्कन ने तमिल आबादी वाले उत्तरी और पूर्वी प्रांतों के लिए भी सत्ता में भागदारी वाली संघीय टाइप व्यवस्था की मांग रखी, जिसे सभी पार्टियों ने ठुकरा दिया। यू एन पी नेता डी. एम. स्वामीनाथन और घोर तमिल विरोधी कम्यूनिस्ट पार्टी जनता विमुक्ति पेरामुन(जे वी पी) प्रवक्ता विजिठा हेरात ने कहा कि चुनाव के समय यह मांग उठाने का असली मकसद संसद में अपनी सीट बढ़ाना है।
सिरिसेना ने पहली बार संविधान में राष्ट्रीय मेलजोल शासन व्यवस्था का प्रावधान जोड़ा । मई में तमिल इलाके जाफना में एक तमिल लड़की की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या के प्रति राष्ट्रपति ने वहां जाकर संवेदना व्यक्त की और अपना वायदा दोहराया।
लेकिन राजपक्षा की नजर 19वें संविधान संशोधन पर थी, जिसके तहत राष्ट्रपति के हाथ में केंद्रित कई महत्वपूर्ण अधिकार प्रधानमंत्री के पास आ गए। 2010 में राजपक्षा ने ही सब कुछ अपने हाथ में लेकर प्रधानमंत्री का दर्जा एक मंत्री से बेहतर नहीं रहने दिया। मंत्रिमंडल सीधे अपने नियंत्रण में ले लिया।
अब वैसे समय में राजपक्षा प्रधानमंत्री बनना चाहते है, जब राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के किसी फैसले को सीधे नामंजूर नहीं कर सकते। कोई भी अहम निर्णय लेने में प्रधानमंत्री की राय राष्ट्रपति के लिए मायने रखेगी। यहां तक कि राजपक्षा समर्थको के बिना सिरिसेना का राष्ट्रपति बने रहना भी कठिन है। एक गठजोड़ घटक नेता उदय गम्मनपीला और एस एल एफ पी नेता दिलान पेरीरा बार-बार सफाई दे रहे है कि ‘भारत तो हमारा बड़ा भाई भी है और हमारी बड़ी बहन भी. .........!’ पेरीरा ने कहा कि सरकार के प्रमुख सिरिसेना बने रहेगें, लेकिन............ इसके आगे की पंक्ति 17 अगस्त के बाद जुड़ पाएगी।
सिरिसेना की लाचारी उनके राष्ट्रपति बनने के थोड़े दिनों बाद ही प्रकट हो गयी थी। जनवरी में शपथग्रहण के एक महीने बाद सिरिसेना सेबसे पहले भारत आये । फिर मार्च में चीन गये और कहा कि चीनी सहयोग से कोलंबो पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट का काम जारी रहेगा। तमिलों को भी उनसे ज्यादा उम्मीद नहीं है। पेरीरा का दावा है कि सात महीने पहले राजपक्षा के प्रति मतदाताओं के मन में जो असंतोष था, वो सिरिसेना के ओर चला गया है। प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे का चुनाव बाद हटना लगभग निश्चित है । राजपक्षा पहले तो मात्र एक एमपी सीट का चुनाव लडने का एलान किया, फिर प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो गए।