मणिपुर में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (AFSPA) को फिर से लागू करने और केंद्रीय बलों की तैनाती का विरोध जारी है, जबकि केंद्र सरकार हिंसा पर काबू पाने के लिए इन्हीं बलों पर निर्भर है। जनता को न तो केंद्रीय बलों पर भरोसा है और न ही राज्य पुलिस पर, और सेना की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर सरकार से हिंसा, लूटपाट और आगजनी की घटनाओं का ब्योरा मांगा है, जबकि इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने दिल्ली में प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की है।
मणिपुर में जातीय हिंसा और कानून-व्यवस्था के असामान्य हालात के कारण नवगठित दूसरी सरकार 'वर्चुअल मोड' पर चल रही है। मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह और दो उपमुख्यमंत्री (नेमचा किपगेन और लोसी दीखो) दिल्ली से शपथ लेने को मजबूर हुए, और विधानसभा सत्र में भी कई विधायक वर्चुअल रूप से शामिल हुए। यह लेख राज्य में जारी हिंसा, जातीय समुदायों के बीच अविश्वास और राजनीतिक अस्थिरता को उजागर करता है, जिसमें कुकी-जो समुदाय द्वारा अलग 'कुकीलैंड' की मांग भी शामिल है।
मणिपुर में जातीय हिंसा और तनाव के बीच, असम राइफल्स ने सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए एक अनूठा फुटबॉल मैच 'ऑपरेशन सद्भावना' आयोजित किया। इस मैच में नगा, मेइतेइ और कूकी समुदायों के युवाओं ने भाग लिया, जिसका उद्देश्य आपसी वैमनस्य को कम करना था। यह पहल ऐसे समय में हुई जब राज्य में नई सरकार के गठन के बाद भी हिंसा भड़क उठी थी, और बच्चों पर हिंसा के भयावह मानसिक प्रभावों को भी उजागर किया गया।
मणिपुर में भाजपा गठबंधन सरकार जून 2020 में अस्थिर हो गई, जब नौ मंत्रियों और विधायकों ने मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह से समर्थन वापस ले लिया, जिससे सरकार अल्पमत में आ गई। इसमें तीन भाजपा विधायक और चार एनपीपी विधायक शामिल थे। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और अन्य भाजपा नेताओं ने सरकार बचाने के लिए हस्तक्षेप किया, खासकर राज्यसभा चुनाव से पहले। विधायकों की अयोग्यता और अदालती फैसलों ने स्थिति को और जटिल बना दिया, जिससे गठबंधन की स्थिरता पर सवाल खड़े हो गए।
मणिपुर में जातीय हिंसा के एक साल पूरे होने पर सामाजिक संगठनों ने शांति और न्याय की गुहार लगाई है। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने भाजपा सरकार के तहत शांति बहाली का दावा किया, लेकिन स्थानीय लोगों में चुनाव को लेकर उत्साह नहीं था और वे सरकार की नीतियों से असंतुष्ट दिखे। लेख बताता है कि राज्य और केंद्र सरकार ने मणिपुरवासियों की पीड़ा को समझने के बजाय उन्हें केवल अपनी नीतियां समझाने की कोशिश की है, जिससे तनाव और अविश्वास बढ़ा है।
यह लेख मणिपुर में राष्ट्रीय खेल यूनिवर्सिटी की स्थापना के केंद्र सरकार के फैसले की आलोचना करता है। लेखक तर्क देता है कि मणिपुर के लोग इस परियोजना में दिलचस्पी नहीं रखते क्योंकि वे लंबे समय से आफ्सपा के तहत सुरक्षा बलों की ज्यादतियों और मानवाधिकार उल्लंघनों से पीड़ित हैं। लेख में मणिपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति विवाद और फर्जी मुठभेड़ों की सीबीआई जांच का भी उल्लेख है, जो राज्य की गंभीर स्थिति को उजागर करता है।
यह लेख मणिपुर में भारत सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, विशेषकर आसियान देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के प्रयासों की, जबकि मणिपुर के लोग खुद को भारत से कटा हुआ महसूस करते हैं। इसमें सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के तहत सेना द्वारा कथित न्यायेत्तर हत्याओं और फर्जी मुठभेड़ों का जिक्र है, जिनकी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया है। लेखक नागा शांति समझौते की गोपनीयता और मणिपुर के लोगों के प्रति केंद्र सरकार के अविश्वास पर भी प्रकाश डालता है, यह तर्क देते हुए कि व्यापार से पहले लोगों का विश्वास जीतना आवश्यक है।
मणिपुर में शांति के प्रयासों के बावजूद हिंसा जारी है, जिससे सरकार गठन और जातीय गुटों के बीच वार्ता बेनतीजा रही है। मेइतेइ और कुकी-जो समुदायों के बीच नफरती हिंसा 03 मई 2023 से जारी है, जिसके कारण मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को इस्तीफा देना पड़ा और राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। केंद्रीय गृह मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद, लूटे गए हथियारों की बरामदगी और विस्थापितों के पुनर्वास जैसे मुद्दों पर प्रगति धीमी है, और समुदायों के बीच विश्वास खंडित है।
यह लेख मणिपुर केंद्रीय यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. आद्या प्रसाद पांडेय के खिलाफ चल रहे छात्र-शिक्षक आंदोलन पर केंद्रित है। कुलपति पर वित्तीय हेराफेरी और कैंपस में हिंदुत्व एजेंडा थोपने का आरोप है, जिसके कारण चार महीने से शैक्षणिक गतिविधियां ठप्प हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के हस्तक्षेप के बावजूद, कुलपति ने अपने पद पर बने रहने और मंत्रालय के आदेशों को चुनौती देने का प्रयास किया, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।
यह लेख मणिपुर विधानसभा स्पीकर वाई. खेमचंद और सुप्रीम कोर्ट के बीच दलबदल कानून के तहत कांग्रेस विधायकों को अयोग्य ठहराने के मामले में चल रहे गतिरोध पर केंद्रित है। स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन के बावजूद सात कांग्रेस विधायकों को अयोग्य घोषित करने का फैसला टाल दिया, जिससे राज्य में भाजपा सरकार की स्थिरता पर सवाल उठ गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही वन मंत्री श्याम कुमार सिंह को अयोग्य घोषित करने का आदेश दिया था और संसद को दलबदल मामलों के लिए एक स्थायी ट्रिब्यूनल बनाने का सुझाव दिया है।
यह लेख मणिपुर में जारी जातीय हिंसा पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी की आलोचना करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे विभिन्न समुदाय और विपक्षी दल प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे हैं, जबकि वे अमेरिका यात्रा में व्यस्त थे। लेख में मणिपुर की माताओं और विपक्षी दलों द्वारा दिल्ली में किए गए विरोध प्रदर्शनों का भी उल्लेख है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मणिपुर में जातीय संघर्ष के बाद शांति स्थापित करने का प्रयास किया, जिसमें उन्होंने विभिन्न समुदायों से मुलाकात की और न्यायिक आयोग के गठन की घोषणा की। लेख बताता है कि राज्य सरकार और हाईकोर्ट के कथित पक्षपातपूर्ण रवैये ने हिंसा को बढ़ावा दिया, खासकर मेइती समुदाय को एसटी दर्जा देने के हाईकोर्ट के आदेश के कारण। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं, जबकि अमित शाह ने शांति समिति बनाकर समाधान का प्रयास किया।
यह लेख मणिपुर में हालिया हिंसा का विश्लेषण करता है, जिसमें मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश और कूकी समुदाय के विरोध को मुख्य कारण बताया गया है। यह राज्य सरकार की नीतियों, मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की भूमिका और केंद्र-राज्य मतभेदों पर सवाल उठाता है। लेख में मणिपुर के जातीय संघर्षों के ऐतिहासिक संदर्भ और राजनीतिक आयामों पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख मणिपुर विधानसभा चुनाव 2022 की विशिष्टताओं का विश्लेषण करता है, जो अन्य राज्यों से भिन्न हैं। इसमें दलबदल, मुख्यमंत्री एन. वीरेन सिंह की राजनीतिक रणनीति, कांग्रेस का जनाधार बचाने की चुनौती, और AFSPA जैसे क्षेत्रीय मुद्दों पर राष्ट्रीय दलों की चुप्पी पर प्रकाश डाला गया है। लेख में उग्रवाद, सेना की कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट के दलबदल संबंधी निर्णयों के प्रभाव को भी रेखांकित किया गया है।
यह लेख मणिपुर में मई 2023 से जारी जातीय हिंसा के तीसरे वर्ष में प्रवेश करने पर केंद्रित है। यह हिंसा को नियंत्रित करने में केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों और नेतृत्व की विफलता की आलोचना करता है, विशेष रूप से सुरक्षा बलों पर आम लोगों के घटते भरोसे और राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण गृह मंत्रालय के ध्यान भटकने पर प्रकाश डालता है। लेख में बच्चों की मौत और जांच आयोग की देरी जैसे हालिया घटनाक्रमों का भी उल्लेख है, जो नीतिगत बदलाव की तत्काल आवश्यकता पर जोर देता है।
मणिपुर में भाजपा की पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापसी ने पूर्वोत्तर में शांति की नई आशा जगाई है। भाजपा एकमात्र पार्टी थी जिसने चुनाव में आफ्प्सा हटाने का वादा नहीं किया, जबकि अन्य दलों ने किया। चुनाव परिणामों से पता चलता है कि मणिपुर के मतदाता शांति और मजबूत सरकार चाहते हैं, और उनके लिए आफ्प्सा का मुद्दा चुनावी प्राथमिकता नहीं है।