मणिपुर में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (AFSPA) को फिर से लागू करने और केंद्रीय बलों की तैनाती का विरोध जारी है, जबकि केंद्र सरकार हिंसा पर काबू पाने के लिए इन्हीं बलों पर निर्भर है। जनता को न तो केंद्रीय बलों पर भरोसा है और न ही राज्य पुलिस पर, और सेना की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर सरकार से हिंसा, लूटपाट और आगजनी की घटनाओं का ब्योरा मांगा है, जबकि इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने दिल्ली में प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की है।
यह लेख मणिपुर में राष्ट्रीय खेल यूनिवर्सिटी की स्थापना के केंद्र सरकार के फैसले की आलोचना करता है। लेखक तर्क देता है कि मणिपुर के लोग इस परियोजना में दिलचस्पी नहीं रखते क्योंकि वे लंबे समय से आफ्सपा के तहत सुरक्षा बलों की ज्यादतियों और मानवाधिकार उल्लंघनों से पीड़ित हैं। लेख में मणिपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति विवाद और फर्जी मुठभेड़ों की सीबीआई जांच का भी उल्लेख है, जो राज्य की गंभीर स्थिति को उजागर करता है।
यह लेख मणिपुर में भारत सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, विशेषकर आसियान देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के प्रयासों की, जबकि मणिपुर के लोग खुद को भारत से कटा हुआ महसूस करते हैं। इसमें सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के तहत सेना द्वारा कथित न्यायेत्तर हत्याओं और फर्जी मुठभेड़ों का जिक्र है, जिनकी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया है। लेखक नागा शांति समझौते की गोपनीयता और मणिपुर के लोगों के प्रति केंद्र सरकार के अविश्वास पर भी प्रकाश डालता है, यह तर्क देते हुए कि व्यापार से पहले लोगों का विश्वास जीतना आवश्यक है।
यह लेख मणिपुर विधानसभा चुनाव 2022 की विशिष्टताओं का विश्लेषण करता है, जो अन्य राज्यों से भिन्न हैं। इसमें दलबदल, मुख्यमंत्री एन. वीरेन सिंह की राजनीतिक रणनीति, कांग्रेस का जनाधार बचाने की चुनौती, और AFSPA जैसे क्षेत्रीय मुद्दों पर राष्ट्रीय दलों की चुप्पी पर प्रकाश डाला गया है। लेख में उग्रवाद, सेना की कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट के दलबदल संबंधी निर्णयों के प्रभाव को भी रेखांकित किया गया है।
मणिपुर में भाजपा की पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापसी ने पूर्वोत्तर में शांति की नई आशा जगाई है। भाजपा एकमात्र पार्टी थी जिसने चुनाव में आफ्प्सा हटाने का वादा नहीं किया, जबकि अन्य दलों ने किया। चुनाव परिणामों से पता चलता है कि मणिपुर के मतदाता शांति और मजबूत सरकार चाहते हैं, और उनके लिए आफ्प्सा का मुद्दा चुनावी प्राथमिकता नहीं है।
केंद्र सरकार ने नगालैंड में आफ्प्सा की अवधि छह महीने के लिए बढ़ा दी है, जबकि उसने स्वयं इस कानून को हटाने पर विचार करने के लिए एक समिति गठित की थी। यह फैसला मोन जिले में सेना की गोलीबारी में 14 नागरिकों की मौत के बाद व्यापक जन असंतोष और नगा शांति वार्ता पर इसके संभावित नकारात्मक प्रभाव के बावजूद लिया गया है। नगालैंड सरकार और विभिन्न नगा गुटों ने आफ्प्सा हटाने की मांग की है, लेकिन केंद्र ने अपनी ही समिति की रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नगालैंड के 6 पूर्वी जिलों को मिलाकर अलग आदिवासी राज्य की मांग पर चुनाव के बाद विचार करने का आश्वासन दिया है। यह लेख नगा अलगाववाद, शांति प्रक्रिया की ठप स्थिति, और भाजपा नेताओं द्वारा चुनावी वादों में विकास पर जोर देने के बावजूद अलग राज्य की मांग पर चुप्पी साधने का विश्लेषण करता है। इसमें AFSPA के विरोध और नगालैंड में महिला प्रतिनिधित्व की कमी जैसे मुद्दों पर भी प्रकाश डाला गया है।
नगा संकट के अंतिम समाधान की दिशा में केंद्र सरकार के वार्ताकार अक्षय कुमार मिश्र सभी नगा गुटों, सिविल सोसायटी और नगालैंड सरकार के साथ गहन बातचीत कर रहे हैं। यह प्रयास 1997 के बाद पहली बार हो रहा है, जिसमें मिश्र ने NSCN(IM) के भूमिगत मुख्यालय का भी दौरा किया। हालांकि, NSCN(IM) अभी भी अलग संविधान और झंडे की अपनी मांग पर अड़ा है, जबकि पूर्वोत्तर के कई जिलों से AFSPA हटाने जैसे हालिया घटनाक्रमों ने वार्ता के लिए सकारात्मक माहौल बनाया है।
यह लेख नगा शांति वार्ता में जारी गतिरोध का विश्लेषण करता है, जिसमें केंद्र सरकार और विभिन्न नगा गुटों, विशेषकर एनएससीएन (आई-एम) के बीच बातचीत शामिल है। लेखक दीमापुर और कोहिमा में अपने अनुभवों के आधार पर नगा लोगों की भावनाओं, अलग झंडे और संविधान की मांग, और AFSPA के प्रभाव पर प्रकाश डालते हैं। लेख में मोन जिले में असम राइफल्स की गोलीबारी की घटना और 'फ्रंटियर नगालैंड' राज्य की मांग का भी उल्लेख है, साथ ही नगालैंड के लिए एक अलग उच्च न्यायालय की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।
कश्मीर शांति वार्ता, अफजल गुरु क्षमादान विवाद, यूरोपीय संसद की भूमिका, पीओके बयानबाजी और सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम पर उठे प्रश्नों के बीच बदलते राजनीतिक तनाव का विश्लेषण।