यह लेख संविधान दिवस की 70वीं वर्षगांठ के अवसर पर संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरों पर केंद्रित है। इसमें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने, पूर्वोत्तर राज्यों की चिंताओं, राज्यसभा को दरकिनार कर बिल पारित करने, आरटीआई संशोधन, और न्यायपालिका व सीबीआई की स्थिति जैसे कई विवादास्पद मुद्दों पर चर्चा की गई है। लेखक सरकार की कार्यप्रणाली और संवैधानिक मर्यादाओं के कथित उल्लंघन पर चिंता व्यक्त करता है।
यह लेख चुनाव सुधारों पर केंद्रित है, विशेष रूप से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के मुद्दे पर। यह बताता है कि कैसे चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के प्रयासों के बावजूद, राजनीतिक दल इस मुख्य मुद्दे को टालते रहे हैं, जबकि अन्य सुधारों जैसे चुनावी बॉन्ड और मुफ्त चुनावी वादों पर चर्चा होती रहती है। लेख में दागी नेताओं की जीत और उनके खिलाफ लंबित मुकदमों पर भी प्रकाश डाला गया है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने विधानसभा को समय से पहले भंग कर दिया, जिससे चुनाव आयोग एक नई चुनौती में फंस गया। आयोग को अब तेलंगाना विधानसभा चुनाव मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम के साथ कराना होगा, जबकि तेलंगाना विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने में आठ महीने से अधिक का समय बचा था। यह कदम संवैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत चुनाव आयोग के लिए एक जटिल स्थिति पैदा करता है, खासकर एक साथ चुनाव कराने की राष्ट्रीय बहस के बीच।
चुनाव आयोग लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की जल्दबाजी दिखा रहा है, जबकि केंद्र सरकार इस पर राजनीतिक सहमति चाहती है। यह लेख गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों की तारीखों की घोषणा में आयोग के कथित राजनीतिक दबाव और विरोधाभासी कदमों पर भी सवाल उठाता है। विपक्षी दल आयोग के इरादों पर सवाल उठा रहे हैं, खासकर प्रधानमंत्री के गुजरात दौरों के संदर्भ में।
यह लेख गोरखालैंड राज्य आंदोलन की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करता है, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा बुलाई गई हालिया त्रिपक्षीय वार्ता पर प्रकाश डाला गया है। इसमें बताया गया है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने वार्ता में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिससे आंदोलन कमजोर पड़ गया है। लेख में बिमल गुरंग के भाजपा से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का समर्थन करने और दार्जीलिंग में गोरखालैंड के चुनावी मुद्दे के रूप में कमजोर पड़ने पर भी चर्चा की गई है।
यह लेख नगा शांति प्रक्रिया में आ रही बाधाओं और परिसीमन प्रक्रिया को लेकर नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि और मुख्यमंत्री नेफियू रियो के बीच मतभेदों पर प्रकाश डालता है। इसमें 2015 के 'नगा फ्रेमवर्क डील' की गोपनीयता, 'अलग झंडे और संविधान' की मांग, और चुनावी लाभ के लिए शांति वार्ता के इस्तेमाल जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है। लेख में मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश के हितों का भी उल्लेख है, जो 'ग्रेटर नगालिम' की अवधारणा से प्रभावित हो सकते हैं।