हिंदी के वरिष्ठ कवि नागार्जुन को पिछले दिनों मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने बिहार सरकार की ओर से जब सम्मानित किया तो साथ में च्यवनप्राश का डिब्बा भी दिया। बाबा नागार्जुन ने च्यवनप्राश के ही बहाने शुरू हुई चर्चा में कई अंतरंग बातें कह डालीं......!
'लालू का दिया च्यवनप्राश खाने में तो बड़ा मजेदार लग रहा है।' ये शब्द हैं हिंदी, संस्कृत और बंगला में समान अधिकार रखने वाले ८३ वर्षीय साहित्यकार बाबा नागार्जुन के, जो उन्होंने पिछले महीने बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा राजेन्द्र शिखर सम्मान प्रदान किए जाने के बाद व्यक्त किए। मुख्यमंत्री ने उन्हें एक लाख इक्यावन हजार के ड्राफ्ट के साथ-साथ च्यवनप्राश का एक किलो का डिब्बा भी भेंट किया। डिब्बा समारोह के दौरान ही जल्दबाजी में मँगाया गया। बिहार पर्यटन विकास निगम के कमरा नं. १०२ में एक चरमराते पलंग पर बैठे बाबा अपनी शैली में व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ च्यवनप्राश ब्रेड पर लगाकर खा रहे हैं और कह रहे हैं- 'च्यवनप्राश तो मैंने पहले भी खाया है, लेकिन इसका स्वाद तो गजब का है, सरकारी है न। गुणाकर मुले ने भी खाया, वे भी तारीफ करके राजगीर गए हैं। लालू कहते हैं 'रऊवा के, जियावे के बा, हेतना जल्दी हम जाए ना देब हेई लीं च्यवनप्राश के डिब्बा' (आपको जिंदा रखना है, इतनी जल्दी मैं जाने नहीं दूँगा, ये लीजिए च्यवनप्राश) बहुत बड़ा नौटंकीबाज है लालू, देखना इसकी नटलीला इसे दोबारा मुख्यमंत्री बना देगी, अभिनय में तो शत्रुघ्न सिन्हा का नाना है ये। हाँ, हड्डी तो गल रही है, अब लालू शायद मेरी खलड़ी (चमड़ी) के लिए मुझे और जिंदा रखना चाहता है। देखो तो च्यवनप्राश किस ब्रांड का है, इतना प्रचार हो रहा है, उसे भुगतान करना चाहिए। हँसी छूटती है।
बाबा के साथ-साथ प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह और विज्ञान जैसे विषय को सरल हिन्दी में प्रस्तुत करने वाले जाने माने लेखक गुणाकर मुले भी सम्मानित किए गए। तीनों लेखकों को बिहार सरकार के राजभाषा विभाग की ओर से पर्यटन विकास निगम के होटल में ठहराया गया। बातचीत के दौरान ही होटल वाला दो बार बिल के बारे में पूछने आ जाता है और बाबा के साथ मौजूद उनके सबसे बड़े पुत्र शोभाकांतजी द्वारा यह कहे जाने पर कि भुगतान राजभाषा विभाग की ओर से किया जाएगा' - बैरा आश्वस्त नहीं होता। इधर बाबा को तेज खाँसी आ जाती है और बैरा बिल रखकर कमरे के बाहर निकल जाता है। बाबा दुखी होकर थोड़ी देर चुप लगा जाते हैं। कमरे का टेलीफोन काम नहीं कर रहा है कि राजभाषा विभाग के अधिकारियों को इस अव्यवस्था की जानकारी दी जा सके। जरासी झपकी नहीं आती कि ड्राइवर गाड़ी का बिल मांगने आ जाता है। राजभाषा विभाग ने बाबा के कहने पर उनके लिए टैक्सी की व्यवस्था कर दी और किनारे हो गए। ड्राइवर के आने पर बाबा बेचैनी महसूस करते हैं और सो नहीं पाते। राजेन्द्र शिखर पुरस्कार बाबा को देने की घोषणा तो पिछले वर्ष सितंबर में ही हो गई, लेकिन देने की बात टल गई क्योंकि राजभाषा विभाग के पास पैसे नहीं थे। बाबा को यह पुरस्कार दिलाने में उनके अनन्य मित्र और जद सरकार की सहयोगी पार्टी भाकपा के सांसद चतुरानन मिश्र ने मुख्य भूमिका निभाई जिनके अथक प्रयासों से सरकार ने कोष में पैसे दे दिए। अब अगले पुरस्कार की शायद घोषणा भी न हो। यों भी बाबा श्री मिश्र को छोड़कर किसी अन्य राजनीतिज्ञ से मिलना पसंद नहीं करते। आखिरकार १४ नवंबर ९४ को बाबा को पुरस्कार दिया गया और उसके एक दिन बाद यानी कि १५ नवंबर की दोपहर की ये बात है।
बाबा का कहना है कि उन्हें पैसा और सम्मान से ज्यादा अब सेवा तथा देखभाल की जरूरत है , लेकिन अफसोस की बात है कि इस मोर्चे पर सबके सब पिछड़ जाते हैं। बाबा अपने पुत्रों के व्यवहार से बड़े दुखी हैं- 'जब तक मैं जीवित रहूँगा ये लोग मेरी हड्डी चूसते रहेंगे और इस झूलती बुढ़ौती में मेरी गत देखो कि पेट भरने के लिए कलम चलाने को विवश हूँ। सम्मान की राशि से ज्यादा दिन पेट नहीं चलता, क्योंकि उसमें भी तो मेरे पुत्रों को हिस्सा चाहिए, लेकिन मेरा हाल पूछने वाला कोई नहीं। साहित्य अकादमी फेलोशिप के एवज में बहुत होगा तो कहीं जाने का खर्च देगा वह भी खास उद्देश्यों के लिए, अकादमी को मेरे बाकी खर्चों से क्या मतलब। बाबा के मुताबिक शोभाकांत को छोड़कर किसी को इतना भी नहीं पता कि मेरी कौन रचना किस प्रकाशक ने छापी है। उनका कहना है कि जब 'मेरे पास पैसा कहीं से आता है तो सब के सब मेरे इर्द-गिर्द रहते हैं और उसके बाद कोई एक गिलास पानी भी नहीं देने आता। आखिर में 'मिनी (श्रीमती उषा किरण खान का बचपन का नाम) का घर काम आता है। या फिर शोभाकांत के पास रहता हूँ।' बाबा को अपने चारों पुत्रों का खर्च चलाना पड़ता है। बाबा मानते हैं कि अगर थोड़ी बहुत सेवा भावना है तो शोभाकांत में है जो एक पैर से लाचार होने के बावजूद आखिर ख्याल तो रखता है।
शोभाकांतजी ने वर्षों मेहनत करके बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, सिन्हा लाइब्रेरी, नेशनल लाइब्रेरी, कलकत्ता और हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन, इलाहाबाद सरीखे प्रमुख पुस्तकालयों में बैठकर बाबा की ऐसी-ऐसी दुर्लभ पुरानी रचनाएँ खोज निकालीं जिन्हें देखकर स्वयं बाबा को याद नहीं आई कि कब की हैं। उन रचनाओं की गंध पाते ही प्रकाशक टूट पड़े क्योंकि नागार्जुन उस लोकप्रिय जनकवि का नाम है जिनकी पुस्तकें लोग व्यक्तिगत स्तर पर खरीदकर पढ़ते हैं, पुस्तकालयों के भरोसे नहीं रहते। वह जादुई लेखनी अकेले बाबा के पास है जिन्होंने एक ओर जहाँ आंचलिक परिवेश को माध्यम बनाकर नई पीढ़ी को हाथ में मशाल थामने की प्रेरणा दी, वहीं दूसरी ओर देश के तमाम सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक पहलुओं पर पैनी खुरदरी टिप्पणियाँ कीं इसका तात्पर्य यह नहीं कि विशुद्ध साहित्य की उन्होंने उपेक्षा की। बाबा की साहित्यिक कविताओं के पढ़ते-पढ़ते लोग विभोर हो उठते हैं और ऐसी अधिकांश रचनाएँ उनकी काफी पुरानी हैं जिन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय श्री शोभाकांतजी को है जो उनकी टिप्पणियों के साथ छपी हैं।
प्रकाशकों ने हमेशा बाबा की मजबूरी का फायदा उठाया और चूँकि बाबा के जीवनयापन का एकमात्र जरिया उनकी लेखनी है, इसलिए उन्हें हमेशा पैसे की जरूरत रहती है- खासकर, उनके घुमंतू स्वभाव होने के कारण और भी ज्यादा। अपनी बेहतर-से-बेहतर रचनाएँ बाबा को प्रकाशकों की शर्तों पर देनी पड़ीं और उसके बाद जो मिला तो उसे पैतृक संपत्ति के दावे पर बाँटने पुत्रगण पहुँच गए। यह सब बताते-बताते बाबा का स्वर अत्यंत करुण हो उठता है। कई वर्षों से भयंकर दमे से पीड़ित बाबा खाँसी का वेग रोक नहीं पाते और थोड़ी देर शांत रहने का इशारा करके लेट जाते हैं।
पटना में रह रहे अपने दो पुत्रों के डर से पुरस्कार के बतौर मिले ड्राफ्ट को बाबा राजधानी में नहीं भुनाते, लेकर दरभंगा चले जाते हैं जहाँ दमे के इलाज में कम से कम उन्हें साल में दो-चार बार आकर महीनों रहना पड़ता है। दरभंगा में वे शोभाकांतजी के यहाँ रहते हैं। १९८७ में यहीं बाबा की तकलीफ बेहद बढ़ गई, बिहार के लेखकों द्वारा हाय तौबा मचाने पर तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने काफी जद्दोजहद के बाद साहित्यकार कल्याण कोष से बाबा के इलाज के लिए दो हजार रुपए मंजूर किए और जब भुगतान का वक्त आया तो ट्रेजरी वालों ने बताया कि इस कोष के मद में पैसे ही नहीं हैं। तब तक मध्यप्रदेश सरकार का ड्राफ्ट आ चुका था। अभी बिहार सरकार मात्र ५०० रुपए पेंशन देती है जो बाबा को जून से नहीं मिली। वयोवृद्ध बाबा शायद अकेले ऐसे लेखक हैं जिन्हें बिहार में पैदा होने के लिए फख्र महसूस करने में संकोच होता है, क्योंकि सबसे ज्यादा उपेक्षा उनकी अपने ही प्रदेश में हुई है। उनसे भी ज्यादा उपेक्षित और अभाव की जिंदगी कविवर आरसी प्रसाद सिंह जी रहे हैं।
बाबा बताते हैं, 'दरभंगा के जिला मजिस्ट्रेट मेरे निवास पर सिर्फ पुरस्कार की सूचना देने गए- मुख्यमंत्री के निर्देश पर। न उसके पहले कभी खोजखबर ली न उसके बाद लेंगे। अब लगता है मैं सिर्फ समारोह में इस्तेमाल की वस्तु बनकर रह गया हूँ। शुक्र है उस विश्व संस्था का, जिसका ध्यान मेरे गाँव की ओर गया।
यूनिसेफ ने बाबा के पैतृक गाँव तरौनी (जिला दरभंगा) को 'मॉडल गाँव' चुनकर वहाँ बाबा के झोपड़ीनुमा घर को पक्का करने, सामुदायिक विकास भवन बनवाने और जिला मुख्यालय तक पक्की सड़क से जोड़ने के लिए राशि उपलब्ध कराई है ताकि बाबा उस गाँव में पुनः जाकर रह सकें जहाँ के पात्र उनके सभी उपन्यासों में बोलते हैं। आज तब बिहार सरकार का कोई परिंदा उस गाँव में झाँकने तक नहीं गया।
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के वर्तमान निदेशक प्रो. महेन्द्र प्रसाद यादव को बाबा की संपत्ति के बारे में विस्तृत जानकारी है। उन्हें पता है कि दिल्ली में बाबा के पास काफी जमीन है, आलीशान मकान है और पैसे की कमी नहीं है। गरीब लेखकों में बाबा नहीं आते और परिषद ने हाल में गरीब लेखकों की मदद की योजना बनाई है।
बिहार सरकार से बाबा को कोई उम्मीद नहीं, लेकिन मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश सरकारों के प्रति आभारी हैं। केंद्रीय रेल मंत्री जाफर शरीफ से उनकी गुजारिश है कि अगर दो आदमी का प्रथम श्रेणी का पास उपलब्ध करा दें तो बड़ी मेहरबानी हो, क्योंकि सारी उमर तो तृतीय श्रेणी के डिब्बों के रेलमपेल में कट गई, अब यह जर्जर शरीर द्वितीय श्रेणी के धक्के नहीं बर्दाश्त कर पाता। लेकिन बाबा यह खबरदार करना नहीं भूलते कि उन्हें फर्जी स्वतंत्रता सेनानीवाला या सर्वोदयी पास नहीं चाहिए, एक ऐसे साहित्यकार के रूप में चाहिए जिसकी पुस्तकें देश के १८ विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। हिंदी और बंगला में माध्यमिक कक्षा से लेकर एम.ए. तक बाबा की रचनाएँ चलती हैं तथा संस्कृत में भी उनके श्लोक काफी पसंद किए गए हैं।
राजनीतिज्ञों से मिलना और राजनीति के संबंध में बात करना बाबा को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है। चर्चा करने पर संक्षेप में बोल जाते हैं- जेपी आंदोलन को उनके अनुयायियों ने कूड़ा करके रख दिया। (यहाँ यह बात दीगर है कि जेपी के नेतृत्व वाले १९७४ के छात्र आंदोलन के समर्थन में बाबा नागार्जुन ने नुक्कड़ों पर झूमझूमकर 'इंदूजी इंदूजी क्या हुआ आपको, सत्ता के मद में भूल गई बाप को' सरीखी कविताओं का पाठ किया, और जेल भी गए। उनकी दृष्टि में भारतीय जनता पार्टी तलैया में पैदा होने वाले मच्छर की तरह है जो नई पीढ़ी को गुमराह कर रही है। प्रधानमंत्री नरसिंहराव खूब मजे में सरकार चला लेंगे, क्योंकि ये जोड़तोड़ की कला में पारंगत हैं। आखिर उन्हीं की बदौलत तो रामलखन सिंह यादव का वैधव्य छूटा और अजीत सिंह को भी बड़ी चतुराई से मिला लिया।')
कुछ वामपंथियों के नाम से भी बाबा काफी चिढ़ते हैं। उनके मुताबिक उनका चरित्र भ्रष्ट हो गया है, न कोई नीति है न सिद्धांत, जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी कीजै वाली 'कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। कहते हैं इन वामपंथियों को उस जमीन की जानकारी नहीं 'जहाँ खेतों में बंदूकें बनती हैं टके सेर तो बम बिकता है- याद है कि नहीं?'
बाबा फिर घूमकर जेपी के अनुयायियों पर आ जाते हैं और कहते हैं कि इन लोगों ने जिस तरह से आंदोलन के आदर्शों, उपलब्धियों को कूड़ा किया तो अब इन पर तरस भी नहीं आता। बाबा के मुताबिक, 'अच्छे राजनीतिज्ञ कभी किसी व्यापक जनांदोलन की उपलब्धियों की बंदरबाँट में शामिल नहीं होते। आजादी के बाद के माहौल से दुखी होकर महात्मा गाँधी ने दिल्ली छोड़ दी थी, नोआखली चले गए थे। अब नहीं बोला जाता' पुनः खाँसी आ जाती है और बाबा अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ प्रेम से स्लाइस में लालू प्रसाद वाला च्यवनप्राश लगाने लगते हैं।
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### [परिशिष्ट: मूल अंक में प्रकाशित नागार्जुन की कविताएं]
### गेहूँ दो, चावल दो!
गेहूँ दो, चावल दो! इतना दिया, और दो, पुष्कल दो! गंगा बेकार है, हडसन का जल दो! चारा दो, फल दो! हिलेगी कैसे, दुम में बल दो! गेहूँ दो, चावल दो!!
जीत हम जाएँ, सवालों का हल दो बटोर लिए हैं राजा-रानी, मोर-पंख झल दो! धोखा खा जाए पड़ोसी, ऐसी अकल दो! उगे हैं बगावत के अँखुए, उनको मसल दो! रंगी हैं तरुण निगाहें, जादुई काजल दो!
जपे हैं नाम बहुत, उसका फल दो! फिलहाल गेहूँ दो, चावल दो! और दो, अधिक दो, पुष्कल दो! कानों को भले बराबर मल दो! हिलेगी खूब, दुम में बल दो!
### हम भी साझीदार थे
लगता है प्रजातंत्र का रथ उतर गया है पटरी से लगता है सारी-की-सारी पार्टियों के नेता रुचिपूर्वक खेल रहे हैं दलीय स्वार्थों के शतरंज अंधे धृतराष्ट्र की मोह-माया भली-भाँति प्रवेश कर गई है दलपतियों के अंतःकरण में
लगता है बुद्धिजीवियों की हमारी अपनी बिरादरी भी शत-प्रतिशत लिप्त है सुविधाएँ बटोरते जाने की द्यूत-क्रीड़ा में जी हाँ, अँगूठा दिखला रहे हैं हमारे पुत्र-पौत्र, स्वजन-परिजन सुरक्षित है हमारी आशीष उन्हीं के निमित्त... जी हाँ, अपने तो स्थितप्रज्ञ ठहरे कोई अँगूठा दिखलाए अथवा अर्पित करे फूल-माला अच्छा ही तो लगता है! लगता है हम भी साझीदार थे राजघाट वाली उस बेहयाई में! अभी तो उतर गया प्रजातंत्र का रथ पटरी से...
-नागार्जुन