बाबा नागार्जुन जयंती (10 मई) के लिए विशेष

- शशिधर खान

हिन्दी में 'नागार्जुन' और मातृभाषा मैथिली में 'यात्री' नाम से सर्वाधिक प्रसिद्धि पाने वाले पं. वैद्यनाथ मिश्र साहित्य जगत के एकमात्र हस्ताक्षर हैं जिनका न केवल संस्कृत, बंगला में भी हिन्दी के समान अधिकार था, बल्कि लोकप्रियता की दौड़ में उन्होंने अपने समय के सभी रचनाकारों को पीछे छोड़ दिया । उम्र ढलने से पहले ही नागार्जुन 'बाबा' के नाम से मशहूर हो गए थे । चूंकि वे हिन्दी साहित्य के एकमात्र औघड़ थे, इसलिए बाबा कहने से ही लोग समझ जाते थे कि किस साहित्यकार की बात हो रही है । भारत की किसी भी भाषा में बाबा जैसी हस्ती की दूसरी मिसाल नहीं मिलती जिनकी रचनाशीलता में एक ही साथ कालिदास, तुलसीदास, कबीरदास की शैली की स्पष्ट झलक मिलती हो । बाबा के जीवन जीने के स्टाईल में और लिखने के अंदाज में सबसे ज्यादा कबीर का प्रभाव मिलता है, इसलिए उन्हें आधुनिक कबीर कहा ही जाता है ।

बाबा नहाते नहीं थे, न ही कभी दांत साफ करते थे और सुविधासम्पन्न जिंदगी से उन्हें नफरत थी । वे उन्हीं गरीब, उपेक्षित आम लोगों के बीच उठना बैठना पसंद करते थे जिन्हें उन्होंने अपनी रचनाओं का पात्र बनाया । दिल्ली जैसे महानगर की चकाचौंध बाबा को कभी आकर्षित नहीं कर पाई । उनका बुढ़ापा भी यों तो युवावस्था की तरह ही घूमते-फिरते गुजरा, मगर हर जगह से घूम-घामकर वे फिर ज्यादा समय दिल्ली के स्लम इलाके में गुजारते थे । पहले टैगोर पार्क में रहे और फिर बाद में सादतपुर (करावलनगर) में रहने लगे । उनसे मिलने के लिए रिक्शा से और फिर पैदल जाना पड़ता था । कहा जाता है कि बाबा के पास इतने पैसे ही नहीं होते थे कि वे बेहतर स्थिति में रहे सकें, मगर सच्चाई यह है कि बाबा की सारी जिन्दगी समाज के छिद्रों को खुरचने के लिए समर्पित थी, इसलिए उन्होंने ऐशो-आराम की कभी चाहत नहीं की ।

जिस ऐश के लिए राजनीति में जाने का इन दिनों फैशन है, उसमें शामिल किसी भी व्यक्ति को बाबा ने बख्शा नहीं । वो चाहे जवाहर लाल नेहरू हों, इंदिरा गांधी हों, जयप्रकाश नारायण हों अथवा कम्युनिस्ट लोग हों । विचारों से थोड़ी कम्युनिस्ट सोच बाबा की जरूर थी और वो कुछ दिनों तक बौद्ध भिक्षु की तरह भदन्त आनंद कौसल्यायन तथा राहुल सांकृत्यायन के संसर्ग में आने के कारण हो सकती है, मगर वे कम्युनिस्ट नहीं बने । बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद के उस बिन्दु को बाबा भली भांति समझते थे जहां ईश्वर के अस्तित्व को नकारा गया है, लेकिन उन्होंने नास्तिकता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया । हां, पूजापाठ के नाम पर कायम हिन्दू समाज की कुरीतियों को दर्शाने वाले कथानक उनकी कृतियों के मुख्य विषय रहे । कम्युनिस्ट नेता और वामपंथी रूझान वाले साहित्यकारों ने जब बाबा को कम्युनिस्ट के रूप में प्रचारित कर दिया तो उन्होंने ऐसे लोगों को जमकर लताड़ा तथा 'प्रगतिशील' शब्द पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की । उनका मानना था कि जनता के बीच रहकर जनसाधारण के हित में काम करने के लिए किसी वाद को अपनाने की जरूरत नहीं है । शोषण, उत्पीड़न और राजनीतिक अव्यवस्था के खिलाफ अपनी लेखनी से आजीवन खौलता लहू उगलने वाले बाबा खून की होली में विश्वास रखने वाले नक्सली विचारों के हिमायती नहीं थे । दरअसल उन्होंने निम्न और मध्य आयवर्गीय जिन्दगी को काफी करीब से महसूस किया । उसे चित्रित करते समय वे अच्छी तरह समझ रहे थे कि समाज के इस वर्ग का जीवनस्तर किसी भी व्यवस्था में बदलाव आने से सुधर नहीं सकता । भूख और अभाव को बाबा ने बचपन से देखा, जो मृत्युपर्यन्त उनके जीवन के अंग बने रहे । गरीबी में जीने के बावजूद उनके मन में गरीबों के लिए दर्द था । साइकिल रिक्शा वाले को भाड़ा के अलावे दस-बीस रूपए दे दिया करते थे । बाबा नागार्जुन का साहित्य संसार बताता है कि एक ओर जहां उन्होंने अपने समय की तमाम समसामयिक घटनाओं पर तीखी, खुरदरी टिप्पणियां की और इतनी की कि उनकी छवि ऐसे ही साहित्यकार के रूप में बन गई, वहीं दूसरी और तुलसी व कालिदास की शैली में विशुद्ध साहित्यिक पद्यों की रचना करके बाबा ने अपनी विद्वता की धाक जमाई । ऐसे साहित्य बाबा ने कॉलेजों में हिन्दी पढ़ाने वालों को जवाब देने के लिए लिखे, जिन्हें वे 'तथाकथित' लेखक कहा करते थे । यह इसलिए भी करारा झटका था क्योंकि बाबा कहते थे - 'भई, अपने पास तो हिन्दी में एम.ए., पीएचडी की डिग्री नहीं है', हम क्या साहित्य लिखेंगे, कमाल है, हिन्दी पढ़ाने क्या लग गए, अपने को लेखक मान लिया । इस मामले में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को अपवाद मानते थे ।

बाबा के व्यंग्य का खुरदरापन उनके हर काम से झलकता था और कभी-कभी काफी गहराई लिए होता था । एक बार का किस्सा मुझे याद आता है । बात 1992 की है, जब बिहार सरकार ने बाबा को राजेन्द्र शिखर सम्मान से सम्मानित किया । तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने सम्मान प्रदान करने के साथ-साथ बाबा को च्यवनप्राश का एक डिब्बा यह कहते हुए भेंट किया - 'मैं अपनी माँ के लिए ला दिया करता था । रौआ के हम मरे ना देब, रौआ के जियाबे के बा (आपको हम मरने नहीं देंगे, आपको जिलाना है) ।' पुरस्कार समारोह की समाप्ति के बाद पर्यटन विभाग के होटल के कमरे में च्यवनप्राश ब्रेड पर लगाकर खाते हुए बाबा ने कहा - 'च्यवनप्राश तो मैंने पहले भी खाया है, मगर इसका तो मजा ही कुछ और है, सरकारी है न इसलिए । गजब का स्वाद है प्यारे ।' अभिनय में शत्रुघ्न सिन्हा का नाना है लालू, देखना, इसकी नटलीला इसे दुबारा मुख्यमंत्री बना देगी । 'बाबा का कहना सही निकला ।

कस्बानुमा शहर दरभंगा के अस्पताल में उचित चिकित्सा और देखभाल के अभाव में बाबा अंतिम सांस लेने के दिन से कई महीने पहले अधमरे हो गए थे । लेकिन जिस बिहार को बाबा ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति दी, वहां की सरकार का कोई परिंदा उनका कभी हालचाल लेने नहीं गया, न ही कोई आर्थिक मदद पहुंचायी । जबकि लालू प्रसाद उसी जेपी आंदोलन की उपज हैं जिसमें आपातस्थिति के खिलाफ श्रीमती इंदिरा गांधी पर कविता पढ़ने के कारण बाबा को जेल जाना पड़ा । बिहार के कुछ साहित्यकारों द्वारा काफी शोरशराबा किए जाने के बाद बड़ी मुश्किल से सरकार ने बाबा के इलाज के लिए दो हजार का चेक काटा लेकिन ट्रेजरी में पैसे न होने के कारण चेक भुनाया नहीं जा सका । इससे घृणित स्थिति की कल्पना नहीं की जा सकती । ये 1992 के उस समय की बात है जब बाबा अपने जिले (दरभंगा) के अस्पताल में बिल्कुल संज्ञाहीन बेजान की तरह बिस्तर पर पड़े रहते थे । न सुन पाते थे, न ही किसी परिचित को गौर से देखने के बाद भी पहचान पाते थे । शुक्र है, मध्यप्रदेश सरकार का, जिसने बिहार सरकार का रूख जानने के बाद बाबा के इलाज का सारा खर्च अपने जिम्मे ले लिया । मध्यप्रदेश में बाबा ने काफी समय गुजारा है ।

बाबा दमे के मरीज थे, यह बात किसी से छिपी नहीं है और उनकी राजनीतिक कविताएँ भी जन-जन की जुबान पर है । जिन्हें उद्धत करना कोई बहुत आवश्यक नहीं । मैं उन गिने-चुने भाग्यशालियों में से हूं जिन्हें बचपन से ही बाबा का सान्निध्य मिला । इसलिए मैं बाबा के कतिपय वैसे अंतरंग संस्मरणों पर ही केन्द्रित कर रहा हूँ जिनसे जुड़ी बातें अभी-भी जनसाधारण तक नहीं पहुंची है । बाबा ने जनकवि बनने के लिए वैसी भाषा और बोली का इस्तेमाल किया जो कबीर व तुलसी ने अपनाया था । हिन्दी साहित्य के काव्य संसार में धारा की विविधताएं बाबा को विलक्षण प्रतिभा का परिचय देती है ।

'भस्मांकुर' काव्य तुलसीदास के 'बरवे रामायण' की तर्ज पर लिखी हुई है । बाबा के संस्कृत श्लोकों में वर्णित शिव-पार्वती विवाह का प्रसंग पढ़ते समय लगता है कि मानो कालिदास का 'कुमारसंभवम्' सामने हो । कालिदास ने जिस उपजाति छंद का इस्तेमाल किया है उसका ज्ञान बाबा ने किशोरावस्था में ही हासिल कर लिया था । क्योंकि कर्मकांडी ब्राह्मण कुल में पैदा होने के कारण उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा संस्कृत माध्यम से हुई । प्राकृत, पालि, बंगला और अंग्रेजी उन्होंने अपने हुनर से सीखी । यह भी आश्चर्य है कि बिल्कुल पोंगापंथी पंडिताई वाले माहौल में पढ़े बाबा की रगों में अन्याय व अत्याचार के खिलाफ विद्रोह की भावना कूट-कूटकर भरी थी । क्रांति तो इस तरह से उनकी सोच में रची बसी थी कि उन्होंने 'ऊँ शांतिः शांतिः' की अपने ढंग से 'ऊँ क्रांतिः क्रांतिः' के रूप में व्याख्या करके जनता के सामने पेश किया और बुढ़ापे में भी नौजवानों के हाथ में धू-धू जलती मशाल थमाने का माद्दा रखते थे । उन्हें नौजवानों के बीच रहना बहुत भाता था । नागार्जुन की लेखनी में सांप की फुफकार जैसा दंश था ।

बुढ़ापे में भीड़भाड़ में ट्रेन में चढ़ने उतरने में बाबा को काफी दिक्कत होती थी । इसलिए उन्होंने पीवी नरसिंह राव के शासनकाल में रेलमंत्री सी. के. जाफर शरीफ से प्रथम श्रेणी के पास की गुहार की, मगर सर्वोदयी या फर्जी स्वतंत्रता सेनानी वाला नहीं, एक ऐसे साहित्यकार के रूप में जिसकी रचनाएं देश के 18 विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में शामिल है । उनका अक्खड़पन और अड़ियल स्वभाव सर्वजनीन है । तभी तो कोई भी सरकारी उपाधि या पुरस्कार बाबा को सरकार का पिट्ठू नहीं बना पाया । साहित्य अकादमी द्वारा नवरत्न में शामिल किए जाने पर अपनी प्रतिक्रिया में बाबा ने कहा था - 'मुझे सम्मान की नहीं, पैसे की जरूरत है और हमेशा यह डर मन में रहता है कि जिस दिन लेखनी बंद हो जाएगी, खाने के लाले पड़ जाएंगे' मैंने 1996 में साहित्य अकादमी के सचिव के. सच्चिदानंदन जी से बाबा के लिए कुछ विशेष आर्थिक सहायता के प्रावधान का आग्रह किया था । अकादमी इस पर विचार करती रह गई, बाबा दुनिया से चले गए ।

2011 में बाबा की जन्मशती उनके अपने ही राज्य बिहार में बिल्कुल फीकी रही । महात्मा गांधी हिन्दी यूनिवर्सिटी, वर्धा से नागार्जुन प्रेमियों ने पटना आकर तीन दिनों की बाबा संगोष्ठी आयोजित की ।